कल्लू कुम्हार की उनाकोटी
Bihar Board · Class 9 · Hindi
NCERT Solutions for कल्लू कुम्हार की उनाकोटी — Bihar Board Class 9 Hindi.
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Get startedबोध-प्रश्न — कल्लू कुम्हार की उनाकोटी (संचयन, कक्षा 9)
1'उनाकोटी' का अर्थ स्पष्ट करते हुए बतलाएँ कि यह स्थान इस नाम से क्यों प्रसिद्ध है?Show solution
उत्तर:
'उनाकोटी' का शाब्दिक अर्थ है — एक कोटि (करोड़) से एक कम, अर्थात् 99,99,999 (निन्यानवे लाख निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे)।
यह स्थान त्रिपुरा राज्य में स्थित है। यहाँ पहाड़ी पर भगवान शिव तथा अन्य देवी-देवताओं की विशाल मूर्तियाँ और उभरी हुई आकृतियाँ (bas-relief) उकेरी गई हैं। इन मूर्तियों की कुल संख्या एक कोटि से एक कम — अर्थात् उनाकोटि — बताई जाती है। इसीलिए इस स्थान का नाम 'उनाकोटी' पड़ा और यह इसी नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ शिव की एक विशाल मूर्ति है जिसे 'उनाकोटीश्वर काल भैरव' कहते हैं, जिसका मुख मात्र ही लगभग तीस फुट ऊँचा है।
2पाठ के संदर्भ में उनाकोटी में स्थित गंगावतरण की कथा को अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
उत्तर:
पाठ के अनुसार गंगावतरण की कथा इस प्रकार है —
जब माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होने वाली थीं, तब उनके वेग को सहन करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण करने का निर्णय किया। गंगा के पृथ्वी पर उतरने से पहले सभी देवी-देवता उस पवित्र दृश्य को देखने के लिए उनाकोटी में एकत्रित हुए। उनकी संख्या एक कोटि (एक करोड़) थी। भगवान शिव ने सभी देवताओं से कहा कि वे सब रात्रि यहीं विश्राम करें और प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर साथ चलें। परंतु अगले दिन सूर्योदय होने पर भी कोई नहीं उठा — केवल शिव ही जागे। इस पर शिव क्रोधित हो गए और शेष सभी देवताओं को वहीं पत्थर बन जाने का शाप दे दिया। तभी से वे सभी देवी-देवता उनाकोटी की पहाड़ियों पर पत्थर की मूर्तियों के रूप में विद्यमान हैं। शिव स्वयं वहाँ से चले गए, इसीलिए मूर्तियों की संख्या एक कोटि से एक कम — उनाकोटि — रह गई।
3कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी से किस प्रकार जुड़ गया?Show solution
उत्तर:
कल्लू कुम्हार एक कुशल मूर्तिकार था जो भगवान शिव का परम भक्त था। वह शिव-पार्वती के साथ कैलाश पर्वत जाना चाहता था। उसने भगवान शिव से इसकी प्रार्थना की। शिव ने शर्त रखी कि यदि कल्लू एक ही रात में शिव की एक कोटि मूर्तियाँ बना दे, तो उसे कैलाश ले जाया जाएगा। कल्लू ने पूरी रात अथक परिश्रम किया और प्रातःकाल तक एक कोटि से एक कम — अर्थात् उनाकोटि — मूर्तियाँ बना डालीं। एक मूर्ति पूरी न हो सकी। शर्त पूरी न होने के कारण शिव उसे कैलाश नहीं ले गए और कल्लू वहीं रह गया। इस प्रकार उन मूर्तियों की संख्या 'उनाकोटि' होने के कारण उस स्थान का नाम 'उनाकोटी' पड़ा और कल्लू कुम्हार का नाम इस स्थान से सदा के लिए जुड़ गया।
4'मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई' — लेखक के इस कथन के पीछे कौन-सी घटना जुड़ी है?Show solution
उत्तर:
लेखक जब उनाकोटी की यात्रा पर थे, तब उन्होंने देखा कि वहाँ की विशाल और प्राचीन मूर्तियाँ उपेक्षित अवस्था में हैं। जंगल में छिपी इन अमूल्य मूर्तियों की कोई देखभाल नहीं हो रही थी। इसी दौरान लेखक को यह जानकारी मिली कि इन दुर्लभ मूर्तियों के कुछ अंग — विशेषकर सिर — चोरी हो चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इन प्राचीन मूर्तियों के अंगों की भारी माँग है और तस्कर इन्हें चुराकर विदेशों में बेच देते हैं। भारत की इस अमूल्य सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक धरोहर की इस प्रकार की दुर्दशा और लूट की बात सुनकर लेखक के मन में गहरी पीड़ा और सिहरन उत्पन्न हुई। इसी कारण उन्होंने कहा — 'मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई।' यह कथन लेखक की देश की विरासत के प्रति चिंता और संवेदनशीलता को व्यक्त करता है।
5त्रिपुरा 'बहुधार्मिक समाज' का उदाहरण कैसे बना?Show solution
उत्तर:
त्रिपुरा अनेक धर्मों, जातियों और संस्कृतियों का संगम-स्थल है, इसीलिए यह 'बहुधार्मिक समाज' का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं —
1. विभिन्न जनजातियाँ: त्रिपुरा में उन्नीस से अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं जिनकी अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताएँ और परंपराएँ हैं।
2. हिंदू धर्म: यहाँ हिंदू धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में हैं और उनाकोटी जैसे प्राचीन शैव तीर्थ इसके प्रमाण हैं।
3. इस्लाम और ईसाई धर्म: यहाँ मुसलमान और ईसाई समुदाय भी शांतिपूर्वक रहते हैं।
4. बौद्ध धर्म: बौद्ध धर्म के अनुयायी भी यहाँ पाए जाते हैं।
इस प्रकार त्रिपुरा में विभिन्न धर्मों के लोग आपसी सौहार्द और सहिष्णुता के साथ रहते हैं, जो इसे एक बहुधार्मिक समाज का जीवंत उदाहरण बनाता है।
6टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय किन दो प्रमुख हस्तियों से हुआ? समाज-कल्याण के कार्यों में उनका क्या योगदान था?Show solution
उत्तर:
टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय निम्नलिखित दो प्रमुख हस्तियों से हुआ —
1. हेमंत कुमार जमातिया —
ये एक लोकगायक थे। इन्होंने 'कोकबोरोक' भाषा में अनेक लोकगीत गाए और इस भाषा को जीवित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्होंने अपने गीतों के माध्यम से जनजातीय समाज में जागरूकता फैलाई। इन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
2. मंगला सिंह —
ये एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता थीं। इन्होंने महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए। इन्होंने महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए घरेलू उद्योगों और हस्तशिल्प को प्रोत्साहित किया। इनके प्रयासों से स्थानीय महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त हुईं।
इस प्रकार दोनों हस्तियों ने अपने-अपने क्षेत्र में समाज-कल्याण के उल्लेखनीय कार्य किए।
7कैलासशहर के जिलाधिकारी ने आलू की खेती के विषय में लेखक को क्या जानकारी दी?Show solution
उत्तर:
कैलासशहर के जिलाधिकारी ने लेखक को आलू की खेती के विषय में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दीं —
1. उत्पादन में वृद्धि: त्रिपुरा में आलू की खेती बड़े पैमाने पर होती है और यहाँ के किसान अच्छी मात्रा में आलू उत्पादन करते हैं।
2. भंडारण की समस्या: यहाँ आलू के भंडारण के लिए पर्याप्त शीतगृह (cold storage) की सुविधा नहीं है, जिसके कारण किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है।
3. बाजार की समस्या: उचित बाजार और परिवहन सुविधाओं के अभाव में किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
4. सरकारी प्रयास: जिलाधिकारी ने बताया कि सरकार इस समस्या के समाधान के लिए प्रयासरत है और शीतगृहों की स्थापना की योजना बनाई जा रही है ताकि किसानों को उनकी मेहनत का उचित फल मिल सके।
इस प्रकार आलू की खेती में संभावनाएँ तो अपार हैं, किंतु भंडारण और विपणन की समस्याएँ किसानों की प्रगति में बाधक हैं।
8त्रिपुरा के घरेलू उद्योगों पर प्रकाश डालते हुए अपनी जानकारी के कुछ अन्य घरेलू उद्योगों के विषय में बताइए?Show solution
उत्तर:
त्रिपुरा के घरेलू उद्योग —
त्रिपुरा में निम्नलिखित घरेलू उद्योग प्रमुख हैं —
1. बाँस और बेंत के उत्पाद: त्रिपुरा में बाँस और बेंत की प्रचुरता है। यहाँ के लोग बाँस से टोकरियाँ, चटाइयाँ, फर्नीचर और अन्य सजावटी वस्तुएँ बनाते हैं।
2. हथकरघा और बुनाई: यहाँ की जनजातीय महिलाएँ परंपरागत वस्त्र बुनती हैं जो अपने विशिष्ट रंग और डिजाइन के लिए प्रसिद्ध हैं।
3. अगरबत्ती उद्योग: त्रिपुरा में अगरबत्ती बनाने का उद्योग भी प्रचलित है।
4. रबर उत्पादन: यहाँ रबर की खेती और उससे संबंधित उद्योग भी विकसित हो रहे हैं।
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अन्य घरेलू उद्योग (सामान्य जानकारी के आधार पर) —
1. मधुमक्खी पालन: शहद उत्पादन एक लाभकारी घरेलू उद्योग है।
2. मिट्टी के बर्तन बनाना (कुम्हारी): यह परंपरागत घरेलू उद्योग है।
3. अचार-पापड़ उद्योग: घरों में महिलाएँ अचार, पापड़ और मुरब्बा बनाकर आजीविका कमाती हैं।
4. सिलाई-कढ़ाई उद्योग: वस्त्रों पर कढ़ाई और सिलाई का कार्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाता है।
5. मोमबत्ती और साबुन निर्माण: ये भी लघु घरेलू उद्योग के रूप में प्रचलित हैं।
घरेलू उद्योग ग्रामीण और जनजातीय समाज को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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