साखियाँ एवं सबद
Himachal Pradesh Board · Class 9 · Hindi
NCERT Solutions for साखियाँ एवं सबद — Himachal Pradesh Board Class 9 Hindi.
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1'मानसरोवर' से कवि का क्या आशय है?Show solution
उत्तर:
कबीर ने 'मानसरोवर' से आशय मन रूपी पवित्र सरोवर से लिया है। जिस प्रकार हिमालय में स्थित मानसरोवर झील अत्यंत पवित्र और निर्मल मानी जाती है, उसी प्रकार कवि ने मनुष्य के शुद्ध, पवित्र और ईश्वर-भक्ति से परिपूर्ण मन को मानसरोवर कहा है। इस मानसरोवर में हंस रूपी आत्मा विचरण करती है और मुक्ताफल (मोती) रूपी ईश्वरीय ज्ञान व प्रेम को ग्रहण करती है।
2कवि ने सच्चे प्रेमी की क्या कसौटी बताई है?Show solution
उत्तर:
कबीर के अनुसार सच्चे प्रेमी की कसौटी यह है कि वह ईश्वर से सच्चा और निःस्वार्थ प्रेम करे। सच्चा प्रेमी वही है जो प्रेम की पीड़ा को चुपचाप सहन करे और उसे किसी के सामने प्रकट न करे। जैसे तलवार की चोट सहन करना कठिन होता है, वैसे ही सच्चे प्रेम की राह कठिन है। जो व्यक्ति इस कठिन राह पर चलने का साहस रखता है, वही सच्चा प्रेमी कहलाता है। अर्थात् प्रेम में त्याग, समर्पण और कष्ट सहने की क्षमता ही सच्चे प्रेमी की कसौटी है।
3तीसरे दोहे में कवि ने किस प्रकार के ज्ञान को महत्व दिया है?Show solution
उत्तर:
तीसरे दोहे में कबीर ने व्यावहारिक एवं आत्मिक ज्ञान को महत्व दिया है। उन्होंने पुस्तकीय या शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभव से प्राप्त ज्ञान को श्रेष्ठ माना है। कबीर कहते हैं कि ज्ञान रूपी हाथी पर चढ़कर, सहजता रूपी कालीन बिछाकर चलना चाहिए। इस ज्ञान के प्रभाव से संसार के लोग भले ही भौंकते रहें (आलोचना करते रहें), परंतु ज्ञानी व्यक्ति को इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। अर्थात् कबीर ने आत्मज्ञान और सहज साधना को सर्वोच्च महत्व दिया है।
4इस संसार में सच्चा संत कौन कहलाता है?Show solution
उत्तर:
कबीर के अनुसार इस संसार में सच्चा संत वही कहलाता है जो:
1. निष्पक्ष हो — अर्थात् किसी के पक्ष या विपक्ष में न हो (पखापखी से दूर रहे)।
2. सांप्रदायिक भेदभाव से मुक्त हो — हिंदू-मुसलमान, ऊँच-नीच के भेद से परे हो।
3. ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति रखता हो।
4. अनंत (परमात्मा) की ओर उन्मुख हो।
संक्षेप में, जो व्यक्ति सभी प्रकार के पक्षपात, द्वेष और सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर निर्पक्ष भाव से ईश्वर-भक्ति में लीन रहता है, वही सच्चा संत है।
5अंतिम दो दोहों के माध्यम से कबीर ने किस तरह की संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है?Show solution
उत्तर:
अंतिम दो दोहों के माध्यम से कबीर ने निम्नलिखित सामाजिक और धार्मिक संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है:
1. जाति-पाँति की संकीर्णता: कबीर ने बताया कि ऊँची जाति या कुल में जन्म लेने से कोई श्रेष्ठ नहीं होता। जो व्यक्ति ईश्वर-भक्ति और सत्कर्म नहीं करता, वह ऊँचे कुल में जन्म लेकर भी व्यर्थ है।
2. धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिकता: हिंदू और मुसलमान दोनों अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर आपस में लड़ते हैं, जबकि ईश्वर एक है और वह सबमें व्याप्त है।
इस प्रकार कबीर ने जातिवाद, धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक भेदभाव जैसी संकीर्णताओं पर प्रहार किया है।
6किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कुल से होती है या उसके कर्मों से? तर्क सहित उत्तर दीजिए।Show solution
उत्तर:
किसी भी व्यक्ति की सच्ची पहचान उसके कर्मों से होती है, न कि उसके कुल से। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
1. कबीर का मत: कबीर ने स्पष्ट कहा है कि ऊँचे कुल में जन्म लेकर यदि व्यक्ति के कर्म अच्छे नहीं हैं तो उसका जन्म व्यर्थ है। जैसे सोने के कलश में शराब भरी हो तो वह पूजनीय नहीं होता।
2. ऐतिहासिक उदाहरण: महर्षि वाल्मीकि निम्न कुल में जन्मे थे, परंतु अपने श्रेष्ठ कर्मों से वे महान ऋषि बने। इसके विपरीत रावण उच्च कुल का ब्राह्मण था, किंतु दुष्कर्मों के कारण अपकीर्ति को प्राप्त हुआ।
3. व्यावहारिक दृष्टि: समाज में भी व्यक्ति को उसके कार्यों, व्यवहार और चरित्र से पहचाना जाता है।
निष्कर्ष: अतः व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके कर्मों से ही होती है।
7काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए— (क) हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि। (ख) स्वान रूप संसार है, भूकन दे झख मारि।Show solution
(क) हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
भाव-सौंदर्य: कवि कहता है कि ज्ञान रूपी हाथी पर सहजता रूपी कालीन बिछाकर सवार हो जाओ। अर्थात् ज्ञान प्राप्त करके सहज और निश्चिंत भाव से जीवन जीओ।
काव्य-सौंदर्य:
- रूपक अलंकार — 'ज्ञान' को 'हस्ती (हाथी)' की उपमा दी गई है।
- प्रतीकात्मकता — 'सहज दुलीचा' सहज साधना का प्रतीक है।
- भाषा — सधुक्कड़ी (ब्रज और खड़ी बोली का मिश्रण)।
- शैली — उपदेशात्मक।
(ख) स्वान रूप संसार है, भूकन दे झख मारि।
भाव-सौंदर्य: यह संसार कुत्ते के समान है जो बिना कारण भौंकता रहता है। ज्ञानी व्यक्ति को इसकी परवाह किए बिना अपने मार्ग पर चलते रहना चाहिए।
काव्य-सौंदर्य:
- रूपक अलंकार — संसार को 'स्वान (कुत्ते)' की संज्ञा दी गई है।
- मुहावरे का प्रयोग — 'झख मारना' (समय बर्बाद करना) — भाषा में जीवंतता आई है।
- व्यंग्यात्मक शैली — संसार की आलोचना पर व्यंग्य।
- भाषा — सरल, सधुक्कड़ी।
सबद
8मनुष्य ईश्वर को कहाँ-कहाँ ढूँढ़ता फिरता है?Show solution
उत्तर:
कबीर के अनुसार मनुष्य ईश्वर को निम्नलिखित स्थानों पर ढूँढ़ता फिरता है:
1. मंदिर और मस्जिद में — हिंदू मंदिर में और मुसलमान मस्जिद में ईश्वर को खोजते हैं।
2. काबा और कैलाश में — मुसलमान काबा में और हिंदू कैलाश पर्वत पर ईश्वर को ढूँढ़ते हैं।
3. कर्मकांडों में — पूजा-पाठ, नमाज़, योग-साधना आदि में।
4. तीर्थस्थलों में — विभिन्न धार्मिक स्थलों की यात्रा में।
कबीर कहते हैं कि ईश्वर इन बाहरी स्थानों में नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के भीतर, हर साँस में विद्यमान है। बाहर ढूँढ़ना व्यर्थ है।
9कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए किन प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है?Show solution
उत्तर:
कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए निम्नलिखित प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है:
1. मूर्तिपूजा का खंडन — ईश्वर पत्थर की मूर्ति में नहीं है।
2. तीर्थयात्रा का खंडन — काबा, कैलाश या अन्य तीर्थों में जाने से ईश्वर नहीं मिलता।
3. बाहरी कर्मकांड का खंडन — पूजा-पाठ, नमाज़, रोज़ा, व्रत आदि बाहरी आडंबरों से ईश्वर-प्राप्ति नहीं होती।
4. योग-साधना के आडंबर का खंडन — केवल शरीर को कष्ट देने वाली साधनाएँ व्यर्थ हैं।
5. सांप्रदायिक भेद का खंडन — हिंदू-मुसलमान के अलग-अलग ईश्वर नहीं हैं।
कबीर का मत है कि ईश्वर हृदय की शुद्धता और सच्ची भक्ति से प्राप्त होता है।
10कबीर ने ईश्वर को 'सब स्वाँसों की स्वाँस में' क्यों कहा है?Show solution
उत्तर:
कबीर ने ईश्वर को 'सब स्वाँसों की स्वाँस में' इसलिए कहा है क्योंकि उनके अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी है। वह प्रत्येक प्राणी की हर साँस में विद्यमान है। जिस प्रकार साँस के बिना जीवन संभव नहीं, उसी प्रकार ईश्वर के बिना सृष्टि का अस्तित्व नहीं।
कबीर यह संदेश देना चाहते हैं कि:
- ईश्वर को बाहर ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं।
- वह हमारे भीतर, हमारी आत्मा में निवास करता है।
- प्रत्येक साँस के साथ हम ईश्वर के निकट हैं।
इस प्रकार कबीर ने अंतर्मुखी साधना पर बल दिया है।
11कबीर ने ज्ञान के आगमन की तुलना सामान्य हवा से न कर आँधी से क्यों की?Show solution
उत्तर:
कबीर ने ज्ञान के आगमन की तुलना सामान्य हवा से न करके आँधी से इसलिए की है क्योंकि:
1. सामान्य हवा धीरे-धीरे बहती है और उसका प्रभाव सीमित होता है। वह किसी बड़े परिवर्तन को नहीं ला सकती।
2. आँधी अत्यंत तीव्र और शक्तिशाली होती है। वह अपने मार्ग में आने वाली हर चीज़ को उखाड़ फेंकती है।
3. इसी प्रकार सच्चा ज्ञान भी आँधी की तरह होता है — वह मनुष्य के मन में व्याप्त अज्ञान, मोह, अहंकार, भ्रम और आडंबर को जड़ से उखाड़ देता है।
4. ज्ञान का प्रभाव इतना व्यापक और क्रांतिकारी होता है कि वह जीवन को पूरी तरह बदल देता है।
अतः आँधी का रूपक ज्ञान की शक्ति और व्यापकता को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।
12ज्ञान की आँधी का भक्त के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?Show solution
उत्तर:
कबीर के अनुसार ज्ञान की आँधी का भक्त के जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:
1. अज्ञान का नाश — मन में व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार दूर हो जाता है।
2. मोह-माया का विनाश — मोह रूपी छप्पर की मोटी लकड़ी (बलिंडा) टूट जाती है।
3. आसक्ति का अंत — चित्त की आसक्ति (हिति) रूपी धूनी (खूँटी) गिर जाती है।
4. भ्रम का नाश — भ्रम और संदेह रूपी टाटी (परदा) उड़ जाती है।
5. भेद का प्रकट होना — भाँडा फूट जाता है अर्थात् सत्य प्रकट हो जाता है।
6. प्रेम की वर्षा — ज्ञान की आँधी के बाद प्रेम रूपी जल की वर्षा होती है जिससे भक्त का हृदय ईश्वरीय प्रेम से भीग जाता है।
निष्कर्ष: ज्ञान की आँधी भक्त के जीवन से समस्त विकारों, आडंबरों और भ्रमों को दूर कर उसे ईश्वर-भक्ति के योग्य बना देती है।
13भाव स्पष्ट कीजिए— (क) हिति चित्त की दै धूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा। (ख) आँधी पीछे जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।Show solution
(क) हिति चित्त की दै धूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
भाव: इस पंक्ति में कबीर ने ज्ञान की आँधी के प्रभाव का वर्णन किया है। 'हिति चित्त की धूँनी' का अर्थ है — चित्त (मन) की आसक्ति रूपी खूँटी या स्तंभ। 'मोह बलिंडा' का अर्थ है — मोह रूपी छप्पर की मजबूत लकड़ी।
कवि कहता है कि जब ज्ञान की आँधी आती है तो मन की आसक्ति रूपी खूँटी गिर जाती है और मोह रूपी मजबूत लकड़ी टूट जाती है। अर्थात् ज्ञान के प्रकाश से मनुष्य के मन में व्याप्त मोह और आसक्ति पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
(ख) आँधी पीछे जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
भाव: इस पंक्ति में कबीर कहते हैं कि ज्ञान की आँधी के बाद प्रेम रूपी जल की वर्षा होती है। जिस प्रकार आँधी के बाद वर्षा होती है और धरती भीग जाती है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त होने के बाद भक्त का हृदय ईश्वरीय प्रेम से भीग जाता है। 'हरि जन भींनाँ' का अर्थ है — ईश्वर के भक्त प्रेम से सराबोर हो जाते हैं। अर्थात् ज्ञान के बाद भक्त में ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम उत्पन्न होता है।
रचना और अभिव्यक्ति
14संकलित साखियों और पदों के आधार पर कबीर के धार्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए।Show solution
उत्तर:
कबीर मध्यकालीन भारत के महान संत-कवि थे जिन्होंने अपनी रचनाओं में धार्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया। उनके विचार निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट होते हैं:
1. ईश्वर की एकता:
कबीर ने हिंदू और मुसलमान दोनों को यह समझाया कि ईश्वर एक है। वह राम हो या रहीम, अल्लाह हो या ब्रह्म — सब एक ही परमसत्ता के नाम हैं।
2. बाहरी आडंबरों का विरोध:
कबीर ने मंदिर-मस्जिद, काबा-कैलाश, पूजा-नमाज़ जैसे बाहरी कर्मकांडों को व्यर्थ बताया। उनके अनुसार ईश्वर हृदय में है, बाहर नहीं।
3. जाति-पाँति का विरोध:
कबीर ने जाति-प्रथा और ऊँच-नीच के भेद को निरर्थक बताया। उनके अनुसार व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होती है, जन्म से नहीं।
4. निष्पक्षता का संदेश:
सच्चा संत वही है जो किसी पक्ष या संप्रदाय का समर्थन न करे, बल्कि सबको समान दृष्टि से देखे।
5. प्रेम और भक्ति पर बल:
कबीर ने सच्ची भक्ति और प्रेम को ही ईश्वर-प्राप्ति का एकमात्र मार्ग बताया।
निष्कर्ष: कबीर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक समरसता और मानवीय प्रेम का जो संदेश दिया, वह भारतीय समाज के लिए अमूल्य धरोहर है।
भाषा-अध्ययन
15निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए— पखापखी, अनंत, जोग, जुगति, बैराग, निरपखShow solution
नियम: तत्सम शब्द वे संस्कृत शब्द हैं जिनसे तद्भव शब्द बने हैं।
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