तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
CBSE · Class 10 · Hindi
NCERT Solutions for तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र — CBSE Class 10 Hindi.
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1'तीसरी कसम' फ़िल्म को कौन-कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?Show solution
'तीसरी कसम' फ़िल्म को राष्ट्रपति स्वर्ण पदक (राष्ट्रीय पुरस्कार) से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त इसे बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला तथा मास्को फ़िल्म फेस्टिवल में भी इसे पुरस्कृत किया गया।
2शैलेंद्र ने कितनी फ़िल्में बनाईं?Show solution
शैलेंद्र ने अपने जीवन में केवल एक ही फ़िल्म बनाई — 'तीसरी कसम'। वे मूलतः गीतकार थे, फ़िल्म निर्माता नहीं।
3राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ फ़िल्मों के नाम बताइए।Show solution
राजकपूर द्वारा निर्देशित कुछ प्रमुख फ़िल्में हैं — 'आग', 'बरसात', 'आवारा', 'श्री 420', 'जागते रहो', 'मेरा नाम जोकर', 'बॉबी' आदि।
4'तीसरी कसम' फ़िल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और फ़िल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभिनय किया है?Show solution
'तीसरी कसम' फ़िल्म के नायक राजकपूर थे, जिन्होंने हीरामन (एक भोले-भाले गाड़ीवान) का अभिनय किया। नायिका वहीदा रहमान थीं, जिन्होंने हीराबाई (एक नौटंकी कलाकार) का अभिनय किया।
5फ़िल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण किसने किया था?Show solution
फ़िल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र ने किया था। यह उनके द्वारा निर्मित एकमात्र फ़िल्म थी।
6राजकपूर ने 'मेरा नाम जोकर' के निर्माण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी?Show solution
राजकपूर ने 'मेरा नाम जोकर' के निर्माण के समय यह कल्पना भी नहीं की थी कि इस फ़िल्म को बनाने में उन्हें पूरे छह साल लग जाएँगे और इसके निर्माण में इतना अधिक समय व धन व्यय होगा।
7राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया?Show solution
जब राजकपूर ने शैलेंद्र से फ़िल्म में काम करने के लिए अपना मेहनताना (पारिश्रमिक) माँगा, तो शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया। उन्हें यह अपेक्षा नहीं थी कि उनका घनिष्ठ मित्र उनसे पारिश्रमिक माँगेगा।
8फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?Show solution
फ़िल्म समीक्षक राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन मानते थे। वे उन्हें एक ऐसा कुशल अभिनेता मानते थे जो अपनी आँखों से भी अभिनय कर सकते थे — अर्थात् उनकी आँखें बोलती थीं।
लिखित (क) — 25-30 शब्दों में उत्तर
1'तीसरी कसम' फ़िल्म को 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' क्यों कहा गया है?Show solution
'तीसरी कसम' फ़िल्म में कविता जैसी संवेदनशीलता, भावप्रवणता और कलात्मकता थी। इसमें लोक-तत्त्व, मानवीय भावनाएँ और साहित्यिक गहराई इस प्रकार उतरी थीं जैसे कोई कविता कैमरे की रील पर लिख दी गई हो। इसीलिए इसे 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' कहा गया।
2'तीसरी कसम' फ़िल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे?Show solution
'तीसरी कसम' फ़िल्म की संवेदना अत्यंत गहरी और साहित्यिक थी। यह व्यावसायिक दृष्टि से लाभदायक नहीं लगती थी। वितरकों को लगता था कि यह फ़िल्म दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाएगी और उन्हें आर्थिक लाभ नहीं होगा, इसलिए कोई खरीददार नहीं मिला।
3शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य क्या है?Show solution
शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कर्तव्य केवल दर्शकों की रुचि के अनुसार उथला मनोरंजन परोसना नहीं है। कलाकार को दर्शकों की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करना चाहिए और उन्हें उच्च भावनाओं व संवेदनाओं से जोड़ना चाहिए।
4फ़िल्मों में त्रासद स्थितियों का चित्रांकन ग्लोरिफाई क्यों कर दिया जाता है?Show solution
फ़िल्मों में त्रासद (दुखद) स्थितियों को ग्लोरिफाई इसलिए कर दिया जाता है क्योंकि फ़िल्म निर्माता दर्शकों को आकर्षित करने और अधिक धन कमाने के लिए दुख को भी मनोरंजक बना देते हैं। व्यावसायिक लाभ के लिए वे यथार्थ को बदल देते हैं।
5'शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं'—इस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।Show solution
राजकपूर एक संवेदनशील कलाकार थे जो अपनी भावनाओं को अभिनय के माध्यम से व्यक्त करते थे। शैलेंद्र ने अपने गीतों में उन्हीं भावनाओं को शब्दों में पिरोया। दोनों की संवेदनाएँ एक-दूसरे की पूरक थीं — राजकपूर जो अभिनय से कहते थे, शैलेंद्र वही गीतों में कह देते थे।
6लेखक ने राजकपूर को एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं?Show solution
'शोमैन' से तात्पर्य ऐसे कलाकार से है जो दर्शकों को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दे। राजकपूर में अभिनय, निर्देशन और मनोरंजन की अद्भुत क्षमता थी। वे अपनी प्रस्तुति से दर्शकों पर गहरा प्रभाव डालते थे, इसीलिए उन्हें एशिया का सबसे बड़ा शोमैन कहा गया।
7फ़िल्म 'श्री 420' के गीत 'रातों दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ' पर संगीतकार जयकिशन ने आपत्ति क्यों की?Show solution
संगीतकार जयकिशन को लगा कि 'दसों दिशाओं' वाली बात सामान्य दर्शकों की समझ से परे है क्योंकि लोग चार दिशाएँ जानते हैं, दस नहीं। उन्होंने 'चारों दिशाओं' करने का सुझाव दिया। परंतु शैलेंद्र ने अपनी बात पर अडिग रहते हुए 'दसों दिशाओं' ही रखा।
लिखित (ख) — 50-60 शब्दों में उत्तर
1राजकपूर द्वारा फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह फ़िल्म क्यों बनाई?Show solution
शैलेंद्र एक आदर्शवादी और भावुक कवि थे। उन्हें धन और यश की उतनी चाह नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि की। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफाम' उन्हें बेहद प्रिय थी और वे उसे पर्दे पर उतारना चाहते थे। उनके लिए यह फ़िल्म एक कलात्मक अभिव्यक्ति थी, व्यावसायिक उद्यम नहीं। वे जानते थे कि यह फ़िल्म उनके हृदय की आवाज़ है और इसे बनाना उनके लिए आवश्यक था, चाहे आर्थिक हानि ही क्यों न हो।
2'तीसरी कसम' में राजकपूर का महिमामय व्यक्तित्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए।Show solution
राजकपूर एक महान् अभिनेता थे जो अपनी आँखों से भी बोल सकते थे। 'तीसरी कसम' में उन्होंने हीरामन के भोलेपन, सरलता और निश्छल प्रेम को इतनी तन्मयता से जिया कि उनका अपना व्यक्तित्व पूरी तरह हीरामन में समा गया। वे एक खालिस देहाती गाड़ीवान बन गए जो दिल की भाषा समझता है। हीराबाई की उपेक्षा पर उनके चेहरे पर जो भाव आते हैं, वे हीरामन के हैं, राजकपूर के नहीं — यही उनकी महानता है।
3लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि 'तीसरी कसम' ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है?Show solution
फणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं इस फ़िल्म की पटकथा तैयार की थी। मूल कहानी 'मारे गए गुलफाम' का रेशा-रेशा, उसकी छोटी-से-छोटी बारीकियाँ फ़िल्म में पूरी तरह उतर आईं। कहानी के पात्रों, भावनाओं, लोक-तत्त्वों और संवेदनाओं को बिना किसी व्यावसायिक समझौते के पर्दे पर प्रस्तुत किया गया। इसीलिए लेखक ने कहा कि इस फ़िल्म ने साहित्य-रचना के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया।
4शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
शैलेंद्र के गीतों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं —
- उनके गीत भाव-प्रवण थे अर्थात् भावनाओं से भरपूर थे।
- वे दुरूह (कठिन) नहीं थे — सरल भाषा में गहरी बात कहते थे।
- उनके गीतों में जीवन का यथार्थ झलकता था।
- वे दर्शकों की रुचि का परिष्कार करते थे, उथलेपन को नहीं थोपते थे।
- उनके गीतों में व्यथा भी थी, किंतु वह पराजित नहीं करती थी, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी।
- उनके गीत लोक-संस्कृति से जुड़े थे।
5फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।Show solution
फ़िल्म निर्माता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताएँ —
- वे एक आदर्शवादी निर्माता थे जिन्होंने व्यावसायिक लाभ की परवाह किए बिना कलात्मक फ़िल्म बनाई।
- उन्होंने साहित्यिक कृति के साथ पूरा न्याय किया।
- उन्होंने राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे श्रेष्ठ कलाकारों को लेकर फ़िल्म बनाई।
- वे दर्शकों की रुचि का परिष्कार करने में विश्वास रखते थे।
- उन्होंने फ़िल्म में लोक-तत्त्वों को प्रमुखता दी।
- वे धन-लिप्सा से दूर रहे और आत्म-संतुष्टि को प्राथमिकता दी।
6शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी फ़िल्म में झलकती है—कैसे? स्पष्ट कीजिए।Show solution
शैलेंद्र स्वयं एक संवेदनशील, भावुक और आदर्शवादी व्यक्ति थे। उनके जीवन में भी सरलता और निश्छलता थी। 'तीसरी कसम' का नायक हीरामन भी ऐसा ही भोला, सरल और भावुक है जो दिल की भाषा समझता है। शैलेंद्र की तरह हीरामन भी व्यावहारिक दुनिया से अनजान है। शैलेंद्र की आत्म-संतुष्टि की चाह, उनकी संवेदनशीलता और जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण — सब कुछ इस फ़िल्म में प्रतिबिंबित होता है।
7लेखक के इस कथन से कि 'तीसरी कसम' फ़िल्म कोई सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।Show solution
मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ। 'तीसरी कसम' एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें व्यावसायिकता का कोई स्थान नहीं है। इसमें मानवीय संवेदनाएँ, लोक-जीवन की सुंदरता और साहित्यिक गहराई है। एक व्यावसायिक निर्माता कभी ऐसी फ़िल्म नहीं बना सकता था क्योंकि उसे लाभ-हानि की चिंता होती। शैलेंद्र ने कवि-हृदय से इसे बनाया — उन्होंने आर्थिक हानि उठाई, परंतु कला से समझौता नहीं किया। ऐसी फ़िल्म केवल वही बना सकता है जिसके हृदय में कविता हो।
लिखित (ग) — आशय स्पष्ट कीजिए
1...वह तो एक आदर्शवादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपत्ति और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म-संतुष्टि के सुख की अभिलाषा थी।Show solution
इस कथन में शैलेंद्र के व्यक्तित्व का सार है। शैलेंद्र एक ऐसे कवि थे जो धन-दौलत और प्रसिद्धि के पीछे नहीं भागते थे। उनके लिए सबसे बड़ा सुख यह था कि वे जो काम करें, उससे उनकी अंतरात्मा संतुष्ट हो। 'तीसरी कसम' बनाकर उन्हें आर्थिक हानि हुई, परंतु उन्हें आत्म-संतोष मिला। यही उनकी सच्ची कमाई थी। वे आदर्शवादी थे — उनके लिए कला की शुद्धता और आत्म-संतुष्टि सर्वोपरि थी।
2उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दर्शकों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कर्तव्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे।Show solution
शैलेंद्र का मानना था कि फ़िल्म निर्माता अक्सर यह कहकर घटिया और उथला मनोरंजन परोसते हैं कि 'दर्शक यही चाहते हैं।' परंतु यह गलत है। एक सच्चे कलाकार का दायित्व है कि वह दर्शकों को उच्च कोटि की कला दे और उनकी रुचि को परिष्कृत करे — उन्हें बेहतर समझने और महसूस करने योग्य बनाए। दर्शकों की कमज़ोरी का फायदा उठाकर उन्हें उथलेपन में डुबोना कलाकार का धर्म नहीं है।
3व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।Show solution
इस कथन का आशय है कि सच्ची पीड़ा और दुख मनुष्य को तोड़ते नहीं, बल्कि उसे और मज़बूत बनाते हैं। शैलेंद्र के गीतों में व्यथा थी, परंतु वह निराशावादी नहीं थी। उनके गीत दुख को स्वीकार करते हुए भी जीवन के प्रति आस्था जगाते थे। व्यथा एक प्रेरणा है — वह बताती है कि संघर्ष करो, हार मत मानो। यही जीवन-दर्शन शैलेंद्र की रचनाओं में झलकता है।
4दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने वाले की समझ से परे है।Show solution
इस कथन का आशय है कि 'तीसरी कसम' फ़िल्म की भावनात्मक गहराई और साहित्यिक संवेदना को केवल व्यावसायिक दृष्टि से सोचने वाले लोग नहीं समझ सकते। 'दो से चार बनाना' अर्थात् केवल मुनाफे की गणना करने वाले वितरक और निर्माता इस फ़िल्म की आत्मा को नहीं पहचान सके। यह फ़िल्म उन लोगों के लिए थी जो कला और संवेदना को समझते हैं, न कि केवल लाभ-हानि की भाषा जानते हैं।
5उनके गीत भाव-प्रवण थे—दुरूह नहीं।Show solution
इस कथन का आशय है कि शैलेंद्र के गीत भावनाओं से ओत-प्रोत थे, परंतु वे कठिन या दुर्बोध नहीं थे। उनके गीतों में गहरी बात सरल और सहज भाषा में कही जाती थी। वे आम आदमी के दिल को छूते थे। उनमें न तो कृत्रिमता थी, न ही जटिलता। भाव की गहराई और भाषा की सरलता का यह संयोजन ही शैलेंद्र के गीतों को अमर बनाता है।
भाषा अध्ययन
1पाठ में आए 'से' के विभिन्न प्रयोगों से वाक्य की संरचना को समझिए।Show solution
'से' विभक्ति के विभिन्न प्रयोग और उनके अर्थ —
(क) 'राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्र की हैसियत से शैलेंद्र को फ़िल्म की असफलता के खतरों से आगाह भी किया।'
→ यहाँ पहला 'से' रूप/हैसियत का बोध कराता है और दूसरा 'से' अलग करने/बचाने का।
(ख) 'रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ।'
→ यहाँ 'से' स्रोत/दिशा का बोध कराता है।
(ग) 'फ़िल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर-तरीकों से नावाकिफ़ थे।'
→ यहाँ 'से' संबंध/परिचय का बोध कराता है।
(घ) 'दरअसल इस फ़िल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने के गणित जानने वाले की समझ से परे थी।'
→ पहला 'से' परिवर्तन/गणना और दूसरा 'से' सीमा/परे का बोध कराता है।
(ङ) 'शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना दोस्ती से परिचित तो थे।'
→ यहाँ 'से' परिचय/जानकारी का बोध कराता है।
2इस पाठ में आए निम्नलिखित वाक्यों की संरचना पर ध्यान दीजिए।Show solution
(क) ''तीसरी कसम' फ़िल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी।'
→ यह एक सरल वाक्य है जिसमें नकारात्मक-सकारात्मक संरचना है। पहले 'फ़िल्म नहीं' कहकर नकारा गया, फिर 'कविता थी' कहकर सकारात्मक परिभाषा दी गई। यह शैली जोर देने के लिए प्रयुक्त होती है।
(ख) 'उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनाई थी जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था।'
→ यह एक मिश्र वाक्य है। 'उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनाई थी' — मुख्य उपवाक्य; 'जिसे सच्चा कवि-हृदय ही बना सकता था' — आश्रित विशेषण उपवाक्य।
(ग) 'फ़िल्म कब आई, कब चली गई, मालूम ही नहीं पड़ा।'
→ यह एक संयुक्त वाक्य है जिसमें तीन क्रियाएँ हैं। यह फ़िल्म की असफलता को व्यंग्यात्मक ढंग से व्यक्त करता है।
(घ) 'खालिस देहाती भुच्च गाड़ीवान जो सिर्फ़ दिल की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं।'
→ यह एक मिश्र वाक्य है। 'खालिस देहाती भुच्च गाड़ीवान' — मुख्य पदबंध; 'जो सिर्फ़ दिल की जुबान समझता है, दिमाग की नहीं' — आश्रित विशेषण उपवाक्य।
3पाठ में आए निम्नलिखित मुहावरों से वाक्य बनाइए — चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो से चार बनाना, आँखों से बोलनाShow solution
1. चेहरा मुरझाना (उदास हो जाना) —
जब परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने की खबर मिली तो राम का चेहरा मुरझा गया।
2. चक्कर खा जाना (भ्रमित हो जाना / हैरान हो जाना) —
इतने बड़े शहर की भीड़ देखकर गाँव से आया वह लड़का चक्कर खा गया।
3. दो से चार बनाना (लाभ कमाना / व्यावसायिक गणना करना) —
वह हर काम में दो से चार बनाने की सोचता है, कला की परवाह उसे नहीं।
4. आँखों से बोलना (आँखों के भाव से भावना व्यक्त करना) —
राजकपूर ऐसे महान् अभिनेता थे जो आँखों से बोलते थे।
4निम्नलिखित शब्दों के हिंदी पर्याय दीजिए।Show solution
| शब्द | हिंदी पर्याय |
|------|---------------|
| (क) शिद्दत | तीव्रता, लगन |
| (ख) याराना | दोस्ताना, मित्रतापूर्ण |
| (ग) बमुश्किल | बड़ी कठिनाई से, मुश्किल से |
| (घ) खालिस | शुद्ध, निरा |
| (ङ) नावाकिफ़ | अनजान, अपरिचित |
| (च) यकीन | विश्वास, भरोसा |
| (छ) हावी | प्रभावी, छाया हुआ |
| (ज) रेशा | धागा, तंतु |
5निम्नलिखित का संधिविच्छेद कीजिए।Show solution
(क) चित्रांकन = चित्र + अंकन (अ + अ = आ, दीर्घ स्वर संधि)
(ख) रूपांतरण = रूप + अंतरण (अ + अ = आ, दीर्घ स्वर संधि)
(ग) चमोत्कर्ष = चम + उत्कर्ष → वास्तव में चरम + उत्कर्ष = चरमोत्कर्ष (अ + उ = ओ, गुण संधि)
(घ) सज्जीकृत = सत् + जीकृत → सत् + जीकृत (व्यंजन संधि: त् + ज = ज्ज)
(ङ) घनानंद = घन + आनंद (अ + आ = आ, दीर्घ स्वर संधि)
नोट: OCR में कुछ शब्द अस्पष्ट हैं; उपर्युक्त संधिविच्छेद पाठ के संदर्भ के अनुसार दिए गए हैं।
6निम्नलिखित का समास विग्रह कीजिए और समास का नाम भी लिखिए।Show solution
| समस्त पद | समास विग्रह | समास का नाम |
|-----------|-------------|-------------|
| (क) कला-मर्मज्ञ | कला का मर्मज्ञ (कला को जानने वाला) | तत्पुरुष समास |
| (ख) लोकप्रिय | लोक को प्रिय | तत्पुरुष समास |
| (ग) राष्ट्रपति | राष्ट्र का पति | तत्पुरुष समास |
योग्यता विस्तार
1फणीश्वरनाथ रेणु की किस कहानी पर 'तीसरी कसम' फ़िल्म आधारित है, जानकारी प्राप्त कीजिए और मूल रचना पढ़िए।Show solution
'तीसरी कसम' फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित है। यह कहानी 1954 में लिखी गई थी। इसमें एक भोले-भाले गाड़ीवान हीरामन और नौटंकी कलाकार हीराबाई की मार्मिक प्रेम-कथा है। विद्यार्थियों को यह कहानी पढ़नी चाहिए ताकि फ़िल्म और मूल रचना की तुलना कर सकें।
2समाचार पत्रों में फ़िल्मों की समीक्षा दी जाती है। किन्हीं तीन फ़िल्मों की समीक्षा पढ़िए और 'तीसरी कसम' फ़िल्म को देखकर इस फ़िल्म की समीक्षा स्वयं लिखने का प्रयास कीजिए।Show solution
यह एक गतिविधि-आधारित प्रश्न है। विद्यार्थी किसी समाचार पत्र या पत्रिका से तीन फ़िल्मों की समीक्षाएँ पढ़ें और निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर 'तीसरी कसम' की समीक्षा लिखें —
- फ़िल्म का कथानक
- अभिनय की विशेषताएँ
- संगीत और गीत
- निर्देशन
- फ़िल्म की कमज़ोरियाँ और खूबियाँ
- कुल मूल्यांकन
परियोजना कार्य
1वर्तमान दौर की फ़िल्मों और पहले की फ़िल्मों में क्या समानता और अंतर है? कक्षा में चर्चा कीजिए।Show solution
यह एक चर्चा-आधारित परियोजना है। कुछ प्रमुख बिंदु —
समानताएँ: दोनों में मनोरंजन, संगीत, अभिनय और कहानी होती है।
अंतर:
- पहले की फ़िल्मों में साहित्यिक गहराई और सामाजिक संदेश अधिक होता था।
- आज की फ़िल्मों में तकनीक और विशेष प्रभाव (VFX) अधिक हैं।
- पहले के गीत भाव-प्रवण थे; आज के गीत अधिक व्यावसायिक हैं।
- पहले की फ़िल्में सामाजिक यथार्थ को दर्शाती थीं; आज मनोरंजन पर अधिक ज़ोर है।
2'तीसरी कसम' जैसी और भी फ़िल्में हैं जो किसी न किसी भाषा की साहित्यिक रचना पर बनी हैं। ऐसी फ़िल्मों की सूची तैयार करें।Show solution
| क्र.सं. | फ़िल्म का नाम | साहित्यिक रचना | भाषा | रचनाकार |
|---------|--------------|----------------|------|----------|
| 1. | देवदास | देवदास | बंगला | शरत्चंद्र |
| 2. | गाइड | द गाइड | अंग्रेज़ी | आर. के. नारायण |
| 3. | चित्रलेखा | चित्रलेखा | हिंदी | भगवतीचरण वर्मा |
| 4. | उसने कहा था | उसने कहा था | हिंदी | चंद्रधर शर्मा गुलेरी |
| 5. | पिंजर | पिंजर | पंजाबी | अमृता प्रीतम |
3लोकगीत हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। आप भी अपने क्षेत्र के प्रचलित दो-तीन लोकगीतों को एकत्र कर परियोजना कॉपी पर लिखिए।Show solution
यह एक संग्रह-आधारित परियोजना है। विद्यार्थी अपने क्षेत्र के बुजुर्गों, माता-पिता या लोक-कलाकारों से लोकगीत सुनें और एकत्र करें। उदाहरण के लिए —
- बिहार/उत्तर प्रदेश: सोहर (जन्म के अवसर पर), विवाह गीत, चैता, कजरी
- राजस्थान: मांड, पणिहारी
- पंजाब: बोलियाँ, टप्पे
इन्हें परियोजना कॉपी पर लिखकर उनका अर्थ और अवसर भी लिखें।
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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