टार्च बेचनेवाले (हरिशंकर परसाई)
Meghalaya Board · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for टार्च बेचनेवाले (हरिशंकर परसाई) — Meghalaya Board Class 11 Hindi.
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प्रश्न-अभ्यास
1लेखक ने टार्च बेचनेवाली कंपनी का नाम 'सूरज छाप' ही क्यों रखा?Show solution
आशय एवं व्याख्या:
लेखक ने 'सूरज छाप' नाम अत्यंत व्यंग्यपूर्ण ढंग से चुना है। सूरज प्रकाश का सबसे बड़ा और स्वाभाविक स्रोत है — वह किसी बाहरी साधन का मोहताज नहीं होता। जब कोई कंपनी 'सूरज छाप' टार्च बेचती है, तो यह नाम ही एक विरोधाभास (irony) उत्पन्न करता है — जिस सूरज के रहते टार्च की जरूरत नहीं, उसी के नाम पर टार्च बेची जा रही है।
इसके पीछे लेखक का व्यंग्य यह है कि समाज में धर्म, अध्यात्म और ज्ञान के नाम पर (जो स्वयं 'सूरज' की तरह प्रकाशमान होने चाहिए) लोग व्यापार करते हैं और भोली-भाली जनता को ठगते हैं। 'सूरज छाप' नाम उस पाखंड और दिखावे का प्रतीक है जो बड़े-बड़े नामों की आड़ में चलता है।
निष्कर्ष: 'सूरज छाप' नाम रखकर लेखक ने यह व्यंग्य किया है कि जो वस्तु स्वयं प्रकाश का प्रतीक है, उसी के नाम पर नकली और व्यावसायिक प्रकाश बेचा जा रहा है — यह समाज की विडंबना है।
2पाँच साल बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात किन परिस्थितियों में और कहाँ होती है?Show solution
परिस्थितियाँ एवं स्थान:
पाँच साल बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात एक सार्वजनिक सभा/प्रवचन स्थल पर होती है। लेखक वहाँ श्रोता के रूप में उपस्थित होता है। वहाँ एक भव्य मंच सजा होता है, दीपक जलते हैं, फूलों की सजावट होती है और एक विशाल भीड़ जमा होती है।
लेखक देखता है कि उसका पुराना मित्र — जो कभी उसके साथ 'सूरज छाप' टार्च बेचा करता था — अब मंच पर एक महात्मा/संत के रूप में विराजमान है। वह गेरुए वस्त्र पहने, माला धारण किए, गुरु-गंभीर वाणी में प्रवचन दे रहा है और लोगों को 'भीतर के अंधकार' को दूर करने का उपदेश दे रहा है।
इस प्रकार एक साधारण टार्च विक्रेता अब 'आध्यात्मिक गुरु' बनकर एक नए किस्म की 'टार्च' बेच रहा होता है।
निष्कर्ष: मुलाकात एक धार्मिक प्रवचन सभा में होती है जहाँ परिस्थितियाँ पूरी तरह बदली हुई हैं — एक मित्र श्रोता है और दूसरा वक्ता/गुरु बन चुका है।
3पहला दोस्त मंच पर किस रूप में था और वह किस अँधेरे को दूर करने के लिए टार्च बेच रहा था?Show solution
मंच पर रूप:
पहला दोस्त मंच पर एक तेजस्वी महात्मा/आध्यात्मिक गुरु के रूप में था। उसने गेरुए (भगवा) वस्त्र धारण किए हुए थे, गले में माला थी, चेहरे पर आध्यात्मिक तेज का भाव था और वह गुरु-गंभीर वाणी में प्रवचन दे रहा था। उसके चारों ओर शिष्यों और भक्तों की भीड़ थी।
किस अँधेरे को दूर करने की बात:
वह 'भीतर के अंधकार' को दूर करने की बात कर रहा था। उसका कहना था कि मनुष्य के मन में, आत्मा में जो अज्ञान का अंधकार है — वही असली अंधकार है। बाहर का प्रकाश नहीं, बल्कि अंतर की ज्योति जगाना जरूरी है। वह लोगों को उपदेश दे रहा था:
इस प्रकार वह भौतिक टार्च की जगह 'आध्यात्मिक टार्च' बेच रहा था — अर्थात् अज्ञान, भय, मोह और मानसिक अंधकार को दूर करने का दावा करते हुए लोगों से धन वसूल रहा था।
निष्कर्ष: पहला दोस्त एक पाखंडी संत के रूप में मंच पर था और वह मनुष्य के आंतरिक/आत्मिक अंधकार को दूर करने के नाम पर व्यापार कर रहा था।
4भव्य पुरुष ने कहा – 'जहाँ अंधकार है वहीं प्रकाश है'। इसका क्या तात्पर्य है?Show solution
शाब्दिक अर्थ:
जहाँ अंधकार है, वहीं प्रकाश की आवश्यकता है और इसीलिए वहीं प्रकाश की संभावना भी है।
व्यंग्यात्मक तात्पर्य (परसाई जी की दृष्टि से):
यह कथन सुनने में बहुत गहरा और दार्शनिक लगता है, परंतु इसके पीछे एक व्यावसायिक चालाकी छिपी है। इसका वास्तविक तात्पर्य यह है:
1. व्यापारिक दृष्टि से: जहाँ लोग अज्ञान, भय, निराशा और मानसिक अंधकार में हैं — वहीं इन 'गुरुओं' का बाजार है। जहाँ समस्या है, वहीं उसका 'समाधान' बेचा जा सकता है।
2. पाखंड की ओर संकेत: यह कथन इस बात का संकेत है कि ये तथाकथित संत समाज की कमजोरियों, अंधविश्वासों और भोलेपन का फायदा उठाते हैं। जहाँ जनता अंधकार में है, वहीं ये अपना 'प्रकाश' बेचने पहुँच जाते हैं।
3. व्यंग्य: लेखक इस कथन के माध्यम से यह दर्शाना चाहते हैं कि यह 'गहरी बात' वास्तव में एक धंधेबाज की मार्केटिंग रणनीति है।
निष्कर्ष: इस कथन का तात्पर्य है कि जहाँ लोगों में अज्ञान और भटकाव है, वहीं इन पाखंडी गुरुओं का व्यापार फलता-फूलता है — यह एक व्यंग्यपूर्ण सत्य है।
5भीतर के अँधेरे की टार्च बेचने और 'सूरज छाप' टार्च बेचने के धंधे में क्या फ़र्क है? पाठ के आधार पर बताइए।Show solution
'सूरज छाप' टार्च बेचने का धंधा:
- यह एक भौतिक/साधारण व्यापार है।
- इसमें एक वास्तविक वस्तु (टार्च) बेची जाती है।
- ग्राहक को पता होता है कि वह क्या खरीद रहा है।
- इसमें धोखा सीमित है — टार्च काम करे या न करे, यह स्पष्ट होता है।
- इसमें कमाई सीमित और मेहनत अधिक है।
- बाजार में प्रतिस्पर्धा है।
भीतर के अँधेरे की टार्च बेचने का धंधा:
- यह एक अमूर्त/आध्यात्मिक व्यापार है।
- इसमें कोई ठोस वस्तु नहीं बेची जाती — केवल उपदेश, प्रवचन और 'ज्ञान' बेचा जाता है।
- ग्राहक (भक्त/श्रोता) को यह भी नहीं पता कि उसे क्या मिल रहा है।
- इसमें धोखे की संभावना असीमित है — 'भीतर का प्रकाश' मिला या नहीं, यह कभी सिद्ध नहीं होता।
- इसमें कमाई बहुत अधिक और मेहनत कम है।
- कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, क्योंकि हर गुरु अपना अलग 'ब्रांड' बनाता है।
मुख्य अंतर:
| 'सूरज छाप' टार्च | भीतर के अँधेरे की टार्च |
|---|---|
| भौतिक वस्तु | अमूर्त उपदेश |
| सीमित लाभ | असीमित लाभ |
| जवाबदेही संभव | कोई जवाबदेही नहीं |
| साधारण व्यापार | पाखंड का व्यापार |
निष्कर्ष: 'सूरज छाप' टार्च का धंधा एक ईमानदार (भले ही साधारण) व्यापार था, जबकि 'भीतर के अँधेरे की टार्च' बेचना एक चालाक, पाखंडपूर्ण और अत्यधिक लाभदायक धंधा है जो लोगों की भावनाओं और अज्ञान का शोषण करता है।
6'सवाल के पाँव जमीन में गहरे गड़े हैं। यह उखड़ेगा नहीं।' इस कथन में मनुष्य की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत है और क्यों?Show solution
कथन का आशय:
इस कथन में यह बताया गया है कि मनुष्य के मन में जो जिज्ञासा है, जो प्रश्न उठते हैं — वे इतने गहरे और स्वाभाविक हैं कि उन्हें दबाया नहीं जा सकता।
मनुष्य की प्रवृत्ति की ओर संकेत:
इस कथन में मनुष्य की निम्नलिखित प्रवृत्तियों की ओर संकेत है:
1. जिज्ञासा की प्रवृत्ति: मनुष्य स्वभाव से जिज्ञासु है। वह जीवन, मृत्यु, ईश्वर, सत्य आदि के बारे में सदा प्रश्न पूछता रहता है। यह प्रवृत्ति उसके स्वभाव में गहरी जड़ें जमाए हुए है।
2. असंतोष की प्रवृत्ति: मनुष्य कभी पूर्णतः संतुष्ट नहीं होता। उसके मन में सदा कुछ न कुछ प्रश्न बने रहते हैं।
3. व्यंग्यात्मक संकेत: परसाई जी इस कथन के माध्यम से यह भी व्यंग्य करते हैं कि इन्हीं अनुत्तरित प्रश्नों का फायदा पाखंडी गुरु उठाते हैं। जब तक मनुष्य के मन में प्रश्न हैं, तब तक इन 'उत्तर बेचने वालों' का धंधा चलता रहेगा।
क्यों उखड़ेगा नहीं:
क्योंकि ये प्रश्न मानव-स्वभाव का अभिन्न अंग हैं। जीवन की अनिश्चितता, मृत्यु का भय, सुख-दुख की समस्याएँ — ये सब मनुष्य को सदा प्रश्न पूछने पर विवश करती हैं।
निष्कर्ष: इस कथन में मनुष्य की शाश्वत जिज्ञासा और अनुत्तरित प्रश्नों की ओर संकेत है, और साथ ही यह व्यंग्य भी है कि इसी प्रवृत्ति का शोषण पाखंडी लोग करते हैं।
7'व्यंग्य विधा में भाषा सबसे धारदार है।' परसाई जी की इस रचना को आधार बनाकर इस कथन के पक्ष में अपने विचार प्रकट कीजिए।Show solution
व्यंग्य साहित्य की वह विधा है जिसमें भाषा का प्रयोग इस प्रकार किया जाता है कि वह सीधे आघात न करके भी गहरी चोट करती है। परसाई जी हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार हैं और 'टार्च बेचनेवाले' उनकी इस प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
पाठ के आधार पर विचार:
1. व्यंग्यपूर्ण नामकरण:
'सूरज छाप' टार्च का नाम ही एक तीखा व्यंग्य है। सूरज — जो स्वयं प्रकाश का स्रोत है — उसके नाम पर टार्च बेचना, यह भाषाई चतुराई समाज के पाखंड पर करारी चोट करती है।
2. विरोधाभासी भाषा:
'जहाँ अंधकार है वहीं प्रकाश है' — यह वाक्य सुनने में दार्शनिक लगता है, परंतु इसके पीछे व्यापारिक चालाकी है। परसाई जी ने इस विरोधाभास को भाषा के माध्यम से उजागर किया है।
3. सरल भाषा में गहरा प्रहार:
'धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ।' — यह सरल वाक्य पूरे आध्यात्मिक पाखंड की पोल खोल देता है। इतनी सरल भाषा में इतना गहरा व्यंग्य — यही धारदार भाषा का प्रमाण है।
4. प्रतीकात्मक भाषा:
टार्च, अंधकार, प्रकाश — ये सब प्रतीक हैं जो भाषा को बहुआयामी बनाते हैं। एक ही शब्द के कई अर्थ निकलते हैं।
5. हास्य और करुणा का मिश्रण:
परसाई जी की भाषा में हँसाते हुए रुलाने की क्षमता है। पाठक पहले हँसता है, फिर सोचता है — यही व्यंग्य की सफलता है।
निष्कर्ष:
परसाई जी की इस रचना में भाषा वास्तव में 'धारदार' है। वह सीधे उपदेश नहीं देती, बल्कि पाठक को स्वयं सोचने पर विवश करती है। व्यंग्य की भाषा वह तलवार है जो म्यान में रहते हुए भी काटती है।
8आशय स्पष्ट कीजिए—
(क) क्या पैसा कमाने के लिए मनुष्य कुछ भी कर सकता है?
(ख) प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ।
(ग) धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ।Show solution
आशय:
यह प्रश्न पाठ का केंद्रीय व्यंग्य है। इसका आशय यह है कि आधुनिक युग में धन-लोलुपता इतनी बढ़ गई है कि मनुष्य पैसा कमाने के लिए किसी भी सीमा को पार करने को तैयार है। धर्म, अध्यात्म, ईश्वर — जो पवित्र माने जाते हैं — उन्हें भी व्यापार का साधन बना लिया गया है। लेखक का मित्र पहले साधारण टार्च बेचता था, अब 'आत्मज्ञान' बेच रहा है — दोनों में उद्देश्य एक ही है: पैसा कमाना। यह प्रश्न समाज की नैतिक गिरावट पर एक तीखा व्यंग्य है।
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(ख) प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ।
आशय:
यह कथन दो स्तरों पर काम करता है:
- दार्शनिक स्तर पर: यह एक सत्य उपदेश है। वास्तव में आत्मज्ञान, शांति और सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजने से मिलते हैं। यह भारतीय दर्शन का मूल सिद्धांत है।
- व्यंग्यात्मक स्तर पर: परसाई जी इस कथन के माध्यम से दिखाते हैं कि यही सच्चा उपदेश एक पाखंडी व्यक्ति के मुँह से निकल रहा है जो इसे व्यापार का साधन बना चुका है। जो व्यक्ति स्वयं 'सूरज छाप' टार्च बेचता था, वही अब 'आंतरिक ज्योति' जगाने का दावा कर रहा है — यह विडंबना ही इस कथन की धार है।
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(ग) धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ।
आशय:
यह पाठ का सबसे महत्त्वपूर्ण और धारदार व्यंग्य-वाक्य है। इसका आशय है:
लेखक का मित्र स्वीकार करता है कि उसके काम का स्वरूप नहीं बदला है — वह पहले भी 'अंधकार दूर करने' का दावा करके टार्च बेचता था, अब भी वही करेगा। बस 'कंपनी' बदल रही है — यानी पहले भौतिक टार्च बेचता था, अब आध्यात्मिक 'ज्ञान की टार्च' बेचेगा।
यह कथन पूरे आध्यात्मिक व्यापार की पोल एक ही वाक्य में खोल देता है। यह बताता है कि धर्म और अध्यात्म के नाम पर चलने वाला व्यवसाय भी एक 'कंपनी' मात्र है — बस उत्पाद अमूर्त है। यह परसाई जी की भाषा की सबसे बड़ी धार है।
9लेखक ने 'सूरज छाप' टार्च की पेटी को नदी में क्यों फेंक दिया? क्या आप भी वही करते?Show solution
लेखक ने 'सूरज छाप' टार्च की पेटी नदी में इसलिए फेंक दी क्योंकि उसके मित्र ने उसे एक नए और अधिक लाभदायक धंधे के बारे में बताया — 'भीतर के अंधकार की टार्च' बेचना। लेखक को समझ आ गया कि:
1. भौतिक टार्च बेचने में मेहनत अधिक और कमाई कम है।
2. 'आध्यात्मिक टार्च' बेचने में — यानी प्रवचन, उपदेश और ज्ञान बेचने में — कमाई असीमित है।
3. पुरानी 'कंपनी' (सूरज छाप) अब बेकार हो गई थी क्योंकि नई 'कंपनी' (आध्यात्मिक गुरु) ज्यादा फायदेमंद थी।
इस प्रकार पेटी फेंकना पुराने धंधे को छोड़कर नए (और अधिक लाभदायक) पाखंड को अपनाने का प्रतीक है।
क्या मैं भी वही करता?
नहीं, मैं वैसा नहीं करता। इसके कारण:
1. नैतिक दृष्टि से: लोगों की भावनाओं और आस्था का शोषण करना अनैतिक है। धर्म और अध्यात्म को व्यापार बनाना समाज के लिए हानिकारक है।
2. सामाजिक दृष्टि से: ऐसे पाखंड से समाज में अंधविश्वास बढ़ता है और लोग वास्तविक समस्याओं का समाधान खोजने की बजाय इन 'गुरुओं' पर निर्भर हो जाते हैं।
3. व्यक्तिगत दृष्टि से: ईमानदारी से किया गया कोई भी काम — चाहे छोटा हो — पाखंड से बेहतर है।
निष्कर्ष: लेखक ने पेटी फेंककर एक बड़े पाखंड में प्रवेश किया। यह निर्णय व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से समझ में आता है, परंतु नैतिक दृष्टि से यह गलत है।
10टार्च बेचने वाले किस प्रकार की स्किल का प्रयोग करते हैं? क्या इसका 'स्किल इंडिया' प्रोग्राम से कोई संबंध है?Show solution
पाठ में दो प्रकार के टार्च बेचने वाले हैं और दोनों अलग-अलग कौशलों का प्रयोग करते हैं:
1. 'सूरज छाप' टार्च बेचने वाले की स्किल:
- वाक्-कौशल (Communication Skill): भीड़ को आकर्षित करने के लिए प्रभावशाली बोलने की क्षमता।
- विपणन कौशल (Marketing Skill): उत्पाद को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करना।
- मनोविज्ञान की समझ: ग्राहक की जरूरत और कमजोरी को पहचानना।
- प्रदर्शन कौशल: टार्च का प्रदर्शन करके लोगों को प्रभावित करना।
2. 'भीतर के अंधकार की टार्च' बेचने वाले की स्किल:
- वक्तृत्व कला (Oratory): प्रभावशाली और गुरु-गंभीर वाणी।
- मनोवैज्ञानिक कौशल: लोगों के भय, असंतोष और जिज्ञासा को पहचानकर उसका उपयोग करना।
- व्यक्तित्व निर्माण: वेशभूषा, भाव-भंगिमा से प्रभावशाली छवि बनाना।
- नेटवर्किंग: शिष्यों और भक्तों का नेटवर्क बनाना।
'स्किल इंडिया' प्रोग्राम से संबंध:
'स्किल इंडिया' प्रोग्राम का उद्देश्य युवाओं को रोजगारपरक कौशल सिखाना है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और देश के विकास में योगदान दें।
टार्च बेचने वालों के कौशल और 'स्किल इंडिया' में एक महत्त्वपूर्ण अंतर है:
- 'स्किल इंडिया' रचनात्मक और ईमानदार कौशल विकास पर जोर देता है।
- टार्च बेचने वाले (विशेषकर पाखंडी गुरु) अपने कौशल का उपयोग शोषण के लिए करते हैं।
हालाँकि, वाक्-कौशल, विपणन कौशल और जन-संपर्क कौशल — ये सब 'स्किल इंडिया' के अंतर्गत भी आते हैं। अंतर केवल उद्देश्य और नैतिकता का है।
निष्कर्ष: टार्च बेचने वाले उच्च स्तर के संचार और मनोवैज्ञानिक कौशल का प्रयोग करते हैं। यदि इन्हीं कौशलों को ईमानदार और रचनात्मक कार्यों में लगाया जाए, तो ये 'स्किल इंडिया' के आदर्शों के अनुरूप होंगे।
योग्यता-विस्तार
1'पैसा कमाने की लिप्सा ने आध्यात्मिकता को भी एक व्यापार बना दिया है।' इस विषय पर कक्षा में परिचर्चा कीजिए।Show solution
पक्ष में तर्क (हाँ, यह सत्य है):
1. आज अनेक तथाकथित बाबा, गुरु और संत करोड़ों रुपये की संपत्ति के मालिक हैं। उनके आश्रम बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह चलते हैं।
2. प्रवचन, दीक्षा, यज्ञ, पूजा-पाठ — सब कुछ के लिए शुल्क लिया जाता है। धर्म एक 'सेवा उद्योग' बन गया है।
3. टेलीविजन पर धार्मिक चैनल चलाए जाते हैं जो विज्ञापनों से करोड़ों कमाते हैं।
4. 'वेलनेस', 'योग', 'मेडिटेशन' — ये सब आध्यात्मिक अवधारणाएँ अब बड़े व्यापार बन चुकी हैं।
विपक्ष में तर्क (नहीं, सब एक जैसे नहीं):
1. अनेक सच्चे संत और आध्यात्मिक गुरु हैं जो निःस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करते हैं।
2. धर्म और अध्यात्म ने समाज को नैतिक आधार दिया है।
3. व्यावसायीकरण और वास्तविक आध्यात्मिकता में अंतर करना आवश्यक है।
निष्कर्ष:
परसाई जी की रचना इसी समस्या को उजागर करती है। समाज को सच्चे और पाखंडी गुरुओं में अंतर करना सीखना होगा। आध्यात्मिकता व्यक्तिगत साधना है, न कि बाजार की वस्तु।
2समाज में फैले अंधविश्वासों का उल्लेख करते हुए एक लेख लिखिए।Show solution
आज के वैज्ञानिक युग में भी हमारे समाज में अंधविश्वास की जड़ें गहरी हैं। शिक्षित और अशिक्षित — दोनों वर्गों में अंधविश्वास किसी न किसी रूप में विद्यमान है।
प्रमुख अंधविश्वास:
1. काला जादू और टोना-टोटका: बीमारी, दुर्भाग्य या शत्रु को नुकसान पहुँचाने के लिए तांत्रिकों के पास जाना।
2. ग्रह-नक्षत्र का भय: शनि, राहु, केतु आदि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए महंगे उपाय करना।
3. शकुन-अपशकुन: बिल्ली का रास्ता काटना, छींकना, उल्लू का बोलना आदि को अशुभ मानना।
4. बाबाओं पर अंध-आस्था: बिना सोचे-समझे किसी भी तथाकथित गुरु को ईश्वर मान लेना।
5. रोगों का अंधविश्वासी उपचार: डॉक्टर के पास जाने की बजाय झाड़-फूँक कराना।
अंधविश्वास के कारण:
- अशिक्षा और अज्ञान
- भय और असुरक्षा की भावना
- वैज्ञानिक सोच का अभाव
- पाखंडियों का शोषण
समाधान:
- वैज्ञानिक शिक्षा का प्रसार
- तर्कशील सोच का विकास
- सामाजिक जागरूकता अभियान
- कानून द्वारा पाखंड पर रोक
निष्कर्ष:
अंधविश्वास समाज की प्रगति में बाधक है। परसाई जी जैसे लेखकों की रचनाएँ इस समस्या के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हमें तर्क और विज्ञान की कसौटी पर हर बात को परखना चाहिए।
3एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा हरिशंकर परसाई पर बनाई गई फ़िल्म देखिए।Show solution
यह एक गतिविधि-आधारित प्रश्न है। विद्यार्थियों को निम्नलिखित कार्य करने चाहिए:
1. फ़िल्म देखना: एन.सी.ई.आर.टी. की वेबसाइट (ncert.nic.in) या यूट्यूब पर हरिशंकर परसाई पर बनाई गई फ़िल्म/वृत्तचित्र देखें।
2. नोट्स बनाना: फ़िल्म देखते समय निम्न बिंदुओं पर नोट्स बनाएँ:
- परसाई जी का जीवन परिचय
- उनकी प्रमुख रचनाएँ
- उनके व्यंग्य की विशेषताएँ
- उनके समय का सामाजिक परिवेश
3. कक्षा में चर्चा: फ़िल्म देखने के बाद कक्षा में अपने अनुभव और विचार साझा करें।
4. लेखन: फ़िल्म पर एक संक्षिप्त समीक्षा लिखें।
हरिशंकर परसाई के बारे में संक्षिप्त जानकारी:
हरिशंकर परसाई (1924-1995) हिंदी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार माने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'विकलांग श्रद्धा का दौर', 'तब की बात और थी', 'भूत के पाँव पीछे' आदि शामिल हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य के माध्यम से समाज की विसंगतियों, पाखंड और भ्रष्टाचार पर तीखे प्रहार किए।
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