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Chapter 15 of 38
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वसंत आया / तोड़ो (रघुवीर सहाय)

Odisha Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for वसंत आया / तोड़ो (रघुवीर सहाय) — Odisha Board Class 12 Hindi.

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रघुवीर सहाय के जीवन, शिक्षा, पत्रकारिता करियर, साहित्यिक योगदान और प्रमुख कृतियों को दर्शाने वाला एक इन्फोग्राफिक।
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14 Questions Solved · 3 Sections

वसंत आया — प्रश्न-अभ्यास

1वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?Show solution
दिया गया है: रघुवीर सहाय की कविता 'वसंत आया'।

उत्तर:
कवि को वसंत आगमन की सूचना किसी मौसम-विभाग की घोषणा से नहीं, बल्कि प्रकृति के विभिन्न संकेतों से मिली। कोयल की कुहुक सुनाई दी, पेड़ों के बड़े-बड़े पत्ते पीले पड़कर चुरमुराने लगे, सुबह छह बजे हवा ऐसी चली जैसे गरम पानी से नहाई हो — खिली हुई, ताज़ी और सुखद। ढाक के जंगल दहर-दहर दहकने को तैयार दिखे। इस प्रकार प्रकृति के इन्हीं नैसर्गिक संकेतों से कवि को वसंत के आगमन की सूचना मिली।
2'कोई छह बजे सुबह... फिरकी सी आई, चली गई'—पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया है: उक्त पंक्ति 'वसंत आया' कविता से है।

भाव:
इन पंक्तियों में कवि ने वसंत की हवा का अत्यंत सजीव और चित्रात्मक वर्णन किया है। सुबह लगभग छह बजे एक ताज़ी, गर्म और सुखद हवा का झोंका आया — जैसे कोई गरम पानी से नहाकर आई हो। वह हवा 'फिरकी' (लट्टू/घूमने वाले खिलौने) की तरह क्षण-भर के लिए आई और चली गई। इससे यह भाव व्यक्त होता है कि वसंत की अनुभूति क्षणिक और चंचल होती है — वह आती है, मन को छूती है और चली जाती है। आधुनिक व्यस्त मनुष्य इस क्षणिक सौंदर्य को भी ठीक से अनुभव नहीं कर पाता।
3अलंकार बताइए:
(क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते
(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो
(ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई
(घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
Show solution
(क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते
- पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार — 'बड़े-बड़े' शब्द की पुनरावृत्ति से विशेषता में बल आया है।
- अनुप्रास अलंकार — 'प' वर्ण की आवृत्ति: 'पियराए पत्ते'।

(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो
- उपमा अलंकार — हवा की तुलना गरम पानी से नहाई हुई स्त्री से की गई है। उपमेय = हवा, उपमान = गरम पानी से नहाई हुई, वाचक शब्द = 'जैसे'।

(ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई
- उपमा अलंकार — हवा की तुलना फिरकी से की गई है; वाचक शब्द = 'सी'।
- पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार — 'आई' की पुनरावृत्ति।

(घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
- अनुप्रास अलंकार — 'द' वर्ण की आवृत्ति: 'दहर-दहर दहकेंगे'।
- पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार — 'दहर-दहर' की पुनरावृत्ति से तीव्रता का बोध।
4किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है?Show solution
उत्तर:
निम्नलिखित पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आधुनिक मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है:

"तब की बात और थी, अब तो बस यही जानते हैं"\text{"तब की बात और थी, अब तो बस यही जानते हैं"}

कवि कहता है कि पहले मनुष्य प्रकृति के साथ जुड़ा था, परंतु अब वह केवल कैलेंडर देखकर बताता है कि वसंत आ गया। वह कोयल की कुहुक, पत्तों के पीलेपन, हवा की ताज़गी को स्वयं अनुभव नहीं करता। पंक्ति —

> *"कि कोकिल कूकी, कि वसंत आया"*

तथा

> *"फिरकी-सी आई, चली गई"*

— इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि वसंत का सौंदर्य क्षण-भर के लिए आता है और मनुष्य उसे पकड़ नहीं पाता। वह प्रकृति से इतना कट गया है कि उसे वसंत की सूचना स्वयं प्रकृति से नहीं, बल्कि दूसरों के माध्यम से मिलती है।
5'प्रकृति मनुष्य की सहचरी है' इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।Show solution
उत्तर:
प्रकृति और मनुष्य का संबंध अत्यंत प्राचीन और घनिष्ठ है। आदिकाल से मनुष्य प्रकृति की गोद में पला-बढ़ा है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत — सभी में प्रकृति को मनुष्य की सहचरी के रूप में चित्रित किया गया है। कवियों ने प्रकृति में अपनी भावनाओं का प्रतिबिंब देखा है।

आज के संदर्भ में:
आज की वास्तविकता यह है कि मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। औद्योगीकरण, नगरीकरण और भौतिकवाद ने मनुष्य को प्रकृति से काट दिया है। 'वसंत आया' कविता में रघुवीर सहाय इसी चिंता को व्यक्त करते हैं — आधुनिक मनुष्य वसंत को कैलेंडर से जानता है, अनुभव से नहीं। वह कोयल की कुहुक, फूलों की सुगंध और हवा की ताज़गी को महसूस करने का समय नहीं निकाल पाता।

निष्कर्ष: प्रकृति आज भी मनुष्य की सहचरी है, परंतु मनुष्य ने स्वयं इस साहचर्य को तोड़ा है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ अपना संबंध पुनः स्थापित करे तो उसका जीवन अधिक सुखी और संतुलित होगा।
6'वसंत आया' कविता में कवि की चिंता क्या है?Show solution
उत्तर:
'वसंत आया' कविता में कवि रघुवीर सहाय की मुख्य चिंता यह है कि आधुनिक मनुष्य प्रकृति से पूरी तरह कट गया है। वह वसंत जैसी ऋतु को भी प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से — किसी के बताने पर या कैलेंडर देखकर — जानता है।

कवि चिंतित है कि:
1. मनुष्य की संवेदनशीलता कम हो गई है।
2. वह प्रकृति के सूक्ष्म संकेतों को पहचानने में असमर्थ हो गया है।
3. नगरीय जीवन की व्यस्तता ने उसे प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित कर दिया है।
4. मनुष्य और प्रकृति के बीच जो स्वाभाविक, भावनात्मक संबंध था, वह टूट रहा है।

इस प्रकार कवि की चिंता केवल वसंत तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आधुनिक मनुष्य की संवेदनहीनता और प्रकृति से बढ़ती दूरी पर गहरी चिंता व्यक्त करता है।

तोड़ो — प्रश्न-अभ्यास

1'पत्थर' और 'चट्टान' शब्द किसके प्रतीक हैं?Show solution
उत्तर:
कविता 'तोड़ो' में 'पत्थर' और 'चट्टान' शब्द प्रतीकात्मक हैं:

- पत्थर — मनुष्य के मन में जमी हुई जड़ता, संवेदनहीनता, रूढ़िवादिता और मानसिक अवरोधों के प्रतीक हैं।
- चट्टान — समाज में व्याप्त कठोर, अटल और पुरानी रूढ़ियाँ, परंपराएँ, झूठे बंधन और वे बाधाएँ जो मनुष्य को प्रगति से रोकती हैं — इनके प्रतीक हैं।

कवि का आशय है कि मनुष्य को अपने मन की जड़ता और समाज की रूढ़िवादी बेड़ियों को तोड़ना होगा, तभी वह धरती (वास्तविकता/जीवन) को सही अर्थों में जान सकेगा और उसमें नई संभावनाएँ उत्पन्न कर सकेगा।
2भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए—
मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?
गोड़ो गोड़ो गोड़ो
Show solution
दिया गया है: उपर्युक्त पंक्तियाँ 'तोड़ो' कविता से हैं।

भाव-सौंदर्य:
इन पंक्तियों में कवि ने मिट्टी और मन का सुंदर समानांतर चित्रण किया है।

- 'मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को' — कवि कहता है कि मिट्टी में रस (उर्वरता) तभी सिद्ध होती है जब वह बीज को पोषण देकर अंकुरित करे। अर्थात् संभावना तभी सार्थक होती है जब वह क्रियान्वित हो।

- 'हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को' — मनुष्य के मन में भी ऊर्जा और बेचैनी (खीज) है, परंतु वह उसे सही दिशा नहीं दे पा रहा। यह खीज व्यर्थ न जाए, इसे सृजनात्मक कार्य में लगाना चाहिए।

- 'गोड़ो गोड़ो गोड़ो' — 'गोड़ना' अर्थात् जमीन को खोदकर उसे उपजाऊ बनाना। यहाँ यह प्रतीक है — मन की जड़ता को खोदो, उसे उर्वर बनाओ, ताकि नए विचारों के बीज अंकुरित हो सकें।

सौंदर्य: पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ('गोड़ो गोड़ो गोड़ो') से आग्रह और तीव्रता का भाव उत्पन्न होता है। मिट्टी-बीज का प्रतीक अत्यंत सटीक और भावपूर्ण है।
3कविता का आरंभ 'तोड़ो तोड़ो तोड़ो' से हुआ है और अंत 'गोड़ो गोड़ो गोड़ो' से। विचार कीजिए कि कवि ने ऐसा क्यों किया?Show solution
उत्तर:
कवि ने कविता का आरंभ 'तोड़ो' से और अंत 'गोड़ो' से अत्यंत सोच-समझकर किया है। इसमें एक क्रमिक और तार्किक विकास है:

'तोड़ो तोड़ो तोड़ो' — यह विध्वंस का आह्वान है। पहले पुरानी जड़ता, रूढ़ियाँ, झूठे बंधन, मानसिक अवरोध और बंजर मानसिकता को तोड़ना आवश्यक है। बिना पुराने को तोड़े नया नहीं बन सकता।

'गोड़ो गोड़ो गोड़ो' — यह सृजन का आह्वान है। तोड़ने के बाद केवल विनाश नहीं होना चाहिए; उस टूटी हुई जमीन को गोड़कर (जोतकर) उपजाऊ बनाना होगा, ताकि नए विचारों और संभावनाओं के बीज उगाए जा सकें।

निष्कर्ष: कवि का संदेश है — पहले तोड़ो (पुरानी जड़ता), फिर गोड़ो (नई संभावनाओं को तैयार करो)। यह क्रम परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया को दर्शाता है — विध्वंस से निर्माण की ओर।
4ये झूठे बंधन टूटें
तो धरती को हम जानें
यहाँ पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय हैं?
Show solution
उत्तर:

'झूठे बंधन' से अभिप्राय:
झूठे बंधन से कवि का तात्पर्य उन सामाजिक, मानसिक और वैचारिक बेड़ियों से है जो मनुष्य को जकड़े हुए हैं — जैसे:
- रूढ़िवादी परंपराएँ और अंधविश्वास
- मानसिक जड़ता और आलस्य
- वे सामाजिक बंधन जो मनुष्य की प्रगति में बाधक हैं
- वे विचार जो मनुष्य को यथास्थिति में बनाए रखते हैं

ये बंधन 'झूठे' इसलिए हैं क्योंकि इनका कोई वास्तविक आधार नहीं है; ये केवल मनुष्य की कल्पना और भय से बने हैं।

'धरती को जानने' से अभिप्राय:
धरती को जानने से कवि का तात्पर्य है —
- वास्तविक जीवन और उसकी संभावनाओं को पहचानना
- श्रम, मिट्टी और प्रकृति से जुड़ना
- जीवन की सच्चाई और उसके सौंदर्य को अनुभव करना
- अपनी जड़ों से जुड़कर नई संभावनाओं को खोजना

सार: जब तक मनुष्य झूठे बंधनों में जकड़ा है, वह जीवन की वास्तविकता को नहीं जान सकता।
5'आधे-आधे गाने' के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?Show solution
उत्तर:
'आधे-आधे गाने' एक अत्यंत सार्थक प्रतीक है। इसके माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि:

1. अधूरापन: आधुनिक मनुष्य का जीवन अधूरा है। वह न पूरी तरह प्रकृति से जुड़ा है, न पूरी तरह अपने मन से। उसके सुख-दुख, उसकी अनुभूतियाँ — सब अधूरी हैं।

2. अपूर्ण अभिव्यक्ति: मनुष्य अपनी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता। उसके गीत — अर्थात् उसकी जीवन-यात्रा, उसके सपने, उसकी उपलब्धियाँ — सब अधूरी रह जाती हैं।

3. मानसिक ऊब और अतृप्ति: मन के मैदानों पर जो ऊब व्याप्त है, उसके कारण मनुष्य कोई भी काम पूरे उत्साह और समर्पण से नहीं कर पाता — इसीलिए उसके गाने 'आधे-आधे' रह जाते हैं।

निष्कर्ष: 'आधे-आधे गाने' अधूरेपन, अतृप्ति और मानसिक जड़ता के प्रतीक हैं। कवि चाहता है कि मनुष्य इस अधूरेपन को तोड़े और पूर्णता की ओर बढ़े।

योग्यता-विस्तार

1वसंत ऋतु पर किन्हीं दो कवियों की कविताएँ खोजिए और इस कविता से उनका मिलान कीजिए।Show solution
उत्तर:
वसंत ऋतु पर दो प्रमुख कविताएँ:

1. सुमित्रानंदन पंत — 'वसंत'
पंत जी की कविताओं में वसंत का उल्लास, प्रकृति का सौंदर्य और मनुष्य की आनंदमयी अनुभूति मिलती है। वे प्रकृति को सजीव और भावपूर्ण रूप में चित्रित करते हैं।

2. जयशंकर प्रसाद — 'वसंत आया'
प्रसाद जी की कविताओं में वसंत प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक है।

मिलान:
- पंत और प्रसाद की कविताओं में वसंत उल्लास और सौंदर्य का प्रतीक है।
- रघुवीर सहाय की 'वसंत आया' में वसंत चिंता और विडंबना का माध्यम है — कवि दिखाता है कि आधुनिक मनुष्य वसंत के सौंदर्य को अनुभव नहीं कर पाता।
- अंतर यह है कि पुराने कवि प्रकृति में डूबकर लिखते थे, जबकि रघुवीर सहाय प्रकृति से मनुष्य की दूरी पर व्यंग्य करते हैं।

*(विद्यार्थी पुस्तकालय से अन्य कविताएँ खोजकर इस तुलना को विस्तार दे सकते हैं।)*
2भारत में ऋतुओं का चक्र बताइए और उनके लक्षण लिखिए।Show solution
उत्तर:
भारत में मुख्यतः छह ऋतुएँ होती हैं:

| ऋतु | माह | लक्षण |
|-----|-----|--------|
| वसंत | फाल्गुन-चैत्र (फरवरी-मार्च) | फूल खिलते हैं, कोयल कूकती है, मौसम सुहावना होता है, पलाश दहकते हैं |
| ग्रीष्म | वैशाख-ज्येष्ठ (अप्रैल-जून) | तेज धूप, लू चलती है, नदियाँ सूखती हैं |
| वर्षा | आषाढ़-श्रावण (जुलाई-अगस्त) | वर्षा होती है, नदियाँ उफनती हैं, हरियाली छाती है |
| शरद | भाद्रपद-आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) | आकाश स्वच्छ, चाँदनी उज्ज्वल, मौसम सुहावना |
| हेमंत | कार्तिक-मार्गशीर्ष (नवंबर-दिसंबर) | हल्की ठंड, फसलें पकती हैं |
| शिशिर | पौष-माघ (जनवरी-फरवरी) | कड़ाके की ठंड, कोहरा, पाला |

इस प्रकार भारत में ऋतुओं का यह चक्र प्रकृति और जीवन को नई ऊर्जा देता रहता है।
3मिट्टी और बीज से संबंधित और भी कविताएँ हैं, जैसे सुमित्रानंदन पंत की 'बीज'। अन्य कवियों की ऐसी कविताओं का संकलन कीजिए और भित्ति पत्रिका में उनका उपयोग कीजिए।Show solution
उत्तर:
मिट्टी और बीज से संबंधित कुछ प्रमुख कविताएँ:

1. सुमित्रानंदन पंत — 'बीज': इसमें बीज के अंकुरण को जीवन की नई शुरुआत के रूप में देखा गया है।

2. महादेवी वर्मा: उनकी कविताओं में मिट्टी और प्रकृति का भावपूर्ण चित्रण मिलता है।

3. केदारनाथ अग्रवाल: उनकी कविताओं में किसान, मिट्टी और बीज का यथार्थ चित्रण है।

4. नागार्जुन: 'अकाल और उसके बाद' जैसी कविताओं में मिट्टी और जीवन का संबंध दिखाया गया है।

भित्ति पत्रिका के लिए सुझाव:
- इन कविताओं को सुंदर हस्तलेख में लिखें।
- साथ में मिट्टी, बीज और अंकुर के चित्र बनाएँ।
- प्रत्येक कविता के नीचे उसका संक्षिप्त भाव लिखें।
- शीर्षक दें: 'मिट्टी से उगती उम्मीद'

*(विद्यार्थी पुस्तकालय और इंटरनेट की सहायता से अधिक कविताएँ एकत्र कर सकते हैं।)*

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Sources & Official References

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