जाग तुझको दूर जाना (महादेवी वर्मा)
Jharkhand Board · Class 11 · Hindi
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प्रश्न-अभ्यास — जाग तुझको दूर जाना (महादेवी वर्मा)
1'जाग तुझको दूर जाना' कविता में कवयित्री मानव को किन विपरीत स्थितियों में आगे बढ़ने के लिए उत्साहित कर रही है?Show solution
उत्तर:
कवयित्री महादेवी वर्मा ने इस कविता में मानव को निम्नलिखित विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया है —
1. सुख-दुख की विपरीत स्थितियाँ: जब चारों ओर विश्व का क्रंदन (रोना-चिल्लाना) हो और मनुष्य उसे अपनी कारा (बंधन) बना ले, तब भी उसे जागकर आगे बढ़ना है।
2. निराशा और हताशा की स्थिति: जब मन में ठंडी साँसें भरने की इच्छा हो, निराशा घेर ले, तब भी कवयित्री कहती हैं कि हिम्मत न हारो।
3. कठोर संघर्ष की स्थिति: जब मार्ग में अंगार-शय्या (अंगारों की सेज) बिछी हो, अर्थात् कठिनाइयाँ और यातनाएँ हों, तब भी मनुष्य को उन पर कलियाँ बिछाकर आगे बढ़ना है।
4. मोह और आलस्य की स्थिति: जब प्रकृति की मनोरम छटा — मलय पर्वत की शीतल हवा, सुगंधित वातावरण — मनुष्य को मोहित कर सुला देना चाहे, तब भी उसे जागना है।
5. अंधकार और संकट की स्थिति: जब चारों ओर अँधेरा हो और संकट के बादल छाए हों, तब भी मनुष्य को अपना लक्ष्य नहीं भूलना चाहिए।
निष्कर्ष: कवयित्री ने इन सभी विपरीत स्थितियों में मनुष्य को जागृत रहकर अपने दूरस्थ लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने की प्रेरणा दी है।
2कवयित्री किस मोहपूर्ण बंधन से मुक्त होकर मानव को जागृति का संदेश दे रही है?Show solution
उत्तर:
कवयित्री महादेवी वर्मा स्वयं एक संवेदनशील, कोमल हृदय की कवयित्री हैं। वे प्रकृति की सुंदरता, मलय पर्वत की शीतल सुगंधित वायु, चाँदनी रात की मनोरमता और जीवन के सुख-सौंदर्य से गहरे रूप से जुड़ी हैं। यही उनका मोहपूर्ण बंधन है।
इस कविता में कवयित्री स्वयं इस मोह को पहचानती हैं और उससे मुक्त होकर मानव को जागृति का संदेश देती हैं। वे कहती हैं कि —
- प्रकृति का मोह — मलय की शीतल हवा, सुगंधित वातावरण, उनींदी रात — ये सब मनुष्य को सुला देना चाहते हैं।
- सांसारिक सुख-सुविधाओं का मोह — आरामदायक जीवन, भोग-विलास, स्वार्थपरता — ये बंधन मनुष्य को कर्तव्य-पथ से विचलित करते हैं।
- भावनात्मक दुर्बलता का मोह — विश्व के क्रंदन को देखकर निराश हो जाना, ठंडी साँसें भरना — यह भी एक प्रकार का मोह है।
कवयित्री इन सभी मोहपूर्ण बंधनों से स्वयं को मुक्त करके मानव को यह संदेश देती हैं कि जागो, उठो और अपने दूरस्थ लक्ष्य की ओर बढ़ो। देश की स्वाधीनता और मानव-कल्याण के लिए इन मोहों को त्यागना आवश्यक है।
3'जाग तुझको दूर जाना' स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा से रचित एक जागरण गीत है। इस कथन के आधार पर कविता की मूल संवेदना को लिखिए।Show solution
उत्तर:
यह कथन पूर्णतः सत्य है। महादेवी वर्मा ने यह कविता उस युग में लिखी जब भारत स्वाधीनता संग्राम की आग में तप रहा था। कविता की मूल संवेदना निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट होती है —
1. जागृति का आह्वान:
कविता का केंद्रीय भाव है — सोए हुए मनुष्य को जगाना। स्वाधीनता आंदोलन में जनता को उदासीनता और भय से बाहर निकालकर संघर्ष के लिए तैयार करना आवश्यक था। कवयित्री बार-बार 'जाग' कहकर यही संदेश देती हैं।
2. कठिनाइयों से न घबराने की प्रेरणा:
स्वाधीनता के मार्ग में अंग्रेजी शासन का दमन, जेल, यातनाएँ — सब कुछ था। कवयित्री कहती हैं कि 'अंगार-शय्या' पर भी कलियाँ बिछाकर आगे बढ़ो — अर्थात् कठिनाइयों को सहर्ष स्वीकार करो।
3. मोह-माया त्यागने का संदेश:
स्वाधीनता सेनानियों को अपने घर-परिवार, सुख-सुविधाओं का मोह छोड़कर देश-सेवा में लगना था। कवयित्री इसी भाव को व्यक्त करती हैं।
4. निराशा से उबरने की प्रेरणा:
'कह न ठंडी साँस' — यह पंक्ति स्वाधीनता सेनानियों को निराश न होने की प्रेरणा देती है।
5. सामूहिक चेतना का विस्तार:
कविता केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि समस्त भारतीय जनमानस को संबोधित करती है।
निष्कर्ष: इस प्रकार यह कविता स्वाधीनता आंदोलन की पृष्ठभूमि में रचित एक ओजस्वी जागरण गीत है जिसकी मूल संवेदना है — संघर्ष, जागृति, साहस और अदम्य इच्छाशक्ति के साथ स्वतंत्रता के लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना।
4निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए —
(क) विश्व का क्रंदन...अपने लिए कारा बनाना!
(ख) कह न ठंडी साँस...सजेगा आज पानी।
(ग) है तुझे अंगार-शय्या...कलियाँ बिछाना!Show solution
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(क) विश्व का क्रंदन...अपने लिए कारा बनाना!
काव्य-सौंदर्य:
- भाव-सौंदर्य: इन पंक्तियों में कवयित्री कहती हैं कि विश्व में चारों ओर दुख, पीड़ा और क्रंदन (रोना) है। मनुष्य इस दुख को देखकर स्वयं भी दुखी हो जाता है और उसे अपनी कारा (बंधन/कैद) बना लेता है। कवयित्री इस प्रवृत्ति से मुक्त होने का संदेश देती हैं।
- अलंकार: 'विश्व का क्रंदन' में रूपक अलंकार है — दुख को कारा (जेल) कहा गया है। विरोधाभास भी है — दूसरों का दुख अपनी कारा बनाना।
- भाषा-सौंदर्य: 'क्रंदन' और 'कारा' जैसे तत्सम शब्दों का प्रयोग भाषा को गरिमामय बनाता है।
- शिल्प-सौंदर्य: गीत-शैली में रचित यह पंक्ति लयात्मक है।
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(ख) कह न ठंडी साँस...सजेगा आज पानी।
काव्य-सौंदर्य:
- भाव-सौंदर्य: कवयित्री कहती हैं कि निराशा की ठंडी साँसें मत भरो। जो व्यक्ति निराश होकर आँसू बहाता है, उसके आँसुओं से कोई परिवर्तन नहीं होता — 'पानी' (आँसू) से कुछ नहीं सजता। अर्थात् रोने-धोने से नहीं, संघर्ष से परिवर्तन आता है।
- अलंकार: 'ठंडी साँस' में विशेषण-विपर्यय है। 'सजेगा आज पानी' में व्यंग्योक्ति है।
- प्रतीक: 'ठंडी साँस' निराशा का प्रतीक है; 'पानी' आँसुओं का प्रतीक है।
- भाषा-सौंदर्य: सरल, प्रवाहमयी खड़ी बोली का प्रयोग। वाक्य छोटे और प्रभावशाली हैं।
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(ग) है तुझे अंगार-शय्या...कलियाँ बिछाना!
काव्य-सौंदर्य:
- भाव-सौंदर्य: यह पंक्ति अत्यंत ओजस्वी है। कवयित्री कहती हैं कि तुम्हें अंगारों की सेज पर सोना है — अर्थात् कठिनाइयाँ और यातनाएँ सहनी हैं — किंतु उन अंगारों पर कलियाँ बिछाना है, अर्थात् अपनी सहनशीलता और साहस से कठिनाइयों को सुंदर बना देना है।
- अलंकार: 'अंगार-शय्या' में रूपक अलंकार है — कठिनाइयों को अंगारों की सेज कहा गया है। 'अंगार' और 'कलियाँ' में विरोधाभास (विभावना) अलंकार है।
- प्रतीक: 'अंगार-शय्या' — संघर्ष और यातना का प्रतीक; 'कलियाँ' — कोमलता, आशा और सौंदर्य का प्रतीक।
- भाषा-सौंदर्य: विरोधी बिंबों (अंगार और कलियाँ) का एक साथ प्रयोग पंक्ति को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है।
- शिल्प-सौंदर्य: विस्मयादिबोधक चिह्न (!) पंक्ति के ओज को और बढ़ाता है।
5कवयित्री ने स्वाधीनता के मार्ग में आनेवाली कठिनाइयों को इंगित कर मनुष्य के भीतर किन गुणों का विस्तार करना चाहा है? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।Show solution
उत्तर:
कवयित्री महादेवी वर्मा ने इस कविता में स्वाधीनता के मार्ग में आनेवाली अनेक कठिनाइयों का उल्लेख किया है और उनसे जूझने के लिए मनुष्य के भीतर निम्नलिखित गुणों का विस्तार करना चाहा है —
1. जागरूकता (Awareness):
कवयित्री बार-बार 'जाग' कहकर मनुष्य को आलस्य, उदासीनता और मोह-निद्रा से जागृत करना चाहती हैं। स्वाधीनता के लिए सबसे पहले मानसिक जागरूकता आवश्यक है।
2. साहस और वीरता:
'अंगार-शय्या पर कलियाँ बिछाना' — इस पंक्ति में कवयित्री मनुष्य में असाधारण साहस और वीरता का विकास करना चाहती हैं। कठिनाइयों से न डरना, बल्कि उनका सामना करना — यही वीरता है।
3. धैर्य और सहनशीलता:
कठिनाइयों के बीच भी धैर्य बनाए रखना, निराश न होना — यह गुण कवयित्री मनुष्य में देखना चाहती हैं।
4. आशावादिता:
'कह न ठंडी साँस' — निराशा को त्यागकर आशावादी दृष्टिकोण अपनाना। कवयित्री चाहती हैं कि मनुष्य हर परिस्थिति में आशा का दामन थामे रहे।
5. त्याग और बलिदान की भावना:
मोह-माया, सुख-सुविधाओं और प्रकृति के आकर्षण को त्यागकर देश-सेवा में लगना — यह त्याग-भावना कवयित्री मनुष्य में जगाना चाहती हैं।
6. दृढ़ संकल्प:
लक्ष्य 'दूर' है, मार्ग कठिन है, फिर भी रुकना नहीं — यह दृढ़ संकल्प की भावना कवयित्री मनुष्य में भरना चाहती हैं।
7. कर्तव्यनिष्ठा:
व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करना — यह गुण भी कवयित्री को अभीष्ट है।
निष्कर्ष: इस प्रकार कवयित्री ने जागरूकता, साहस, धैर्य, आशावादिता, त्याग, दृढ़ संकल्प और कर्तव्यनिष्ठा जैसे गुणों का विस्तार करके मनुष्य को स्वाधीनता के पथ पर अग्रसर करना चाहा है।
योग्यता-विस्तार
1स्वाधीनता आंदोलन के कुछ जागरण गीतों का एक संकलन तैयार कीजिए।Show solution
संकलन के लिए सुझाव:
निम्नलिखित प्रसिद्ध जागरण गीतों को अपने संकलन में सम्मिलित किया जा सकता है —
1. 'सरफ़रोशी की तमन्ना' — रामप्रसाद 'बिस्मिल'
*(यह गीत क्रांतिकारियों का प्रिय गीत था।)*
2. 'वंदे मातरम्' — बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय
*(यह स्वाधीनता आंदोलन का राष्ट्रगीत बना।)*
3. 'झाँसी की रानी' — सुभद्राकुमारी चौहान
*(वीरांगना लक्ष्मीबाई की वीरता का गान।)*
4. 'जाग तुझको दूर जाना' — महादेवी वर्मा
*(जागृति और संघर्ष का आह्वान।)*
5. 'मेरा रंग दे बसंती चोला' — भगत सिंह
*(बलिदान और देशप्रेम का गीत।)*
6. 'पुष्प की अभिलाषा' — माखनलाल चतुर्वेदी
*(देश के लिए बलिदान की भावना।)*
संकलन बनाने की विधि:
- प्रत्येक गीत को सुंदर ढंग से लिखें।
- कवि का संक्षिप्त परिचय दें।
- गीत की पृष्ठभूमि और उसका महत्त्व लिखें।
- चित्र या चित्रकारी से संकलन को आकर्षक बनाएँ।
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