सूरदास — NCERT Solutions
Meghalaya Board · Class 10 · Hindi
NCERT Solutions for सूरदास, Meghalaya Board Class 10 Hindi: 15 textbook questions solved step by step. Part of the Meghalaya Board Class 10 Hindi syllabus.
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पद (ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी / मन की मन ही माँझ रही / हमारैं हरि हारिल की लकरी / हरि हैं राजनीति पढ़ि आए)
1गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' (भाग्यवान) कहती हैं।
व्यंग्य का स्पष्टीकरण:
गोपियाँ उद्धव को भाग्यवान इसलिए कहती हैं क्योंकि वे प्रेम के बंधन से सर्वथा मुक्त हैं — न उनका मन किसी से जुड़ा है, न वे किसी के प्रेम में पड़े हैं। वे कमल के पत्ते की तरह जल में रहकर भी उससे अलिप्त हैं और तेल लगे घड़े की तरह प्रेम-रस से अछूते हैं।
व्यंग्य यह है कि जो व्यक्ति श्रीकृष्ण जैसे परम प्रेमास्पद के सान्निध्य में रहकर भी उनके प्रेम से वंचित रहा, वह वास्तव में अभागा है, भाग्यवान नहीं। गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कह रही हैं कि उद्धव ने कृष्ण का सामीप्य पाकर भी उनके प्रेम का रसास्वादन नहीं किया — यह उनका दुर्भाग्य है, सौभाग्य नहीं।
निष्कर्ष: 'बड़भागी' शब्द में गहरा व्यंग्य है — उद्धव प्रेम-रस से वंचित रहे, इसीलिए गोपियाँ उन्हें 'भाग्यवान' कहकर वास्तव में उनकी भावशून्यता पर कटाक्ष करती हैं।
2उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव के व्यवहार की तुलना दो वस्तुओं से करती हैं।
तुलनाएँ:
(i) कमल के पत्ते से:
जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार उद्धव कृष्ण के निकट रहते हुए भी उनके प्रेम से सर्वथा अछूते रहे। उन पर प्रेम का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
(ii) तेल लगे घड़े से:
जिस प्रकार तेल लगे घड़े पर जल की एक बूँद भी नहीं टिकती, उसी प्रकार उद्धव के हृदय पर कृष्ण-प्रेम की एक बूँद भी नहीं ठहरी। वे प्रेम-भावना से सर्वथा निर्लिप्त रहे।
निष्कर्ष: इन दोनों तुलनाओं के माध्यम से गोपियाँ उद्धव की भावशून्यता और प्रेम के प्रति उनकी उदासीनता पर व्यंग्य करती हैं।
3गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव को विभिन्न उदाहरणों द्वारा उलाहना देती हैं।
उदाहरण एवं उलाहने:
(i) कमल-पत्र और तेल-घड़े का उदाहरण: उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम से अछूते रहे — यह उनकी भावहीनता का प्रमाण है।
(ii) प्रीति-नदी में पाँव न बोरने का उलाहना: गोपियाँ कहती हैं कि उद्धव ने प्रेम की नदी में अपने पाँव तक नहीं डुबोए, अर्थात् प्रेम का अनुभव ही नहीं किया।
(iii) योग का संदेश लाने का उलाहना: जो गोपियाँ पहले से ही विरह की अग्नि में जल रही थीं, उनके पास उद्धव योग का संदेश लेकर आए — यह उनकी पीड़ा में घी डालने जैसा था।
(iv) हारिल पक्षी का उदाहरण: जैसे हारिल पक्षी अपने पंजों में लकड़ी को कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने कृष्ण को अपने हृदय में दृढ़ता से पकड़ा हुआ है — उद्धव का योग-संदेश उन्हें कृष्ण से विमुख नहीं कर सकता।
(v) मन चकरी वाले लोगों को योग देने की बात: गोपियाँ कहती हैं कि योग की शिक्षा उन्हें दो जिनका मन अस्थिर है, हमारा मन तो कृष्ण में ही रमा है।
निष्कर्ष: इन सभी उदाहरणों द्वारा गोपियाँ उद्धव को यह बताती हैं कि उनका योग-संदेश गोपियों के लिए व्यर्थ है।
4उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ पहले से ही कृष्ण के वियोग में जल रही थीं।
स्पष्टीकरण:
गोपियाँ कृष्ण के विरह में पहले से ही व्याकुल और पीड़ित थीं। वे कृष्ण के लौट आने की प्रतीक्षा में थीं। ऐसे में उन्हें आशा थी कि उद्धव कृष्ण का कोई प्रेम-संदेश लेकर आए होंगे।
किंतु उद्धव ने प्रेम-संदेश के स्थान पर निर्गुण ब्रह्म की उपासना और योग-साधना का संदेश दिया। यह संदेश गोपियों की विरह-वेदना को शांत करने के बजाय और अधिक बढ़ाने वाला था।
जिस प्रकार जलती हुई आग में घी डालने से आग और भड़क उठती है, उसी प्रकार उद्धव के योग-संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि को और तीव्र कर दिया। कृष्ण को भूलकर निर्गुण ब्रह्म की उपासना करना गोपियों के लिए असंभव था — इस संदेश ने उनकी पीड़ा को दोगुना कर दिया।
निष्कर्ष: योग का संदेश गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम इसलिए किया क्योंकि इससे उनकी पीड़ा कम होने के बजाय और अधिक बढ़ गई।
5'मरजादा न लही' के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ कहती हैं कि 'मरजादा न लही' अर्थात् मर्यादा नहीं रही।
मर्यादा का आशय:
यहाँ दो प्रकार की मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ है:
(i) कृष्ण द्वारा प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन: कृष्ण ने गोपियों से प्रेम का वचन दिया था, उनके साथ प्रेम-संबंध स्थापित किया था। किंतु मथुरा जाने के बाद उन्होंने गोपियों की सुध नहीं ली और योग का संदेश भेज दिया — यह प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन है।
(ii) राजधर्म की मर्यादा का उल्लंघन: कृष्ण अब राजनीति में पड़ गए हैं। एक राजा का धर्म है कि वह प्रजा की रक्षा करे, उनके दुःख दूर करे। किंतु कृष्ण ने गोपियों की विरह-वेदना की उपेक्षा की — यह राजधर्म की मर्यादा का उल्लंघन है।
निष्कर्ष: 'मरजादा न लही' से गोपियों का आशय है कि कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा और राजधर्म दोनों का पालन नहीं किया।
6कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को विभिन्न प्रतीकों और उदाहरणों द्वारा व्यक्त करती हैं।
प्रेम की अभिव्यक्ति के तरीके:
(i) हारिल पक्षी का प्रतीक: जैसे हारिल पक्षी अपने पंजों में एक लकड़ी को सदा थामे रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने कृष्ण को अपने मन और हृदय में दृढ़ता से पकड़ा हुआ है। वे कृष्ण को कभी नहीं भूल सकतीं।
(ii) गुड़ में चींटी का प्रतीक: जैसे चींटी गुड़ में लिपट जाती है और उसे छोड़ नहीं पाती, वैसे ही गोपियाँ कृष्ण-प्रेम में इस तरह रम गई हैं कि उनसे अलग होना संभव नहीं।
(iii) जागते-सोते, दिन-रात कृष्ण का स्मरण: गोपियाँ कहती हैं कि वे सोते-जागते, दिन-रात केवल कृष्ण का नाम जपती रहती हैं।
(iv) मन की बात मन में रखना: गोपियों ने अपनी विरह-व्यथा किसी से नहीं कही, मन की बात मन में ही रखी — यह उनके एकनिष्ठ प्रेम का प्रमाण है।
निष्कर्ष: गोपियों का कृष्ण-प्रेम अनन्य, अटूट और एकनिष्ठ है — वे किसी भी परिस्थिति में कृष्ण को नहीं भूल सकतीं।
7गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश को अपने लिए अनुपयुक्त बताती हैं।
गोपियों का कथन:
गोपियाँ कहती हैं कि योग की शिक्षा उन लोगों को दो जिनका मन चंचल और अस्थिर है — जिन्हें 'मन चकरी' कहा गया है, अर्थात् जिनका मन किसी एक स्थान पर नहीं टिकता, जो भटकते रहते हैं।
गोपियों का मन तो पहले से ही कृष्ण में पूरी तरह रमा हुआ है — वे एकनिष्ठ प्रेमिकाएँ हैं। उनके लिए योग की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनका मन पहले से ही एक लक्ष्य (कृष्ण) पर केंद्रित है।
निष्कर्ष: गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं — योग उन्हें दो जिनका मन अस्थिर है; हमारा मन तो कृष्ण में ही लगा है, हमें योग की क्या आवश्यकता?
8प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।Show solution
दिया गया संदर्भ: उद्धव गोपियों को निर्गुण ब्रह्म की उपासना और योग-साधना का संदेश देते हैं।
गोपियों का दृष्टिकोण:
(i) योग को अनावश्यक मानना: गोपियाँ योग-साधना को अपने लिए पूर्णतः अनावश्यक मानती हैं। उनका मन पहले से ही कृष्ण-प्रेम में लीन है।
(ii) योग को 'व्याधि' मानना: गोपियाँ योग के संदेश को एक रोग (व्याधि) की संज्ञा देती हैं जो उनके लिए पीड़ादायक है।
(iii) योग को विरहाग्नि बढ़ाने वाला मानना: उद्धव का योग-संदेश उनकी विरह-वेदना को शांत नहीं करता, बल्कि उसे और बढ़ाता है।
(iv) सगुण प्रेम को श्रेष्ठ मानना: गोपियाँ निर्गुण ब्रह्म की अपेक्षा सगुण कृष्ण के प्रत्यक्ष प्रेम को श्रेष्ठ मानती हैं। वे कहती हैं कि जो कृष्ण को देख-सुन सकती हैं, उनके लिए निराकार ब्रह्म की उपासना संभव नहीं।
(v) योग को अव्यावहारिक मानना: गोपियाँ कहती हैं कि योग उन लोगों के लिए है जिनका मन अस्थिर है, हमारा मन तो कृष्ण में स्थिर है।
निष्कर्ष: गोपियाँ योग-साधना को अपने लिए अनुपयुक्त, कष्टदायक और व्यर्थ मानती हैं। उनके लिए कृष्ण-प्रेम ही सर्वोच्च साधना है।
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Frequently Asked Questions
What are the important topics in सूरदास for Meghalaya Board Class 10 Hindi?
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