आत्मपरिचय | एक गीत
Odisha Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for आत्मपरिचय | एक गीत — Odisha Board Class 12 Hindi.
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Get startedआत्मपरिचय | एक गीत — अभ्यास
1कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ— विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?Show solution
आशय एवं स्पष्टीकरण:
ये दोनों कथन वास्तव में विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि कवि की जीवन-दृष्टि के दो पहलुओं को उजागर करते हैं।
- पहला कथन — 'जग-जीवन का भार लिए घूमना' — इसका अर्थ है कि कवि संसार के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद और जीवन की समस्त अनुभूतियों को अपने हृदय में समेटे हुए चलता है। वह जीवन की वास्तविकताओं से पूरी तरह परिचित है और उनसे प्रभावित भी होता है।
- दूसरा कथन — 'जग का ध्यान न करना' — इसका अर्थ है कि कवि संसार की परवाह नहीं करता, अर्थात् वह लोक-लाज, सामाजिक मान-मर्यादा और सांसारिक बंधनों की चिंता नहीं करता। वह स्वच्छंद और निर्भीक होकर जीता है।
निष्कर्ष: कवि संसार में रहते हुए उसके दुःख-दर्द को महसूस तो करता है, किंतु सांसारिक मोह-माया और लोक-दिखावे से स्वयं को मुक्त रखता है। यही उसकी विशिष्ट जीवन-शैली है — संसार में रहकर भी उससे अलिप्त रहना।
2जहाँ पर दाना रहते हैं, वहाँ नादान भी होते हैं— कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?Show solution
प्रयुक्त अवधारणा: संसार में विरोधों का सह-अस्तित्व — जहाँ ज्ञान है, वहाँ अज्ञान भी है; जहाँ प्रकाश है, वहाँ अंधकार भी है।
व्याख्या:
कवि ने यह पंक्ति इसलिए कही होगी क्योंकि —
1. संसार की विरोधात्मक प्रकृति: इस संसार में ज्ञानी (दाना) और अज्ञानी (नादान) दोनों साथ-साथ रहते हैं। यह सृष्टि का नियम है।
2. कवि की अपनी स्थिति: कवि स्वयं को प्रेम के मामले में 'नादान' मानता है। वह जानता है कि प्रेम में बुद्धि और विवेक काम नहीं आते — प्रेमी हमेशा दीवाना (नादान) होता है।
3. व्यंग्यात्मक भाव: जो लोग स्वयं को 'दाना' (समझदार) समझते हैं और कवि के प्रेम को मूर्खता कहते हैं, वे भी कहीं न कहीं 'नादान' हैं — क्योंकि वे प्रेम की गहराई को नहीं समझ पाते।
निष्कर्ष: कवि का आशय है कि समझदारी और नासमझी साथ-साथ चलती हैं। प्रेम में डूबा कवि भले ही 'नादान' दिखे, किंतु उसकी यही नादानी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
3मैं और, और जग और कहाँ का नाता— पंक्ति में और शब्द की विशेषता बताइए।Show solution
और शब्द की विशेषता:
इस पंक्ति में 'और' शब्द तीन बार आया है और तीनों बार इसका अर्थ अलग-अलग है — यही इस शब्द की सबसे बड़ी विशेषता है:
| क्रम | प्रयोग | अर्थ |
|------|--------|------|
| पहला | 'मैं और' | अलग / भिन्न |
| दूसरा | 'और जग' | तथा / एवं (समुच्चयबोधक) |
| तीसरा | 'जग और' | अलग / भिन्न |
विस्तृत स्पष्टीकरण:
- पहला 'और' — 'मैं और' अर्थात् 'मैं अलग हूँ', 'मैं भिन्न हूँ' — यहाँ 'और' विशेषण की तरह प्रयुक्त है जिसका अर्थ है 'अलग' या 'दूसरा'।
- दूसरा 'और' — 'और जग' अर्थात् 'तथा संसार' — यहाँ 'और' समुच्चयबोधक अव्यय है।
- तीसरा 'और' — 'जग और' अर्थात् 'संसार भी अलग है' — यहाँ भी 'और' का अर्थ 'भिन्न' है।
काव्य-सौंदर्य: एक ही शब्द का तीन भिन्न अर्थों में प्रयोग यमक अलंकार की झलक देता है। इससे पंक्ति में संगीतात्मकता और अर्थ-गाम्भीर्य दोनों उत्पन्न होते हैं।
भाव: कवि और संसार के बीच कोई संबंध नहीं है — दोनों एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं।
4शीतल वाणी में आग— के होने का क्या अभिप्राय है?Show solution
अलंकार: यह विरोधाभास अलंकार का सुंदर उदाहरण है — शीतल (ठंडी) और आग (गर्म) परस्पर विरोधी हैं।
अभिप्राय:
कवि हरिवंशराय बच्चन के कहने का आशय है कि उनकी कविता और वाणी ऊपर से देखने में शांत, मधुर और कोमल लगती है, किंतु उसके भीतर एक तीव्र आग धधकती है —
1. प्रेम की आग: कवि के हृदय में प्रेम की जो पीड़ा और तड़प है, वह उनकी वाणी में छिपी हुई है। बाहर से वाणी शीतल लगती है, परंतु भीतर से वह प्रेम-विरह की अग्नि से दहकती है।
2. विद्रोह की आग: कवि की वाणी में सामाजिक रूढ़ियों और बंधनों के विरुद्ध एक विद्रोह की भावना भी है। यह विद्रोह शांत स्वर में व्यक्त होता है, इसलिए 'शीतल वाणी में आग' है।
3. जीवन-दर्शन की गहराई: कवि की बातें सुनने में सरल और मधुर लगती हैं, परंतु उनमें जीवन के गहरे सत्य और दर्शन की ऊष्मा विद्यमान है।
निष्कर्ष: 'शीतल वाणी में आग' का अभिप्राय है — बाहर से शांत और मधुर, परंतु भीतर से प्रेम, पीड़ा और विद्रोह की ज्वाला से भरी हुई कविता।
5बच्चे किस बात की आशा में नींदों से झाँक रहे होंगे?Show solution
व्याख्या:
कविता में संध्या का समय है और दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। इस संदर्भ में बच्चे नींदों से झाँक रहे हैं — अर्थात् वे अर्ध-निद्रा की अवस्था में हैं और किसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
बच्चों की आशा:
बच्चे अपने पिता (या घर के किसी प्रिय सदस्य) के घर लौटने की आशा में नींदों से झाँक रहे होंगे। दिन भर काम पर गए पिता की राह देखते-देखते बच्चों को नींद आ गई है, परंतु उनके मन में यह आशा है कि पिता आएंगे, उन्हें प्यार करेंगे, उनसे मिलेंगे।
भावार्थ:
- बच्चों का यह इंतजार निश्छल प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक है।
- यह दृश्य घर की ऊष्मा और पारिवारिक प्रेम को दर्शाता है।
- इसी प्रेम और आत्मीयता के कारण पथिक (कवि) के कदम तेज हो जाते हैं और वह जल्दी घर पहुँचना चाहता है।
निष्कर्ष: बच्चे अपने प्रिय परिजन (पिता/माता) के घर लौटने की आशा में नींद में भी सजग हैं — यह दृश्य पारिवारिक प्रेम और अपेक्षा का मार्मिक चित्रण है।
6दिन जल्दी-जल्दी ढलता है—की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?Show solution
आवृत्ति से प्रकट होने वाली विशेषताएँ:
1. संगीतात्मकता (गेयता):
किसी पंक्ति की आवृत्ति कविता को गीत का रूप देती है। यह पंक्ति 'टेक' (Refrain) की तरह प्रयुक्त हुई है जो कविता को लयबद्ध और संगीतमय बनाती है।
2. समय की क्षणभंगुरता का बोध:
पंक्ति की बार-बार आवृत्ति इस भाव को और गहरा करती है कि समय बहुत तेजी से बीत रहा है। जीवन क्षणिक है और हर पल बीतता जा रहा है।
3. व्यग्रता और त्वरा का भाव:
'जल्दी-जल्दी' शब्द की पुनरावृत्ति और पूरी पंक्ति की आवृत्ति मिलकर एक बेचैनी और जल्दी का भाव उत्पन्न करती है — मानो पथिक को घर पहुँचने की जल्दी है।
4. भावात्मक तीव्रता:
आवृत्ति से भाव की तीव्रता बढ़ती है। पाठक/श्रोता के मन पर यह भाव गहराई से अंकित हो जाता है कि समय रुकता नहीं।
5. अनुप्रास और संगीत-सौंदर्य:
'जल्दी-जल्दी' में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है जो कविता के संगीत-सौंदर्य को बढ़ाता है।
निष्कर्ष: इस पंक्ति की आवृत्ति से कविता की गेयता, संगीतात्मकता, भावात्मक तीव्रता और समय की क्षणभंगुरता का पता चलता है।
7कविता के आसपास: संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?Show solution
उत्तर:
कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता 'आत्मपरिचय' हमें यह सिखाती है कि जीवन में कष्ट अनिवार्य हैं, परंतु उनके बीच भी खुशी और मस्ती का माहौल पैदा किया जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं —
1. जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण:
कष्टों को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार करने से मन हल्का होता है। जो होना है, वह होगा — इस भाव से जीने पर मस्ती आती है।
2. प्रेम और आत्मीयता:
परिवार, मित्रों और प्रियजनों के साथ प्रेम और आत्मीयता बनाए रखने से कष्ट कम लगते हैं। बच्चों की मुस्कान, प्रियजनों का साथ — ये सब जीवन में खुशी भरते हैं।
3. कला, संगीत और साहित्य:
कविता, संगीत, चित्रकला आदि में मन लगाने से कष्टों का बोझ हल्का होता है। कवि स्वयं अपनी कविता के माध्यम से दुःख को मस्ती में बदलता है।
4. वर्तमान में जीना:
भूत की चिंता और भविष्य के भय को छोड़कर वर्तमान क्षण में जीने से जीवन आनंदमय बनता है।
5. निस्संगता और स्वतंत्रता:
सांसारिक मोह-माया और लोक-लाज की परवाह न करके स्वच्छंद जीवन जीने से मस्ती का भाव उत्पन्न होता है — जैसा कवि बच्चन करते हैं।
निष्कर्ष: कष्टों को जीवन की परीक्षा मानकर, प्रेम और सकारात्मकता के साथ जीने से संसार में खुशी और मस्ती का माहौल पैदा किया जा सकता है।
8आपसदारी: जयशंकर प्रसाद की 'आत्मकथ्य' कविता और पाठ में दी गई 'आत्मपरिचय' कविता में क्या संबंध दिखाई देता है? चर्चा करें।Show solution
दोनों कविताओं में समानताएँ:
1. आत्म-अभिव्यक्ति का स्वर:
दोनों कविताएँ कवियों की आत्म-अभिव्यक्ति हैं। दोनों अपने जीवन, अपनी पीड़ा और अपने अनुभवों को काव्य के माध्यम से व्यक्त करते हैं।
2. संसार से अलगाव का भाव:
- बच्चन कहते हैं — 'मैं और, और जग और, कहाँ का नाता' — वे संसार से अपनी भिन्नता स्वीकार करते हैं।
- प्रसाद कहते हैं — 'क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ' — वे भी संसार से कटे हुए और मौन रहना पसंद करते हैं।
3. आत्मकथा कहने में संकोच:
- प्रसाद स्पष्ट रूप से आत्मकथा कहने से बचते हैं — 'छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?'
- बच्चन भी अपनी पीड़ा को सीधे नहीं कहते, बल्कि प्रतीकों और रूपकों में व्यक्त करते हैं।
4. व्यथा और पीड़ा:
दोनों कवियों के जीवन में गहरी पीड़ा है। प्रसाद की 'मौन व्यथा' और बच्चन की 'शीतल वाणी में आग' — दोनों भीतरी दर्द को व्यक्त करते हैं।
दोनों में अंतर:
| आत्मपरिचय (बच्चन) | आत्मकथ्य (प्रसाद) |
|---------------------|--------------------|
| कवि मस्ती और निर्भीकता से जीता है | कवि संकोच और मौन को प्राथमिकता देता है |
| जीवन का भार उठाकर भी प्रसन्न है | थकान और विषाद अधिक है |
| संसार की परवाह नहीं करता | दूसरों की सुनना पसंद करता है |
निष्कर्ष: दोनों कविताओं में आत्म-अभिव्यक्ति, जीवन की पीड़ा और संसार से अलगाव का स्वर समान है, परंतु बच्चन जहाँ मस्ती और निर्भीकता से जीते हैं, वहीं प्रसाद संकोच और मौन में अपनी व्यथा छिपाते हैं। दोनों कविताएँ छायावादी और उत्तर-छायावादी काव्य-चेतना की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं।
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