नमक का दारोगा (प्रेमचंद)
Nagaland Board · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for नमक का दारोगा (प्रेमचंद) — Nagaland Board Class 11 Hindi.
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पाठ के साथ
1कहानी का कौन-सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?Show solution
इस कहानी में वंशीधर का पात्र मुझे सर्वाधिक प्रभावित करता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं—
1. ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा: वंशीधर एक ऐसे युग में जब भ्रष्टाचार सामान्य बात थी, अपने कर्तव्य पर अडिग रहा। उसने धन के लालच में आकर पंडित अलोपीदीन जैसे प्रभावशाली व्यक्ति को नहीं छोड़ा।
2. दबाव में न झुकना: जब पूरा प्रशासन, वकील, भीड़ और यहाँ तक कि उसके अधिकारी भी अलोपीदीन के पक्ष में थे, तब भी वंशीधर ने अपना निर्णय नहीं बदला।
3. नैतिक साहस: नौकरी जाने के बाद भी उसने अपनी ईमानदारी पर पछतावा नहीं किया। यह उसके दृढ़ चरित्र का प्रमाण है।
4. आदर्श का प्रतीक: वह प्रेमचंद के उस आदर्श पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है जो धर्म को धन से ऊँचा मानता है।
इस प्रकार वंशीधर का पात्र ईमानदारी, साहस और नैतिकता का जीवंत उदाहरण है, जो पाठक को गहराई से प्रभावित करता है।
2'नमक का दारोगा' कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के कौन से दो पहलू (पक्ष) उभरकर आते हैं?Show solution
पहला पहलू — धन का दुरुपयोग करने वाला भ्रष्ट व्यक्ति:
अलोपीदीन एक धनी जमींदार हैं जो अपने धन के बल पर कानून को भी खरीद लेते हैं। वे नमक की अवैध तस्करी करते हैं और पकड़े जाने पर अपने वकीलों तथा धन के माध्यम से न्यायालय से बरी हो जाते हैं। उनके लिए न्याय और नीति सब धन के खिलौने हैं। यह पहलू उनके नकारात्मक चरित्र को दर्शाता है।
दूसरा पहलू — ईमानदारी का सम्मान करने वाला विवेकशील व्यक्ति:
कहानी के अंत में अलोपीदीन का दूसरा और सकारात्मक पहलू सामने आता है। वे वंशीधर की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से इतने प्रभावित होते हैं कि उन्हें अपनी सारी संपत्ति का स्थायी मैनेजर नियुक्त करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे बेदाग, ऐसे उज्ज्वल रत्न की उन्हें तलाश थी। यह पहलू उनके विवेक और सच्चे मूल्यों की पहचान को दर्शाता है।
इस प्रकार अलोपीदीन एक जटिल पात्र हैं जिनमें भ्रष्टाचार और ईमानदारी के प्रति सम्मान — दोनों एक साथ विद्यमान हैं।
3कहानी के लगभग सभी पात्र समाज की किसी-न-किसी सच्चाई को उजागर करते हैं। निम्नलिखित पात्रों के संदर्भ में पाठ से उस अंश को उद्धृत करते हुए बताइए कि यह समाज की किस सच्चाई को उजागर करते हैं— (क) वृद्ध मुंशी (ख) वकील (ग) शहर की भीड़Show solution
वृद्ध मुंशी वंशीधर के पिता हैं। वे समाज की उस सच्चाई को उजागर करते हैं जहाँ अनुभवी और बुजुर्ग लोग भी भ्रष्टाचार को जीवन की वास्तविकता मानकर स्वीकार कर लेते हैं। वे अपने पुत्र को सलाह देते हैं—
*"नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।"*
यह अंश समाज की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जहाँ भ्रष्टाचार को न केवल स्वीकार किया जाता है, बल्कि उसे अपनाने की सीख भी दी जाती है। जब वंशीधर ने ईमानदारी दिखाई तो उन्होंने कहा — *"खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।"* यह दर्शाता है कि समाज में शिक्षा का मूल्यांकन भी भ्रष्ट मानदंडों से होता है।
(ख) वकील:
वकील समाज की उस सच्चाई को उजागर करते हैं जहाँ कानून और न्याय भी धन के सामने झुक जाते हैं। अलोपीदीन के पक्ष में वकीलों की पूरी फौज खड़ी हो जाती है। पाठ में उल्लेख है कि अलोपीदीन के पक्ष में शहर के सबसे प्रतिष्ठित वकील थे जो अपनी वाचालता और तर्कों से न्यायालय में सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर देते हैं। यह दर्शाता है कि न्याय व्यवस्था में भी धन का वर्चस्व है और वकील अपनी विद्वत्ता का उपयोग सत्य की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि धनवानों की सेवा के लिए करते हैं।
(ग) शहर की भीड़:
शहर की भीड़ समाज की उस मानसिकता को उजागर करती है जो शक्तिशाली और धनवान व्यक्ति के साथ खड़ी हो जाती है, चाहे वह गलत ही क्यों न हो। पाठ में लिखा है—
*"इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए... प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था।"*
यह अंश दर्शाता है कि समाज में नैतिकता और न्याय की परवाह कम लोगों को होती है। भीड़ अपराधी के प्रति सहानुभूति रखती है क्योंकि वह धनवान और प्रभावशाली है। यह भीड़ की मानसिकता समाज की एक कटु सच्चाई है।
4निम्न पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए— 'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना...' (क) यह किसकी उक्ति है? (ख) मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद क्यों कहा गया है? (ग) क्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हैं?Show solution
यह उक्ति वंशीधर के वृद्ध पिता (वृद्ध मुंशी) की है। जब वंशीधर को नमक विभाग में दारोगा की नौकरी मिलती है, तब उसके पिता उसे विदाई के समय यह व्यावहारिक (किंतु भ्रष्ट) सलाह देते हैं।
(ख) मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद क्यों कहा गया है?
मासिक वेतन को पूर्णमासी के चाँद की उपमा इसलिए दी गई है क्योंकि—
- पूर्णमासी का चाँद महीने में केवल एक बार दिखाई देता है और उसके बाद धीरे-धीरे घटता जाता है और अंततः अमावस्या को लुप्त हो जाता है।
- उसी प्रकार मासिक वेतन भी महीने में एक बार मिलता है और घर-खर्च, परिवार की जरूरतों में खर्च होते-होते महीने के अंत तक समाप्त हो जाता है।
- इस उपमा के माध्यम से वृद्ध मुंशी यह कहना चाहते हैं कि केवल वेतन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, इसलिए 'ऊपरी आय' (रिश्वत) भी लेनी चाहिए।
यह उपमा भाषा की दृष्टि से अत्यंत सटीक और चित्रात्मक है।
(ग) क्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हैं?
नहीं, मैं इस वक्तव्य से सहमत नहीं हूँ। इसके निम्नलिखित कारण हैं—
1. यह वक्तव्य भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करता है। 'ऊपरी आय' वास्तव में रिश्वत है जो अनैतिक और गैरकानूनी है।
2. एक पिता का कर्तव्य है कि वह अपने पुत्र को नैतिक मूल्यों की शिक्षा दे, न कि भ्रष्टाचार की।
3. यदि प्रत्येक व्यक्ति इसी सोच को अपना ले तो समाज में ईमानदारी और न्याय का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
4. वंशीधर ने इस सलाह को नहीं माना और अंत में उसकी ईमानदारी ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनी — यही कहानी का मूल संदेश है।
हालाँकि यह वक्तव्य उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और एक पिता की चिंता को दर्शाता है, फिर भी यह नैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य है।
5'नमक का दारोगा' कहानी के कोई दो अन्य शीर्षक बताते हुए उसके आधार को भी स्पष्ट कीजिए।Show solution
पहला वैकल्पिक शीर्षक — 'धर्म की जीत'
आधार: इस कहानी का मूल संघर्ष धर्म (ईमानदारी, नैतिकता) और धन (भ्रष्टाचार, लालच) के बीच है। पाठ में स्पष्ट लिखा है — *"न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया।"* और अंत में *"धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।"* वंशीधर की ईमानदारी अंततः विजयी होती है — अलोपीदीन उसे मैनेजर नियुक्त करते हैं। अतः 'धर्म की जीत' शीर्षक कहानी के केंद्रीय भाव को पूर्णतः व्यक्त करता है।
दूसरा वैकल्पिक शीर्षक — 'ईमानदारी का पुरस्कार'
आधार: इस कहानी में वंशीधर की ईमानदारी को ही अंततः पुरस्कृत किया जाता है। उसने धन, दबाव और नौकरी जाने के भय के बावजूद अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी। कहानी का अंत इस बात का प्रमाण है कि ईमानदारी का पुरस्कार अवश्य मिलता है — अलोपीदीन ने उसे अपनी सारी संपत्ति का मैनेजर बनाया। अतः 'ईमानदारी का पुरस्कार' शीर्षक भी कहानी के संदेश को सटीक रूप से व्यक्त करता है।
6कहानी के अंत में अलोपीदीन के वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए। आप इस कहानी का अंत किस प्रकार करते?Show solution
1. ईमानदारी में विश्वास: अलोपीदीन एक अनुभवी व्यापारी थे। उन्होंने जीवन में देखा था कि धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है, परंतु वंशीधर ने उनके धन को ठुकरा दिया। ऐसे ईमानदार व्यक्ति पर वे अपनी संपत्ति का भार सौंप सकते थे।
2. व्यावहारिक बुद्धि: अलोपीदीन जानते थे कि जो व्यक्ति उनकी रिश्वत नहीं ले सकता, वह उनकी संपत्ति में भी हेराफेरी नहीं करेगा। एक ईमानदार मैनेजर उनकी संपत्ति की सबसे अच्छी रक्षा कर सकता है।
3. पश्चाताप और सम्मान: अलोपीदीन के मन में वंशीधर के प्रति सम्मान था। उन्होंने स्वयं कहा — *"ऐसे बेदाग, ऐसे उज्ज्वल रत्न की मुझे तलाश थी।"* यह उनके हृदय की सच्ची भावना थी।
4. सामाजिक प्रतिष्ठा: एक ईमानदार मैनेजर रखने से समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ती।
यदि मैं कहानी का अंत करता:
मैं कहानी का अंत इस प्रकार करता — वंशीधर अलोपीदीन का प्रस्ताव स्वीकार करता, परंतु एक शर्त के साथ कि वह अपने काम में पूर्ण स्वतंत्रता और ईमानदारी से काम करेगा और किसी भी अवैध कार्य में भागीदार नहीं बनेगा। अलोपीदीन यह शर्त मान लेते और धीरे-धीरे वंशीधर के प्रभाव से स्वयं भी ईमानदारी की राह पर चलने लगते। इस प्रकार कहानी का अंत केवल व्यक्तिगत विजय तक सीमित न रहकर सामाजिक परिवर्तन का संदेश भी देता।
पाठ के आस-पास
1दारोगा वंशीधर गैरकानूनी कार्यों की वजह से पंडित अलोपीदीन को गिरफ्तार करता है, लेकिन कहानी के अंत में इसी पंडित अलोपीदीन की सहृदयता पर मुग्ध होकर उसके यहाँ मैनेजर की नौकरी को तैयार हो जाता है। आपके विचार से वंशीधर का ऐसा करना उचित था? आप उसकी जगह होते तो क्या करते?Show solution
वंशीधर का यह निर्णय एक जटिल प्रश्न उठाता है। एक दृष्टि से यह उचित प्रतीत होता है क्योंकि—
- अलोपीदीन ने वंशीधर की ईमानदारी को सच्चे मन से सम्मान दिया।
- वंशीधर के पास परिवार की जिम्मेदारी थी और नौकरी जाने के बाद उसे आजीविका की आवश्यकता थी।
- मैनेजर के पद पर रहकर वह ईमानदारी से काम कर सकता था।
परंतु दूसरी दृष्टि से यह प्रश्नास्पद भी है क्योंकि—
- जिस व्यक्ति को उसने अपराधी मानकर गिरफ्तार किया, उसी के यहाँ नौकरी करना एक नैतिक विरोधाभास है।
- इससे यह संदेश जा सकता है कि धनवान व्यक्ति अंततः सब कुछ अपने पक्ष में कर लेता है।
यदि मैं वंशीधर की जगह होता:
मैं भी संभवतः यह नौकरी स्वीकार करता, परंतु स्पष्ट शर्तों के साथ। मैं अलोपीदीन से कहता कि मैं केवल ईमानदारी और नैतिकता के दायरे में काम करूँगा। यदि कभी मुझे किसी अवैध कार्य में भाग लेने को कहा गया तो मैं तुरंत नौकरी छोड़ दूँगा। इस प्रकार मैं अपने आत्मसम्मान और नैतिकता को बनाए रखते हुए परिवार की जिम्मेदारी भी निभाता।
2नमक विभाग के दारोगा पद के लिए बड़ों-बड़ों का जी ललचाता था। वर्तमान समाज में ऐसा कौन-सा पद होगा जिसे पाने के लिए लोग लालायित रहते होंगे और क्यों?Show solution
1. सरकारी अधिकारी (IAS/IPS): इन पदों पर व्यापक अधिकार, सामाजिक प्रतिष्ठा और सुरक्षित भविष्य होता है। इन पदों पर रहते हुए कुछ लोग अपने प्रभाव का दुरुपयोग भी करते हैं।
2. नगर निगम/पंचायत के पद: इन पदों पर ठेके, परमिट और लाइसेंस देने का अधिकार होता है, जिससे 'ऊपरी आय' की संभावना रहती है।
3. राजनीतिक पद (विधायक/सांसद): इन पदों पर सत्ता, धन और प्रतिष्ठा तीनों मिलती हैं।
लोग इन पदों के लिए लालायित क्यों रहते हैं:
- इन पदों पर नियमित वेतन के अतिरिक्त अन्य सुविधाएँ और अधिकार मिलते हैं।
- सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभाव मिलता है।
- कुछ लोग इन पदों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए करते हैं।
यह स्थिति दर्शाती है कि प्रेमचंद की कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
3अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि जब आपके तर्कों ने आपके भ्रम को पुष्ट किया हो।Show solution
एक बार परीक्षा की तैयारी के दौरान मुझे लगा कि एक विशेष अध्याय परीक्षा में नहीं आएगा क्योंकि पिछले वर्षों में उससे प्रश्न नहीं पूछे गए थे। मैंने अपने इस भ्रम को तर्कों से पुष्ट किया — 'पिछले तीन वर्षों में यह अध्याय नहीं आया', 'शिक्षक ने भी इस पर कम ध्यान दिया', 'यह अध्याय कठिन है इसलिए परीक्षक इसे नहीं पूछेंगे।' इन सभी तर्कों ने मेरे भ्रम को और मजबूत किया और मैंने वह अध्याय नहीं पढ़ा। परीक्षा में उसी अध्याय से प्रश्न आया और मैं उत्तर नहीं दे सका।
इस अनुभव से मुझे समझ आया कि जब हम किसी निष्कर्ष पर पहले से पहुँच जाते हैं, तो हमारा मन उसी के पक्ष में तर्क ढूँढने लगता है। यही 'तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया' का अर्थ है।
4'पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।' वृद्ध मुंशी जी द्वारा यह बात एक विशिष्ट संदर्भ में कही गई थी। अपने निजी अनुभवों के आधार पर बताइए— (क) जब आपको पढ़ना-लिखना व्यर्थ लगा हो। (ख) जब आपको पढ़ना-लिखना सार्थक लगा हो। (ग) 'पढ़ना-लिखना' को किस अर्थ में प्रयुक्त किया गया होगा : साक्षरता अथवा शिक्षा?Show solution
एक बार जब मैंने बहुत परिश्रम से परीक्षा की तैयारी की, परंतु परीक्षा में प्रश्नपत्र अपेक्षा से अलग आया और परिणाम अच्छा नहीं रहा, तब ऐसा लगा कि इतनी मेहनत व्यर्थ गई। इसी प्रकार जब कभी देखते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोग अनुचित तरीकों से अधिक सफल हो जाते हैं, तब भी पढ़ाई व्यर्थ लगती है।
(ख) जब पढ़ना-लिखना सार्थक लगा:
जब किसी कठिन समस्या का समाधान अपने ज्ञान और विवेक से किया, जब किसी को सही जानकारी देकर उसकी मदद की, जब किसी प्रतियोगिता में सफलता मिली — तब पढ़ाई सार्थक लगी। शिक्षा ने न केवल रोजगार दिलाया बल्कि सही-गलत की पहचान करने की शक्ति भी दी।
(ग) 'पढ़ना-लिखना' का अर्थ — साक्षरता या शिक्षा:
वृद्ध मुंशी के संदर्भ में 'पढ़ना-लिखना' का अर्थ शिक्षा से है, न कि केवल साक्षरता से। वे यह कह रहे थे कि इतनी शिक्षा पाकर भी वंशीधर ने व्यावहारिक बुद्धि नहीं सीखी — रिश्वत लेना नहीं सीखा।
साक्षरता और शिक्षा में अंतर: साक्षरता का अर्थ है पढ़ने-लिखने की क्षमता, जबकि शिक्षा का अर्थ है ज्ञान, विवेक, नैतिकता और जीवन-मूल्यों का विकास। ये दोनों समान नहीं हैं। एक व्यक्ति साक्षर हो सकता है परंतु शिक्षित नहीं, और कभी-कभी एक अनपढ़ व्यक्ति भी अपने अनुभव और विवेक से शिक्षित व्यक्ति से अधिक समझदार हो सकता है।
5'लड़कियाँ हैं, वह घास-फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं।' वाक्य समाज में लड़कियों की स्थिति की किस वास्तविकता को प्रकट करता है?Show solution
1. उपेक्षा और तुच्छता का भाव: 'घास-फूस' की उपमा दर्शाती है कि उस समय के समाज में लड़कियों को महत्त्वहीन और बोझ समझा जाता था। जैसे घास-फूस अपने आप उगती है और उस पर कोई ध्यान नहीं देता, वैसे ही लड़कियों की परवरिश पर ध्यान नहीं दिया जाता था।
2. दहेज की समस्या: वृद्ध मुंशी के लिए लड़कियों का बढ़ना आर्थिक बोझ का बढ़ना था क्योंकि उन्हें दहेज देकर विदा करना होता था।
3. लिंग-भेद: यह वाक्य पितृसत्तात्मक समाज की उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ लड़कों को संपत्ति और लड़कियों को बोझ माना जाता था।
4. आज की स्थिति: यद्यपि आज समाज में काफी परिवर्तन आया है और लड़कियाँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, फिर भी कुछ स्थानों पर यह मानसिकता अभी भी विद्यमान है।
यह वाक्य प्रेमचंद की सामाजिक चेतना का प्रमाण है — वे इस मानसिकता की आलोचना करते हैं।
6'इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए...' अपने आस-पास अलोपीदीन जैसे व्यक्तियों को देखकर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?Show solution
1. दुख और निराशा: जब समाज किसी अपराधी के प्रति इसलिए सहानुभूति रखता है क्योंकि वह धनवान है, तो यह न्याय व्यवस्था और सामाजिक मूल्यों के पतन का संकेत है। यह देखकर मन में गहरी निराशा होती है।
2. क्रोध: जब ईमानदार व्यक्ति को दंड मिलता है और भ्रष्ट व्यक्ति को सहानुभूति — यह अन्याय क्रोध उत्पन्न करता है।
3. सजगता: ऐसे व्यक्तियों को देखकर मैं सजग रहूँगा कि उनके प्रभाव में न आऊँ और उनके अवैध कार्यों में सहयोग न करूँ।
4. सकारात्मक प्रयास: मैं अपने स्तर पर ईमानदारी का समर्थन करूँगा और यदि संभव हो तो ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध उचित कानूनी मार्ग अपनाऊँगा।
5. सामाजिक जागरूकता: समाज को यह समझाने का प्रयास करूँगा कि धन और शक्ति के आधार पर किसी के अपराध को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
प्रेमचंद का यह अंश आज भी उतना ही प्रासंगिक है — धनवान और प्रभावशाली लोगों के प्रति समाज की यह अंध-सहानुभूति एक गंभीर सामाजिक समस्या है।
समझाइए तो ज़रा
1नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर की मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति में वृद्ध मुंशी अपने पुत्र को भ्रष्टाचार की व्यावहारिक शिक्षा दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि नौकरी में पद (ओहदे) का महत्त्व नहीं है — पद तो पीर की मजार की तरह है जो केवल दिखावे के लिए है। असली महत्त्व तो उस पर चढ़ावे और चादर का है अर्थात् उस पद से मिलने वाली रिश्वत और अवैध आय का है।
भाव: इस उक्ति का भाव यह है कि नौकरी में वेतन से अधिक महत्त्वपूर्ण 'ऊपरी आय' (रिश्वत) है। जैसे लोग पीर की मजार पर चढ़ावा चढ़ाते हैं, उसी प्रकार नौकरी में भी लोग अधिकारियों को रिश्वत देते हैं — इसी पर ध्यान देना चाहिए।
आलोचनात्मक दृष्टि: यह उक्ति भ्रष्टाचार को सामान्य और स्वाभाविक बताती है जो नैतिक दृष्टि से अत्यंत निंदनीय है। यह उस समाज की विकृत मानसिकता का प्रतीक है।
2इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुद्धि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलंबन ही अपना सहायक था।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति में लेखक ने वंशीधर की मनोस्थिति और उसके जीवन-दर्शन को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। जब वंशीधर के पास न धन था, न सहायक, न कोई सहारा — तब उसके पास तीन शक्तियाँ थीं:
1. धैर्य — मित्र के रूप में: कठिन परिस्थितियों में धैर्य ही सच्चा मित्र होता है। धैर्य ने उसे टूटने नहीं दिया।
2. बुद्धि — पथप्रदर्शक के रूप में: बुद्धि ने उसे सही-गलत का निर्णय करने में सहायता की और उसे सही मार्ग दिखाया।
3. आत्मावलंबन — सहायक के रूप में: स्वयं पर निर्भर रहना ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी। उसने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया।
भाव: यह पंक्ति जीवन का एक महत्त्वपूर्ण संदेश देती है — विपत्ति में धैर्य, बुद्धि और आत्मनिर्भरता ही मनुष्य के सच्चे साथी होते हैं।
3तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति का अर्थ है कि जब मनुष्य के मन में पहले से कोई भ्रम (गलत धारणा) होती है, तो वह उसी के पक्ष में तर्क ढूँढने लगता है। तर्क सत्य को खोजने के बजाय भ्रम को और मजबूत कर देते हैं।
इस कहानी के संदर्भ में — जब वंशीधर के मन में यह भ्रम था कि अलोपीदीन जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति इतना बड़ा अपराध नहीं कर सकते, तो उसका मन तर्क देने लगा — 'इतने बड़े आदमी को क्यों गिरफ्तार करूँ', 'शायद कोई गलतफहमी हो।' इस प्रकार तर्क ने उसके भ्रम को और पुष्ट किया।
व्यापक अर्थ: यह मानव मनोविज्ञान की एक सच्चाई है — हम प्रायः वही देखते और सुनते हैं जो हम देखना-सुनना चाहते हैं, और अपने पूर्वाग्रहों को तर्कों से सही ठहराते हैं।
4न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति में लेखक ने धन (लक्ष्मी) की सर्वशक्तिमानता पर व्यंग्य किया है। 'खिलौने' और 'नचाना' शब्दों के प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि—
- न्याय और नीति — जो समाज के सबसे पवित्र और आदर्श मूल्य माने जाते हैं — वे भी धन के सामने असहाय हो जाते हैं।
- लक्ष्मी (धन) — एक कठपुतली की डोर की तरह न्याय और नीति को अपनी इच्छानुसार नचाती है।
भाव: यह पंक्ति समाज की उस कटु सच्चाई को उजागर करती है जहाँ धनवान व्यक्ति कानून और न्याय को भी अपने पक्ष में मोड़ सकता है। यह एक तीखा व्यंग्य है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
आलोचना: लेखक इस स्थिति को स्वीकार नहीं करते, बल्कि इसकी आलोचना करते हैं और वंशीधर के माध्यम से यह दिखाते हैं कि धर्म अंततः धन पर विजय पाता है।
5दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति में एक अत्यंत सटीक और चित्रात्मक विरोधाभास (विरोधाभास अलंकार) का प्रयोग किया गया है—
- 'दुनिया सोती थी' — शारीरिक रूप से लोग सो रहे थे, रात का अंधेरा था, सब शांत था।
- 'दुनिया की जीभ जागती थी' — परंतु लोगों की जिज्ञासा, गपशप और चर्चा कभी नहीं सोती। घटना की खबर फैलती रही।
भाव: यह पंक्ति मानव स्वभाव की एक सच्चाई को उजागर करती है — लोग चाहे कितने भी थके हों, दूसरों के बारे में बात करने और जानने की उनकी उत्सुकता कभी नहीं थकती। समाज में अफवाहें और खबरें रात को भी फैलती रहती हैं।
भाषा की दृष्टि से यह पंक्ति प्रेमचंद की शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
6खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।Show solution
व्याख्या:
वृद्ध मुंशी की दृष्टि में 'पढ़ना-लिखना' का उद्देश्य था — व्यावहारिक बुद्धि प्राप्त करना, अर्थात् यह सीखना कि कैसे धन कमाया जाए, कैसे प्रभावशाली लोगों से संबंध बनाए जाएँ और कैसे 'ऊपरी आय' प्राप्त की जाए।
जब वंशीधर ने इसके विपरीत ईमानदारी का मार्ग चुना, तो पिता को लगा कि उनके पुत्र की सारी शिक्षा व्यर्थ हो गई क्योंकि उसने 'व्यावहारिक' बुद्धि नहीं सीखी।
व्यंग्य: प्रेमचंद इस उक्ति के माध्यम से समाज पर गहरा व्यंग्य करते हैं। जो पिता अपने पुत्र की ईमानदारी पर खेद प्रकट करे — यह उस समाज की विकृत मानसिकता का प्रतीक है जहाँ भ्रष्टाचार को 'व्यावहारिकता' और ईमानदारी को 'मूर्खता' माना जाता है।
वास्तविक अर्थ: वास्तव में वंशीधर की शिक्षा सार्थक थी क्योंकि उसने उसे नैतिक साहस और कर्तव्यनिष्ठा दी।
7धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति में दो प्रतीकों का सुंदर प्रयोग किया गया है—
- धर्म — यहाँ धर्म का अर्थ धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि नैतिकता, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और सत्य का पालन है। वंशीधर इसका प्रतीक है।
- धन — यहाँ धन भ्रष्टाचार, लालच और अनैतिक शक्ति का प्रतीक है। अलोपीदीन इसका प्रतीक है।
भाव: जब वंशीधर ने अलोपीदीन की रिश्वत ठुकराई और उन्हें गिरफ्तार किया, तो यह धर्म (नैतिकता) की धन (भ्रष्टाचार) पर विजय थी। 'पैरों तले कुचलना' एक शक्तिशाली बिंब है जो यह दर्शाता है कि ईमानदारी ने भ्रष्टाचार को पूरी तरह पराजित किया।
संदेश: यह पंक्ति कहानी के केंद्रीय संदेश को व्यक्त करती है — अंततः नैतिकता और ईमानदारी की विजय होती है।
8न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति में युद्ध की रूपक (metaphor) का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग किया गया है—
- 'न्याय का मैदान' — न्यायालय को युद्ध के मैदान की उपमा दी गई है जहाँ दो शक्तियाँ आमने-सामने हैं।
- 'धर्म' — वंशीधर की ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिकता।
- 'धन' — अलोपीदीन का धन, उनके वकील, उनका प्रभाव और भ्रष्ट व्यवस्था।
- 'युद्ध ठन गया' — यह मुहावरा दर्शाता है कि संघर्ष अत्यंत तीव्र और निर्णायक था।
भाव: यह पंक्ति कहानी के केंद्रीय द्वंद्व को अत्यंत नाटकीय और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। न्यायालय केवल कानूनी लड़ाई का स्थान नहीं, बल्कि नैतिकता और भ्रष्टाचार के बीच के महायुद्ध का रणक्षेत्र बन जाता है।
भाषा-सौंदर्य: 'ठन गया' मुहावरे का प्रयोग भाषा को जीवंत और प्रभावशाली बनाता है।
भाषा की बात
1भाषा की चित्रात्मकता, लोकोक्तियों और मुहावरों के जानदार उपयोग तथा हिंदी-उर्दू के साझा रूप एवं बोलचाल की भाषा के लिहाज से यह कहानी अद्भुत है। कहानी में से ऐसे उदाहरण छाँटकर लिखिए और यह भी बताइए कि इनके प्रयोग से किस तरह कहानी का कथ्य अधिक असरदार बना है?Show solution
1. *"मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।"* — यह उपमा वेतन की अस्थायी प्रकृति को अत्यंत सजीव रूप से चित्रित करती है।
2. *"ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।"* — यह बिंब रिश्वत की निरंतरता को दर्शाता है।
3. *"दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी।"* — यह विरोधाभास समाज की जिज्ञासु प्रकृति को चित्रित करता है।
मुहावरों और लोकोक्तियों के उदाहरण:
1. *"पीर का मजार"* — भ्रष्टाचार को धार्मिक रूपक से समझाना।
2. *"धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला"* — नैतिकता की विजय का प्रभावशाली चित्रण।
3. *"न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया"* — संघर्ष का नाटकीय चित्रण।
हिंदी-उर्दू के साझा रूप के उदाहरण:
1. *तजवीज, मुख्तार, अमले, अरदली, बरकंदाज* — उर्दू शब्द
2. *सदाब्रत, धर्म, आत्मावलंबन* — संस्कृत-हिंदी शब्द
3. *ऊपरी आय, चढ़ावा, चादर* — बोलचाल के शब्द
प्रभाव: इन प्रयोगों से कहानी का कथ्य अधिक असरदार बना है क्योंकि—
- चित्रात्मक भाषा पाठक के मन में जीवंत दृश्य उत्पन्न करती है।
- मुहावरे और लोकोक्तियाँ जटिल विचारों को सरल और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करते हैं।
- हिंदी-उर्दू का मिश्रण कहानी को उस युग की वास्तविकता के निकट लाता है।
2कहानी में मासिक वेतन के लिए किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया गया है? इसके लिए आप अपनी ओर से दो-दो विशेषण और बताइए। साथ ही विशेषणों के आधार को तर्क सहित पुष्ट कीजिए।Show solution
कहानी में मासिक वेतन के लिए निम्नलिखित विशेषण/उपमाएँ प्रयुक्त हुई हैं—
1. पूर्णमासी का चाँद — जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।
2. अस्थायी/क्षणिक — (निहित अर्थ में) जो टिकता नहीं।
अपनी ओर से दो विशेषण:
पहला विशेषण — 'बुझती हुई मोमबत्ती':
मासिक वेतन बुझती हुई मोमबत्ती की तरह है — जैसे मोमबत्ती जलते-जलते धीरे-धीरे घटती जाती है और अंत में बुझ जाती है, उसी प्रकार वेतन भी महीने के खर्चों में धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। यह उपमा वेतन की क्षणभंगुरता को दर्शाती है।
दूसरा विशेषण — 'बरसाती नदी':
मासिक वेतन बरसाती नदी की तरह है — जैसे बरसाती नदी में वर्षा के समय पानी आता है और फिर सूख जाती है, उसी प्रकार वेतन महीने में एक बार आता है और जल्दी ही समाप्त हो जाता है। यह उपमा वेतन की अनिश्चितता और अपर्याप्तता को दर्शाती है।
3(क) बाबूजी आशीर्वाद! (ख) सरकारी हुक्म! (ग) दातागंज के! (घ) कानपुर! — दी गई विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक निश्चित संदर्भ में निश्चित अर्थ देती हैं। संदर्भ बदलते ही अर्थ भी परिवर्तित हो जाता है। अब आप किसी अन्य संदर्भ में इन भाषिक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते हुए समझाइए।Show solution
(क) बाबूजी आशीर्वाद!
मूल संदर्भ: कहानी में यह अभिव्यक्ति तब आती है जब अलोपीदीन वंशीधर से मिलते हैं और उसे प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।
नया संदर्भ: एक छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने के बाद अपने शिक्षक के पास जाता है और कहता है — *"बाबूजी आशीर्वाद!"* — यहाँ इसका अर्थ है कि वह शिक्षक का आशीर्वाद और सहानुभूति चाहता है ताकि उसे पास कर दिया जाए।
(ख) सरकारी हुक्म!
मूल संदर्भ: कहानी में यह तब कहा जाता है जब वंशीधर अलोपीदीन की गाड़ियाँ रोकता है।
नया संदर्भ: एक दुकानदार से जब कोई ग्राहक कहता है — *"सरकारी हुक्म है कि इस वस्तु की कीमत इतनी ही होगी"* — तो यहाँ इसका अर्थ है कि सरकार ने मूल्य नियंत्रण का आदेश दिया है।
(ग) दातागंज के!
मूल संदर्भ: कहानी में यह किसी स्थान-विशेष के संदर्भ में प्रयुक्त है।
नया संदर्भ: जब कोई व्यक्ति किसी अपरिचित से पूछता है — *"आप कहाँ के हैं?"* और वह उत्तर देता है — *"दातागंज के!"* — तो यह उसकी पहचान और मूल स्थान को दर्शाता है।
(घ) कानपुर!
मूल संदर्भ: कहानी में यह उस स्थान का नाम है जहाँ नमक भेजा जा रहा था।
नया संदर्भ: रेलवे स्टेशन पर एक यात्री से पूछा जाता है — *"आप कहाँ जा रहे हैं?"* और वह उत्तर देता है — *"कानपुर!"* — यहाँ यह उसके गंतव्य स्थान को दर्शाता है।
निष्कर्ष: इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भाषिक अभिव्यक्तियाँ संदर्भ के अनुसार अपना अर्थ बदलती हैं। यही भाषा की लचीलापन और समृद्धि है।
चर्चा करें
1इस कहानी को पढ़कर बड़ी-बड़ी डिग्रियों, न्याय और विद्वत्ता के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? वर्तमान समय को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर शिक्षकों के साथ एक परिचर्चा आयोजित करें।Show solution
डिग्रियों के बारे में:
इस कहानी को पढ़कर यह धारणा बनती है कि बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ व्यक्ति को नैतिक नहीं बनातीं। वकीलों ने अपनी विद्वत्ता का उपयोग सत्य की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि एक अपराधी को बचाने के लिए किया। वृद्ध मुंशी ने पढ़ाई को भ्रष्टाचार सीखने का माध्यम माना। इससे यह प्रश्न उठता है — क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना है या नैतिक मूल्यों का विकास करना?
न्याय के बारे में:
कहानी दर्शाती है कि न्याय व्यवस्था भी धन के प्रभाव से मुक्त नहीं है। अलोपीदीन अपने धन से न्यायालय में जीत जाते हैं। वर्तमान समय में भी यह प्रश्न प्रासंगिक है — क्या न्याय सबके लिए समान है?
विद्वत्ता के बारे में:
विद्वत्ता का उपयोग समाज की भलाई के लिए होना चाहिए। परंतु जब विद्वान लोग अपनी विद्वत्ता का उपयोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए करते हैं, तो वह विद्वत्ता व्यर्थ है।
वर्तमान संदर्भ:
आज भी हम देखते हैं कि उच्च शिक्षित लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इसलिए शिक्षा में नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। डिग्री से अधिक महत्त्वपूर्ण है — चरित्र का निर्माण।
निष्कर्ष: वंशीधर का उदाहरण यह सिद्ध करता है कि सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति को नैतिक साहस और कर्तव्यनिष्ठा प्रदान करे।
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