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Chapter 15 of 39
NCERT Solutions

ज्योतिबा फुले (सुधा अरोड़ा)

Haryana Board · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for ज्योतिबा फुले (सुधा अरोड़ा) — Haryana Board Class 11 Hindi.

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15 Questions Solved · 2 Sections

प्रश्न-अभ्यास

1ज्योतिबा फुले का नाम समाज सुधारकों की सूची में शुमार क्यों नहीं किया गया? तर्क सहित उत्तर लिखिए।Show solution
दिया गया है: ज्योतिबा फुले एक महान समाज सुधारक थे जिन्होंने दलितों और स्त्रियों के उत्थान के लिए अथक संघर्ष किया।

उत्तर:
ज्योतिबा फुले का नाम समाज सुधारकों की सूची में इसलिए शुमार नहीं किया गया क्योंकि —

1. जाति-आधारित भेदभाव: फुले स्वयं एक निम्न जाति (माली) से थे। उच्चवर्गीय और सवर्ण समाज ने उन्हें कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया। समाज सुधारकों की सूची बनाने वाले प्रायः उच्च जाति के लोग थे, जो फुले के कार्यों को मान्यता देने से कतराते थे।

2. शोषण-व्यवस्था का षड्यंत्र: फुले ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था और जाति-प्रथा पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने 'गुलामगिरी' जैसी पुस्तकें लिखकर शोषण का पर्दाफाश किया। इससे वर्चस्वशाली वर्ग उनसे नाराज था और उसने उनके योगदान को जानबूझकर उपेक्षित किया।

3. मुख्यधारा के इतिहास-लेखन से बाहर: इतिहास लेखन पर उच्च वर्ग का नियंत्रण था। दलित और पिछड़े वर्ग के नायकों को इतिहास में उचित स्थान नहीं दिया गया।

4. स्त्री-शिक्षा का समर्थन: फुले ने स्त्रियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया, जो तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को स्वीकार्य नहीं था।

तर्क: वास्तव में फुले का कार्य राजा राममोहन राय या दयानंद सरस्वती से किसी भी प्रकार कम नहीं था, परंतु उनकी जाति और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों की प्रकृति के कारण उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। यह स्वयं उस शोषण-व्यवस्था का प्रमाण है जिसके विरुद्ध फुले लड़ते रहे।
2शोषण-व्यवस्था ने क्या-क्या षड्यंत्र रचे और क्यों?Show solution
दिया गया है: शोषण-व्यवस्था ने दलितों और स्त्रियों को दबाए रखने के लिए अनेक षड्यंत्र रचे।

उत्तर:
शोषण-व्यवस्था ने निम्नलिखित षड्यंत्र रचे —

1. शिक्षा से वंचित करना: दलितों और स्त्रियों को शिक्षा से दूर रखा गया। वेद-शास्त्र पढ़ने का अधिकार केवल उच्च जाति के पुरुषों को था। अशिक्षित रहने से ये वर्ग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो सकते थे।

2. धर्म का हथियार: धर्म और शास्त्रों की आड़ में यह प्रचारित किया गया कि शूद्रों और स्त्रियों की यही नियति है। इससे शोषित वर्ग अपनी दुर्दशा को ईश्वरीय विधान मानकर स्वीकार करता रहा।

3. सामाजिक बहिष्कार: जो भी इस व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाता, उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता। फुले दंपति को भी इसी का सामना करना पड़ा।

4. आर्थिक परतंत्रता: दलितों को केवल निम्न कोटि के कार्य करने पर विवश किया गया ताकि वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी न हो सकें।

5. स्त्रियों को घर में बंद रखना: स्त्रियों को पर्दे और घर की चारदीवारी में कैद रखा गया ताकि वे बाहरी दुनिया से अनजान रहें।

षड्यंत्र रचने का कारण: इन षड्यंत्रों का मूल उद्देश्य उच्च वर्ग का वर्चस्व और सत्ता कायम रखना था। यदि दलित और स्त्रियाँ शिक्षित और जागरूक हो जातीं तो शोषण-व्यवस्था स्वतः ध्वस्त हो जाती।
3ज्योतिबा फुले द्वारा प्रतिपादित आदर्श परिवार क्या आपके विचारों के आदर्श परिवार से मेल खाता है? पक्ष-विपक्ष में अपने उत्तर दीजिए।Show solution
दिया गया है: ज्योतिबा फुले ने एक ऐसे आदर्श परिवार की कल्पना की जिसमें स्त्री-पुरुष समान हों, जाति-भेद न हो और सभी को शिक्षा का अधिकार हो।

उत्तर:

फुले का आदर्श परिवार:
- पति-पत्नी में पूर्ण समानता हो।
- स्त्री को शिक्षा और स्वतंत्रता का अधिकार हो।
- जाति, धर्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो।
- परिवार में सभी निर्णय मिलकर लिए जाएँ।
- विधवाओं और अनाथ बच्चों को परिवार में स्थान मिले।

पक्ष में (मेल खाने के कारण):
1. आज का आधुनिक समाज भी स्त्री-पुरुष समानता को आदर्श मानता है।
2. शिक्षा को सभी का मौलिक अधिकार मानना आज की सोच से मेल खाता है।
3. परस्पर सम्मान और सहयोग पर आधारित दांपत्य जीवन आज भी आदर्श माना जाता है।
4. जाति-भेद से मुक्त परिवार की कल्पना आज के संविधान की भावना के अनुरूप है।

विपक्ष में (मेल न खाने के कारण):
1. आज भी कई परिवारों में पितृसत्तात्मक सोच हावी है।
2. जाति और धर्म के आधार पर विवाह और परिवार की संरचना अभी भी प्रचलित है।
3. फुले का आदर्श परिवार अत्यंत उदार और क्रांतिकारी था, जो आज भी पूरी तरह व्यवहार में नहीं आया है।

निष्कर्ष: फुले का आदर्श परिवार मेरे विचारों से काफी हद तक मेल खाता है। समानता, शिक्षा और सम्मान पर आधारित परिवार ही सच्चे अर्थों में आदर्श परिवार है।
4स्त्री-समानता को प्रतिष्ठित करने के लिए ज्योतिबा फुले के अनुसार क्या-क्या होना चाहिए?Show solution
दिया गया है: ज्योतिबा फुले स्त्री-समानता के प्रबल समर्थक थे।

उत्तर:
स्त्री-समानता को प्रतिष्ठित करने के लिए ज्योतिबा फुले के अनुसार निम्नलिखित होना चाहिए —

1. स्त्री-शिक्षा: स्त्रियों को शिक्षा का पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए। शिक्षा के बिना स्त्री न तो अपने अधिकारों को समझ सकती है और न ही समाज में समान स्थान पा सकती है। इसीलिए फुले ने पुणे में बालिका विद्यालय खोला।

2. आर्थिक स्वावलंबन: स्त्री को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहिए ताकि वह किसी पर निर्भर न रहे।

3. जाति-प्रथा का उन्मूलन: जाति-प्रथा स्त्री-शोषण का एक बड़ा कारण है। इसे समाप्त किए बिना स्त्री-समानता संभव नहीं।

4. विधवा-विवाह का समर्थन: विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार मिलना चाहिए। फुले ने विधवाओं के लिए आश्रम खोला और उनके बच्चों को अपनाया।

5. बाल-विवाह का विरोध: बाल-विवाह स्त्री के जीवन को नष्ट कर देता है। इसे रोका जाना चाहिए।

6. सामाजिक जागरूकता: समाज में यह चेतना फैलानी चाहिए कि स्त्री पुरुष से किसी भी प्रकार कम नहीं है।

7. कानूनी अधिकार: स्त्रियों को संपत्ति, विवाह और तलाक में समान कानूनी अधिकार मिलने चाहिए।

निष्कर्ष: फुले का मानना था कि स्त्री की मुक्ति शिक्षा और जागरूकता से ही संभव है।
5सावित्री बाई के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन किस प्रकार आए? क्रमबद्ध रूप में लिखिए।Show solution
दिया गया है: सावित्री बाई फुले का विवाह बाल्यावस्था में ज्योतिबा फुले से हुआ था।

उत्तर:
सावित्री बाई के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन निम्नलिखित क्रम में आए —

1. विवाह और शिक्षा की शुरुआत:
सावित्री बाई का विवाह बहुत कम उम्र में ज्योतिबा फुले से हुआ। उस समय वे अनपढ़ थीं। ज्योतिबा ने उन्हें घर पर ही पढ़ाना शुरू किया। यह उनके जीवन का पहला क्रांतिकारी मोड़ था।

2. शिक्षक-प्रशिक्षण:
सावित्री बाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक-प्रशिक्षण प्राप्त किया और भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं।

3. बालिका विद्यालय की स्थापना:
सन् 1848 में ज्योतिबा के साथ मिलकर उन्होंने पुणे में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोला। यह उस युग में एक अत्यंत साहसिक कदम था।

4. सामाजिक विरोध का सामना:
जब वे विद्यालय जाती थीं तो रूढ़िवादी लोग उन पर गोबर और कीचड़ फेंकते थे। परंतु वे विचलित नहीं हुईं और अपना कार्य जारी रखा।

5. विधवाओं और दलितों की सेवा:
उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रम खोला, उनके बच्चों को अपनाया और दलित महिलाओं को शिक्षित किया।

6. कवयित्री के रूप में उभरना:
सावित्री बाई ने कविताएँ लिखकर समाज को जागरूक किया। उनकी कविताएँ स्त्री-शिक्षा और सामाजिक समानता का संदेश देती थीं।

7. प्लेग-पीड़ितों की सेवा:
जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने प्लेग-पीड़ितों की सेवा की और इसी दौरान उनका निधन हुआ।

निष्कर्ष: सावित्री बाई का जीवन एक अनपढ़ बालिका से भारत की पहली महिला शिक्षिका और समाज-सुधारक बनने की प्रेरणादायक यात्रा है।
6ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई के जीवन से प्रेरित होकर आप समाज में क्या परिवर्तन करना चाहेंगे?Show solution
दिया गया है: फुले दंपति ने दलितों और स्त्रियों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित किया।

उत्तर:
ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई के जीवन से प्रेरित होकर मैं समाज में निम्नलिखित परिवर्तन करना चाहूँगा/चाहूँगी —

1. शिक्षा का प्रसार: मैं अपने आसपास के वंचित और गरीब बच्चों, विशेषकर बालिकाओं को शिक्षित करने का प्रयास करूँगा/करूँगी। शिक्षा ही वह हथियार है जो सामाजिक असमानता को दूर कर सकती है।

2. जाति-भेद का विरोध: मैं जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करूँगा/करूँगी और दूसरों को भी ऐसा करने से रोकूँगा/रोकूँगी।

3. स्त्री-सम्मान: मैं स्त्रियों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार करूँगा/करूँगी और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाऊँगा/उठाऊँगी।

4. सामाजिक जागरूकता: मैं अंधविश्वास और रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध लोगों को जागरूक करूँगा/करूँगी।

5. दलित और पिछड़े वर्ग की सहायता: मैं दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को उनके अधिकार दिलाने में सहयोग करूँगा/करूँगी।

6. स्वयंसेवी कार्य: मैं किसी सामाजिक संस्था से जुड़कर समाज-सेवा का कार्य करूँगा/करूँगी।

निष्कर्ष: फुले दंपति ने हमें सिखाया कि सामाजिक परिवर्तन के लिए साहस, दृढ़ता और निस्वार्थ सेवा की आवश्यकता होती है। उनका जीवन हमारे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
7उनका दांपत्य जीवन किस प्रकार आधुनिक दंपतियों को प्रेरणा प्रदान करता है?Show solution
दिया गया है: ज्योतिबा और सावित्री बाई फुले का दांपत्य जीवन समानता और सहयोग पर आधारित था।

उत्तर:
फुले दंपति का दांपत्य जीवन आधुनिक दंपतियों के लिए निम्नलिखित प्रकार से प्रेरणादायक है —

1. समानता का आदर्श: ज्योतिबा ने सावित्री बाई को कभी कमतर नहीं समझा। उन्होंने उन्हें शिक्षित किया और अपने सामाजिक कार्यों में बराबर का भागीदार बनाया। यह आज के दंपतियों के लिए आदर्श है।

2. परस्पर सहयोग: दोनों ने मिलकर विद्यालय खोले, समाज-सेवा की और एक-दूसरे का हर कदम पर साथ दिया। आज के दंपतियों को भी एक-दूसरे के सपनों और लक्ष्यों में सहयोग देना चाहिए।

3. विपरीत परिस्थितियों में एकता: जब समाज ने उन्हें प्रताड़ित किया, घर से निकाला गया, तब भी वे एक-दूसरे के साथ खड़े रहे। यह दृढ़ता आज के दंपतियों को सिखाती है कि कठिनाइयों में साथ न छोड़ें।

4. साझा उद्देश्य: उनका दांपत्य जीवन केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज-सेवा को अपना साझा उद्देश्य बनाया। यह आज के दंपतियों को प्रेरित करता है कि वे भी किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए मिलकर काम करें।

5. स्त्री की स्वतंत्रता का सम्मान: ज्योतिबा ने सावित्री बाई को घर की चारदीवारी से बाहर निकलने और स्वतंत्र रूप से कार्य करने की पूरी छूट दी।

निष्कर्ष: फुले दंपति का जीवन यह सिद्ध करता है कि सच्चा दांपत्य जीवन समानता, सम्मान और साझे उद्देश्य पर टिका होता है।
8फुले दंपति ने स्त्री समस्या के लिए जो कदम उठाया था, क्या उसी का अगला चरण 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' कार्यक्रम है?Show solution
दिया गया है: फुले दंपति ने उन्नीसवीं सदी में स्त्री-शिक्षा और स्त्री-सम्मान के लिए अनेक कदम उठाए थे।

उत्तर:
हाँ, 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' कार्यक्रम फुले दंपति के प्रयासों का ही अगला चरण है। इसे निम्नलिखित तर्कों से समझा जा सकता है —

समानता:
- फुले दंपति ने बालिका-शिक्षा के लिए विद्यालय खोले। 'बेटी पढ़ाओ' कार्यक्रम भी उसी लक्ष्य को आगे बढ़ाता है।
- फुले ने कन्या-भ्रूण हत्या के विरुद्ध आवाज उठाई और अनाथ बच्चों को आश्रय दिया। 'बेटी बचाओ' कार्यक्रम भी इसी समस्या से लड़ता है।

अंतर:
- फुले दंपति का संघर्ष व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर था, जबकि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' एक सरकारी कार्यक्रम है।
- फुले का आंदोलन जाति-प्रथा और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध भी था, जबकि यह सरकारी कार्यक्रम केवल लिंग-भेद तक सीमित है।

विश्लेषण:
यह दुखद है कि फुले दंपति के डेढ़ सौ वर्ष बाद भी हमें 'बेटी बचाओ' जैसे कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता पड़ रही है। इससे स्पष्ट होता है कि फुले का सपना अभी पूरी तरह साकार नहीं हुआ है। यह कार्यक्रम उनके अधूरे सपने को पूरा करने की दिशा में एक सरकारी प्रयास है।

निष्कर्ष: 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' कार्यक्रम फुले दंपति के प्रयासों की ही निरंतरता है, परंतु इसे और अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
9(क)निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए — (क) सच का सबेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई, भू-देव (ब्राह्मण) शरमा गए।Show solution
संदर्भ: यह पंक्ति ज्योतिबा फुले के विचारों से संबंधित है जो उन्होंने शोषण-व्यवस्था के विरुद्ध कही।

आशय:
इस पंक्ति में फुले ने व्यंग्यात्मक शैली में यह बताया है कि जब समाज में सत्य और ज्ञान का प्रकाश फैला, तो —

1. 'वेद डूब गए' — इसका अर्थ है कि वेदों की आड़ में जो झूठी श्रेष्ठता और शोषण की व्यवस्था बनाई गई थी, वह सत्य के प्रकाश में टिक नहीं सकी। वेदों का उपयोग दलितों और स्त्रियों को दबाने के लिए किया जाता था, परंतु जब सत्य सामने आया तो यह व्यवस्था ध्वस्त होने लगी।

2. 'विद्या शूद्रों के घर चली गई' — जब फुले ने दलितों और शूद्रों के लिए विद्यालय खोले, तो शिक्षा जो केवल उच्च वर्ग का विशेषाधिकार थी, वह अब सभी के लिए सुलभ हो गई। यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन था।

3. 'भू-देव (ब्राह्मण) शरमा गए' — जब शूद्र और दलित शिक्षित होने लगे और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए, तो उच्च वर्ग को अपनी झूठी श्रेष्ठता पर लज्जा आने लगी।

निष्कर्ष: यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि शिक्षा और सत्य की शक्ति से शोषण की व्यवस्था को चुनौती दी जा सकती है।
9(ख)निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए — (ख) इस शोषण-व्यवस्था के खिलाफ़ दलितों के अलावा स्त्रियों को भी आंदोलन करना चाहिए।Show solution
संदर्भ: यह पंक्ति ज्योतिबा फुले के उस विचार को व्यक्त करती है जिसमें उन्होंने दलितों और स्त्रियों की समान पीड़ा को पहचाना।

आशय:
फुले ने यह महत्वपूर्ण बात कही कि शोषण-व्यवस्था ने केवल दलितों को ही नहीं, बल्कि स्त्रियों को भी समान रूप से पीड़ित किया है। इसलिए —

1. दलितों और स्त्रियों की समान पीड़ा: दलितों को जाति के आधार पर और स्त्रियों को लिंग के आधार पर शोषित किया गया। दोनों को शिक्षा, अधिकार और सम्मान से वंचित रखा गया।

2. संयुक्त संघर्ष की आवश्यकता: फुले का मानना था कि यदि केवल दलित आंदोलन करें और स्त्रियाँ चुप रहें, तो शोषण-व्यवस्था पूरी तरह नहीं टूटेगी। इसलिए दोनों को मिलकर इस व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए।

3. स्त्री की दोहरी पीड़ा: दलित स्त्री तो दोहरे शोषण की शिकार है — एक ओर जाति का शोषण और दूसरी ओर लिंग का शोषण। इसलिए उनका आंदोलन और भी आवश्यक है।

4. जागरूकता का आह्वान: यह पंक्ति स्त्रियों को यह संदेश देती है कि वे अपनी दुर्दशा को नियति मानकर न बैठें, बल्कि उसके विरुद्ध संगठित होकर लड़ें।

निष्कर्ष: फुले का यह विचार आज भी प्रासंगिक है। स्त्री-मुक्ति और दलित-मुक्ति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोनों को साथ मिलकर लड़ना होगा।
10(क)निम्नलिखित गद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए — (क) स्वतंत्रता का अनुभव……………हर स्त्री की थी।Show solution
संदर्भ: यह गद्यांश सुधा अरोड़ा द्वारा लिखित 'ज्योतिबा फुले' पाठ से लिया गया है। यह सावित्री बाई फुले के जीवन-परिवर्तन और स्त्री-स्वतंत्रता के संदर्भ में है।

प्रसंग: जब सावित्री बाई ने शिक्षा प्राप्त की और घर से बाहर निकलकर समाज-सेवा का कार्य किया, तब उन्हें जो स्वतंत्रता का अनुभव हुआ, वह केवल उनका व्यक्तिगत अनुभव नहीं था।

व्याख्या:
इस गद्यांश में लेखिका यह बताना चाहती हैं कि सावित्री बाई ने जब पहली बार शिक्षा प्राप्त की और विद्यालय में पढ़ाने गईं, तो उन्हें जो स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का अनुभव हुआ, वह अनुभव वास्तव में उस युग की हर उस स्त्री का था जो घर की चारदीवारी में कैद थी, जो अशिक्षित थी और जो अपने अधिकारों से वंचित थी।

सावित्री बाई एक प्रतीक बन गईं — उन सभी स्त्रियों की आकांक्षाओं का प्रतीक जो स्वतंत्र होना चाहती थीं, पढ़ना चाहती थीं, परंतु समाज की बेड़ियों में जकड़ी हुई थीं। उनकी स्वतंत्रता का संघर्ष सामूहिक था।

विशेष:
- यह गद्यांश स्त्री-चेतना और सामूहिक मुक्ति का संदेश देता है।
- लेखिका ने यह स्पष्ट किया है कि एक स्त्री की मुक्ति सभी स्त्रियों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

निष्कर्ष: सावित्री बाई का स्वतंत्रता-अनुभव व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक था — वह उस युग की हर पीड़ित स्त्री की आवाज थी।
10(ख)निम्नलिखित गद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए — (ख) मुझे 'महात्मा' कहकर……………अलग न करें।Show solution
संदर्भ: यह गद्यांश सुधा अरोड़ा द्वारा लिखित 'ज्योतिबा फुले' पाठ से लिया गया है। यह ज्योतिबा फुले के उस कथन पर आधारित है जो उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा था।

प्रसंग: जब लोग ज्योतिबा फुले को 'महात्मा' कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे, तब फुले ने यह महत्वपूर्ण बात कही।

व्याख्या:
इस गद्यांश में फुले कह रहे हैं कि उन्हें 'महात्मा' जैसी उपाधि देकर आम जनता से अलग न किया जाए। इसके पीछे उनका गहरा सामाजिक दर्शन है —

1. महात्मा बनाने का षड्यंत्र: जब किसी समाज-सुधारक को 'महात्मा' या 'देवता' बना दिया जाता है, तो उसके विचारों को व्यावहारिक जीवन से अलग कर दिया जाता है। लोग उनकी पूजा करने लगते हैं, परंतु उनके विचारों पर अमल नहीं करते।

2. आम आदमी से जुड़ाव: फुले चाहते थे कि वे एक आम इंसान की तरह लोगों के बीच रहें और उनके दुख-दर्द को समझें। 'महात्मा' की उपाधि उन्हें जनता से दूर कर देती।

3. विचारों की निरंतरता: फुले का संदेश था कि उनके बाद भी यह आंदोलन जारी रहना चाहिए। यदि उन्हें महात्मा बना दिया गया तो लोग यह सोचने लगेंगे कि यह काम केवल महापुरुषों का है, आम आदमी का नहीं।

विशेष:
- यह गद्यांश फुले की विनम्रता और उनकी दूरदर्शिता का परिचय देता है।
- वे नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद उनके विचार मंदिरों में बंद हो जाएँ।

निष्कर्ष: फुले का यह कथन उनकी महानता का सबसे बड़ा प्रमाण है। वे जानते थे कि सामाजिक परिवर्तन के लिए जन-आंदोलन की आवश्यकता है, न कि किसी एक महापुरुष की पूजा की।

योग्यता-विस्तार

1अपने आसपास के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत कर उसके आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।Show solution
निर्देश: यह एक क्रियाकलाप (Activity) आधारित प्रश्न है। छात्र स्वयं अपने आसपास के सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलकर यह कार्य करें।

रिपोर्ट का नमूना प्रारूप:

शीर्षक: सामाजिक कार्यकर्ताओं से भेंट-वार्ता पर आधारित रिपोर्ट

दिनांक: ............
स्थान: ............

परिचय:
हमने अपने क्षेत्र के तीन सामाजिक कार्यकर्ताओं से भेंट की। इनमें से एक महिला स्वयंसेवी संस्था से जुड़ी थीं, एक दलित अधिकार संगठन से और एक बाल-शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत थे।

मुख्य बातें:
1. सभी कार्यकर्ताओं ने बताया कि आज भी समाज में जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव होता है।
2. स्त्री-शिक्षा की स्थिति में सुधार हुआ है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बहुत काम बाकी है।
3. फुले दंपति जैसे समाज-सुधारकों से प्रेरणा लेकर ये कार्यकर्ता अपना काम कर रहे हैं।

निष्कर्ष:
सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। हम सभी को मिलकर इस दिशा में प्रयास करने चाहिए।
2क्या आज भी समाज में स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव किया जाता है? कक्षा में चर्चा कीजिए।Show solution
निर्देश: यह एक चर्चा (Discussion) आधारित प्रश्न है। कक्षा में इस विषय पर खुली चर्चा करें।

चर्चा के लिए मुख्य बिंदु:

हाँ, आज भी भेदभाव होता है — पक्ष में तर्क:
1. कार्यस्थल पर समान काम के लिए स्त्रियों को कम वेतन मिलता है।
2. घर में स्त्रियों से अधिक काम की अपेक्षा की जाती है।
3. बेटे और बेटी की परवरिश में अभी भी अंतर किया जाता है।
4. कन्या-भ्रूण हत्या और दहेज-प्रथा जैसी समस्याएँ अभी भी विद्यमान हैं।
5. उच्च पदों पर स्त्रियों की संख्या अभी भी कम है।

स्थिति में सुधार — विपक्ष में तर्क:
1. आज स्त्रियाँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं।
2. कानूनी अधिकारों में समानता आई है।
3. शिक्षा का स्तर बढ़ा है।
4. सामाजिक जागरूकता बढ़ी है।

निष्कर्ष: भेदभाव कम हुआ है, परंतु पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। फुले दंपति के सपने को साकार करने के लिए अभी और प्रयास की आवश्यकता है।
3सावित्री बाई और महात्मा फुले ने समाज-हित के जो काम किए उनकी सूची बनाइए।Show solution
सावित्री बाई और महात्मा फुले के समाज-हित के कार्यों की सूची:

ज्योतिबा फुले के कार्य:
1. सन् 1848 में पुणे में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय स्थापित किया।
2. दलितों और शूद्रों के लिए विद्यालय खोले।
3. 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की (1873)।
4. 'गुलामगिरी' पुस्तक लिखकर जाति-प्रथा और शोषण का पर्दाफाश किया।
5. विधवा-विवाह का समर्थन किया।
6. कन्या-भ्रूण हत्या के विरुद्ध आवाज उठाई।
7. अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया।
8. किसानों की समस्याओं पर लेखन किया।

सावित्री बाई फुले के कार्य:
1. भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं।
2. बालिका-शिक्षा के लिए अनेक विद्यालय खोले।
3. विधवाओं के लिए आश्रम की स्थापना की।
4. अनाथ बच्चों को अपनाया और उनका पालन-पोषण किया।
5. दलित महिलाओं को शिक्षित किया।
6. सामाजिक जागरूकता के लिए कविताएँ लिखीं।
7. प्लेग-पीड़ितों की सेवा की।
8. बाल-विवाह और सती-प्रथा का विरोध किया।

संयुक्त कार्य:
1. दलितों के लिए कुआँ खुलवाया।
2. समाज में समानता और भाईचारे का संदेश फैलाया।
3. जाति-प्रथा के विरुद्ध आंदोलन चलाया।

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