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Chapter 14 of 39
NCERT Solutions

भारतीय कलाएँ

Bihar Board · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for भारतीय कलाएँ — Bihar Board Class 11 Hindi.

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4 Questions Solved · 2 Sections

अभ्यास

1कला और भाषा के अंतर्संबंध पर आपकी क्या राय है? लिखकर बताएँ।Show solution
दिया गया है: कला और भाषा के बीच संबंध पर विचार करना है।

अवधारणा: कला और भाषा दोनों मानव अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। दोनों विचारों, भावनाओं और संस्कृति को संप्रेषित करते हैं।

उत्तर:

कला और भाषा का अंतर्संबंध अत्यंत गहरा और अविभाज्य है। दोनों मनुष्य की आंतरिक अनुभूतियों को बाहरी रूप देने के साधन हैं।

(i) अभिव्यक्ति का माध्यम: जिस प्रकार भाषा शब्दों के माध्यम से विचारों और भावनाओं को व्यक्त करती है, उसी प्रकार कला रेखाओं, रंगों, ध्वनियों और गतियों के माध्यम से अभिव्यक्ति देती है। दोनों का मूल उद्देश्य संप्रेषण है।

(ii) सांस्कृतिक वाहक: भाषा और कला दोनों किसी समाज की संस्कृति, परंपरा और इतिहास को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते हैं। लोकगीत, लोककथाएँ, नाटक आदि में भाषा और कला का समन्वय स्पष्ट दिखता है।

(iii) परस्पर पूरक: कला को समझने के लिए भाषा की आवश्यकता होती है और भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए कलात्मकता की। कविता में लय और छंद कला का ही रूप है।

(iv) सीमाओं का अतिक्रमण: जहाँ भाषा की सीमाएँ समाप्त होती हैं, वहाँ कला अपना काम शुरू करती है। संगीत, नृत्य और चित्रकला भाषाई बाधाओं को पार कर सार्वभौमिक संवाद स्थापित करती हैं।

निष्कर्ष: कला और भाषा एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनों मिलकर मानव सभ्यता को समृद्ध करती हैं। कला एक ऐसी भाषा है जिसे बिना शब्दों के भी समझा जा सकता है।
2भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति में आप किस तरह का संबंध पाते हैं?Show solution
दिया गया है: भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति के बीच संबंध को समझना है।

अवधारणा: संस्कृति किसी समाज के जीवन-मूल्यों, परंपराओं और विश्वासों का समुच्चय है, जबकि कला उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम है।

उत्तर:

भारतीय कलाएँ और भारतीय संस्कृति में अन्योन्याश्रित (परस्पर निर्भर) संबंध है। दोनों एक-दूसरे को जीवंत और समृद्ध बनाते हैं।

(i) संस्कृति की अभिव्यक्ति: भारतीय कलाएँ — चाहे वह शास्त्रीय संगीत हो, भरतनाट्यम हो, मधुबनी चित्रकला हो या मंदिर स्थापत्य — सभी भारतीय संस्कृति के मूल्यों, धर्म, दर्शन और जीवन-दृष्टि को प्रतिबिंबित करती हैं।

(ii) धार्मिक और आध्यात्मिक जुड़ाव: भारतीय कलाओं का उद्भव प्रायः धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक साधना से हुआ है। नृत्य, संगीत और मूर्तिकला देवी-देवताओं की उपासना के माध्यम बने। इस प्रकार कला और संस्कृति का धार्मिक धरातल पर गहरा मिलन है।

(iii) विविधता में एकता: भारत की विविध क्षेत्रीय कलाएँ — कथकली, कुचिपुड़ी, ओडिसी, मणिपुरी आदि — अलग-अलग होते हुए भी एक सांस्कृतिक सूत्र में बँधी हैं। यह भारतीय संस्कृति की 'विविधता में एकता' की विशेषता को दर्शाता है।

(iv) सामाजिक जीवन का प्रतिबिंब: लोककलाएँ और जनजातीय कलाएँ समाज के सामान्य जन के जीवन, उनके उत्सवों, कृषि-चक्र और प्रकृति के प्रति उनके दृष्टिकोण को व्यक्त करती हैं।

(v) संस्कृति का संरक्षण: कलाएँ संस्कृति को जीवित रखती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी कलाओं के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्य, परंपराएँ और ज्ञान हस्तांतरित होते रहते हैं।

निष्कर्ष: भारतीय कलाएँ भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। संस्कृति कला को जन्म देती है और कला संस्कृति को अमर बनाती है। दोनों के बिना एक-दूसरे का अस्तित्व अधूरा है।
3शास्त्रीय कलाओं का आधार जनजातीय और लोक कलाएँ हैं– अपनी सहमति और असहमति के पक्ष में तर्क दें।Show solution
दिया गया है: यह कथन कि 'शास्त्रीय कलाओं का आधार जनजातीय और लोक कलाएँ हैं' — इस पर सहमति और असहमति के तर्क प्रस्तुत करने हैं।

अवधारणा: शास्त्रीय कलाएँ वे हैं जो शास्त्रों (नियमों/ग्रंथों) पर आधारित हैं, जबकि लोक और जनजातीय कलाएँ जन-सामान्य की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हैं।

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### सहमति के पक्ष में तर्क:

(i) ऐतिहासिक क्रम: मानव सभ्यता के विकास में पहले जनजातीय और लोक कलाएँ अस्तित्व में आईं। ये कलाएँ कच्चे रूप में थीं। बाद में विद्वानों और आचार्यों ने इन्हें परिष्कृत कर शास्त्रीय रूप दिया।

(ii) नाट्यशास्त्र का उदाहरण: भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में लोक परंपराओं के तत्त्वों को समाहित किया गया है। शास्त्रीय नृत्य के कई मुद्राएँ और भाव-भंगिमाएँ लोक नृत्यों से ली गई हैं।

(iii) संगीत का विकास: भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग-रागिनियाँ लोकगीतों और जनजातीय संगीत की धुनों पर आधारित हैं। भैरवी, काफी जैसे राग स्पष्टतः लोक परंपरा से आए हैं।

(iv) चित्रकला: अजंता की गुफाओं की चित्रकला में लोक और जनजातीय कला के तत्त्व स्पष्ट दिखते हैं। मधुबनी और वारली जैसी लोककलाएँ शास्त्रीय चित्रकला की पूर्वज मानी जा सकती हैं।

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### असहमति के पक्ष में तर्क:

(i) स्वतंत्र विकास: शास्त्रीय कलाओं का विकास स्वतंत्र रूप से भी हुआ है। वेदों में वर्णित सामगान, मंदिर स्थापत्य के नियम आदि का लोक कलाओं से सीधा संबंध नहीं है।

(ii) शास्त्रीय कलाओं की जटिलता: शास्त्रीय कलाओं में जो तकनीकी जटिलता, व्याकरण और अनुशासन है, वह लोक कलाओं में नहीं पाया जाता। यह जटिलता स्वतंत्र बौद्धिक विकास का परिणाम है।

(iii) भिन्न उद्देश्य: लोक कलाएँ मनोरंजन और सामाजिक उत्सवों के लिए थीं, जबकि शास्त्रीय कलाएँ आध्यात्मिक साधना और मोक्ष-प्राप्ति के उद्देश्य से विकसित हुईं।

(iv) दोनों की समानांतर उपस्थिति: इतिहास में दोनों प्रकार की कलाएँ एक साथ विद्यमान रही हैं। यह कहना कठिन है कि एक दूसरे का आधार है।

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निष्कर्ष: वस्तुतः शास्त्रीय और लोक कलाओं का संबंध एकतरफा नहीं है। दोनों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया है। लोक कलाओं ने शास्त्रीय कलाओं को कच्चा माल दिया और शास्त्रीय कलाओं ने लोक कलाओं को परिष्कृत रूप। दोनों भारतीय कला-परंपरा के दो पहिए हैं।

चर्चा करें

1साहित्यसंगीतकलाविहीन: साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन: — भर्तृहरि के इस कथन पर कक्षा में चर्चा करें।Show solution
दिया गया है: भर्तृहरि का कथन — 'साहित्यसंगीतकलाविहीन: साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन:'

अर्थ: जो व्यक्ति साहित्य, संगीत और कला से विहीन (रहित) है, वह साक्षात् पशु के समान है — बस अंतर इतना है कि उसके पूँछ और सींग नहीं हैं।

चर्चा के बिंदु:

(i) कथन का भाव: भर्तृहरि यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य और पशु में मूल अंतर उसकी सांस्कृतिक चेतना है। शरीर की दृष्टि से मनुष्य भी एक प्राणी है, किंतु साहित्य, संगीत और कला उसे पशु से ऊपर उठाकर मानवीय गरिमा प्रदान करते हैं।

(ii) साहित्य का महत्त्व: साहित्य मनुष्य को सोचने, समझने और संवेदनशील बनाने की शक्ति देता है। बिना साहित्य के मनुष्य का मानसिक और भावनात्मक विकास अधूरा रहता है।

(iii) संगीत का महत्त्व: संगीत आत्मा को परिष्कृत करता है। यह मनुष्य के भीतर सौंदर्यबोध, भावनात्मक संतुलन और आनंद की अनुभूति जगाता है।

(iv) कला का महत्त्व: कला मनुष्य की सृजनशीलता का प्रमाण है। यह उसे प्रकृति और समाज से जोड़ती है तथा जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है।

(v) आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता: आज के भौतिकवादी युग में जब मनुष्य केवल धन और सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहा है, भर्तृहरि का यह कथन और भी प्रासंगिक हो जाता है। जो व्यक्ति कला और साहित्य से दूर है, वह संवेदनहीन और यांत्रिक जीवन जीता है।

(vi) सहमति: इस कथन से सहमति इस अर्थ में है कि मानवीय सभ्यता का निर्माण ही कला, साहित्य और संगीत से हुआ है। इनके बिना मनुष्य केवल जैविक प्राणी रह जाता है।

निष्कर्ष: भर्तृहरि का यह कथन मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान याद दिलाता है। साहित्य, संगीत और कला ही वे तत्त्व हैं जो मनुष्य को 'मनुष्य' बनाते हैं। इनसे विमुख व्यक्ति भले ही बाहर से मनुष्य दिखे, किंतु उसका आंतरिक जीवन पशु-तुल्य ही होता है।

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Frequently Asked Questions

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