गज़ल (दुष्यंत कुमार)
Assam Board · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for गज़ल (दुष्यंत कुमार) — Assam Board Class 11 Hindi.
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गज़ल के साथ
1आखिरी शेर में गुलमोहर की चर्चा हुई है। क्या उसका आशय एक खास तरह के फूलदार वृक्ष से है या उसमें कोई सांकेतिक अर्थ निहित है? समझाकर लिखें।Show solution
'जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।'
आशय एवं सांकेतिक अर्थ:
गुलमोहर यहाँ केवल एक फूलदार वृक्ष का नाम नहीं है, बल्कि इसमें गहरा सांकेतिक अर्थ निहित है। गुलमोहर का शाब्दिक अर्थ है — 'फूलों का राजा' या 'सुंदरता, वैभव और समृद्धि का प्रतीक'।
सांकेतिक अर्थ:
- 'अपने बगीचे में गुलमोहर के तले जीना' — इसका अर्थ है कि यदि जीना है तो अपने सुख-वैभव, अपनी सुविधाओं और अपने स्वार्थ के लिए जीना।
- 'गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए मरना' — इसका अर्थ है कि यदि मरना (बलिदान देना) है तो दूसरों की खुशी, समाज की भलाई और सुंदर भविष्य के निर्माण के लिए मरना।
निष्कर्ष: कवि दुष्यंत कुमार यहाँ स्वार्थपूर्ण जीवन की तुलना परोपकारी बलिदान से कर रहे हैं। गुलमोहर सुंदर, उज्ज्वल और बेहतर भविष्य का प्रतीक है। कवि का संदेश है कि सच्चा जीवन वही है जो दूसरों के लिए, समाज के लिए, एक बेहतर कल के लिए समर्पित हो।
2पहले शेर में चिराग शब्द एक बार बहुवचन में आया है और दूसरी बार एकवचन में। अर्थ एवं काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से इसका क्या महत्व है?Show solution
'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।'
*(पहले शेर का संदर्भ — 'यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है / चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।')*
'चिराग' का बहुवचन और एकवचन में प्रयोग:
पहले शेर में 'चिराग' बहुवचन में आया है — अर्थात् अनेक दीपक, अनेक आशाएँ, अनेक प्रयास। परंतु दूसरी बार 'चिराग' एकवचन में आया है — अर्थात् एक अकेला दीपक, एक अकेली उम्मीद।
अर्थ की दृष्टि से महत्व:
- बहुवचन 'चिराग' — समाज में अनेक लोग, अनेक नेता, अनेक आंदोलन हैं जो परिवर्तन का दावा करते हैं।
- एकवचन 'चिराग' — परंतु वास्तव में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो सच्चे अर्थों में रोशनी दे सके, जो व्यवस्था को बदल सके।
काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से महत्व:
यह प्रयोग व्यंग्यात्मक विरोधाभास (Irony) उत्पन्न करता है — जहाँ बहुत सारे दीपक हों, वहाँ एक भी काम का न हो। यह शासन-व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। बहुवचन से एकवचन की यात्रा निराशा और विडंबना को और अधिक तीव्र बना देती है।
3गजल के तीसरे शेर को गौर से पढ़ें। यहाँ दुष्यंत का इशारा किस तरह के लोगों की ओर है?Show solution
'न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।'
व्याख्या:
इस शेर में दुष्यंत कुमार उन लोगों की ओर इशारा कर रहे हैं जो —
1. समझौतावादी और अवसरवादी हैं — जो अपनी सुविधा के लिए किसी भी परिस्थिति से समझौता कर लेते हैं।
2. स्वार्थी और कायर हैं — जो अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने की बजाय उसी व्यवस्था में अपना काम निकाल लेते हैं।
3. नेता और राजनेता — जो जनता की समस्याओं को दूर करने के बजाय उन्हें किसी-न-किसी तरह बहला-फुसलाकर चुप करा देते हैं।
4. वे लोग जो क्रांति के लिए अयोग्य हैं — 'इस सफर के लिए' से तात्पर्य परिवर्तन और क्रांति की यात्रा से है। ऐसे लोग जो अभाव में भी संतुष्ट रहते हैं, वे बदलाव की लड़ाई नहीं लड़ सकते।
निष्कर्ष: कवि व्यंग्यपूर्वक कह रहे हैं कि जो लोग अपनी दुर्दशा को भी सहज स्वीकार कर लेते हैं, वे क्रांति और परिवर्तन के मार्ग पर चलने के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं हैं।
4आशय स्पष्ट करें:
तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।Show solution
शब्दार्थ:
- निजाम = शासन, राज
- सिल दे = बंद कर दे, सी दे
- जुबान = वाणी, आवाज़
- शायर = कवि
- एहतियात = सावधानी
- बहर = छंद (यहाँ सांकेतिक अर्थ में — इस युग के लिए, इस दौर के लिए)
आशय:
कवि व्यंग्यपूर्वक शासन-व्यवस्था से कह रहे हैं — 'तेरी सत्ता है, तेरा राज है, तो कवि (शायर) की जुबान बंद कर दे। यह सावधानी इस छंद (युग/दौर) के लिए बहुत ज़रूरी है।'
गहरा अर्थ:
- शासक वर्ग हमेशा से सच बोलने वाले कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की आवाज़ दबाता रहा है।
- 'बहर' का अर्थ यहाँ केवल काव्य-छंद नहीं, बल्कि 'इस दौर', 'इस युग' के लिए है।
- कवि व्यंग्य से कह रहे हैं कि यदि शासन को अपनी सत्ता बचानी है तो उसे सच बोलने वाले कवि की आवाज़ ज़रूर दबानी होगी, क्योंकि कवि की कलम सबसे बड़ा खतरा है।
निष्कर्ष: यह शेर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाले दमन का प्रतीक है। कवि शासन की दमनकारी नीति को उजागर करते हुए उसकी निरंकुशता पर करारा व्यंग्य करते हैं।
गज़ल के आस-पास
1दुष्यंत की इस गजल का मिजाज बदलाव के पक्ष में है। इस कथन पर विचार करें।Show solution
विचार एवं विश्लेषण:
यह कथन पूर्णतः सत्य है। दुष्यंत कुमार की यह गज़ल आपातकाल (1975-77) के दौर में लिखी गई थी, जब देश में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था। पूरी गज़ल में बदलाव की माँग स्पष्ट रूप से दिखती है —
1. 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए' — जनता की पीड़ा इतनी बड़ी हो गई है कि अब उसे बदलाव की गंगा बनकर बहना चाहिए।
2. 'मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही / हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए' — क्रांति की आग कहीं-न-कहीं जलनी ही चाहिए, बदलाव अनिवार्य है।
3. 'न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे' — यह व्यंग्य उन लोगों पर है जो बदलाव के लिए तैयार नहीं, कवि ऐसे लोगों को अयोग्य मानते हैं।
4. 'तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की' — शासन की दमनकारी नीति का विरोध और बदलाव की माँग।
5. 'जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले / मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए' — बलिदान और परिवर्तन के लिए प्रेरणा।
निष्कर्ष: इस प्रकार पूरी गज़ल में दुष्यंत कुमार व्यवस्था परिवर्तन, सामाजिक क्रांति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान करते हैं। गज़ल का समग्र स्वर विद्रोह, जागरण और बदलाव का है।
2'हमको मालूम है जनत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है'
दुष्यंत की गजल का चौथा शेर पढ़ें और बताएँ कि गालिब के उपर्युक्त शेर से वह किस तरह जुड़ता है?Show solution
'कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।'
गालिब का शेर:
'हमको मालूम है जनत की हकीकत लेकिन,
दिल के खुश रखने को गालिब ये खयाल अच्छा है।'
दोनों शेरों में संबंध:
गालिब के शेर का आशय: गालिब कहते हैं कि हम जानते हैं कि स्वर्ग (जनत) की वास्तविकता क्या है — वह शायद एक कल्पना मात्र है। परंतु मन को खुश रखने के लिए यह विचार अच्छा है। अर्थात् — वास्तविकता कड़वी है, पर मन को बहलाने के लिए मीठे सपने देखते हैं।
दुष्यंत के शेर का आशय: दुष्यंत कहते हैं कि वादा तो यह था कि हर घर में रोशनी होगी (स्वतंत्रता के बाद का सपना), परंतु हकीकत यह है कि पूरे शहर में एक दीपक भी नसीब नहीं। अर्थात् — वादे और वास्तविकता में भारी अंतर है।
दोनों में समानता:
- दोनों शेर आदर्श और यथार्थ के बीच की खाई को उजागर करते हैं।
- गालिब जहाँ व्यक्तिगत स्तर पर मन को बहलाने की बात करते हैं, वहीं दुष्यंत सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर शासन के खोखले वादों को उजागर करते हैं।
- दोनों में विडंबना (Irony) है — जो होना चाहिए था, वह हुआ नहीं।
निष्कर्ष: गालिब का शेर व्यक्तिगत सांत्वना का शेर है, जबकि दुष्यंत का शेर सामाजिक व्यंग्य का शेर है। दोनों मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि सपने और हकीकत के बीच की दूरी हर युग में रही है — चाहे गालिब का दौर हो या दुष्यंत का।
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