सपनों के-से दिन
CBSE · Class 10 · Hindi
NCERT Solutions for सपनों के-से दिन — CBSE Class 10 Hindi.
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See them allबोध-प्रश्न — सपनों के-से दिन (संचयन-2, कक्षा 10)
1कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती—पाठ के किस अंश से यह सिद्ध होता है?Show solution
उत्तर:
पाठ में यह सिद्ध होता है जब लेखक बताता है कि उनके स्कूल में पंजाबी, हिंदी और उर्दू बोलने वाले बच्चे एक साथ पढ़ते थे। इसके अतिरिक्त, पीटी प्रीतमचंद पंजाबी में डाँटते-फटकारते थे, हेडमास्टर शर्मा जी हिंदी में बात करते थे, फिर भी सभी बच्चे आपस में घुल-मिलकर रहते थे और एक-दूसरे को भली-भाँति समझते थे। बच्चे आपस में खेलते, लड़ते-झगड़ते और मेल-जोल रखते थे—इसमें भाषा कभी बाधा नहीं बनी। पाठ का यह अंश स्पष्ट करता है कि भावनाओं और व्यवहार की अपनी एक सार्वभौमिक भाषा होती है जो किसी भी भाषाई भेद को पाट देती है।
निष्कर्ष: इस प्रकार पाठ यह सिद्ध करता है कि कोई भी भाषा आपसी व्यवहार में बाधा नहीं बनती।
2पीटी साहब की 'शाबाश' फ़ौज के तमगों-सी क्यों लगती थी? स्पष्ट कीजिए।Show solution
उत्तर:
पीटी साहब प्रीतमचंद स्वभाव से बहुत कठोर और सख्त अनुशासनप्रिय थे। वे बच्चों को बिल्ला मार-मारकर चमड़ी उधेड़ देते थे। उनकी दहकती भूरी आँखें देखकर बच्चों की छाती धकु-धकु करने लगती थी। ऐसे कठोर और भयंकर अध्यापक से 'शाबाश' मिलना अत्यंत दुर्लभ था। जिस प्रकार युद्ध में वीरता दिखाने पर ही फ़ौज के तमगे (पदक) मिलते हैं और वे बहुत मूल्यवान होते हैं, उसी प्रकार पीटी साहब जैसे कठोर अध्यापक की 'शाबाश' भी बच्चों के लिए अत्यंत दुर्लभ और गर्व की बात होती थी।
निष्कर्ष: इसीलिए पीटी साहब की 'शाबाश' बच्चों को फ़ौज के तमगों-सी लगती थी—दोनों ही कठिन परिश्रम और असाधारण प्रदर्शन के बाद मिलती हैं।
3नयी श्रेणी में जाने और नयी कापियों और पुरानी किताबों से आती विशेष गंध से लेखक का बालमन क्यों उदास हो उठता था?Show solution
उत्तर:
नई कक्षा में जाने पर नई कापियों की स्याही और कागज़ की ताज़ी गंध तथा पुरानी किताबों की पीली पड़ी पन्नों की विशेष गंध लेखक के मन में एक अजीब-सी उदासी भर देती थी। इसके दो कारण थे:
1. नई जिम्मेदारी का बोझ: नई कक्षा में जाने का अर्थ था—नया और कठिन पाठ्यक्रम, नए अध्यापक और नई चुनौतियाँ। यह सोचकर मन भारी हो जाता था।
2. छुट्टियों का अंत: नई कापियाँ और किताबें यह याद दिलाती थीं कि लंबी और आनंददायक गर्मी की छुट्टियाँ समाप्त हो गई हैं और अब फिर से स्कूल की दिनचर्या, अनुशासन और पढ़ाई में जुटना होगा।
इन दोनों कारणों से नई कापियों और पुरानी किताबों की गंध लेखक के बालमन को उदास कर देती थी।
4स्काउट परेड करते समय लेखक अपने को महत्वपूर्ण 'आदमी' फ़ौजी जवान क्यों समझने लगता था?Show solution
उत्तर:
स्काउट परेड के समय लेखक को एक विशेष वर्दी पहनने को मिलती थी—खाकी निकर, खाकी कमीज़, सिर पर टोपी और पैरों में जूते-मोज़े। इस पूरी वर्दी में वह बिल्कुल एक असली फ़ौजी जवान जैसा दिखता था। परेड के दौरान कदम-ताल करना, 'लेफ्ट-राइट' की आवाज़ पर चलना, अनुशासन में रहना—ये सब क्रियाएँ उसे वास्तविक सैनिक होने का अहसास कराती थीं।
इसके अतिरिक्त, परेड में भाग लेने से उसे यह भी लगता था कि वह कोई साधारण बच्चा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है जो देश-सेवा के लिए तैयार हो रहा है। वर्दी और अनुशासन ने उसके मन में आत्मगौरव और महत्व की भावना जगा दी।
निष्कर्ष: वर्दी, अनुशासन और परेड की सैनिक-शैली के कारण लेखक स्वयं को फ़ौजी जवान जैसा महत्वपूर्ण समझने लगता था।
5हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब को क्यों मुअतल कर दिया?Show solution
उत्तर:
हेडमास्टर शर्मा जी ने पीटी साहब प्रीतमचंद को इसलिए मुअतल कर दिया क्योंकि पीटी साहब ने एक बच्चे की बेरहमी से पिटाई कर दी थी। पीटी साहब अत्यंत कठोर और क्रूर स्वभाव के थे—वे बच्चों को बिल्ला (बेंत) मार-मारकर इतना पीटते थे कि उनकी चमड़ी तक उधड़ जाती थी। एक बार उन्होंने किसी बच्चे को इतना मारा कि मामला हद से बाहर हो गया। इस अत्यधिक शारीरिक दंड की शिकायत हुई और हेडमास्टर शर्मा जी को विवश होकर पीटी साहब को मुअतल करना पड़ा। जब तक नाभा से डायरेक्टर उन्हें 'बहाल' नहीं करते, वे स्कूल में कदम नहीं रख सकते थे।
निष्कर्ष: बच्चों को अत्यधिक और क्रूर शारीरिक दंड देने के कारण पीटी साहब को मुअतल किया गया।
6लेखक के अनुसार उन्हें स्कूल खुशी से भागे जाने की जगह न लगने पर भी कब और क्यों उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगा?Show solution
उत्तर:
लेखक को स्कूल में कठोर अनुशासन, पीटी साहब की मार और पढ़ाई के बोझ के कारण स्कूल अच्छा नहीं लगता था। परंतु निम्नलिखित अवसरों पर उन्हें स्कूल जाना अच्छा लगने लगा:
1. स्काउटिंग और परेड के समय: जब स्काउट की वर्दी पहनकर परेड करते थे तो स्वयं को फ़ौजी जवान जैसा महत्वपूर्ण महसूस करते थे—यह अनुभव उन्हें स्कूल की ओर आकर्षित करता था।
2. खेलों के दौरान: जब स्कूल में खेल-कूद होती थी, तो लेखक को स्कूल जाना अच्छा लगता था। खेल के मैदान में दोस्तों के साथ खेलना, दौड़ना और मस्ती करना उन्हें आनंद देता था।
3. त्योहारों और विशेष अवसरों पर: जब स्कूल में कोई विशेष कार्यक्रम होता था तब भी स्कूल जाना अच्छा लगता था।
निष्कर्ष: खेल-कूद, स्काउटिंग और साथियों की संगति के कारण लेखक को स्कूल जाना अच्छा लगने लगा।
7लेखक अपने छात्र जीवन में स्कूल से छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए क्या-क्या योजनाएँ बनाया करता था और उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में किसकी भाँति 'बहादुर' बनने की कल्पना किया करता था?Show solution
उत्तर:
योजनाएँ:
लेखक छुट्टियों में मिले काम को पूरा करने के लिए हर बार नई-नई योजनाएँ बनाता था। वह सोचता था कि:
- पहले कुछ दिन खूब खेलेगा और बाद में सारा काम एक साथ पूरा कर लेगा।
- छुट्टियों के बीच में थोड़ा-थोड़ा काम करता रहेगा।
- छुट्टियाँ समाप्त होने से पहले के कुछ दिनों में सारा काम निपटा लेगा।
परंतु हर बार खेल-कूद और मस्ती में इतना समय बीत जाता था कि स्कूल खुलने तक काम अधूरा ही रह जाता था।
'बहादुर' बनने की कल्पना:
जब काम पूरा न होने पर स्कूल में मार पड़ने का डर सताता था, तब लेखक उन बहादुर सिपाहियों की भाँति 'बहादुर' बनने की कल्पना करता था जो युद्ध में घायल होने पर भी मुँह से 'आह' नहीं निकालते। वह सोचता था कि चाहे पीटी साहब कितना भी मारें, वह दाँत भींचकर सह लेगा और मुँह से आवाज़ नहीं निकालेगा।
निष्कर्ष: इस प्रकार लेखक का बालमन योजनाएँ बनाने और वीरता की कल्पना करने में रमा रहता था।
8पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।Show solution
उत्तर:
पाठ में वर्णित घटनाओं के आधार पर पीटी सर की निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताएँ उभरकर आती हैं:
1. कठोर अनुशासनप्रिय:
पीटी साहब अत्यंत कठोर अनुशासनप्रिय थे। वे बच्चों को बिल्ला मार-मारकर चमड़ी उधेड़ देते थे। उनकी दहकती भूरी आँखें देखकर बच्चों की छाती धकु-धकु करने लगती थी।
2. भयंकर व्यक्तित्व:
उनका व्यक्तित्व इतना भयंकर था कि फ़ारसी की घंटी बजते ही बच्चों के चेहरे मुरझा जाते थे और वे डर से काँपने लगते थे।
3. कोमल हृदय (दोहरा व्यक्तित्व):
इतने कठोर होने के बावजूद वे अपने तोतों से बड़े प्यार से मीठी-मीठी बातें करते थे। बादाम भिगोकर, छिलका उतारकर तोतों को खिलाते थे। यह उनके व्यक्तित्व का कोमल पक्ष था।
4. निश्चिंत स्वभाव:
मुअतल होने के बाद भी वे बिल्कुल चिंतित नहीं थे और अपने चौबारे में आराम से रहते थे।
5. दुर्लभ प्रशंसा:
उनकी 'शाबाश' इतनी दुर्लभ थी कि जब भी वे किसी बच्चे की तारीफ करते, वह बच्चे के लिए फ़ौज के तमगे जैसी होती थी।
निष्कर्ष: पीटी साहब एक जटिल व्यक्तित्व के धनी थे—बाहर से कठोर, भीतर से कोमल।
9विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए पाठ में अपनाई गई युक्तियों और वर्तमान में स्वीकृत मान्यताओं के संबंध में अपने विचार प्रकट कीजिए।Show solution
उत्तर:
पाठ में अपनाई गई युक्तियाँ:
पाठ में विद्यार्थियों को अनुशासन में रखने के लिए मुख्यतः शारीरिक दंड का सहारा लिया जाता था। पीटी साहब बिल्ला (बेंत) से बच्चों की पिटाई करते थे। भय और दंड के माध्यम से अनुशासन स्थापित किया जाता था।
वर्तमान में स्वीकृत मान्यताएँ:
आज के समय में शारीरिक दंड को पूर्णतः अस्वीकार किया गया है। भारत सरकार के शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के अंतर्गत विद्यालयों में शारीरिक दंड पूर्णतः प्रतिबंधित है।
मेरे विचार:
- शारीरिक दंड बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
- भय से सीखा हुआ अनुशासन स्थायी नहीं होता।
- वर्तमान में प्रेम, प्रोत्साहन, संवाद और सकारात्मक पुरस्कार के माध्यम से अनुशासन स्थापित करना अधिक प्रभावी और मानवीय है।
- अध्यापक और विद्यार्थी के बीच मित्रवत संबंध होने चाहिए।
निष्कर्ष: पुरानी पद्धति भले ही तत्कालीन समाज में स्वीकृत थी, परंतु आज बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रेम और प्रोत्साहन आधारित अनुशासन ही उचित है।
10बचपन की यादें मन को गुदगुदाने वाली होती हैं विशेषकर स्कूली दिनों की। अपने अब तक के स्कूली जीवन की खट्टी-मीठी यादों को लिखिए।Show solution
उत्तर:
स्कूली जीवन वास्तव में जीवन का सबसे सुनहरा अध्याय होता है। मेरे स्कूली जीवन में भी अनेक खट्टी-मीठी यादें हैं।
मीठी यादें:
- पहली बार जब परीक्षा में प्रथम स्थान आया और अध्यापक ने सबके सामने शाबाशी दी—वह पल आज भी मन को प्रसन्न कर देता है।
- मित्रों के साथ मध्यावकाश में खेलना, टिफिन बाँटकर खाना और हँसी-मज़ाक करना।
- वार्षिकोत्सव में नाटक में भाग लेना और तालियाँ पाना।
- पिकनिक और शैक्षिक भ्रमण के वे आनंददायक दिन।
खट्टी यादें:
- होमवर्क न करने पर कक्षा के बाहर खड़े होने की शर्मिंदगी।
- परीक्षा में कम अंक आने पर माता-पिता की डाँट।
- किसी प्रिय मित्र का दूसरे स्कूल में चले जाना।
निष्कर्ष: ये सभी यादें मिलकर स्कूली जीवन को अविस्मरणीय बना देती हैं। सच में, बचपन के वे दिन 'सपनों के-से दिन' ही थे।
11प्रायः अभिभावक बच्चों को खेल-कूद में ज्यादा रुचि लेने पर रोकते हैं और समय बरबाद न करने की नसीहत देते हैं। बताइए—(क) खेल आपके लिए क्यों जरूरी हैं? (ख) आप कौन से ऐसे नियम-कायदों को अपनाएँगे जिससे अभिभावकों को आपके खेल पर आपत्ति न हो?Show solution
(क) खेल मेरे लिए क्यों जरूरी हैं:
खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य हैं। इसके निम्नलिखित कारण हैं:
1. शारीरिक स्वास्थ्य: खेलने से शरीर स्वस्थ और चुस्त रहता है। हड्डियाँ और माँसपेशियाँ मजबूत होती हैं।
2. मानसिक विकास: खेल में रणनीति बनाना, त्वरित निर्णय लेना और समस्या सुलझाना—ये सब मानसिक क्षमता को बढ़ाते हैं।
3. एकाग्रता में वृद्धि: खेलने के बाद मन तरोताज़ा हो जाता है जिससे पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ती है।
4. सामाजिक गुणों का विकास: खेल में टीम भावना, सहयोग, नेतृत्व और हार-जीत को सहजता से स्वीकार करना सीखते हैं।
5. तनाव मुक्ति: पढ़ाई के बोझ और तनाव से मुक्ति के लिए खेल सबसे अच्छा माध्यम है।
(ख) अभिभावकों को आपत्ति न हो इसके लिए नियम-कायदे:
1. समय-सारणी बनाना: पढ़ाई और खेल दोनों के लिए निश्चित समय तय करूँगा और उसका पालन करूँगा।
2. पहले काम, फिर खेल: स्कूल का होमवर्क और पढ़ाई पूरी करने के बाद ही खेलने जाऊँगा।
3. खेल का समय सीमित रखना: अत्यधिक समय खेल में नष्ट नहीं करूँगा—एक से दो घंटे का खेल पर्याप्त है।
4. परीक्षा के समय संयम: परीक्षा के दिनों में खेल कम करूँगा और पढ़ाई को प्राथमिकता दूँगा।
5. अभिभावकों को विश्वास दिलाना: अपने परीक्षा परिणामों से यह सिद्ध करूँगा कि खेल से पढ़ाई प्रभावित नहीं होती।
निष्कर्ष: संतुलित दिनचर्या अपनाकर पढ़ाई और खेल दोनों को साथ-साथ चलाया जा सकता है।
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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