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Chapter 13 of 39
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विदाई-संभाषण (बालमुकुंद गुप्त)

Tripura Board · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for विदाई-संभाषण (बालमुकुंद गुप्त) — Tripura Board Class 11 Hindi.

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13 Questions Solved · 4 Sections

पाठ के साथ

1शिवशंभु की दो गायों की कहानी के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?Show solution
दिया गया है: पाठ 'विदाई-संभाषण' में लेखक बालमुकुंद गुप्त ने शिवशंभु की दो गायों की कहानी का उल्लेख किया है।

उत्तर:
लेखक इस कहानी के माध्यम से यह बताना चाहता है कि एक साधारण गरीब आदमी शिवशंभु के पास दो गाएँ थीं। जब उनमें से एक गाय बिक गई या चली गई, तो दूसरी गाय उसके वियोग में दुखी होकर रोती रही, खाना-पीना छोड़ दिया। अर्थात् एक पशु भी अपने साथी के बिछड़ने पर इतना दुखी होता है।

इस कहानी के माध्यम से लेखक व्यंग्यपूर्वक लॉर्ड कर्जन पर यह कटाक्ष करता है कि भारत की करोड़ों जनता ने कर्जन के जाने पर कोई दुख नहीं मनाया, कोई आँसू नहीं बहाया। जबकि एक पशु भी अपने साथी के जाने पर दुखी होता है। इससे स्पष्ट होता है कि कर्जन का शासन इतना अत्याचारपूर्ण था कि भारत की जनता उनके जाने पर दुखी होने के बजाय प्रसन्न थी। लेखक यह भी कहना चाहता है कि यदि शासक जनता के प्रति संवेदनशील और हितकारी हो, तो जनता उसके जाने पर अवश्य दुखी होती है।
2आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद न करने की प्रार्थना पर आपने जरा भी ध्यान नहीं दिया—यहाँ किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?Show solution
दिया गया है: पाठ में लेखक ने 'आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद न करने की प्रार्थना' का उल्लेख किया है।

उत्तर:
यहाँ लेखक ने बंगाल-विभाजन (1905) की ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया है। लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया था। बंगाल की आठ करोड़ जनता ने इस विभाजन का घोर विरोध किया। जनता ने गिड़गिड़ाकर, प्रार्थनाएँ करके, आंदोलन करके कर्जन से बंगाल को न बाँटने की विनती की, परंतु कर्जन ने किसी की एक न सुनी और अपनी जिद पर अड़े रहे। उन्होंने बंगाल का विभाजन कर दिया। इसी घटना की ओर लेखक ने यहाँ संकेत किया है। इस विभाजन के विरोध में ही 'स्वदेशी आंदोलन' प्रारंभ हुआ था।
3कर्जन को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा?Show solution
दिया गया है: पाठ में लॉर्ड कर्जन के इस्तीफे का उल्लेख है।

उत्तर:
लॉर्ड कर्जन को निम्नलिखित कारणों से इस्तीफा देना पड़ा:

1. किचनर से विवाद: कर्जन का भारत के सेनापति लॉर्ड किचनर से गहरा मतभेद हो गया था। किचनर सेना पर पूर्ण नियंत्रण चाहते थे, जबकि कर्जन इसके विरुद्ध थे।

2. ब्रिटिश सरकार का असहयोग: इस विवाद में ब्रिटेन की सरकार ने कर्जन का साथ न देकर किचनर का पक्ष लिया।

3. अपमान की स्थिति: जब ब्रिटिश सरकार ने कर्जन की बात नहीं मानी और उनके द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारी को भी नहीं रखा गया, तो कर्जन को अपमानित महसूस हुआ।

4. जिद और अहंकार: कर्जन की अपनी जिद और अहंकार भी उनके पतन का कारण बना। उनकी जिस जिद ने भारत की जनता को पीड़ित किया, उसी जिद ने उन्हें भी पीड़ा दी और अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

इस प्रकार कर्जन का इस्तीफा उनकी अपनी नीतियों और अहंकार का परिणाम था।
4बिचारिए तो, क्या शान आपकी इस देश में थी और अब क्या हो गई! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे! — आशय स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया है: पाठ 'विदाई-संभाषण' की उपर्युक्त पंक्तियाँ।

आशय:
लेखक बालमुकुंद गुप्त इन पंक्तियों में लॉर्ड कर्जन के उत्थान और पतन पर व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी कर रहे हैं।

जब कर्जन भारत के वायसराय बनकर आए थे, तब उनकी बड़ी शान-शौकत थी। वे भारत के सर्वोच्च शासक थे। उनके एक इशारे पर सब कुछ होता था। करोड़ों लोग उनके अधीन थे। उनका रुतबा और वैभव अत्यंत ऊँचा था। वे स्वयं को सर्वशक्तिमान समझते थे।

परंतु अपनी जिद, अहंकार और अत्याचारी नीतियों के कारण वे इतने नीचे गिरे कि उन्हें अपमानित होकर इस्तीफा देना पड़ा। जिस ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि बनकर वे भारत आए थे, उसी सरकार ने उनका साथ नहीं दिया। उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी को भी नहीं रखा गया।

लेखक का आशय है कि कर्जन जितनी ऊँचाई पर थे, उनका पतन उतना ही गहरा और दुखद रहा। यह उनके अहंकार और दुर्नीति का स्वाभाविक परिणाम था।
5आपके और यहाँ के निवासियों के बीच में कोई तीसरी शक्ति और भी है— यहाँ तीसरी शक्ति किसे कहा गया है?Show solution
दिया गया है: पाठ की उपर्युक्त पंक्ति।

उत्तर:
यहाँ 'तीसरी शक्ति' से लेखक का आशय ईश्वर अथवा विधाता से है। कुछ विद्वान इसे ब्रिटिश संसद या ब्रिटिश सरकार भी मानते हैं।

लेखक कहना चाहता है कि एक ओर कर्जन हैं और दूसरी ओर भारत के निवासी हैं। इन दोनों के बीच एक तीसरी शक्ति भी है जो सबके ऊपर है और जो अंततः न्याय करती है। यह शक्ति न तो कर्जन के अत्याचार को सहन करती है और न ही भारतीय जनता को सदा पीड़ित रहने देती है।

इस तीसरी शक्ति ने ही कर्जन को उनकी जिद और अत्याचार का दंड दिया और उन्हें अपमानित होकर भारत छोड़ने पर विवश किया। लेखक का संकेत है कि ईश्वरीय न्याय अवश्य होता है — अत्याचारी को उसके कर्मों का फल अवश्य मिलता है।

पाठ के आस-पास

1पाठ का यह अंश शिवशंभु के चिट्ठे से लिया गया है। शिवशंभु नाम की चर्चा पाठ में भी हुई है। बालमुकुंद गुप्त ने इस नाम का उपयोग क्यों किया होगा?Show solution
उत्तर:
बालमुकुंद गुप्त ने 'शिवशंभु' नाम का उपयोग अत्यंत सोच-समझकर किया है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:

1. प्रतीकात्मकता: 'शिवशंभु' भगवान शिव का नाम है। शिव को भोलेनाथ भी कहा जाता है — जो सरल, निष्कपट और सत्यवादी हैं। इस नाम के माध्यम से लेखक यह दर्शाना चाहता है कि वे एक सामान्य, सीधे-सादे भारतीय की तरह बात कर रहे हैं जिसमें कोई छल-कपट नहीं है।

2. सुरक्षा का उपाय: ब्रिटिश शासन के दौरान सीधे आलोचना करना खतरनाक था। छद्म नाम 'शिवशंभु' का उपयोग करके लेखक ने अपनी पहचान छुपाई और साथ ही व्यंग्य भी किया।

3. आम भारतीय का प्रतिनिधित्व: शिवशंभु एक आम हिंदुस्तानी का प्रतीक है जो अपनी बात निडरता से कहता है। इस नाम के माध्यम से लेखक ने संपूर्ण भारतीय जनमानस की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है।

4. व्यंग्य की धार: शिव का एक रूप विध्वंसक भी है। इस नाम के माध्यम से लेखक ने कर्जन की नीतियों पर तीखा व्यंग्य किया है।
2नादिर से भी बढ़कर आपकी जिद है— कर्जन के संदर्भ में क्या आपको यह बात सही लगती है? पक्ष या विपक्ष में तर्क दीजिए।Show solution
उत्तर (पक्ष में):
नादिरशाह एक क्रूर और जिद्दी शासक था जिसने दिल्ली में भीषण नरसंहार किया था। लेखक ने कर्जन की तुलना नादिर से की है। यह तुलना अनेक दृष्टियों से उचित प्रतीत होती है:

1. बंगाल-विभाजन की जिद: करोड़ों लोगों के विरोध के बावजूद कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया। यह उनकी अदम्य जिद का प्रमाण है।

2. किसी की न सुनना: कर्जन ने न भारतीय जनता की सुनी, न अपने अधिकारियों की, न ब्रिटिश सरकार की। यह हठधर्मिता नादिर जैसी ही थी।

3. स्वयं का नुकसान: नादिर की जिद ने जहाँ दूसरों को नुकसान पहुँचाया, वहीं कर्जन की जिद ने उन्हें स्वयं भी बर्बाद किया।

विपक्ष में:
नादिर एक विदेशी आक्रमणकारी था जिसने केवल लूट और हत्या की। कर्जन एक प्रशासक थे जिनकी कुछ नीतियाँ भले ही गलत थीं, परंतु उनका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूत करना था। अतः दोनों की तुलना पूर्णतः उचित नहीं है।

निष्कर्ष: लेखक ने यह तुलना व्यंग्यात्मक रूप से की है जो कर्जन की हठधर्मिता को उजागर करती है।
3क्या आँख बंद करके मनमाने हुक्म चलाना और किसी की कुछ न सुनने का नाम ही शासन है?— इन पंक्तियों को ध्यान में रखते हुए शासन क्या है? इस पर चर्चा कीजिए।Show solution
उत्तर:
लेखक की इन पंक्तियों में कर्जन के शासन पर गहरा व्यंग्य है। इनके आधार पर 'शासन' की अवधारणा पर विचार करें तो:

शासन क्या नहीं है:
- आँख बंद करके मनमाने आदेश चलाना शासन नहीं है।
- जनता की बात न सुनना शासन नहीं है।
- केवल अपनी शक्ति और अहंकार का प्रदर्शन शासन नहीं है।
- अत्याचार और दमन शासन नहीं है।

शासन क्या है:
1. जनकल्याण: सच्चा शासन वह है जो जनता के हित में काम करे, उनकी समस्याओं को सुने और उनका समाधान करे।
2. न्यायपूर्ण: शासन में सभी के साथ समान न्याय होना चाहिए।
3. जवाबदेही: शासक को अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।
4. संवाद: शासन में शासक और शासित के बीच संवाद होना आवश्यक है।
5. लोकतांत्रिक भावना: जनता की इच्छाओं और आकांक्षाओं का सम्मान करना सच्चे शासन की पहचान है।

निष्कर्ष: कर्जन का शासन इन सभी कसौटियों पर खरा नहीं उतरता था, इसीलिए लेखक ने उनके शासन को वास्तविक शासन नहीं माना।
4इस पाठ में आए अलिफ़ लैला, अलहदीन, अबुल हसन और बगदाद के खलीफ़ा के बारे में सूचना एकत्रित कर कक्षा में चर्चा कीजिए।Show solution
उत्तर:

अलिफ़ लैला (अरेबियन नाइट्स):
अलिफ़ लैला अरबी भाषा की प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह है जिसे 'एक हजार एक रातें' (One Thousand and One Nights) भी कहते हैं। इसमें शहरजाद नामक स्त्री प्रतिदिन रात को राजा शहरयार को एक कहानी सुनाती है और अगले दिन की कहानी के लिए उत्सुकता जगाकर अपनी जान बचाती है।

अलहदीन (अलाउद्दीन):
अलहदीन अलिफ़ लैला का एक प्रसिद्ध पात्र है। उसके पास एक जादुई चिराग था जिसे रगड़ने पर एक जिन्न प्रकट होता था और उसकी हर इच्छा पूरी करता था। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने कर्जन की असीमित शक्ति और वैभव की तुलना की है।

अबुल हसन:
अबुल हसन भी अलिफ़ लैला का एक पात्र है। बगदाद के खलीफा हारून-अल-रशीद ने एक रात अबुल हसन को नशे में सुला दिया और सुबह उसे खलीफा की गद्दी पर बैठा दिया। अबुल हसन एक दिन के लिए खलीफा बन गया। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से कर्जन के अस्थायी वैभव पर व्यंग्य किया है।

बगदाद के खलीफा:
हारून-अल-रशीद बगदाद के प्रसिद्ध खलीफा थे जो अलिफ़ लैला की कहानियों में बार-बार आते हैं। वे रात को भेष बदलकर प्रजा का हाल जानने निकलते थे। लेखक ने इनका उल्लेख कर्जन के वैभव की तुलना में किया है।

गौर करने की बात

इससे आपका जाना भी परंपरा की चाल से कुछ अलग नहीं है, तथापि आपके शासनकाल का नाटक घोर दुखांत है, और अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दर्शक तो क्या, स्वयं सूत्रधार भी नहीं जानता था कि उसने जो खेल सुखांत समझकर खेलना आरंभ किया था, वह दुखांत हो जावेगा। — इस अंश का आशय स्पष्ट कीजिए।Show solution
आशय:
लेखक इस अंश में नाटक के रूपक का प्रयोग करते हुए कर्जन के शासनकाल की समीक्षा कर रहे हैं।

लेखक कहता है कि भारत में जितने भी बड़े शासक आए, अंत में उन्हें जाना ही पड़ा — यह एक परंपरा है। इस दृष्टि से कर्जन का जाना भी कोई नई बात नहीं है।

परंतु विशेष बात यह है कि कर्जन के शासनकाल का 'नाटक' घोर दुखांत रहा। अर्थात् उनका शासन बहुत दुखद रूप से समाप्त हुआ — अपमान, इस्तीफा और पराजय के साथ।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस नाटक के 'सूत्रधार' अर्थात् स्वयं कर्जन को भी यह नहीं पता था कि जो खेल उन्होंने सुखांत (अच्छे अंत वाला) समझकर शुरू किया था, वह दुखांत (दुखद अंत वाला) हो जाएगा। कर्जन ने जब भारत का वायसराय बनकर आए तो उन्हें लगा था कि वे यहाँ बड़ी सफलता प्राप्त करेंगे, परंतु उनकी जिद और अहंकार ने उनके शासन को दुखांत बना दिया।
यहाँ की प्रजा ने आपकी जिद का फल यहाँ देख लिया। उसने देख लिया कि आपकी जिस जिद ने इस देश की प्रजा को पीड़ित किया, आपको भी उसने कम पीड़ा न दी, यहाँ तक कि आप स्वयं उसका शिकार हुए। — इस अंश का आशय स्पष्ट कीजिए।Show solution
आशय:
इस अंश में लेखक एक महत्त्वपूर्ण नैतिक सत्य को उजागर कर रहे हैं।

कर्जन की जिद ने भारत की जनता को बहुत पीड़ित किया — बंगाल-विभाजन, दमनकारी नीतियाँ, जनता की आवाज को अनसुना करना आदि। परंतु इसी जिद ने अंततः कर्जन को भी नहीं छोड़ा।

भारत की जनता ने देखा कि जिस जिद के कारण उन्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा, उसी जिद ने कर्जन को भी कम पीड़ा नहीं दी। किचनर से विवाद में कर्जन की जिद ने उन्हें ब्रिटिश सरकार से भी अलग कर दिया और अंततः वे स्वयं अपनी जिद के शिकार हो गए — उन्हें अपमानित होकर इस्तीफा देना पड़ा।

लेखक का संदेश है कि अत्याचार और जिद का फल अंततः अत्याचारी को ही भोगना पड़ता है। यह एक शाश्वत सत्य है — 'जैसा करोगे, वैसा भरोगे।' इस प्रकार यह अंश न्याय और कर्मफल के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है।

भाषा की बात

1वे दिन-रात यही मनाते थे कि जल्द श्रीमान् यहाँ से पधारें। सामान्य तौर पर आने के लिए पधारें शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ पधारें शब्द का क्या अर्थ है?Show solution
उत्तर:
सामान्यतः 'पधारें' शब्द का अर्थ होता है — 'आइए' या 'आने की कृपा करें'। यह आदरसूचक शब्द है जो किसी के आगमन के लिए प्रयुक्त होता है।

परंतु इस वाक्य में 'पधारें' शब्द का अर्थ है — 'यहाँ से जाएँ' या 'प्रस्थान करें'

यहाँ लेखक ने व्यंग्यात्मक शैली में 'पधारें' शब्द का प्रयोग किया है। भारत की जनता कर्जन के अत्याचारी शासन से इतनी त्रस्त थी कि वे चाहते थे कि कर्जन जल्द से जल्द भारत छोड़कर चले जाएँ। परंतु आदरसूचक शब्द 'पधारें' का प्रयोग करके लेखक ने व्यंग्य किया है — अर्थात् 'कृपया यहाँ से विदा हों।'

यह भाषा का विशिष्ट व्यंग्यात्मक प्रयोग है जहाँ आगमन के लिए प्रयुक्त शब्द को प्रस्थान के अर्थ में इस्तेमाल किया गया है।
2पाठ में से कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं, जिनमें भाषा का विशिष्ट प्रयोग (भारतेंदु युगीन हिंदी) हुआ है। उन्हें सामान्य हिंदी में लिखिए— क. आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत को उनको जाना पड़ा। ख. आप किस को आए थे और क्या कर चले? ग. उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा। घ. पर आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से लाभ करे।Show solution
उत्तर:

क. मूल वाक्य: आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत को उनको जाना पड़ा।

सामान्य हिंदी: पहले भी इस देश में जो प्रमुख शासक आए, अंत में उन्हें जाना पड़ा।

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ख. मूल वाक्य: आप किस को आए थे और क्या कर चले?

सामान्य हिंदी: आप किसलिए आए थे और क्या करके जा रहे हैं?

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ग. मूल वाक्य: उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा।

सामान्य हिंदी: उनके द्वारा नियुक्त किए गए एक भी आदमी को नौकर नहीं रखा गया।

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घ. मूल वाक्य: पर आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से लाभ करे।

सामान्य हिंदी: परंतु मैं आशीर्वाद देता हूँ कि तू फिर से उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से प्राप्त करे।

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