प्रेमचंद के फटे जूते
Meghalaya Board · Class 9 · Hindi
NCERT Solutions for प्रेमचंद के फटे जूते — Meghalaya Board Class 9 Hindi.
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1हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद का जो शब्दचित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है उससे प्रेमचंद के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं?Show solution
प्रेमचंद के व्यक्तित्व की विशेषताएँ:
1. सादगी और फक्कड़पन: प्रेमचंद फोटो खिंचाते समय भी साधारण कपड़े पहनते थे — धोती, कुर्ता और टोपी। उनके जूते में बड़ा छेद था, फिर भी उन्होंने उसे छुपाने की कोशिश नहीं की।
2. दिखावे से दूरी: वे बाहरी आडंबर और दिखावे में विश्वास नहीं रखते थे। फोटो खिंचाने के लिए भी उन्होंने कोई विशेष पोशाक नहीं पहनी।
3. संघर्षशील स्वभाव: फटे जूते पहनकर भी उनके चेहरे पर व्यंग्य-मुसकान थी, जो यह दर्शाती है कि वे कठिनाइयों से घबराते नहीं थे।
4. समझौताहीन व्यक्तित्व: वे समाज की बुराइयों और शोषण के सामने कभी नहीं झुके। उन्होंने अपने साहित्य में सत्य का साथ दिया, चाहे इसके लिए कितनी भी कठिनाई उठानी पड़े।
5. आत्मसम्मान: फटे जूते उनकी गरीबी के प्रतीक हैं, परंतु उनकी मुसकान उनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को दर्शाती है।
6. व्यंग्यात्मक दृष्टि: उनकी मुसकान में एक गहरा व्यंग्य है जो समाज की विसंगतियों पर प्रहार करता है।
निष्कर्ष: प्रेमचंद एक सादगीपसंद, संघर्षशील, स्वाभिमानी और समझौताहीन व्यक्तित्व के धनी थे।
2सही कथन के सामने (✓) का निशान लगाइए—
(क) बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।
(ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए।
(ग) तुम्हारी यह व्यंग्य मुसकान मेरे हौसले बढ़ाती है।
(घ) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ अँगूठे से इशारा करते हो?Show solution
(ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए। ✓
स्पष्टीकरण:
- (क) गलत — पाठ में दाहिने पाँव का जूता ठीक है और बाएँ जूते में छेद है, जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।
- (ख) सही ✓ — यह कथन पाठ में ज्यों का त्यों आया है। लेखक ने लोगों के दिखावे पर व्यंग्य करते हुए यही कहा है।
- (ग) गलत — पाठ में लेखक कहता है कि प्रेमचंद की व्यंग्य-मुसकान उसे 'कचोटती' है, 'हौसले बढ़ाती है' नहीं।
- (घ) गलत — पाठ में 'अँगूठे से' नहीं, बल्कि 'पाँव की अँगुली से' इशारा करने का उल्लेख है।
3नीचे दी गई पंक्तियों में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए—
(क) जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।
(ख) तुम परदे का महत्व ही नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं।
(ग) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?Show solution
यहाँ 'जूता' धन-संपत्ति और शक्ति का प्रतीक है तथा 'टोपी' सम्मान और आत्मसम्मान का। लेखक का व्यंग्य यह है कि हमारे समाज में धन और शक्ति हमेशा सम्मान से ऊपर रही है। जो लोग धनी और शक्तिशाली हैं, उनके सामने सम्मानित और पढ़े-लिखे लोग भी अपना सिर झुकाते हैं। आज तो स्थिति और भी बुरी हो गई है — एक धनी व्यक्ति के आगे अनेक स्वाभिमानी लोग नतमस्तक हो जाते हैं। यह समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और चाटुकारिता पर तीखा व्यंग्य है।
(ख) व्यंग्य स्पष्टीकरण:
यहाँ 'परदा' दिखावे, आडंबर और झूठी मर्यादा का प्रतीक है। लेखक का व्यंग्य यह है कि प्रेमचंद ने अपनी गरीबी और फटे जूते को छुपाने की कोशिश नहीं की, जबकि समाज के अधिकांश लोग अपनी वास्तविकता को परदे में छुपाकर झूठा दिखावा करते हैं। ऐसे लोग अपनी असलियत छुपाने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। प्रेमचंद इस परदे की संस्कृति को नहीं मानते थे — यही उनकी महानता थी।
(ग) व्यंग्य स्पष्टीकरण:
यहाँ व्यंग्य यह है कि प्रेमचंद जिस भ्रष्ट, शोषणकारी और घृणित व्यवस्था का विरोध करते थे, उसकी ओर वे हाथ की अँगुली से इशारा नहीं करते — अर्थात् उसे सीधे सम्मान नहीं देते — बल्कि पाँव की अँगुली से इशारा करते हैं, जो घोर तिरस्कार और अपमान का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि प्रेमचंद ने समाज की बुराइयों को पूरी तरह नकारा और उनसे समझौता नहीं किया।
4पाठ में एक जगह पर लेखक सोचता है कि 'फोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी?' लेकिन अगले ही पल वह विचार बदलता है कि 'नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी।' आपके अनुसार इस संदर्भ में प्रेमचंद के बारे में लेखक के विचार बदलने की क्या वजहें हो सकती हैं?Show solution
विचार बदलने की वजहें:
1. प्रेमचंद के साहित्य का ज्ञान: लेखक जानता था कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में सदा सामान्य जन की पीड़ा को वाणी दी। ऐसा लेखक दिखावे में विश्वास नहीं रखता।
2. सादगी उनके स्वभाव का हिस्सा: प्रेमचंद की सादगी कोई मजबूरी नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग थी। वे जीवन में और साहित्य में एक जैसे थे।
3. दोहरा जीवन न जीना: सामान्यतः लोग विशेष अवसरों के लिए अलग पोशाक रखते हैं, परंतु प्रेमचंद जैसे व्यक्ति जो जीवन में कोई दिखावा नहीं करते, उनके लिए 'विशेष पोशाक' की अवधारणा ही नहीं होती।
4. आर्थिक स्थिति की समझ: लेखक को यह भी ज्ञात था कि प्रेमचंद आर्थिक रूप से संपन्न नहीं थे। उनके पास अलग-अलग पोशाकें रखने की सामर्थ्य नहीं थी।
5. व्यक्तित्व की एकरूपता: प्रेमचंद का बाहरी और भीतरी व्यक्तित्व एक था। वे जो थे, वही दिखते थे — यही उनकी महानता थी।
निष्कर्ष: लेखक को यह अहसास हुआ कि प्रेमचंद जैसे महान और सादगीपसंद व्यक्ति के लिए 'फोटो वाली पोशाक' और 'रोज़ की पोशाक' में कोई अंतर नहीं होता।
5आपने यह व्यंग्य पढ़ा। इसे पढ़कर आपको लेखक की कौन सी बातें आकर्षित करती हैं?Show solution
1. सरल भाषा में गहरी बात: परसाई जी ने बहुत सरल और सहज भाषा में समाज की गहरी विसंगतियों पर प्रहार किया है। उनकी भाषा आम पाठक को भी सहज ही समझ आती है।
2. एक तस्वीर से इतना कुछ कह देना: केवल एक फोटो को आधार बनाकर लेखक ने प्रेमचंद के संपूर्ण व्यक्तित्व को उजागर कर दिया — यह उनकी अद्भुत रचनात्मकता है।
3. व्यंग्य की धार: लेखक ने समाज में व्याप्त दिखावे, चाटुकारिता और भ्रष्टाचार पर बहुत तीखा व्यंग्य किया है, परंतु यह व्यंग्य कहीं भी अशिष्ट नहीं लगता।
4. प्रेमचंद के प्रति श्रद्धा: लेखक ने प्रेमचंद की सादगी और संघर्षशीलता को बड़े आदर के साथ प्रस्तुत किया है। उनके प्रति लेखक की श्रद्धा पाठक को भी प्रभावित करती है।
5. आत्मालोचन: लेखक स्वयं को भी इस व्यंग्य से अलग नहीं रखता — वह स्वयं से भी प्रश्न करता है, जो उनकी ईमानदारी को दर्शाता है।
6. प्रतीकों का सुंदर प्रयोग: जूता, टोपी, परदा, टीला — इन सब प्रतीकों का सटीक और सार्थक प्रयोग लेखक की कुशलता को दर्शाता है।
6पाठ में 'टीले' शब्द का प्रयोग किन संदर्भों को इंगित करने के लिए किया गया होगा?Show solution
'टीले' शब्द के संदर्भ:
पाठ में 'टीले' शब्द उन बाधाओं और रुकावटों का प्रतीक है जो एक ईमानदार, सच्चे और संघर्षशील व्यक्ति के जीवन-पथ में आती हैं। इन 'टीलों' से निम्नलिखित संदर्भ इंगित होते हैं:
1. सामाजिक बाधाएँ: समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता, जातिवाद, शोषण और असमानता — ये सब 'टीले' हैं जिन्हें पार करना कठिन है।
2. आर्थिक कठिनाइयाँ: गरीबी और आर्थिक संघर्ष भी एक 'टीला' है जिससे प्रेमचंद जैसे लेखक जीवन भर जूझते रहे।
3. व्यवस्था का विरोध: सत्ता, शासन और भ्रष्ट व्यवस्था भी एक 'टीला' है जो सच बोलने वालों के रास्ते में आती है।
4. समझौते का दबाव: समाज और व्यवस्था का वह दबाव जो व्यक्ति को अपने सिद्धांतों से समझौता करने पर मजबूर करता है — यह भी एक 'टीला' है।
निष्कर्ष: प्रेमचंद ने इन सभी 'टीलों' को पार करते हुए अपना जीवन और साहित्य-सृजन जारी रखा। उनके फटे जूते इसी संघर्षमय यात्रा के प्रतीक हैं।
7प्रेमचंद के फटे जूते को आधार बनाकर परसाई जी ने यह व्यंग्य लिखा है। आप भी किसी व्यक्ति की पोशाक को आधार बनाकर एक व्यंग्य लिखिए।Show solution
नेताजी की फोटो अखबार में छपी है। सफेद खादी का चमचमाता कोट, नीचे धोती, पाँव में महँगी चप्पल और हाथ में माला। चेहरे पर ऐसी मुसकान जैसे अभी-अभी जनता का दुख दूर करके आए हों।
मैं सोचता हूँ — यह कोट कितना सफेद है! इतना सफेद कोट तो तभी हो सकता है जब इसे कभी पहना ही न गया हो। या फिर इसे धोने के लिए कोई और हो।
नेताजी, तुम्हारे कोट की सफेदी देखकर मन में एक प्रश्न उठता है — क्या यह सफेदी केवल कपड़े की है या मन की भी? तुम्हारे भाषणों में भी इतनी ही सफेदी होती है — बिल्कुल साफ, बिल्कुल चमकदार, परंतु भीतर से खोखले।
खादी पहनना देशभक्ति का प्रतीक है — यह हम जानते हैं। परंतु जब खादी विदेशी मशीनों पर बनी हो और उसे पहनने वाले का बैंक खाता विदेश में हो, तो यह खादी किस देश की भक्ति करती है?
नेताजी, तुम्हारा यह चमकता कोट मुझे कचोटता है।
8आपकी दृष्टि में वेश-भूषा के प्रति लोगों की सोच में आज क्या परिवर्तन आया है?Show solution
आज के युग में वेश-भूषा के प्रति लोगों की सोच में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं:
1. दिखावे की प्रवृत्ति में वृद्धि: आज लोग वेश-भूषा को अपनी पहचान और प्रतिष्ठा का माध्यम मानते हैं। महँगे ब्रांड के कपड़े पहनना सामाजिक स्तर का प्रतीक बन गया है।
2. व्यक्तित्व से अलगाव: पहले वेश-भूषा व्यक्ति के स्वभाव और विचारों का प्रतिबिंब होती थी, परंतु आज वेश-भूषा और व्यक्तित्व में गहरी खाई आ गई है।
3. पश्चिमी प्रभाव: आज युवा पीढ़ी पर पश्चिमी वेश-भूषा का गहरा प्रभाव है। पारंपरिक पोशाकें पिछड़ेपन का प्रतीक मानी जाने लगी हैं।
4. सोशल मीडिया का प्रभाव: सोशल मीडिया के कारण लोग फोटो के लिए विशेष पोशाक पहनते हैं। 'दिखना' अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है, 'होना' कम।
5. सकारात्मक परिवर्तन: आज लोग अपनी पसंद की पोशाक पहनने में अधिक स्वतंत्र हैं। महिलाओं की वेश-भूषा पर लगे अनेक प्रतिबंध कम हुए हैं।
निष्कर्ष: वेश-भूषा व्यक्ति की बाहरी पहचान है, परंतु असली पहचान उसके विचार और कर्म हैं। प्रेमचंद जैसे महान व्यक्ति इसी सत्य के प्रतीक हैं।
9पाठ में आए मुहावरे छाँटिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।Show solution
1. टोपी न्योछावर होना (किसी के सामने सम्मान खोना / झुकना)
- वाक्य: आज के नेताओं के सामने अनेक विद्वानों की टोपियाँ न्योछावर हो जाती हैं।
2. परदे पर कुर्बान होना (दिखावे के लिए सब कुछ त्याग देना)
- वाक्य: कुछ लोग अपनी झूठी इज्जत बचाने के लिए परदे पर कुर्बान हो जाते हैं।
3. मन कचोटना (मन में पीड़ा या बेचैनी होना)
- वाक्य: गरीब बच्चों को भूखा देखकर मेरा मन कचोटता है।
4. हौसला बढ़ाना (उत्साह और साहस देना)
- वाक्य: गुरुजी के प्रोत्साहन ने मेरा हौसला बढ़ाया।
5. इशारा करना (संकेत करना)
- वाक्य: उसने आँखों से ही मुझे चुप रहने का इशारा किया।
6. खिल्ली उड़ाना (उपहास करना, मज़ाक उड़ाना)
- वाक्य: दूसरों की खिल्ली उड़ाना अच्छी आदत नहीं है।
10प्रेमचंद के व्यक्तित्व को उभारने के लिए लेखक ने जिन विशेषणों का उपयोग किया है उनकी सूची बनाइए।Show solution
लेखक हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व को उभारने के लिए निम्नलिखित विशेषणों का प्रयोग किया है:
| क्र.सं. | विशेषण | संदर्भ |
|---------|---------|--------|
| 1. | महान कथाकार | प्रेमचंद की साहित्यिक महानता के संदर्भ में |
| 2. | फक्कड़ | उनकी लापरवाह और निश्चिंत जीवन-शैली के संदर्भ में |
| 3. | अक्खड़ | उनके स्वाभिमानी और बेबाक स्वभाव के संदर्भ में |
| 4. | बेतरतीब | उनकी वेश-भूषा की असव्यवस्था के संदर्भ में |
| 5. | व्यंग्य-मुसकान वाले | उनके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुसकान के संदर्भ में |
| 6. | साहसी | समाज की बुराइयों से न डरने के संदर्भ में |
विशेष: लेखक ने इन विशेषणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि प्रेमचंद बाहर से भले ही साधारण दिखते थे, परंतु उनका व्यक्तित्व असाधारण था। उनकी सादगी उनकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उनकी शक्ति थी।
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