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Chapter 6 of 39
NCERT Solutions

आवारा मसीहा

Manipur Board · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for आवारा मसीहा — Manipur Board Class 11 Hindi.

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9 Questions Solved · 1 Section

प्रश्न-अभ्यास — आवारा मसीहा (अंतराल, कक्षा 11)

1"उस समय वह सोच भी नहीं सकता था कि मनुष्य को दुख पहुँचाने के अलावा भी साहित्य का कोई उद्देश्य हो सकता है।" लेखक ने ऐसा क्यों कहा? आपके विचार से साहित्य के कौन-कौन से उद्देश्य हो सकते हैं?Show solution
दिया गया है: 'आवारा मसीहा' में शरतचंद्र के बचपन और उनके साहित्यिक संस्कारों का वर्णन है।

लेखक ने ऐसा क्यों कहा:
शरत् के बचपन का परिवेश अत्यंत कठोर और पीड़ादायक था। उन्होंने बचपन से ही घोर दरिद्रता, पारिवारिक अस्थिरता और सामाजिक उपेक्षा को भोगा था। उस समय उनके आसपास जो साहित्य पढ़ा-सुना जाता था, वह प्रायः करुण, दुखद और त्रासद कथाओं से भरा होता था। इसलिए बालक शरत् के मन में यही धारणा बन गई थी कि साहित्य का एकमात्र उद्देश्य पाठक को दुख पहुँचाना, रुलाना या करुणा उत्पन्न करना है। उन्होंने जीवन के सुखद, प्रेरणादायी या आनंददायी पक्ष को साहित्य में देखा ही नहीं था, इसलिए उनकी यह सीमित समझ स्वाभाविक थी।

साहित्य के उद्देश्य (हमारे विचार से):
1. मनोरंजन — साहित्य पाठक का मनोरंजन करता है और उसे आनंद प्रदान करता है।
2. समाज-सुधार — साहित्य सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और अन्याय के विरुद्ध जागरूकता फैलाता है।
3. प्रेरणा देना — महान पात्रों और घटनाओं के माध्यम से पाठक को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
4. संवेदनशीलता का विकास — साहित्य मनुष्य के हृदय में दूसरों के प्रति सहानुभूति और करुणा जगाता है।
5. सांस्कृतिक संरक्षण — साहित्य भाषा, परंपरा और संस्कृति को जीवित रखता है।
6. आत्म-अन्वेषण — साहित्य पाठक को स्वयं को समझने और अपने जीवन पर विचार करने का अवसर देता है।

निष्कर्ष: साहित्य केवल दुख का माध्यम नहीं है; वह जीवन के समग्र अनुभव — सुख, दुख, संघर्ष, प्रेम, हास्य — को अभिव्यक्त करता है।
2पाठ के आधार पर बताइए कि उस समय के और वर्तमान समय के पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीकों में क्या अंतर और समानताएँ हैं? आप पढ़ने-पढ़ाने के कौन से तौर-तरीकों के पक्ष में हैं और क्यों?Show solution
दिया गया है: पाठ में शरत् के विद्यार्थी जीवन और उस युग की शिक्षा-पद्धति का वर्णन है।

उस समय के तौर-तरीके:
- गुरुकुल या पाठशाला में शिक्षा दी जाती थी जहाँ अनुशासन अत्यंत कठोर था।
- शिक्षक का भय और दंड-विधान शिक्षा का अनिवार्य अंग था।
- रटने पर अधिक बल दिया जाता था।
- पाठ्यक्रम सीमित था; व्यावहारिक ज्ञान कम था।
- शिक्षा का माध्यम प्रायः संस्कृत या मातृभाषा थी।
- विद्यार्थी की जिज्ञासा और रचनात्मकता को प्रोत्साहन कम मिलता था।

वर्तमान समय के तौर-तरीके:
- विद्यालयों में आधुनिक तकनीक (स्मार्टबोर्ड, इंटरनेट) का उपयोग होता है।
- शारीरिक दंड प्रतिबंधित है; शिक्षक-छात्र संबंध अधिक मैत्रीपूर्ण है।
- समझ और विश्लेषण पर बल दिया जाता है।
- पाठ्यक्रम व्यापक और बहुविषयक है।
- सह-शैक्षिक गतिविधियों को महत्त्व दिया जाता है।

समानताएँ:
- परीक्षा-प्रणाली दोनों युगों में विद्यमान है।
- गृहकार्य (होमवर्क) की परंपरा दोनों में है।
- शिक्षक का मार्गदर्शन दोनों में अनिवार्य है।
- पुस्तकें दोनों युगों में शिक्षा का आधार हैं।

हम किस पक्ष में हैं:
हम वर्तमान शिक्षा-पद्धति के पक्ष में हैं, परंतु उसमें उस समय की अनुशासन-भावना और गुरु के प्रति आदर का समावेश होना चाहिए। वर्तमान पद्धति में बच्चे की रचनात्मकता, तर्कशक्ति और व्यक्तित्व-विकास को प्राथमिकता दी जाती है, जो अधिक उचित है। भय से नहीं, प्रेम और प्रेरणा से दी गई शिक्षा अधिक स्थायी और प्रभावशाली होती है।
3पाठ में अनेक अंश बाल सुलभ चंचलताओं, शरारतों को बहुत रोचक ढंग से उजागर करते हैं। आपको कौन सा अंश अच्छा लगा और क्यों?Show solution
दिया गया है: पाठ में शरत् की बचपन की शरारतों और चंचलताओं का जीवंत चित्रण है।

हमें सबसे अच्छा लगा अंश:
वह अंश जिसमें शरत् नाना के घर के निषिद्ध कार्यों को चुपके से करता है — जैसे पेड़ों पर चढ़ना, तालाब में तैरना, आम-जामुन तोड़ना और अपाठ्य पुस्तकें पढ़ना — यह अंश हमें सबसे अधिक रोचक लगा।

क्यों अच्छा लगा:
1. यह अंश हर बच्चे के स्वभाव को प्रतिबिंबित करता है। जो चीज़ मना हो, उसे करने की इच्छा बचपन में सबसे प्रबल होती है।
2. इस अंश में शरत् की जिज्ञासु, साहसी और स्वतंत्र प्रकृति का परिचय मिलता है जो आगे चलकर उनके लेखन में भी दिखती है।
3. लेखक ने इसे इतने सहज और हास्यपूर्ण ढंग से लिखा है कि पाठक को अपना बचपन याद आ जाता है।
4. यह अंश यह भी बताता है कि बच्चे की स्वाभाविक जिज्ञासा को दबाने से वह और अधिक उत्सुक हो जाता है।

निष्कर्ष: यह अंश बाल-मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण है और पाठक के मन में एक आत्मीय जुड़ाव उत्पन्न करता है।
4नाना के घर किन-किन बातों का निषेध था? शरत् को उन निषिद्ध कार्यों को करना क्यों प्रिय था?Show solution
दिया गया है: पाठ में शरत् के नाना के घर के नियमों और शरत् की शरारतों का वर्णन है।

नाना के घर निषिद्ध बातें:
1. पेड़ों पर चढ़ना मना था।
2. तालाब या नदी में तैरना मना था।
3. आम, जामुन आदि फल तोड़ना मना था।
4. अपाठ्य पुस्तकें (जो पाठ्यक्रम से बाहर हों) पढ़ना मना था।
5. बाहर घूमना-फिरना और आवारागर्दी करना मना था।
6. अनावश्यक खेल-कूद और शरारतें करना मना था।

शरत् को निषिद्ध कार्य क्यों प्रिय थे:
1. स्वाभाविक बाल-प्रवृत्ति: बच्चे का स्वभाव होता है कि जो चीज़ मना हो, उसे करने में उसे अधिक आनंद आता है। शरत् भी इसके अपवाद नहीं थे।
2. स्वतंत्र प्रकृति: शरत् स्वभाव से ही स्वतंत्र और यायावर प्रकृति के थे। बंधन उन्हें असह्य लगते थे।
3. जिज्ञासा: उनके मन में हर नई चीज़ को जानने-समझने की गहरी जिज्ञासा थी।
4. साहसी स्वभाव: वे जोखिम उठाने से नहीं डरते थे, इसलिए पेड़ पर चढ़ना या तालाब में तैरना उन्हें रोमांचक लगता था।
5. रचनात्मक मन: अपाठ्य पुस्तकें पढ़ने की रुचि उनके साहित्यिक मन का प्रारंभिक संकेत था।

निष्कर्ष: शरत् की यही विद्रोही और जिज्ञासु प्रवृत्ति आगे चलकर उनके महान साहित्यकार बनने का आधार बनी।
5आपको शरत् और उसके पिता मोतीलाल के स्वभाव में क्या समानताएँ नजर आती हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया है: पाठ में शरत् और उनके पिता मोतीलाल दोनों के स्वभाव का वर्णन है।

शरत् और मोतीलाल के स्वभाव में समानताएँ:

1. यायावर प्रकृति (घुमक्कड़ स्वभाव):
- मोतीलाल एक स्थान पर टिककर नहीं रहते थे। वे नौकरी छोड़कर एक शहर से दूसरे शहर घूमते रहते थे।
- शरत् भी बचपन से ही घर में बंधकर नहीं रहते थे। वे गाँव-गाँव घूमते, नदी-तालाब में तैरते और जंगलों में भटकते थे।

2. अपरिग्रही स्वभाव (संग्रह न करना):
- मोतीलाल धन-संपत्ति जोड़ने में रुचि नहीं रखते थे। वे जो कमाते, उड़ा देते थे।
- शरत् भी जीवन भर अपरिग्रही रहे। उन्होंने कभी धन-संचय को महत्त्व नहीं दिया।

3. स्वप्नजीवी और कल्पनाशील:
- मोतीलाल अनेक योजनाएँ बनाते थे, नाटक लिखते थे, परंतु उन्हें पूरा नहीं कर पाते थे।
- शरत् भी बचपन से कल्पनाशील थे और कहानियाँ गढ़ने में रुचि रखते थे।

4. व्यावहारिकता का अभाव:
- मोतीलाल परिवार की जिम्मेदारियों से बेपरवाह रहते थे।
- शरत् भी जीवन के व्यावहारिक पक्ष की अपेक्षा साहित्य और कल्पना को अधिक महत्त्व देते थे।

निष्कर्ष: पिता के स्वभाव की छाप पुत्र पर स्पष्ट दिखती है। शरत् की यायावरी, अपरिग्रह और कल्पनाशीलता उन्हें अपने पिता मोतीलाल से विरासत में मिली थी।
6क्या अभाव, अधूरापन मनुष्य के लिए प्रेरणादायी हो सकता है?Show solution
विचार-बिंदु: यह एक विचारात्मक प्रश्न है जिसका उत्तर शरत् के जीवन के संदर्भ में देना है।

हाँ, अभाव और अधूरापन प्रेरणादायी हो सकता है — तर्क सहित:

1. शरत् का उदाहरण: शरत् ने बचपन से घोर दरिद्रता, पारिवारिक अस्थिरता और सामाजिक उपेक्षा झेली। इन्हीं अभावों ने उनके भीतर संवेदनशीलता और मानवीय पीड़ा को समझने की अद्भुत क्षमता विकसित की। उनकी रचनाओं में दरिद्रता और पीड़ा के जो जीवंत चित्र हैं, वे उनके स्वयं के भोगे हुए अनुभव हैं।

2. संघर्ष से शक्ति: जो व्यक्ति अभाव में पला होता है, वह जीवन की कठिनाइयों से लड़ना सीख जाता है। उसमें धैर्य, साहस और जिजीविषा का विकास होता है।

3. रचनात्मकता का स्रोत: अभाव मनुष्य को नए रास्ते खोजने के लिए विवश करता है। अनेक महान कलाकार, लेखक और वैज्ञानिक अभावग्रस्त परिवारों से आए हैं।

4. सफलता की कद्र: जो व्यक्ति अभाव में जीया हो, वह सफलता और सुख की कीमत समझता है।

परंतु एक सीमा भी है:
अत्यधिक अभाव कभी-कभी मनुष्य को तोड़ भी देता है। इसलिए अभाव तभी प्रेरणादायी होता है जब व्यक्ति में उससे लड़ने की इच्छाशक्ति हो।

निष्कर्ष: शरत् का जीवन इस बात का प्रमाण है कि अभाव और अधूरापन मनुष्य को तोड़ते नहीं, बल्कि उसे माँजते हैं और उसकी प्रतिभा को निखारते हैं।
7"जो रुदन के विभिन्न रूपों को पहचानता है वह साधारण बालक नहीं है। बड़ा होकर वह निश्चय ही मनस्तत्व के व्यापार में प्रसिद्ध होगा।" अघोर बाबू के मित्र की इस टिप्पणी पर अपनी टिप्पणी कीजिए।Show solution
दिया गया है: अघोर बाबू के मित्र ने बालक शरत् के बारे में यह टिप्पणी की थी।

टिप्पणी का संदर्भ:
बालक शरत् ने एक बार रोते हुए बच्चे के रुदन के विभिन्न स्वरों और भावों को पहचाना और उनका विश्लेषण किया। यह देखकर अघोर बाबू के मित्र ने यह भविष्यवाणी की।

हमारी टिप्पणी:

1. टिप्पणी सटीक और दूरदर्शी थी: अघोर बाबू के मित्र की यह टिप्पणी पूर्णतः सत्य सिद्ध हुई। शरतचंद्र आगे चलकर हिंदी और बांग्ला साहित्य के महानतम मनोवैज्ञानिक कथाकार बने। उनकी रचनाओं में मानव-मन की गहराइयों का अद्वितीय चित्रण है।

2. बाल-प्रतिभा की पहचान: यह टिप्पणी बताती है कि किसी बच्चे की असाधारण प्रतिभा उसके बचपन में ही प्रकट होने लगती है। जो बच्चा दूसरों की भावनाओं को इतनी सूक्ष्मता से समझ सके, वह निश्चय ही संवेदनशील और प्रतिभाशाली है।

3. मनोविज्ञान और साहित्य का संबंध: शरत् की रचनाओं में स्त्री-पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण, उनकी पीड़ा और संघर्ष का जो सजीव वर्णन है, वह इसी बचपन की संवेदनशीलता का परिपक्व रूप है।

4. 'मनस्तत्व के व्यापार में प्रसिद्ध' — यह सच हुआ: शरतचंद्र की 'देवदास', 'चरित्रहीन', 'श्रीकांत', 'परिणीता' जैसी रचनाएँ मानव-मन के जटिल भावों की अद्भुत व्याख्या हैं।

निष्कर्ष: अघोर बाबू के मित्र की यह टिप्पणी एक सच्चे पारखी की दृष्टि का प्रमाण है। बालक शरत् में जो असाधारण संवेदनशीलता थी, वही उनकी महानता का बीज था।
8शरतचंद्र के जीवन की घटनाओं से आपके जीवन की जो भी घटना मेल खाती है उसके बारे में लिखिए।Show solution
निर्देश: यह एक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित प्रश्न है। विद्यार्थी अपने जीवन की घटना लिखें। नीचे एक नमूना उत्तर दिया जा रहा है।

नमूना उत्तर:

शरतचंद्र के जीवन में एक घटना है जिसमें वे नाना के घर के निषिद्ध नियमों को तोड़कर पेड़ों पर चढ़ते और तालाब में तैरते थे। इसी प्रकार मेरे जीवन में भी एक ऐसी घटना है।

मेरे घर में परीक्षा के दिनों में खेलने पर मनाही थी। परंतु जब भी मौका मिलता, मैं चुपके से मित्रों के साथ क्रिकेट खेलने चला जाता था। एक बार परीक्षा से एक दिन पहले मैं खेलने गया और देर से लौटा। माँ को पता चल गया और उन्होंने डाँटा। परंतु उस दिन मैंने महसूस किया कि खेल के बाद मन इतना तरोताज़ा हो गया था कि रात को पढ़ाई बहुत अच्छी हुई और परीक्षा में भी अच्छे अंक आए।

इस घटना से मुझे लगा कि शरत् की तरह मेरे मन में भी स्वतंत्रता की चाह थी और बंधनों को तोड़ने में एक अलग ही आनंद था। शरत् की यायावर प्रकृति और मेरी खेल-प्रेमी प्रकृति में एक समानता है — दोनों ही बंधन से मुक्त होकर जीना चाहते थे।

नोट: विद्यार्थी अपने वास्तविक अनुभव के आधार पर उत्तर लिखें।
9क्या आप अपने गाँव और परिवेश से कभी मुक्त हो सकते हैं?Show solution
संदर्भ: पाठ के अंत में कहा गया है कि शरत् 'इस गाँव के ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सका।'

हमारा उत्तर — नहीं, हम अपने गाँव और परिवेश से कभी मुक्त नहीं हो सकते:

1. जड़ों का महत्त्व: जिस मिट्टी में हम पले-बढ़े हैं, वह हमारे व्यक्तित्व की नींव होती है। हमारी भाषा, संस्कार, खान-पान, रहन-सहन — सब उसी परिवेश की देन हैं।

2. स्मृतियों का बंधन: बचपन की यादें, गाँव की गलियाँ, खेत-खलिहान, नदी-तालाब — ये सब हमारे मन में इतनी गहराई से बसे होते हैं कि हम चाहकर भी उन्हें भुला नहीं सकते।

3. शरत् का उदाहरण: शरत् ने जीवन भर देश-विदेश में भ्रमण किया, परंतु उनकी रचनाओं में बंगाल के गाँव, नदियाँ और वहाँ के लोग सदा जीवित रहे। उनका साहित्य उनके परिवेश का ऋण चुकाने का प्रयास था।

4. परिवेश हमारी पहचान है: हम जहाँ से आते हैं, वह हमारी पहचान का अभिन्न अंग है। उससे मुक्त होने का प्रयास अपनी जड़ों को काटने जैसा है।

5. सकारात्मक दृष्टि: इस बंधन से मुक्त होने की आवश्यकता भी नहीं है। यह बंधन हमें शक्ति देता है, प्रेरणा देता है और हमें हमारी असली पहचान से जोड़े रखता है।

निष्कर्ष: अपने गाँव और परिवेश से मुक्ति न तो संभव है और न ही वांछनीय। जैसे वृक्ष अपनी जड़ों से जितना गहरा जुड़ा होता है, उतना ही ऊँचा उठता है — उसी प्रकार हम भी अपने परिवेश से जुड़कर ही महान बन सकते हैं।

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