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Chapter 28 of 39
NCERT Solutions

हँसी की चोट (देव)

Manipur Board · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for हँसी की चोट (देव) — Manipur Board Class 11 Hindi.

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11 Questions Solved · 2 Sections

प्रश्न-अभ्यास — हँसी की चोट (देव)

1'हँसी की चोट' सवैये में कवि ने किन पंच तत्वों का वर्णन किया है तथा वियोग में वे किस प्रकार विदा होते हैं?Show solution
दिया गया है: देव रचित 'हँसी की चोट' सवैया।

पंच तत्वों का वर्णन:
कवि ने शरीर के आधार-भूत पाँच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — का वर्णन किया है। वियोग की दशा में नायिका का शरीर इन तत्वों को एक-एक करके खोता जाता है:

1. पृथ्वी तत्व (देह/माँस): वियोग की पीड़ा से नायिका का शरीर दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जाता है — 'तनुता' (दुबलापन) आ जाती है।
2. जल तत्व: नेत्रों से निरंतर अश्रु-प्रवाह होता रहता है, जिससे जल तत्व शरीर छोड़ता जाता है।
3. अग्नि तत्व: विरह की ज्वाला शरीर को भीतर से जलाती रहती है; साँसें गर्म हो जाती हैं।
4. वायु तत्व: लंबी-लंबी साँसें (निःश्वास) वायु तत्व को बाहर निकालती रहती हैं।
5. आकाश तत्व: शरीर इतना खोखला और रिक्त हो जाता है कि आकाश तत्व भी विदा होने लगता है।

निष्कर्ष: इस प्रकार वियोग में नायिका के शरीर से पंचतत्व धीरे-धीरे विदा होते हैं और वह मृत्यु की ओर अग्रसर होती है। कवि ने वियोग-वेदना को वैज्ञानिक एवं दार्शनिक आधार देकर अत्यंत मार्मिक रूप से चित्रित किया है।
2नायिका सपने में क्यों प्रसन्न थी और वह सपना कैसे टूट गया?Show solution
दिया गया है: देव रचित 'सपना' कवित्त।

नायिका की प्रसन्नता का कारण:
नायिका विरहिणी है। उसे सपने में उसका प्रिय (कृष्ण) मिल गया। स्वप्न में प्रियतम का सान्निध्य, उनकी मुस्कान और प्रेम-मिलन का अनुभव हुआ। इस कारण वह अत्यंत प्रसन्न और आनंदित थी। स्वप्न में उसे वह सुख मिला जो जागते हुए संभव नहीं था।

सपने का टूटना:
नायिका की आँख खुल गई — अर्थात् नींद टूट गई। जैसे ही वह जागी, सपना बिखर गया और प्रिय का वह मनोरम दृश्य अदृश्य हो गया। जागने पर उसे अपनी वास्तविक विरह-दशा का बोध हुआ। उसने कहा — 'सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में' — अर्थात् जागना ही उसके भाग्य का सो जाना बन गया। जागरण ने उसके सुख को छीन लिया और वह पुनः विरह-वेदना में डूब गई।

निष्कर्ष: सपने में मिला प्रेम-सुख क्षणिक था; आँख खुलते ही वह सुख स्वप्न की भाँति विलीन हो गया और नायिका की पीड़ा और गहरी हो गई।
3'सपना' कवित्त का भाव-सौंदर्य लिखिए।Show solution
दिया गया है: देव रचित 'सपना' कवित्त।

भाव-सौंदर्य:

1. विरह की तीव्रता: इस कवित्त में विरहिणी नायिका की वेदना का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। स्वप्न में प्रिय-मिलन और जागने पर उसका वियोग — यह विरोधाभास भाव को और गहरा बना देता है।

2. स्वप्न और जागृति का द्वंद्व: कवि ने स्वप्न को सुख का और जागरण को दुःख का प्रतीक बनाया है। 'सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में' — यह पंक्ति भाव की पराकाष्ठा है।

3. प्रकृति का मानवीकरण: बादल की बूँदें नायिका के आँसुओं से दोगुनी हो जाती हैं — 'वेई छाई बूँदें मेरे आँसु हूँ दूगन में' — यह प्रकृति और मानव-भाव का सुंदर समन्वय है।

4. करुण रस की प्रधानता: पूरे कवित्त में करुण रस प्रवाहित होता है। नायिका की असहाय दशा पाठक के हृदय को द्रवित करती है।

5. संक्षिप्तता में गहराई: थोड़े शब्दों में गहरी भावाभिव्यक्ति देव की काव्य-कुशलता का प्रमाण है।

निष्कर्ष: 'सपना' कवित्त भाव-सौंदर्य की दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट रचना है जो विरह-वेदना को नई ऊँचाई देती है।
4'दरबार' सवैये में किस प्रकार के वातावरण का वर्णन किया गया है?Show solution
दिया गया है: देव रचित 'दरबार' सवैया।

दरबार के वातावरण का वर्णन:

कवि देव ने 'दरबार' सवैये में एक ऐसे दरबार का चित्रण किया है जो पूर्णतः भ्रष्ट, अंधा और बहरा है:

1. साहिब (राजा) अंध है — अर्थात् राजा को गुण-दोष की परख नहीं है, वह सच्ची प्रतिभा को पहचानने में असमर्थ है।

2. मुसाहिब (दरबारी) मूक हैं — दरबारी चाटुकार हैं, वे सत्य बोलने का साहस नहीं रखते। वे मौन रहकर राजा की हाँ में हाँ मिलाते हैं।

3. सभा बहिरी है — दरबार की सभा बहरी है, अर्थात् वहाँ किसी की सच्ची बात सुनी नहीं जाती।

4. कलाकार की दुर्दशा: ऐसे वातावरण में एक सच्चा कलाकार ('निबरे नट') भटकता रहता है। उसकी कला की कोई कद्र नहीं होती और वह सारी रात व्यर्थ नाचता रहता है।

निष्कर्ष: यह दरबार अंधेर नगरी का प्रतीक है जहाँ योग्यता की उपेक्षा और चाटुकारिता का बोलबाला है। कवि ने इस वातावरण पर तीखा व्यंग्य किया है।
5दरबार में गुणग्राहकता और कला की परख को किस प्रकार अनदेखा किया जाता है?Show solution
दिया गया है: देव रचित 'दरबार' सवैया।

गुणग्राहकता की उपेक्षा:

कवि देव ने बताया है कि दरबार में गुणग्राहकता और कला की परख को निम्नलिखित प्रकार से अनदेखा किया जाता है:

1. राजा की अज्ञानता: 'साहिब अंध' — राजा स्वयं अंधा है, अर्थात् उसे कला और गुण की पहचान नहीं। वह केवल चापलूसी से प्रसन्न होता है।

2. दरबारियों की चुप्पी: 'मुसाहिब मूक' — दरबारी जानते हुए भी चुप रहते हैं। वे कलाकार की प्रशंसा नहीं करते क्योंकि उन्हें अपने स्वार्थ की चिंता है।

3. सभा की बेरुखी: 'सभा बहिरी' — सभा बहरी है, किसी की सुनती नहीं। कलाकार की कला का मूल्यांकन करने वाला कोई नहीं।

4. कलाकार की दुर्दशा: 'भेष न सूझ्यो, कह्यो समझ्यो न, बतायो सुन्यो न' — कलाकार का वेश नहीं देखा गया, उसकी बात नहीं समझी गई, उसे बताया गया तो सुना नहीं गया।

5. व्यर्थ परिश्रम: 'निबरे नट की बिगरी मति को सगरी निसि नाच्यो' — कलाकार सारी रात नाचता रहा किंतु उसकी कला को कोई सराहना नहीं मिली।

निष्कर्ष: इस प्रकार दरबार में गुण की परख और कला की सराहना पूरी तरह अनदेखी की जाती है।
6भाव स्पष्ट कीजिए— (क) हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि। (ख) सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में। (ग) वेई छाई बूँदें मेरे आँसु हूँ दूगन में। (घ) साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी।Show solution
(क) हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि।

भाव: इस पंक्ति में श्लेष और यमक अलंकार का सुंदर प्रयोग है। 'हरि' शब्द के दो अर्थ हैं — एक 'हरने वाला' और दूसरा 'कृष्ण'। भाव यह है कि कृष्ण ने नायिका को देखा और देखते ही उसका हृदय हर लिया। अर्थात् कृष्ण की एक दृष्टि ने नायिका को पूरी तरह मोहित कर लिया। यह प्रेम की तीव्रता और कृष्ण के आकर्षण का सुंदर चित्रण है।

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(ख) सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में।

भाव: नायिका विरहिणी है। उसे स्वप्न में प्रिय का मिलन हुआ था जिससे वह सुखी थी। परंतु जैसे ही उसकी नींद टूटी और वह जागी, वह सुख भी समाप्त हो गया। कवि कहता है कि जागने में ही उसके भाग्य सो गए — अर्थात् जागरण ने उसके सौभाग्य को नष्ट कर दिया। यह विरोधाभास अत्यंत मार्मिक है — जागना जो सामान्यतः शुभ माना जाता है, यहाँ दुर्भाग्य का कारण बन गया।

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(ग) वेई छाई बूँदें मेरे आँसु हूँ दूगन में।

भाव: नायिका की विरह-वेदना इतनी गहरी है कि वर्षा की बूँदें भी उसके आँसुओं के सामने कम पड़ जाती हैं। जो बूँदें बादल से बरस रही हैं, वही बूँदें उसके आँसुओं में दोगुनी होकर बह रही हैं। अर्थात् प्रकृति का रोना और नायिका का रोना एक हो गए हैं, किंतु नायिका का दुःख प्रकृति से भी अधिक है। यह पंक्ति विरह की पराकाष्ठा को व्यक्त करती है।

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(घ) साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी।

भाव: यह पंक्ति एक भ्रष्ट दरबार का सटीक चित्र प्रस्तुत करती है। राजा ('साहिब') अंधा है — उसे सत्य और गुण की पहचान नहीं। दरबारी ('मुसाहिब') मूक हैं — वे सत्य जानते हुए भी चुप रहते हैं। सभा बहरी है — वहाँ किसी की सच्ची बात नहीं सुनी जाती। इस प्रकार पूरा दरबार अंधेपन, मौन और बहरेपन का शिकार है। यह व्यंग्य दरबारी चाटुकारिता और भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार है।
7देव ने दरबारी चाटुकारिता और दंभपूर्ण वातावरण पर किस प्रकार व्यंग्य किया है?Show solution
दिया गया है: देव रचित 'दरबार' सवैया।

देव का व्यंग्य:

कवि देव ने 'दरबार' सवैये में दरबारी चाटुकारिता और दंभपूर्ण वातावरण पर अत्यंत तीखा और सटीक व्यंग्य किया है:

1. तीन प्रतीकों द्वारा व्यंग्य: 'साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी' — इन तीन प्रतीकों में पूरे दरबार की विकृति को समेट दिया है। राजा अंधा है (सत्य नहीं देखता), दरबारी मूक हैं (सत्य नहीं बोलते), सभा बहरी है (सत्य नहीं सुनती)।

2. कलाकार की दुर्दशा द्वारा व्यंग्य: 'निबरे नट की बिगरी मति को सगरी निसि नाच्यो' — एक सच्चा कलाकार सारी रात नाचता रहा किंतु किसी ने उसकी कला की सराहना नहीं की। यह दरबार की गुणहीनता पर व्यंग्य है।

3. 'रंग रीझ को माच्यो': दरबार में केवल मनोरंजन और चाटुकारिता का बोलबाला है, गुणग्राहकता का कोई स्थान नहीं।

4. 'भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट': दरबार में आकर कलाकार स्वयं को भटका हुआ पाता है — यह दरबारी वातावरण की दिशाहीनता पर व्यंग्य है।

5. 'भेष न सूझ्यो, कह्यो समझ्यो न, बतायो सुन्यो न': यह त्रिगुण व्यंग्य है — न देखा, न समझा, न सुना — दरबार की पूर्ण उदासीनता का चित्रण।

निष्कर्ष: देव ने बड़ी कुशलता से व्यंग्य के माध्यम से दरबारी भ्रष्टाचार, चाटुकारिता और कला की उपेक्षा को उजागर किया है।
8निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या करिए— (क) साँसिनि ही……तनुता करि। (ख) झहरि……गगन में। (ग) साहिब अंध……बाच्यो।Show solution
(क) साँसिनि ही……तनुता करि।

प्रसंग: यह पंक्तियाँ देव रचित 'हँसी की चोट' सवैये से ली गई हैं। इसमें विरहिणी नायिका की दशा का वर्णन है।

व्याख्या: कवि कहता है कि नायिका की लंबी-लंबी साँसें ही उसके शरीर को क्षीण करती जा रही हैं। विरह की पीड़ा में वह जो गहरी साँसें लेती है, वे उसके शरीर की ऊर्जा और शक्ति को धीरे-धीरे समाप्त कर देती हैं। साँसों के माध्यम से वायु तत्व शरीर से बाहर जाता है और शरीर दुबला होता जाता है। 'तनुता' अर्थात् कृशता — नायिका का शरीर इतना कमज़ोर हो गया है कि वह मात्र साँसों के सहारे जी रही है। यह विरह-वेदना की चरम अवस्था का चित्रण है।

विशेष: यहाँ वायु तत्व के माध्यम से पंचतत्व-सिद्धांत को काव्य में पिरोया गया है।

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(ख) झहरि……गगन में।

प्रसंग: यह पंक्तियाँ देव रचित 'सपना' कवित्त से ली गई हैं। इसमें विरहिणी नायिका के आँसुओं और वर्षा का वर्णन है।

व्याख्या: कवि कहता है कि बादलों से बूँदें झर-झर कर बरस रही हैं। यह वर्षा ऋतु का दृश्य है। परंतु नायिका की विरह-वेदना इतनी गहरी है कि आकाश से बरसने वाली बूँदें उसके आँसुओं में दोगुनी होकर मिल जाती हैं। अर्थात् प्रकृति का रोना और नायिका का रोना एक हो गए हैं। आकाश भी जैसे नायिका के दुःख में सहभागी हो गया है। यह प्रकृति और मानव-भाव का अद्भुत समन्वय है।

विशेष: यहाँ मानवीकरण और अतिशयोक्ति अलंकार का सुंदर प्रयोग है।

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(ग) साहिब अंध……बाच्यो।

प्रसंग: यह पंक्तियाँ देव रचित 'दरबार' सवैये से ली गई हैं। इसमें एक भ्रष्ट दरबार का चित्रण है।

व्याख्या: कवि कहता है — राजा ('साहिब') अंधा है अर्थात् उसे सत्य और गुण की पहचान नहीं; दरबारी ('मुसाहिब') मूक हैं अर्थात् वे सत्य जानते हुए भी चुप रहते हैं; सभा बहरी है अर्थात् वहाँ किसी की सच्ची बात नहीं सुनी जाती। ऐसे दरबार में केवल मनोरंजन और चाटुकारिता का रंग जमा हुआ है। इस वातावरण में एक सच्चा कलाकार भटकता रहता है — वह न सही मार्ग देख पाता है, न उसकी बात समझी जाती है, न उसे कोई बताने वाला है। उसके डूबने (बर्बाद होने) से बचाने का कोई उपाय नहीं बचा।

विशेष: यहाँ 'अंध', 'मूक', 'बहिरी' तीन विशेषणों द्वारा दरबार की त्रिस्तरीय विकृति पर तीखा व्यंग्य किया गया है।
9देव के अलंकार प्रयोग और भाषा प्रयोग के कुछ उदाहरण पठित पदों से लिखिए।Show solution
दिया गया है: देव रचित पठित पद — 'हँसी की चोट', 'सपना', 'दरबार'।

अलंकार प्रयोग के उदाहरण:

1. यमक अलंकार:
'हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि' — यहाँ 'हरि' शब्द तीन बार आया है और तीनों बार अर्थ भिन्न है — देखना, कृष्ण, हरना।

2. श्लेष अलंकार:
'हरि' शब्द में श्लेष है — एक साथ 'कृष्ण' और 'हरने वाला' दोनों अर्थ निकलते हैं।

3. अनुप्रास अलंकार:
'साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी' — यहाँ 'म' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास है।
'झहरि झहरि' — 'झ' वर्ण की आवृत्ति।

4. अतिशयोक्ति अलंकार:
'वेई छाई बूँदें मेरे आँसु हूँ दूगन में' — आँसुओं का वर्षा से दोगुना होना अतिशयोक्ति है।

5. मानवीकरण अलंकार:
प्रकृति (बादल, बूँदें) को नायिका के दुःख में सहभागी दिखाना मानवीकरण है।

6. विरोधाभास अलंकार:
'सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में' — जागना और भाग्य का सोना — विरोधाभास।

भाषा प्रयोग के उदाहरण:

1. ब्रजभाषा का प्रयोग: देव ने शुद्ध ब्रजभाषा का प्रयोग किया है — 'हेरि', 'लियो', 'बाच्यो', 'माच्यो', 'नाच्यो' आदि।

2. संगीतात्मकता: सवैया और कवित्त छंदों में लय और संगीत का सुंदर समन्वय है।

3. चित्रात्मकता: 'साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी' — तीन शब्दों में पूरे दरबार का चित्र।

4. तत्सम और देशज शब्दों का मिश्रण: 'तनुता', 'मुसाहिब', 'औघट', 'निगोड़ी' आदि शब्द भाषा को जीवंत बनाते हैं।

5. व्यंग्यात्मक भाषा: 'दरबार' सवैये में व्यंग्य की भाषा अत्यंत पैनी और प्रभावशाली है।

योग्यता-विस्तार

1'दरबार' सवैये को भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक 'अंधेर नगरी' के समकक्ष रखकर विवेचना कीजिए।Show solution
समानताएँ:

1. भ्रष्ट शासन-व्यवस्था का चित्रण: देव के 'दरबार' सवैये में जिस प्रकार 'साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी' का वर्णन है, उसी प्रकार भारतेंदु के 'अंधेर नगरी' में 'अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा' की स्थिति है। दोनों में शासक की अयोग्यता और अंधेपन का चित्रण है।

2. व्यंग्य की समानता: दोनों रचनाओं में तत्कालीन शासन-व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है। देव ने काव्य में और भारतेंदु ने नाटक में यही कार्य किया।

3. गुण की उपेक्षा: दोनों में योग्य और गुणी व्यक्ति की उपेक्षा और अयोग्य की प्रतिष्ठा का चित्रण है।

4. चाटुकारिता: दोनों में दरबारी चाटुकारिता और स्वार्थपरता का यथार्थ चित्रण है।

अंतर: देव का व्यंग्य काव्यात्मक और संक्षिप्त है जबकि भारतेंदु का व्यंग्य नाटकीय, विस्तृत और सामाजिक है। देव का उद्देश्य दरबारी वातावरण की आलोचना है जबकि भारतेंदु का उद्देश्य सामाजिक-राजनीतिक जागरण है।

निष्कर्ष: दोनों रचनाएँ अपने-अपने युग में भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध साहित्यिक प्रतिरोध की मिसाल हैं।
2देव के समान भाषा प्रयोग करने वाले किसी अन्य कवि की रचनाओं का संकलन कीजिए।Show solution
संकेत एवं उत्तर:

देव रीतिकालीन कवि हैं जिन्होंने ब्रजभाषा में सवैया, कवित्त और छंदों की रचना की। उनके समान भाषा प्रयोग करने वाले प्रमुख कवि हैं:

1. बिहारी (बिहारी सतसई):
- 'मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।'
- बिहारी ने भी ब्रजभाषा में श्रृंगार रस की रचनाएँ कीं। उनकी भाषा में भी यमक, श्लेष और अनुप्रास का सुंदर प्रयोग है।

2. घनानंद:
- 'अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।'
- घनानंद की ब्रजभाषा में भी देव जैसी संगीतात्मकता और भावगहनता है।

3. पद्माकर:
- 'फागुन के भीने रस में, डूबी रहती है दुनिया सारी।'
- पद्माकर ने भी ब्रजभाषा में सवैया और कवित्त लिखे जो देव की शैली से मिलते-जुलते हैं।

विद्यार्थियों के लिए निर्देश: इन कवियों की रचनाओं का संकलन पुस्तकालय से प्राप्त करें और उनकी भाषा-शैली, अलंकार-प्रयोग तथा छंद-विधान की देव से तुलना करें।

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