संध्या के बाद (सुमित्रानंदन पंत)
Manipur Board · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for संध्या के बाद (सुमित्रानंदन पंत) — Manipur Board Class 11 Hindi.
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प्रश्न-अभ्यास
1संध्या के समय प्रकृति में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं, कविता के आधार पर लिखिए।Show solution
उत्तर:
कविता के आधार पर संध्या के समय प्रकृति में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं —
1. आकाश का रंग बदलना: सूर्यास्त के समय आकाश ताम्रवर्णी (तांबे जैसा लाल) हो जाता है। पीपल के पत्ते स्वर्णिम आभा से चमकने लगते हैं, मानो सैकड़ों मुखों से सुनहरे झरने झर रहे हों।
2. मंदिर के कलश का दीप्तिमान होना: संध्या की लालिमा में मंदिर का कलश दीपशिखा की भाँति जलता हुआ प्रतीत होता है, मानो वह आकाश में नीराजन (आरती) कर रहा हो।
3. पक्षियों का कलरव: सोन (सुनहरे) पक्षियों की पंक्तियाँ आर्द्र (भीगी) ध्वनि से नीरव आकाश को मुखरित करती हैं।
4. नदी का दृश्य: नदी की मंथर (धीमी) धारा में संध्या की छाया पड़ती है। बगुले तट पर स्थिर खड़े रहते हैं।
5. गोधूलि का वातावरण: गाय-बैलों के लौटने से गोरज (गोधूलि) उड़ती है और बस्ती में धुंधलका छा जाता है।
6. अंधकार का फैलना: धीरे-धीरे गाढ़ी नींद के अजगर की भाँति अंधकार पूरी बस्ती को निगलने लगता है।
निष्कर्ष: कवि ने संध्याकालीन प्रकृति के सौंदर्य को अत्यंत सजीव एवं चित्रात्मक शैली में प्रस्तुत किया है।
2पंत जी ने नदी के तट का जो वर्णन किया है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
उत्तर:
पंत जी ने नदी के तट का अत्यंत मनोरम एवं भावपूर्ण वर्णन किया है। संध्या के समय नदी की धारा मंथर (धीमी) गति से बह रही है। नदी की लहरें (ऊर्मियाँ) शांत हैं। तट पर बालू (सिकता) बिछी हुई है।
नदी के तट पर वृद्धाएँ और विधवाएँ बगुलों की भाँति एकटक बैठी जप-ध्यान में मगन हैं। उनका बाहरी जीवन जितना शांत दिखता है, भीतर से उतना ही गहरा रुदन (अंतर-रोदन) है, जो नदी की मंथर धारा में अदृश्य रूप से बहता जा रहा है।
इस प्रकार कवि ने नदी के तट के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ वहाँ बैठी स्त्रियों की पीड़ा को भी जोड़कर एक करुण एवं मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।
3बस्ती के छोटे से गाँव के अवसाद को किन-किन उपकरणों द्वारा अभिव्यक्त किया गया है?Show solution
उत्तर:
कवि ने गाँव की बस्ती के अवसाद (उदासी एवं निराशा) को निम्नलिखित उपकरणों (बिम्बों एवं प्रतीकों) द्वारा अभिव्यक्त किया है —
1. ढिबरी की मंद रोशनी: झोपड़ियों में जलती ढिबरी की क्षीण ज्योति गरीबी और अंधकारमय जीवन का प्रतीक है।
2. थकी-हारी स्त्री का चित्र: खेतों से लौटती थकी हुई स्त्री जिसके जीवन की परिभाषा ही 'बिना आय की क्लांति' बन गई है — यह ग्रामीण जीवन की दयनीय दशा को व्यक्त करता है।
3. बुद्धिया का आटा लेने आना: बेचारी बुद्धिया का आध-पाव आटा लेने आना और लाला द्वारा डंडी मारना — यह शोषण और गरीबी का प्रतीक है।
4. घूघू की चीख: डालों में घूघू (उल्लू) का चीखना उदासी और अशुभ वातावरण का प्रतीक है।
5. बंद दरवाजे: लोगों का दरवाजे बंद कर लेना — एकाकीपन और निराशा का बोध कराता है।
6. अजगर-सी नींद: 'गाढ़ अलस निद्रा का अजगर' — यह बस्ती की जड़ता, निष्क्रियता और अवसाद का सशक्त प्रतीक है।
7. मन का जाला बुनना: 'मन से कढ़ अवसाद श्रांति / आँखों के आगे बुनती जाला' — यह मानसिक थकान और निराशा को व्यक्त करता है।
निष्कर्ष: इन सभी उपकरणों के माध्यम से कवि ने ग्रामीण जीवन की दरिद्रता, शोषण और उदासी को बड़े प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है।
4लाला के मन में उठनेवाली दुविधा को अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
उत्तर:
कविता में लाला एक दुकानदार है। जब बुद्धिया आध-पाव आटा लेने आती है, तो लाला के मन में दुविधा उत्पन्न होती है। एक ओर उसके मन में यह विचार आता है कि वह ईमानदारी से सही तौल करे और बुद्धिया को उचित मात्रा में आटा दे। दूसरी ओर उसके मन में लालच और स्वार्थ है — वह डंडी मारकर (तराजू में कम तौलकर) अधिक लाभ कमाना चाहता है।
अंततः लालच की जीत होती है और वह डंडी मारता है। इस प्रकार लाला की दुविधा ईमानदारी और बेईमानी के बीच की है — नैतिकता और स्वार्थ के बीच का द्वंद्व है। यह दुविधा वास्तव में उस सामाजिक व्यवस्था की देन है जहाँ व्यापारी वर्ग गरीबों का शोषण करता है।
5सामाजिक समानता की छवि की कल्पना किस तरह अभिव्यक्त हुई है?Show solution
उत्तर:
कवि पंत जी ने कविता में एक आदर्श समाज की कल्पना की है जहाँ सामाजिक समानता हो। वे चाहते हैं कि —
1. कर्म और गुण के आधार पर वितरण हो: समाज में प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्म और गुण के अनुसार फल मिले, न कि जाति, धन या वंश के आधार पर।
2. शोषण का अंत हो: लाला जैसे व्यापारी बुद्धिया जैसी गरीब महिलाओं का शोषण न करें।
3. समान अवसर मिलें: खेतों में काम करने वाली स्त्री को उचित पारिश्रमिक मिले ताकि 'बिना आय की क्लांति' उसके जीवन की परिभाषा न बने।
4. व्यक्ति नहीं, व्यवस्था दोषी है: कवि स्पष्ट करते हैं कि व्यक्ति नहीं, बल्कि जग की परिपाटी (सामाजिक व्यवस्था) दोषी है। अतः व्यवस्था में परिवर्तन लाकर समानता स्थापित की जा सकती है।
निष्कर्ष: कवि की सामाजिक समानता की कल्पना एक ऐसे समाज की है जहाँ शोषण न हो, सबको उचित अवसर मिले और कर्म के आधार पर फल का वितरण हो।
6'कर्म और गुण के समान'……….हो वितरण' पंक्ति के माध्यम से कवि कैसे समाज की ओर संकेत कर रहा है?Show solution
उत्तर:
इस पंक्ति के माध्यम से कवि एक समतामूलक एवं न्यायपूर्ण समाज की ओर संकेत कर रहा है।
कवि का आशय:
1. कवि चाहते हैं कि समाज में धन, संपत्ति और अवसरों का वितरण व्यक्ति के कर्म (परिश्रम) और गुण (योग्यता) के आधार पर हो।
2. वर्तमान समाज में जन्म, जाति, धन और वंश के आधार पर विषमता है — कुछ लोग बिना परिश्रम के सुख भोगते हैं और कुछ कठोर परिश्रम करके भी भूखे रहते हैं।
3. कवि इस वर्ग-विषमता को समाप्त करना चाहते हैं। वे समाजवादी दृष्टिकोण से प्रेरित हैं जहाँ 'जितना काम, उतना दाम' का सिद्धांत लागू हो।
4. बुद्धिया जैसी गरीब महिला और लाला जैसे शोषक व्यापारी के बीच की खाई को पाटने के लिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है।
निष्कर्ष: कवि एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना करता है जहाँ समानता, न्याय और कर्म-आधारित वितरण हो — यह प्रगतिवादी चेतना का स्पष्ट उदाहरण है।
7निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए –
(क) तट पर बगुलों-सी वृद्धाएँ / विधवाएँ जप ध्यान में मगन, / मंथर धारा में बहता / जिनका अदृश्य, गति अंतर-रोदन!Show solution
काव्य-सौंदर्य:
भाव-सौंदर्य:
इन पंक्तियों में कवि ने नदी के तट पर बैठी वृद्धाओं और विधवाओं का मार्मिक चित्रण किया है। वे बाहर से जप-ध्यान में मगन दिखती हैं, परंतु उनके भीतर गहरा दुःख और रुदन है जो नदी की मंथर धारा में अदृश्य रूप से बहता रहता है। यह बाह्य शांति और आंतरिक पीड़ा का अद्भुत विरोधाभास है।
शिल्प-सौंदर्य:
1. उपमा अलंकार: 'बगुलों-सी वृद्धाएँ' — वृद्धाओं की तुलना बगुलों से की गई है। जैसे बगुले एकटक स्थिर खड़े रहते हैं, वैसे ही वृद्धाएँ ध्यानमग्न बैठी हैं।
2. मानवीकरण: नदी की धारा में 'अंतर-रोदन' का बहना — निर्जीव नदी को मानवीय भावना से जोड़ा गया है।
3. विरोधाभास (विभावना): बाहर से शांत, भीतर से रोती हुई स्त्रियों का चित्रण।
4. बिम्ब-योजना: दृश्य बिम्ब अत्यंत सजीव है — नदी का तट, बगुले, ध्यानमग्न स्त्रियाँ।
5. भाषा: तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली, प्रवाहमयी एवं संगीतात्मक।
6. करुण रस की प्रधानता है।
निष्कर्ष: ये पंक्तियाँ भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से अत्यंत सुंदर एवं मार्मिक हैं।
8(क)आशय स्पष्ट कीजिए – ताम्रपर्ण, पीपल से, शतमुख/झरते चंचल स्वर्णिम निर्झर!Show solution
आशय:
इन पंक्तियों में कवि ने संध्याकालीन पीपल के वृक्ष का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है।
संध्या के समय सूर्य की लालिमा में पीपल के पत्ते ताँबे जैसे लाल-सुनहरे हो जाते हैं। पीपल के असंख्य पत्ते हवा में हिलते हुए ऐसे लगते हैं मानो सैकड़ों मुखों (शतमुख) से चंचल, सुनहरे झरने (स्वर्णिम निर्झर) झर रहे हों।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर प्रयोग है। पत्तों की हलचल को झरने से उपमित किया गया है। 'शतमुख' में अतिशयोक्ति है। संध्या के प्रकाश में प्रकृति का स्वर्णिम सौंदर्य उभरकर आता है।
8(ख)आशय स्पष्ट कीजिए – दीप शिखा-सा ज्वलित कलश/ नभ में उठकर करता नीराजन!Show solution
आशय:
संध्या के समय जब सूर्य की लाल-सुनहरी किरणें मंदिर के कलश पर पड़ती हैं, तो वह कलश दीपक की लौ (दीपशिखा) की भाँति जलता-चमकता प्रतीत होता है। ऐसा लगता है मानो वह कलश आकाश में ऊँचा उठकर संपूर्ण ब्रह्मांड की आरती (नीराजन) कर रहा हो।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ उपमा अलंकार है — 'दीपशिखा-सा ज्वलित कलश'। मानवीकरण भी है — कलश को नीराजन करते हुए दिखाया गया है। यह पंक्ति आध्यात्मिक भाव और प्रकृति-सौंदर्य का अद्भुत संगम है।
8(ग)आशय स्पष्ट कीजिए – सोन खगों की पाँति/आर्द्र ध्वनि से नीरव नभ करती मुखरित!Show solution
आशय:
संध्या के समय सुनहरे (सोन) पक्षियों की पंक्तियाँ (पाँति) आकाश में उड़ती हैं। उनकी नम (आर्द्र), भीगी-भीगी ध्वनि से शांत और नीरव (चुप) आकाश मुखरित (गूँजायमान) हो उठता है।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ विरोधाभास है — नीरव नभ का मुखरित होना। श्रव्य बिम्ब (आर्द्र ध्वनि) और दृश्य बिम्ब (सोन खगों की पाँति) का सुंदर समन्वय है। 'आर्द्र ध्वनि' में पक्षियों की करुण पुकार का भाव है जो संध्या की उदासी को और गहरा करती है।
8(घ)आशय स्पष्ट कीजिए – मन से कढ़ अवसाद श्रांति/आँखों के आगे बुनती जाला!Show solution
आशय:
इन पंक्तियों में कवि ने थकी-हारी ग्रामीण स्त्री की मानसिक दशा का चित्रण किया है। दिनभर खेतों में कठोर परिश्रम करने के बाद उसके मन में जो अवसाद (उदासी) और श्रांति (थकान) है, वह इतनी गहरी है कि उसकी आँखों के सामने एक जाला-सा बुन जाता है — अर्थात् थकान और निराशा से उसकी दृष्टि धुंधली हो जाती है, वह स्पष्ट नहीं देख पाती।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ रूपक अलंकार है — अवसाद और श्रांति को जाला बुनने वाले के रूप में चित्रित किया गया है। यह मनोवैज्ञानिक बिम्ब है जो मानसिक थकान को दृश्यात्मक रूप देता है।
8(ड.)आशय स्पष्ट कीजिए – क्षीण ज्योति ने चुपके ज्यों/गोपन मन को दे दी हो भाषा!Show solution
आशय:
झोपड़ी में जलती ढिबरी की क्षीण (मंद, कमजोर) रोशनी थकी हुई स्त्री के मन की गुप्त (गोपन) पीड़ा को जैसे वाणी दे देती है। अर्थात् उस मंद प्रकाश में स्त्री के मन के वे भाव जो वह कह नहीं सकती, जो उसके भीतर दबे हैं — वे सब जैसे प्रकट हो जाते हैं। ढिबरी की टिमटिमाती रोशनी उसकी आंतरिक पीड़ा की प्रतीक बन जाती है।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है ('ज्यों' से)। प्रतीकात्मकता है — क्षीण ज्योति गरीबी और दबी हुई पीड़ा का प्रतीक है। भाषा सरल किंतु भावपूर्ण है।
8(च)आशय स्पष्ट कीजिए – बिना आय की क्लांति बन रही / उसके जीवन की परिभाषा!Show solution
आशय:
इन पंक्तियों में कवि ने ग्रामीण मजदूर स्त्री की दयनीय दशा का चित्रण किया है। वह स्त्री दिनभर खेतों में कठोर परिश्रम करती है, परंतु उसे उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता। बिना उचित आय के उसकी थकान (क्लांति) ही उसके जीवन की पहचान बन गई है — अर्थात् उसका पूरा जीवन केवल थकान, गरीबी और शोषण का पर्याय बनकर रह गया है।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ सामाजिक यथार्थ का मार्मिक चित्रण है। 'जीवन की परिभाषा' में व्यंग्य है। यह पंक्ति प्रगतिवादी चेतना की द्योतक है जो शोषण के विरुद्ध आवाज उठाती है।
8(छ)आशय स्पष्ट कीजिए – व्यक्ति नहीं, जग की परिपाटी / दोषी जन के दु:ख क्लेश की।Show solution
आशय:
इन पंक्तियों में कवि एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक सत्य उद्घाटित करता है। कवि का कहना है कि समाज में जो गरीब, शोषित और पीड़ित लोग हैं — जैसे बुद्धिया, थकी हुई मजदूर स्त्री — उनके दुःख और क्लेश के लिए वे स्वयं दोषी नहीं हैं। दोषी है — जग की परिपाटी अर्थात् समाज की वह व्यवस्था, वे रूढ़ियाँ और परंपराएँ जो विषमता, शोषण और अन्याय को बनाए रखती हैं।
काव्य-सौंदर्य: यह पंक्ति प्रगतिवादी विचारधारा का सार है। कवि व्यक्ति को नहीं, व्यवस्था को दोषी ठहराता है। भाषा सरल, सीधी और प्रभावशाली है। यह पंक्ति सामाजिक परिवर्तन का आह्वान करती है।
योग्यता-विस्तार
1ग्राम्य जीवन से संबंधित कविताओं का संकलन कीजिए।Show solution
1. 'ग्राम श्री' — सुमित्रानंदन पंत
2. 'बादल राग' — सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
3. 'यह धरती कितना देती है' — सुमित्रानंदन पंत
4. 'गाँव का घर' — ज्ञानेंद्रपति
5. 'मेरे देश की धरती' — गुलशन बावरा
6. 'पूस की रात' (कविता रूप में) — प्रेमचंद की कहानी पर आधारित
विद्यार्थी इन कविताओं को पुस्तकालय से या इंटरनेट से खोजकर अपनी कॉपी में संकलित करें।
2कविता में निम्नलिखित उपमान किसके लिए आए हैं, लिखिए –
(क) ज्योति स्तंभ-सा
(ख) केंचुल-सा
(ग) दीपशिखा-सा
(घ) बगुलों-सी
(ङ) स्वर्ण चूर्ण-सी
(च) सनन् तीर-साShow solution
उत्तर:
| उपमान | किसके लिए आया है |
|---|---|
| (क) ज्योति स्तंभ-सा | संध्याकालीन आकाश में चमकते सूर्य या प्रकाश-स्तंभ के लिए (तरुशिखर/वृक्ष के ऊपरी भाग के लिए) |
| (ख) केंचुल-सा | नदी के किनारे की रेत (सिकता) की पट्टी के लिए — जो साँप की केंचुल की तरह फैली हुई है |
| (ग) दीपशिखा-सा | मंदिर के ज्वलित (चमकते) कलश के लिए |
| (घ) बगुलों-सी | नदी के तट पर ध्यानमग्न बैठी वृद्धाओं और विधवाओं के लिए |
| (ङ) स्वर्ण चूर्ण-सी | संध्याकालीन सूर्य की सुनहरी धूल जैसी आभा के लिए (गोरज/गोधूलि के लिए) |
| (च) सनन् तीर-सा | तेज गति से उड़ते हुए पक्षी के लिए |
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