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Chapter 10 of 30
NCERT Solutions

रीढ़ की हड्डी

Himachal Pradesh Board · Class 9 · Hindi

NCERT Solutions for रीढ़ की हड्डी — Himachal Pradesh Board Class 9 Hindi.

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11 Questions Solved · 1 Section

प्रश्न-अभ्यास — रीढ़ की हड्डी (कृतिका-1, कक्षा 9)

1रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर "एक हमारा जमाना था..." कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?Show solution
दिया गया है: एकांकी में रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बार-बार अपने पुराने जमाने की तुलना वर्तमान से करते हैं।

विचार एवं उत्तर:

इस प्रकार की तुलना करना अधिकांशतः तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि —

1. समय परिवर्तनशील है। प्रत्येक युग की अपनी परिस्थितियाँ, आवश्यकताएँ और मूल्य होते हैं। पुराने जमाने की हर बात आज के संदर्भ में उचित नहीं हो सकती।

2. पुराने जमाने में भी कमियाँ थीं। जिस युग को ये दोनों आदर्श मानते हैं, उसमें स्त्री-शिक्षा का अभाव था, सामाजिक कुरीतियाँ थीं और स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता था।

3. यह मानसिकता प्रगति में बाधक है। 'पुराना ही अच्छा था' — यह सोच नई पीढ़ी की उन्नति और स्वतंत्र सोच को रोकती है।

4. सकारात्मक पक्ष: यदि पुराने जमाने के नैतिक मूल्यों, आपसी सम्मान और सादगी की बात की जाए, तो वह तुलना कुछ हद तक उचित हो सकती है।

निष्कर्ष: अतीत से प्रेरणा लेना उचित है, किंतु वर्तमान की हर बात को अतीत की कसौटी पर कसना तर्कसंगत नहीं है। हमें समय के साथ बदलना चाहिए और अच्छे मूल्यों को अपनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
2रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है?Show solution
दिया गया है: रामस्वरूप ने उमा को उच्च शिक्षा दिलाई, परंतु विवाह के अवसर पर उसकी शिक्षा को छिपाया।

विरोधाभास का विश्लेषण:

एक ओर रामस्वरूप एक जागरूक पिता हैं जो बेटी को पढ़ाना चाहते हैं, दूसरी ओर वे समाज की रूढ़िवादी सोच के सामने झुक जाते हैं। यह विरोधाभास निम्नलिखित विवशताओं को उजागर करता है —

1. सामाजिक दबाव की विवशता: समाज में अभी भी पढ़ी-लिखी लड़कियों को 'घमंडी' या 'अनुशासनहीन' समझा जाता है। रामस्वरूप इस सोच से डरते हैं।

2. विवाह बाज़ार की विवशता: गोपाल प्रसाद जैसे लोग शिक्षित बहू नहीं चाहते। रिश्ता टूट जाने के डर से रामस्वरूप सच छिपाते हैं।

3. पितृसत्तात्मक समाज की विवशता: बेटी की शादी करना पिता की 'जिम्मेदारी' मानी जाती है। इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए वे समझौता करते हैं।

4. आत्मविश्वास की कमी: रामस्वरूप स्वयं भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं कि शिक्षित बेटी को समाज स्वीकार करेगा।

निष्कर्ष: यह विरोधाभास उस पिता की विवशता को दर्शाता है जो भीतर से प्रगतिशील है, किंतु बाहर से रूढ़िवादी समाज के सामने असहाय है। यह स्थिति हमारे समाज की उस दोहरी मानसिकता का प्रतीक है जो स्त्री-शिक्षा को तो स्वीकार करती है, परंतु शिक्षित स्त्री को नहीं।
3अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं है?Show solution
दिया गया है: रामस्वरूप चाहते हैं कि उमा लड़के वालों के सामने कम पढ़ी-लिखी दिखे, चुप रहे, सिर झुकाए रहे और अपनी वास्तविक योग्यता न प्रकट करे।

यह व्यवहार उचित क्यों नहीं है — कारण:

1. आत्मसम्मान का हनन: उमा एक शिक्षित और योग्य लड़की है। उसे अपनी शिक्षा छिपाने के लिए कहना उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना है।

2. झूठ पर आधारित रिश्ता: जो रिश्ता झूठ की नींव पर बने, वह टिकाऊ नहीं होता। विवाह के बाद सच सामने आने पर संबंध टूट सकते हैं।

3. स्त्री की स्वतंत्र पहचान का दमन: उमा को एक वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, न कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह। यह उसके मानवीय अधिकारों का उल्लंघन है।

4. गलत परंपरा को बढ़ावा: इस प्रकार का व्यवहार उस रूढ़िवादी सोच को बल देता है जो स्त्री को केवल घर की चारदीवारी तक सीमित रखना चाहती है।

5. उमा की भावनाओं की अनदेखी: पिता का यह व्यवहार उमा की भावनाओं, इच्छाओं और विचारों को कोई महत्त्व नहीं देता।

निष्कर्ष: रामस्वरूप की यह अपेक्षा न केवल अनुचित है, बल्कि उमा जैसी शिक्षित लड़की के लिए अपमानजनक भी है। विवाह में दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वास्तविकता जाननी चाहिए।
4गोपाल प्रसाद विवाह को 'बिज़नेस' मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा छिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं? अपने विचार लिखें।Show solution
दिया गया है: गोपाल प्रसाद विवाह को व्यापार मानते हैं और रामस्वरूप उमा की शिक्षा छिपाते हैं।

विचार:

हाँ, दोनों ही अपने-अपने स्तर पर दोषी हैं, परंतु उनके अपराध की प्रकृति अलग-अलग है —

गोपाल प्रसाद का अपराध:
- वे विवाह जैसे पवित्र संबंध को 'बिज़नेस' कहते हैं — यह सोच ही स्त्री को वस्तु मानने की है।
- वे चाहते हैं कि बहू कम पढ़ी-लिखी हो ताकि वह प्रश्न न करे — यह स्त्री की बौद्धिक स्वतंत्रता का दमन है।
- उनका दृष्टिकोण खुलेआम पितृसत्तात्मक और स्वार्थी है।
- यह अपराध सचेत और जानबूझकर किया गया है।

रामस्वरूप का अपराध:
- वे बेटी से प्रेम करते हैं, उसे पढ़ाते हैं, परंतु समाज के डर से सच छिपाते हैं।
- उनका अपराध विवशता और कायरता से उपजा है, न कि दुर्भावना से।
- फिर भी, झूठ बोलकर रिश्ता तय करना नैतिक रूप से गलत है।

तुलनात्मक निष्कर्ष:

गोपाल प्रसाद का अपराध अधिक गंभीर है क्योंकि वे स्त्री को जानबूझकर हीन समझते हैं। रामस्वरूप का अपराध सामाजिक दबाव की उपज है। दोनों मिलकर उस व्यवस्था को बनाए रखते हैं जो स्त्री के साथ अन्याय करती है। समाज को बदलने के लिए दोनों प्रकार की मानसिकता का विरोध आवश्यक है।
5"...आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं..." उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती है?Show solution
दिया गया है: उमा का यह कथन एकांकी का सबसे महत्त्वपूर्ण संवाद है जो शंकर के चरित्र पर तीखा व्यंग्य करता है।

'रीढ़ की हड्डी' का प्रतीकात्मक अर्थ:
रीढ़ की हड्डी शरीर को सीधा खड़ा रखती है — यह आत्मबल, साहस, स्वाभिमान और व्यक्तित्व की दृढ़ता का प्रतीक है।

उमा शंकर की निम्नलिखित कमियों की ओर संकेत करती है —

1. कायरता और निर्बलता: शंकर अपने पिता के सामने कुछ नहीं बोलता। वह पूरी तरह पिता के नियंत्रण में है — उसमें स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता नहीं है।

2. चरित्रहीनता: उमा को पता चलता है कि शंकर का आचरण अच्छा नहीं है। वह लड़कियों के छात्रावास के बाहर मँडराता है — यह उसके नैतिक पतन को दर्शाता है।

3. व्यक्तित्वहीनता: शंकर में कोई आत्मविश्वास नहीं है। वह न ठीक से बात कर सकता है, न अपना परिचय दे सकता है।

4. पिता पर अत्यधिक निर्भरता: एक वयस्क युवक होते हुए भी वह पिता की उँगली पकड़कर चलता है — यह उसकी मानसिक अपरिपक्वता को दर्शाता है।

5. दोहरा चरित्र: बाहर से सभ्य दिखने वाला शंकर भीतर से खोखला है।

निष्कर्ष: उमा के इस कथन से स्पष्ट होता है कि वह एक साहसी और स्वाभिमानी लड़की है जो ऐसे व्यक्तित्वहीन युवक से विवाह नहीं करना चाहती।
6शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की — समाज को कैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।Show solution
दिया गया है: एकांकी में शंकर और उमा दो विपरीत व्यक्तित्वों के प्रतीक हैं।

शंकर का व्यक्तित्व:
- कायर, व्यक्तित्वहीन, पिता पर आश्रित
- नैतिक रूप से कमज़ोर
- स्वतंत्र सोच और निर्णय क्षमता से रहित

उमा का व्यक्तित्व:
- शिक्षित, साहसी और आत्मविश्वासी
- सत्य बोलने का साहस रखती है
- अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाती है
- स्वाभिमानी और दृढ़ निश्चयी

समाज को किस व्यक्तित्व की ज़रूरत है — तर्क:

समाज को उमा जैसे व्यक्तित्व की आवश्यकता है, क्योंकि —

1. प्रगति के लिए साहस चाहिए: उमा जैसे लोग ही समाज की कुरीतियों को चुनौती देते हैं और बदलाव लाते हैं।

2. शिक्षा का सदुपयोग: उमा अपनी शिक्षा का उपयोग केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए करती है।

3. आत्मनिर्भरता: उमा जैसे व्यक्तित्व समाज पर बोझ नहीं बनते, बल्कि समाज को दिशा देते हैं।

4. शंकर जैसे व्यक्तित्व हानिकारक: जो व्यक्ति स्वयं निर्णय नहीं ले सकता, वह परिवार और समाज का नेतृत्व कैसे करेगा?

निष्कर्ष: समाज को उमा जैसे — शिक्षित, साहसी, स्वाभिमानी और सत्यनिष्ठ — व्यक्तित्व की आवश्यकता है, चाहे वे लड़के हों या लड़कियाँ।
7'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया है: एकांकी का शीर्षक है — 'रीढ़ की हड्डी'।

शीर्षक का शाब्दिक अर्थ:
रीढ़ की हड्डी मनुष्य के शरीर की वह धुरी है जो उसे सीधा खड़ा रखती है। इसके बिना मनुष्य न खड़ा हो सकता है, न चल सकता है।

शीर्षक का प्रतीकात्मक अर्थ:
यहाँ 'रीढ़ की हड्डी' आत्मबल, साहस, स्वाभिमान, दृढ़ता और नैतिक शक्ति का प्रतीक है।

शीर्षक की सार्थकता:

1. शंकर के संदर्भ में: उमा प्रश्न करती है — "आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं?" शंकर में आत्मबल और व्यक्तित्व का पूर्णतः अभाव है — वह 'रीढ़विहीन' है।

2. उमा के संदर्भ में: उमा में 'रीढ़ की हड्डी' है — वह सत्य बोलती है, अन्याय का विरोध करती है और अपने स्वाभिमान की रक्षा करती है।

3. समाज के संदर्भ में: एकांकी यह संदेश देती है कि समाज को 'रीढ़ की हड्डी' वाले — अर्थात् साहसी, स्वाभिमानी और नैतिक — व्यक्तियों की आवश्यकता है।

4. स्त्री-सशक्तीकरण के संदर्भ में: शीर्षक यह भी संकेत करता है कि स्त्री को भी 'रीढ़ की हड्डी' — अर्थात् आत्मसम्मान और साहस — की आवश्यकता है और उमा इसका जीवंत उदाहरण है।

निष्कर्ष: यह शीर्षक एकांकी के केंद्रीय भाव को पूरी तरह व्यक्त करता है। यह व्यंग्यात्मक भी है और प्रेरणादायक भी — इसलिए यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
8कथावस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों?Show solution
दिया गया है: एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' में कई पात्र हैं — रामस्वरूप, उमा, गोपाल प्रसाद, शंकर, प्रेमा आदि।

मुख्य पात्र: उमा

कथावस्तु के आधार पर उमा इस एकांकी की मुख्य पात्र है। इसके निम्नलिखित कारण हैं —

1. एकांकी का केंद्रबिंदु: पूरी कथा उमा के विवाह के इर्द-गिर्द घूमती है। सभी घटनाएँ और संवाद उसी से जुड़े हैं।

2. एकांकी का संदेश उमा के माध्यम से: लेखक जगदीशचंद्र माथुर स्त्री-सशक्तीकरण का संदेश उमा के माध्यम से देते हैं। उमा का साहसी व्यवहार ही एकांकी का चरमबिंदु है।

3. शीर्षक से संबंध: एकांकी का शीर्षक 'रीढ़ की हड्डी' उमा के साहस और आत्मबल को ही इंगित करता है।

4. परिवर्तन की वाहक: उमा ही वह पात्र है जो रूढ़िवादी व्यवस्था को चुनौती देती है और दर्शकों/पाठकों को सोचने पर विवश करती है।

5. सबसे प्रभावशाली संवाद: उमा के संवाद सबसे तीखे, साहसी और विचारोत्तेजक हैं।

निष्कर्ष: यद्यपि रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद भी महत्त्वपूर्ण पात्र हैं, किंतु एकांकी की आत्मा उमा में बसती है। वही इस एकांकी की मुख्य पात्र है।
9एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।Show solution
दिया गया है: एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' में रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद दो प्रमुख पुरुष पात्र हैं।

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रामस्वरूप की चारित्रिक विशेषताएँ:

1. स्नेही पिता: वे उमा से प्रेम करते हैं और उसे उच्च शिक्षा दिलाते हैं।

2. विवशता में जीने वाले: समाज के डर से वे बेटी की शिक्षा छिपाते हैं — यह उनकी कायरता और विवशता है।

3. दोहरी मानसिकता: एक ओर प्रगतिशील सोच, दूसरी ओर रूढ़िवादी समाज के सामने समझौता — यह उनका विरोधाभासी स्वभाव है।

4. अतिथि-सत्कार में विश्वास: वे गोपाल प्रसाद का भरपूर स्वागत करते हैं।

5. सामाजिक दबाव में दब जाने वाले: वे जानते हैं कि क्या सही है, परंतु करते वही हैं जो समाज चाहता है।

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गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ:

1. रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक: वे स्त्री को केवल घर की चारदीवारी तक सीमित देखना चाहते हैं।

2. विवाह को व्यापार मानने वाले: उनके लिए विवाह एक 'बिज़नेस डील' है — इसमें भावनाओं का कोई स्थान नहीं।

3. दोहरे मानदंड: वे बेटे की शिक्षा को महत्त्व देते हैं, परंतु बहू की शिक्षा से डरते हैं।

4. अहंकारी: वे स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं और दूसरों को नीचा दिखाने में संकोच नहीं करते।

5. पुराने जमाने के पैरोकार: वे बार-बार 'हमारे जमाने' की बात करते हैं और वर्तमान को हेय दृष्टि से देखते हैं।

निष्कर्ष: दोनों पात्र उस पुरुष-प्रधान समाज के प्रतिनिधि हैं जो स्त्री को बराबरी का दर्जा देने में असमर्थ है।
10इस एकांकी का क्या उद्देश्य है? लिखिए।Show solution
दिया गया है: एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' जगदीशचंद्र माथुर द्वारा रचित है।

एकांकी के उद्देश्य:

1. स्त्री-शिक्षा का समर्थन: एकांकी का प्रमुख उद्देश्य यह बताना है कि स्त्री-शिक्षा न केवल उचित है, बल्कि आवश्यक भी है। उमा का चरित्र इसका जीवंत प्रमाण है।

2. स्त्री-सशक्तीकरण का संदेश: लेखक यह बताना चाहते हैं कि स्त्री को अपने अधिकारों के लिए स्वयं आवाज़ उठानी होगी।

3. रूढ़िवादी सोच पर व्यंग्य: गोपाल प्रसाद जैसे लोगों की संकीर्ण मानसिकता पर व्यंग्य करना और समाज को उसका दर्पण दिखाना।

4. विवाह-प्रथा की विकृतियों को उजागर करना: विवाह को 'बिज़नेस' मानने की प्रवृत्ति का विरोध करना।

5. युवा पीढ़ी को प्रेरित करना: शंकर जैसे व्यक्तित्वहीन युवकों के विपरीत उमा जैसे साहसी व्यक्तित्व को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना।

6. सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता: यह बताना कि समाज को बदलने के लिए व्यक्तिगत साहस और नैतिक दृढ़ता आवश्यक है।

निष्कर्ष: इस एकांकी का मूल उद्देश्य स्त्री को उसका उचित सम्मान और स्थान दिलाना है तथा समाज की उस दोहरी मानसिकता को उजागर करना है जो स्त्री-शिक्षा को तो स्वीकार करती है, परंतु शिक्षित स्त्री को नहीं।
11समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने हेतु आप कौन-कौन से प्रयास कर सकते हैं?Show solution
दिया गया है: यह प्रश्न छात्र के व्यक्तिगत विचारों और सामाजिक चेतना से संबंधित है।

महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने हेतु प्रयास:

1. शिक्षा के क्षेत्र में:
- लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करना।
- अपने परिवार और समाज में लड़कियों को स्कूल/कॉलेज भेजने के लिए प्रेरित करना।
- 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे अभियानों में सक्रिय भागीदारी।

2. सामाजिक स्तर पर:
- महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा और व्यवहार का विरोध करना।
- घर में माँ, बहन और अन्य महिलाओं के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करना।
- दहेज प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध करना।

3. कानूनी जागरूकता:
- महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक करना।
- महिला उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज़ उठाना और पीड़ितों की सहायता करना।

4. मीडिया और साहित्य के माध्यम से:
- महिला सशक्तीकरण पर लेख, नाटक, कविताएँ लिखना।
- सोशल मीडिया पर सकारात्मक संदेश फैलाना।

5. व्यक्तिगत स्तर पर:
- महिलाओं की उपलब्धियों को सराहना और उन्हें प्रोत्साहित करना।
- घर के कामों में बराबरी से हिस्सा लेना ताकि महिलाओं पर बोझ कम हो।

निष्कर्ष: महिलाओं को गरिमा दिलाना केवल सरकार या कानून का काम नहीं है — यह हम सबकी जिम्मेदारी है। छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

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Sources & Official References

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