उपभोक्तावाद की संस्कृति
Bihar Board · Class 9 · Hindi
NCERT Solutions for उपभोक्तावाद की संस्कृति — Bihar Board Class 9 Hindi.
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Get startedप्रश्न-अभ्यास
1लेखक के अनुसार जीवन में 'सुख' से क्या अभिप्राय है?Show solution
उत्तर:
लेखक के अनुसार जीवन में 'सुख' का अभिप्राय केवल भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति या उपभोग से नहीं है। लेखक का मानना है कि वास्तविक सुख आंतरिक संतोष, सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा और जीवन की गुणवत्ता में निहित है। जीवन की गुणवत्ता आलू के चिप्स या बहुविज्ञापित शीतल पेयों से नहीं सुधरती। सच्चा सुख भोग-विलास और दिखावे में नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा में है। उपभोक्तावादी संस्कृति जो 'सुख' परोसती है, वह झूठी तुष्टि मात्र है।
2आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है?Show solution
उत्तर:
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित कर रही है—
1. मानसिकता में परिवर्तन: विज्ञापन और प्रसार के सूक्ष्म तंत्र हमारी मानसिकता बदल रहे हैं। हम अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित होते हैं।
2. चरित्र में बदलाव: जाने-अनजाने हमारा चरित्र बदल रहा है और हम उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
3. दिखावे की प्रवृत्ति: समाज में दिखावे की संस्कृति बढ़ रही है। लोग प्रतिष्ठा के लिए महँगी वस्तुएँ खरीदते हैं।
4. सामाजिक असमानता: वर्गों के बीच दूरी बढ़ रही है और सामाजिक सरोकारों में कमी आ रही है।
5. नैतिक मूल्यों का ह्रास: मर्यादाएँ टूट रही हैं, नैतिक मानदंड ढीले पड़ रहे हैं और व्यक्ति-केंद्रकता बढ़ रही है।
6. सांस्कृतिक अस्मिता का हास: हमारी सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ रही है और हम लक्ष्य-भ्रम से पीड़ित हो रहे हैं।
3लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?Show solution
उत्तर:
लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती निम्नलिखित कारणों से कहा है—
1. सामाजिक नींव को खतरा: उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है। गांधी जी के अनुसार हमें अपनी बुनियाद पर कायम रहना चाहिए, किंतु यह संस्कृति उसे नष्ट कर रही है।
2. सीमित संसाधनों का अपव्यय: हमारे सीमित संसाधनों का घोर अपव्यय हो रहा है जो भविष्य के लिए हानिकारक है।
3. सामाजिक अशांति: जीवन स्तर का बढ़ता अंतर आक्रोश और अशांति को जन्म दे रहा है।
4. सांस्कृतिक अस्मिता का हास: हमारी सांस्कृतिक पहचान खतरे में है और हम दिग्भ्रमित हो रहे हैं।
5. झूठे लक्ष्यों का पीछा: विकास के विराट उद्देश्य पीछे हट रहे हैं और हम झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं।
6. नैतिक पतन: स्वार्थ परमार्थ पर हावी हो रहा है और भोग की आकांक्षाएँ बढ़ती जा रही हैं।
इन सभी कारणों से लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बताया है।
4आशय स्पष्ट कीजिए—
(क) जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
(ख) प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हो।Show solution
दिया गया है: उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव का वर्णन।
इस कथन का आशय यह है कि आज के विज्ञापन-प्रधान युग में हम जाने-अनजाने उपभोक्तावादी संस्कृति के शिकार होते जा रहे हैं। विज्ञापनों और प्रचार-तंत्र का इतना गहरा प्रभाव पड़ रहा है कि हमारा चरित्र, हमारी सोच और हमारे मूल्य बदलते जा रहे हैं। हम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार वस्तुएँ नहीं खरीदते, बल्कि बाज़ार और विज्ञापन जो दिखाते हैं, उसी के पीछे भागते हैं। इस प्रकार हम उत्पादों के दास बन जाते हैं — हम वस्तुओं का उपयोग नहीं करते, बल्कि वस्तुएँ हमें नियंत्रित करने लगती हैं।
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(ख) आशय:
दिया गया है: समाज में प्रतिष्ठा और दिखावे की प्रवृत्ति का वर्णन।
इस कथन का आशय यह है कि आज के उपभोक्तावादी समाज में लोग प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के दिखावे करते हैं। कोई महँगी कार खरीदकर, कोई ब्रांडेड कपड़े पहनकर, तो कोई विदेशी वस्तुओं का उपयोग करके अपनी प्रतिष्ठा दिखाना चाहता है। ये सब प्रयास कभी-कभी इतने हास्यास्पद हो जाते हैं कि देखने वाले हँसते हैं, फिर भी लोग इन्हें करते रहते हैं। समाज में मान-सम्मान पाने की यह अंधी दौड़ व्यक्ति को विवेकहीन बना देती है।
5कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं? क्यों?Show solution
उत्तर:
टी.वी. पर विज्ञापन देखकर हम किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए लालायित हो जाते हैं, इसके निम्नलिखित कारण हैं—
1. आकर्षक प्रस्तुति: विज्ञापन बनाने वाले विशेषज्ञ वस्तु को इतने आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि वह हमें अपनी ओर खींचती है।
2. सम्मोहन शक्ति: विज्ञापनों में सम्मोहन और वशीकरण की शक्ति होती है। प्रसिद्ध हस्तियों (celebrities) को देखकर हम भी उनके जैसा बनना चाहते हैं।
3. मनोवैज्ञानिक प्रभाव: विज्ञापन हमारी इच्छाओं और भावनाओं को उकसाते हैं। वे हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि यह वस्तु हमारे जीवन को बेहतर बनाएगी।
4. बार-बार दोहराव: एक ही विज्ञापन बार-बार दिखाने से वह हमारे मन में बस जाता है और हम उस वस्तु को खरीदने की इच्छा करने लगते हैं।
5. सामाजिक दबाव: जब हम देखते हैं कि हमारे आस-पास के लोग कोई वस्तु उपयोग कर रहे हैं, तो हम भी उसे खरीदना चाहते हैं।
इस प्रकार विज्ञापन हमारी मानसिकता को प्रभावित करके हमें अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं।
6आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन? तर्क देकर स्पष्ट करें।Show solution
उत्तर:
मेरे अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए, न कि उसका विज्ञापन। इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क हैं—
गुणवत्ता के पक्ष में तर्क:
1. दीर्घकालिक लाभ: गुणवत्तापूर्ण वस्तु अधिक समय तक चलती है और हमें बार-बार खरीदारी नहीं करनी पड़ती।
2. धन की बचत: विज्ञापित वस्तुएँ प्रायः महँगी होती हैं क्योंकि उनकी विज्ञापन लागत भी उपभोक्ता से वसूली जाती है। गुणवत्ता के आधार पर खरीदने से धन की बचत होती है।
3. वास्तविक आवश्यकता की पूर्ति: गुणवत्ता के आधार पर खरीदी गई वस्तु हमारी वास्तविक आवश्यकता पूरी करती है।
4. विज्ञापन भ्रामक हो सकते हैं: विज्ञापन केवल वस्तु के अच्छे पहलू दिखाते हैं, उसकी कमियाँ छुपाते हैं। अतः विज्ञापन पर आँख मूँदकर विश्वास करना उचित नहीं।
5. विवेकशील उपभोक्ता: गुणवत्ता के आधार पर खरीदारी करने वाला व्यक्ति विवेकशील उपभोक्ता कहलाता है।
निष्कर्ष: विज्ञापन केवल जानकारी का एक साधन है, खरीदारी का आधार नहीं। हमें सदैव वस्तु की गुणवत्ता, उपयोगिता और अपनी आवश्यकता को ध्यान में रखकर खरीदारी करनी चाहिए।
7पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही 'दिखावे की संस्कृति' पर विचार व्यक्त कीजिए।Show solution
उत्तर:
आज के उपभोक्तावादी युग में 'दिखावे की संस्कृति' तेज़ी से पनप रही है। इस पर विचार इस प्रकार हैं—
दिखावे की संस्कृति का स्वरूप:
आज लोग वस्तुएँ अपनी आवश्यकता के लिए नहीं, बल्कि दूसरों को दिखाने के लिए खरीदते हैं। महँगे मोबाइल, ब्रांडेड कपड़े, विदेशी गाड़ियाँ — ये सब प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए हैं।
दिखावे के कारण:
- विज्ञापनों का सम्मोहन
- सामाजिक दबाव और प्रतिस्पर्धा
- पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण
- प्रतिष्ठा पाने की लालसा
दिखावे के दुष्परिणाम:
1. सीमित संसाधनों का अपव्यय होता है।
2. समाज में वर्ग-भेद बढ़ता है।
3. सामाजिक अशांति और आक्रोश उत्पन्न होता है।
4. नैतिक मूल्यों का पतन होता है।
5. सांस्कृतिक अस्मिता खतरे में पड़ती है।
निष्कर्ष: दिखावे की यह संस्कृति समाज की जड़ों को खोखला कर रही है। गांधी जी के अनुसार हमें अपनी सांस्कृतिक बुनियाद पर कायम रहते हुए विवेकपूर्ण जीवन जीना चाहिए। दिखावे की बजाय सादगी और वास्तविक मूल्यों को अपनाना ही समाज के लिए हितकर है।
8आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।Show solution
उत्तर (अनुच्छेद):
आज की उपभोक्ता संस्कृति ने हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। दीपावली, होली, ईद, क्रिसमस जैसे त्योहार अब केवल आनंद और आपसी मेल-मिलाप के अवसर नहीं रहे, बल्कि ये बाज़ार के लिए बड़े अवसर बन गए हैं। दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा की जगह चीनी बिजली की झालरें ले चुकी हैं। घर पर बने पकवानों की जगह बाज़ार की मिठाइयाँ और चॉकलेट आ गई हैं। शादी-विवाह में सादगी की जगह भव्य आयोजन होने लगे हैं जिनमें लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। त्योहारों पर महँगे उपहार देना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है। विज्ञापन कंपनियाँ त्योहारों से पहले ही 'फेस्टिव सेल' और 'ऑफर' लेकर आ जाती हैं और लोग अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने लगते हैं। इस प्रकार त्योहारों की आत्मा — प्रेम, भाईचारा, सादगी और आध्यात्मिकता — धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है और उनका स्थान दिखावा और उपभोग ले रहा है। हमें इस प्रवृत्ति से सावधान रहकर अपने त्योहारों की मूल भावना को बचाना होगा।
भाषा-अध्ययन
9(क)ऊपर दिए गए उदाहरण को ध्यान में रखते हुए क्रिया-विशेषण से युक्त पाँच वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए।Show solution
पाठ से क्रिया-विशेषण युक्त पाँच वाक्य:
1. धीरे-धीरे सब कुछ बदल रही है। (क्रिया-विशेषण: धीरे-धीरे — कैसे बदल रही है)
2. संस्कृति की नियंत्रक शक्तियाँ क्षीण होती जा रही हैं। (क्रिया-विशेषण: क्षीण — कैसे हो रही हैं)
3. हमारा समाज अन्य-निर्देशित होता जा रहा है। (क्रिया-विशेषण: अन्य-निर्देशित — कैसे हो रहा है)
4. भोग की आकांक्षाएँ आसमान को छू रही हैं। (क्रिया-विशेषण: आसमान को — कहाँ तक)
5. जैसे-जैसे दिखावे की यह संस्कृति फैलेगी, सामाजिक अशांति भी बढ़ेगी। (क्रिया-विशेषण: जैसे-जैसे — कब/किस क्रम में)
नोट: उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित/बोल्ड शब्द क्रिया-विशेषण हैं जो क्रिया की विशेषता बता रहे हैं।
9(ख)धीरे-धीरे, जोर से, लगातार, हमेशा, आजकल, कम, ज्यादा, यहाँ, उधर, बाहर—इन क्रिया-विशेषण शब्दों का प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए।Show solution
वाक्य निर्माण:
1. धीरे-धीरे — राम धीरे-धीरे चलता है।
2. जोर से — बच्चे जोर से हँस रहे थे।
3. लगातार — वह लगातार तीन घंटे पढ़ता रहा।
4. हमेशा — सच्चाई हमेशा जीतती है।
5. आजकल — आजकल बाज़ार में विदेशी वस्तुओं की भरमार है।
6. कम — उसने आज कम खाना खाया।
7. ज्यादा — तुम ज्यादा बोलते हो।
8. यहाँ — यहाँ बैठकर पढ़ाई करो।
9. उधर — उधर मत जाओ, खतरा है।
10. बाहर — बच्चे बाहर खेल रहे हैं।
9(ग)नीचे दिए गए वाक्यों में से क्रिया-विशेषण और विशेषण शब्द छाँटकर अलग लिखिए।Show solution
उत्तर:
| वाक्य | क्रिया-विशेषण | विशेषण |
|---|---|---|
| (1) कल रात से निरंतर बारिश हो रही है। | निरंतर, कल | — |
| (2) पेड़ पर लगे पके आम देखकर बच्चों के मुँह में पानी आ गया। | — | पके (आम की विशेषता) |
| (3) रसोईघर से आती पुलाव की हलकी खुशबू से मुझे जोरों की भूख लग आई। | जोरों की | हलकी (खुशबू की विशेषता) |
| (4) उतना ही खाओ जितनी भूख है। | उतना, जितनी | — |
| (5) विलासिता की वस्तुओं से आजकल बाज़ार भरा पड़ा है। | आजकल | — |
स्पष्टीकरण:
- क्रिया-विशेषण वे शब्द हैं जो क्रिया की विशेषता बताते हैं (कब, कैसे, कहाँ, कितना)।
- विशेषण वे शब्द हैं जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते हैं।
पाठेतर सक्रियता
1'दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का बच्चों पर बढ़ता प्रभाव' विषय पर अध्यापक और विद्यार्थी के बीच हुए वार्तालाप को संवाद शैली में लिखिए।Show solution
संवाद:
विद्यार्थी (रोहन): सर, कल टी.वी. पर एक नए चॉकलेट का विज्ञापन देखा, बहुत अच्छा लगा। मैं उसे ज़रूर खरीदूँगा।
अध्यापक: रोहन, क्या तुमने सोचा कि तुम्हें उस चॉकलेट की वास्तव में ज़रूरत है?
विद्यार्थी: नहीं सर, लेकिन विज्ञापन में वह बहुत स्वादिष्ट लग रही थी।
अध्यापक: यही तो समस्या है। विज्ञापन हमें वस्तु की ज़रूरत नहीं, बल्कि उसकी चाहत पैदा करते हैं। क्या तुम जानते हो कि विज्ञापन बनाने वाले विशेषज्ञ बच्चों की मनोवैज्ञानिक कमज़ोरियों का फायदा उठाते हैं?
विद्यार्थी: सर, तो क्या विज्ञापन देखना बुरा है?
अध्यापक: नहीं, विज्ञापन देखना बुरा नहीं है, लेकिन उन पर आँख मूँदकर विश्वास करना और उनसे प्रभावित होकर अनावश्यक वस्तुएँ खरीदना ज़रूर हानिकारक है।
विद्यार्थी: तो हमें क्या करना चाहिए सर?
अध्यापक: तुम्हें विवेकशील उपभोक्ता बनना चाहिए। वस्तु खरीदने से पहले सोचो — क्या यह मेरे लिए आवश्यक है? क्या इसकी गुणवत्ता अच्छी है? क्या इसकी कीमत उचित है?
विद्यार्थी: आपने सही कहा सर। अब मैं विज्ञापन देखकर नहीं, बल्कि सोच-समझकर खरीदारी करूँगा।
अध्यापक: शाबाश! यही एक जागरूक नागरिक की पहचान है।
2क्या उपभोक्ता संस्कृति सामंती संस्कृति का ही विकसित रूप है — इस विषय के पक्ष अथवा विपक्ष में विचार व्यक्त कीजिए।Show solution
पक्ष में विचार:
हाँ, उपभोक्ता संस्कृति सामंती संस्कृति का ही विकसित रूप है। इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क हैं—
1. वर्ग-भेद: सामंती संस्कृति में जैसे राजा-महाराजा और सामान्य जन के बीच भारी अंतर था, उसी प्रकार उपभोक्ता संस्कृति में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है।
2. दिखावा और विलासिता: सामंती युग में राजा-महाराजा विलासिता और दिखावे में जीते थे। आज उपभोक्ता संस्कृति में भी लोग महँगी वस्तुओं से अपनी प्रतिष्ठा दिखाते हैं।
3. शोषण: सामंती व्यवस्था में सामान्य जन का शोषण होता था। उपभोक्ता संस्कृति में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उपभोक्ताओं का आर्थिक शोषण करती हैं।
4. शक्ति का केंद्रीकरण: दोनों संस्कृतियों में शक्ति और संसाधन कुछ ही लोगों के हाथ में केंद्रित रहते हैं।
निष्कर्ष: इस प्रकार उपभोक्ता संस्कृति सामंती संस्कृति का ही आधुनिक और विकसित रूप प्रतीत होती है, जिसमें शोषण और असमानता के तरीके बदल गए हैं, किंतु उनका मूल स्वभाव वही है।
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