तुम कब जाओगे, अतिथि
Haryana Board · Class 9 · Hindi
NCERT Solutions for तुम कब जाओगे, अतिथि — Haryana Board Class 9 Hindi.
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Explore the full setमौखिक प्रश्न
1अतिथि कितने दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है?Show solution
2कैलेंडर की तारीखें किस तरह फड़फड़ा रही हैं?Show solution
3पति-पत्नी ने मेहमान का स्वागत कैसे किया?Show solution
4दोपहर के भोजन को कौन-सी गरिमा प्रदान की गई?Show solution
5तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा?Show solution
6सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ?Show solution
लिखित — (क) 25-30 शब्दों में उत्तर
1लेखक अतिथि को कैसी विदाई देना चाहता था?Show solution
2(क)'अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया' — इस कथन की व्याख्या कीजिए।Show solution
2(ख)'अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोड़े अंशों में राक्षस भी हो सकता है' — इस कथन की व्याख्या कीजिए।Show solution
2(ग)'लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़ें' — इस कथन की व्याख्या कीजिए।Show solution
2(घ)'मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी' — इस कथन की व्याख्या कीजिए।Show solution
2(ङ)'एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते' — इस कथन की व्याख्या कीजिए।Show solution
लिखित — (ख) 50-60 शब्दों में उत्तर
1कौन-सा आघात अप्रत्याशित था और उसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?Show solution
2'संबंधों का संक्रमण के दौर से गुजरना' — इस पंक्ति से आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।Show solution
3जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या-क्या परिवर्तन आए?Show solution
1. मुस्कुराहट का लुप्त होना — आरंभ की खुशी और मुस्कुराहट धीरे-धीरे फीकी पड़कर समाप्त हो गई।
2. बातचीत का बंद होना — शब्दों का लेन-देन मिट गया, चर्चा के विषय चुक गए।
3. उदासीनता — लेखक उपन्यास पढ़ने लगा और अतिथि की ओर ध्यान देना बंद कर दिया।
4. आर्थिक चिंता — घर का बजट बिगड़ने की चिंता सताने लगी।
5. मन में क्रोध — भावनाएँ गालियों का स्वरूप ग्रहण करने लगीं।
6. सत्कार में कमी — विशेष भोजन और आवभगत बंद हो गई।
भाषा-अध्ययन
1निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्याय लिखिए — चाँद, जिक्र, आघात, ऊष्मा, अंतरंगShow solution
| शब्द | पर्याय |
|------|--------|
| चाँद | चंद्रमा, शशि |
| जिक्र | उल्लेख, चर्चा |
| आघात | चोट, प्रहार |
| ऊष्मा | गर्मी, ताप |
| अंतरंग | घनिष्ठ, आत्मीय |
2(क)हम तुम्हें स्टेशन तक छोड़ने जाएँगे। (नकारात्मक वाक्य)Show solution
2(ख)किसी लॉण्ड्री पर दे देते हैं, जल्दी धुल जाएँगे। (प्रश्नवाचक वाक्य)Show solution
2(ग)सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो रही थी। (भविष्यत् काल)Show solution
2(घ)इनके कपड़े देने हैं। (स्थानसूचक प्रश्नवाची)Show solution
2(ङ)कब तक टिकेंगे ये? (नकारात्मक)Show solution
3पाठ में आए 'चुकना' क्रिया के विभिन्न प्रयोगों को ध्यान से देखिए और वाक्य संरचना को समझिए।Show solution
(क) 'कर चुके' — पूर्ण क्रिया (Past Perfect): तुम अपने भारी चरण-कमलों की छाप मेरी जमीन पर अंकित कर चुके। (कार्य पूरी तरह संपन्न हो गया।)
(ख) 'खोद चुके' — पूर्ण क्रिया: तुम मेरी काफ़ी मिट्टी खोद चुके। (कार्य समाप्त हो चुका है।)
(ग) 'ले जा चुके थे' — पूर्णकालिक भूतकाल: जिस उच्च बिंदु पर हम तुम्हें ले जा चुके थे। (भूतकाल में पूर्ण हुई क्रिया।)
(घ) 'चुक गए' — स्वतः समाप्त होना: चर्चा के विषय चुक गए। (विषय समाप्त हो गए।)
(ङ) 'बदली जा चुकी' — कर्मवाच्य पूर्ण क्रिया: चादर बदली जा चुकी। (कार्य किसी के द्वारा पूर्ण कर दिया गया।)
निष्कर्ष: 'चुकना' क्रिया मुख्य क्रिया के साथ जुड़कर कार्य की पूर्णता या समाप्ति का बोध कराती है।
4निम्नलिखित वाक्य संरचनाओं में 'तुम' के प्रयोग पर ध्यान दीजिए।Show solution
(क) 'तुम यहीं हो' — कर्ता के रूप में: अतिथि की उपस्थिति पर व्यंग्य। लॉण्ड्री के कपड़े आ गए, फिर भी तुम यहीं हो।
(ख) 'तुम्हें देखकर' — कर्म के रूप में (तुम्हें): अतिथि को देखकर जो प्रसन्नता होती थी, वह अब समाप्त हो गई।
(ग) 'तुम्हारे भरकम शरीर से' — संबंध कारक (तुम्हारे): अतिथि के शरीर के कारण चादर पर सलवटें पड़ गईं।
(घ) 'तुम फिल्मी पत्रिका के पन्ने पलट रहे हो' — कर्ता के रूप में: अतिथि की निष्क्रियता और बेपरवाही पर व्यंग्य।
(ङ) 'तुम जा नहीं रहे' — कर्ता के रूप में: अतिथि के न जाने पर लेखक की खीझ और निराशा व्यक्त होती है।
निष्कर्ष: 'तुम' और उसके रूप (तुम्हें, तुम्हारे, तुम्हारा) पूरे पाठ में अतिथि को सीधे संबोधित करने के लिए प्रयुक्त हुए हैं, जिससे पाठ में एक व्यक्तिगत और व्यंग्यात्मक स्वर उत्पन्न होता है।
योग्यता-विस्तार
1'अतिथि देवो भव' उक्ति की व्याख्या करें तथा आधुनिक युग के संदर्भ में इसका आकलन करें।Show solution
'अतिथि देवो भव' की व्याख्या:
'अतिथि देवो भव' एक प्राचीन भारतीय संस्कृत उक्ति है जिसका अर्थ है — 'अतिथि देवता के समान होता है।' भारतीय संस्कृति में अतिथि-सत्कार को सर्वोच्च धर्म माना गया है। बिना बुलाए आए मेहमान का भी आदर-सत्कार करना गृहस्थ का कर्तव्य समझा जाता था।
आधुनिक युग के संदर्भ में आकलन:
आधुनिक युग में जीवन की परिस्थितियाँ बदल गई हैं। आज के व्यस्त और महँगे जीवन में लंबे समय तक अतिथि का सत्कार करना कठिन हो गया है। इस पाठ में लेखक ने व्यंग्यात्मक ढंग से यह दर्शाया है कि यदि अतिथि स्वयं शिष्टाचार का पालन न करे और अनावश्यक रूप से लंबे समय तक रुका रहे, तो 'अतिथि देवो भव' की भावना कमज़ोर पड़ जाती है। आज इस उक्ति का पालन तभी संभव है जब अतिथि और मेज़बान — दोनों अपनी-अपनी सीमाओं का ध्यान रखें।
2विद्यार्थी अपने घर आए अतिथियों के सत्कार का अनुभव कक्षा में सुनाएँ।Show solution
एक बार हमारे घर हमारे चाचाजी परिवार सहित आए। पहले दो दिन बहुत अच्छे बीते — माँ ने विशेष पकवान बनाए, हम सब साथ घूमने गए। परंतु जब वे एक सप्ताह से अधिक रुक गए, तो घर का बजट और दिनचर्या प्रभावित होने लगी। इस अनुभव से मुझे इस पाठ की भावना भली-भाँति समझ में आई।
3अतिथि के अपेक्षा से अधिक रुक जाने पर लेखक की क्या-क्या प्रतिक्रियाएँ हुईं, उन्हें क्रम से छाँटकर लिखिए।Show solution
1. पहला दिन: हार्दिक स्वागत, मुस्कुराहट, विशेष भोजन-व्यवस्था।
2. दूसरा दिन: सत्कार जारी, परंतु मन में हल्की बेचैनी।
3. तीसरा दिन: अतिथि द्वारा कपड़े लॉण्ड्री पर देने की बात सुनकर 'बटुए का काँपना' — आर्थिक चिंता और मानसिक आघात।
4. चौथा दिन: मुस्कुराहट का लुप्त होना, बातचीत बंद, उपन्यास पढ़ने में व्यस्त होना, उदासीनता।
5. आगे: भावनाओं का गालियों में बदलना, सहनशीलता की सीमा समाप्त होना।
6. अंत में: अतिथि से मन ही मन 'गेट आउट' कहने की इच्छा और उसे सम्मानपूर्वक विदा करने की प्रार्थना।
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