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Chapter 1 of 32
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ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी मन की मन ही माँझ रही हमारैं हरि हारिल की लकरी हरि हैं राजनीति पढ़ि आए

Bihar Board · Class 10 · Hindi

NCERT Solutions for ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी मन की मन ही माँझ रही हमारैं हरि हारिल की लकरी हरि हैं राजनीति पढ़ि आए — Bihar Board Class 10 Hindi.

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सूरदास के जन्म, निवास, गुरु, प्रमुख ग्रंथों और निधन को दर्शाने वाली एक समयरेखा।
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15 Questions Solved · 1 Section

सूरदास — पद (ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी / मन की मन ही माँझ रही / हमारैं हरि हारिल की लकरी / हरि हैं राजनीति पढ़ि आए)

1गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' (भाग्यवान) कहती हैं।

व्यंग्य का स्पष्टीकरण:
गोपियाँ उद्धव को भाग्यवान इसलिए कहती हैं क्योंकि वे प्रेम के बंधन से सर्वथा मुक्त हैं — न उनका मन किसी से जुड़ा है, न वे किसी के प्रेम में पड़े हैं। वे कमल के पत्ते की तरह जल में रहकर भी उससे अलिप्त हैं और तेल लगे घड़े की तरह प्रेम-रस से अछूते हैं।

व्यंग्य यह है कि जो व्यक्ति श्रीकृष्ण जैसे परम प्रेमास्पद के सान्निध्य में रहकर भी उनके प्रेम से वंचित रहा, वह वास्तव में अभागा है, भाग्यवान नहीं। गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कह रही हैं कि उद्धव ने कृष्ण का सामीप्य पाकर भी उनके प्रेम का रसास्वादन नहीं किया — यह उनका दुर्भाग्य है, सौभाग्य नहीं।

निष्कर्ष: 'बड़भागी' शब्द में गहरा व्यंग्य है — उद्धव प्रेम-रस से वंचित रहे, इसीलिए गोपियाँ उन्हें 'भाग्यवान' कहकर वास्तव में उनकी भावशून्यता पर कटाक्ष करती हैं।
2उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव के व्यवहार की तुलना दो वस्तुओं से करती हैं।

तुलनाएँ:

(i) कमल के पत्ते से:
जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार उद्धव कृष्ण के निकट रहते हुए भी उनके प्रेम से सर्वथा अछूते रहे। उन पर प्रेम का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

(ii) तेल लगे घड़े से:
जिस प्रकार तेल लगे घड़े पर जल की एक बूँद भी नहीं टिकती, उसी प्रकार उद्धव के हृदय पर कृष्ण-प्रेम की एक बूँद भी नहीं ठहरी। वे प्रेम-भावना से सर्वथा निर्लिप्त रहे।

निष्कर्ष: इन दोनों तुलनाओं के माध्यम से गोपियाँ उद्धव की भावशून्यता और प्रेम के प्रति उनकी उदासीनता पर व्यंग्य करती हैं।
3गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव को विभिन्न उदाहरणों द्वारा उलाहना देती हैं।

उदाहरण एवं उलाहने:

(i) कमल-पत्र और तेल-घड़े का उदाहरण: उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम से अछूते रहे — यह उनकी भावहीनता का प्रमाण है।

(ii) प्रीति-नदी में पाँव न बोरने का उलाहना: गोपियाँ कहती हैं कि उद्धव ने प्रेम की नदी में अपने पाँव तक नहीं डुबोए, अर्थात् प्रेम का अनुभव ही नहीं किया।

(iii) योग का संदेश लाने का उलाहना: जो गोपियाँ पहले से ही विरह की अग्नि में जल रही थीं, उनके पास उद्धव योग का संदेश लेकर आए — यह उनकी पीड़ा में घी डालने जैसा था।

(iv) हारिल पक्षी का उदाहरण: जैसे हारिल पक्षी अपने पंजों में लकड़ी को कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने कृष्ण को अपने हृदय में दृढ़ता से पकड़ा हुआ है — उद्धव का योग-संदेश उन्हें कृष्ण से विमुख नहीं कर सकता।

(v) मन चकरी वाले लोगों को योग देने की बात: गोपियाँ कहती हैं कि योग की शिक्षा उन्हें दो जिनका मन अस्थिर है, हमारा मन तो कृष्ण में ही रमा है।

निष्कर्ष: इन सभी उदाहरणों द्वारा गोपियाँ उद्धव को यह बताती हैं कि उनका योग-संदेश गोपियों के लिए व्यर्थ है।
4उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ पहले से ही कृष्ण के वियोग में जल रही थीं।

स्पष्टीकरण:
गोपियाँ कृष्ण के विरह में पहले से ही व्याकुल और पीड़ित थीं। वे कृष्ण के लौट आने की प्रतीक्षा में थीं। ऐसे में उन्हें आशा थी कि उद्धव कृष्ण का कोई प्रेम-संदेश लेकर आए होंगे।

किंतु उद्धव ने प्रेम-संदेश के स्थान पर निर्गुण ब्रह्म की उपासना और योग-साधना का संदेश दिया। यह संदेश गोपियों की विरह-वेदना को शांत करने के बजाय और अधिक बढ़ाने वाला था।

जिस प्रकार जलती हुई आग में घी डालने से आग और भड़क उठती है, उसी प्रकार उद्धव के योग-संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि को और तीव्र कर दिया। कृष्ण को भूलकर निर्गुण ब्रह्म की उपासना करना गोपियों के लिए असंभव था — इस संदेश ने उनकी पीड़ा को दोगुना कर दिया।

निष्कर्ष: योग का संदेश गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम इसलिए किया क्योंकि इससे उनकी पीड़ा कम होने के बजाय और अधिक बढ़ गई।
5'मरजादा न लही' के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ कहती हैं कि 'मरजादा न लही' अर्थात् मर्यादा नहीं रही।

मर्यादा का आशय:
यहाँ दो प्रकार की मर्यादाओं का उल्लंघन हुआ है:

(i) कृष्ण द्वारा प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन: कृष्ण ने गोपियों से प्रेम का वचन दिया था, उनके साथ प्रेम-संबंध स्थापित किया था। किंतु मथुरा जाने के बाद उन्होंने गोपियों की सुध नहीं ली और योग का संदेश भेज दिया — यह प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन है।

(ii) राजधर्म की मर्यादा का उल्लंघन: कृष्ण अब राजनीति में पड़ गए हैं। एक राजा का धर्म है कि वह प्रजा की रक्षा करे, उनके दुःख दूर करे। किंतु कृष्ण ने गोपियों की विरह-वेदना की उपेक्षा की — यह राजधर्म की मर्यादा का उल्लंघन है।

निष्कर्ष: 'मरजादा न लही' से गोपियों का आशय है कि कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा और राजधर्म दोनों का पालन नहीं किया।
6कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को विभिन्न प्रतीकों और उदाहरणों द्वारा व्यक्त करती हैं।

प्रेम की अभिव्यक्ति के तरीके:

(i) हारिल पक्षी का प्रतीक: जैसे हारिल पक्षी अपने पंजों में एक लकड़ी को सदा थामे रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने कृष्ण को अपने मन और हृदय में दृढ़ता से पकड़ा हुआ है। वे कृष्ण को कभी नहीं भूल सकतीं।

(ii) गुड़ में चींटी का प्रतीक: जैसे चींटी गुड़ में लिपट जाती है और उसे छोड़ नहीं पाती, वैसे ही गोपियाँ कृष्ण-प्रेम में इस तरह रम गई हैं कि उनसे अलग होना संभव नहीं।

(iii) जागते-सोते, दिन-रात कृष्ण का स्मरण: गोपियाँ कहती हैं कि वे सोते-जागते, दिन-रात केवल कृष्ण का नाम जपती रहती हैं।

(iv) मन की बात मन में रखना: गोपियों ने अपनी विरह-व्यथा किसी से नहीं कही, मन की बात मन में ही रखी — यह उनके एकनिष्ठ प्रेम का प्रमाण है।

निष्कर्ष: गोपियों का कृष्ण-प्रेम अनन्य, अटूट और एकनिष्ठ है — वे किसी भी परिस्थिति में कृष्ण को नहीं भूल सकतीं।
7गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश को अपने लिए अनुपयुक्त बताती हैं।

गोपियों का कथन:
गोपियाँ कहती हैं कि योग की शिक्षा उन लोगों को दो जिनका मन चंचल और अस्थिर है — जिन्हें 'मन चकरी' कहा गया है, अर्थात् जिनका मन किसी एक स्थान पर नहीं टिकता, जो भटकते रहते हैं।

गोपियों का मन तो पहले से ही कृष्ण में पूरी तरह रमा हुआ है — वे एकनिष्ठ प्रेमिकाएँ हैं। उनके लिए योग की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनका मन पहले से ही एक लक्ष्य (कृष्ण) पर केंद्रित है।

निष्कर्ष: गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं — योग उन्हें दो जिनका मन अस्थिर है; हमारा मन तो कृष्ण में ही लगा है, हमें योग की क्या आवश्यकता?
8प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।Show solution
दिया गया संदर्भ: उद्धव गोपियों को निर्गुण ब्रह्म की उपासना और योग-साधना का संदेश देते हैं।

गोपियों का दृष्टिकोण:

(i) योग को अनावश्यक मानना: गोपियाँ योग-साधना को अपने लिए पूर्णतः अनावश्यक मानती हैं। उनका मन पहले से ही कृष्ण-प्रेम में लीन है।

(ii) योग को 'व्याधि' मानना: गोपियाँ योग के संदेश को एक रोग (व्याधि) की संज्ञा देती हैं जो उनके लिए पीड़ादायक है।

(iii) योग को विरहाग्नि बढ़ाने वाला मानना: उद्धव का योग-संदेश उनकी विरह-वेदना को शांत नहीं करता, बल्कि उसे और बढ़ाता है।

(iv) सगुण प्रेम को श्रेष्ठ मानना: गोपियाँ निर्गुण ब्रह्म की अपेक्षा सगुण कृष्ण के प्रत्यक्ष प्रेम को श्रेष्ठ मानती हैं। वे कहती हैं कि जो कृष्ण को देख-सुन सकती हैं, उनके लिए निराकार ब्रह्म की उपासना संभव नहीं।

(v) योग को अव्यावहारिक मानना: गोपियाँ कहती हैं कि योग उन लोगों के लिए है जिनका मन अस्थिर है, हमारा मन तो कृष्ण में स्थिर है।

निष्कर्ष: गोपियाँ योग-साधना को अपने लिए अनुपयुक्त, कष्टदायक और व्यर्थ मानती हैं। उनके लिए कृष्ण-प्रेम ही सर्वोच्च साधना है।
9गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ कृष्ण पर राजनीति में पड़ जाने का आरोप लगाती हैं।

गोपियों के अनुसार राजधर्म:

गोपियों के अनुसार राजा का धर्म है:

(i) प्रजा की रक्षा करना: राजा को अपनी प्रजा के दुःख-दर्द को दूर करना चाहिए। उसे प्रजा की पीड़ा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

(ii) अन्याय न करना: राजा को अनीति (अन्याय) का आचरण नहीं करना चाहिए। कृष्ण ने गोपियों के साथ जो किया वह अनीति है।

(iii) मर्यादा का पालन करना: राजा को अपने वचन और प्रतिज्ञा का पालन करना चाहिए — मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।

(iv) कमज़ोरों की सहायता करना: राजा को उन लोगों की सहायता करनी चाहिए जो उस पर निर्भर हैं और जो उसकी शरण में हैं।

निष्कर्ष: गोपियों के अनुसार कृष्ण ने राजा बनने के बाद राजधर्म का पालन नहीं किया — उन्होंने अपनी प्रजा (गोपियों) की पीड़ा की उपेक्षा की और अनीति का आचरण किया।
10गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ कहती हैं कि यदि कृष्ण ने ऐसा व्यवहार किया तो वे अपना मन वापस माँगती हैं।

कृष्ण में दिखे परिवर्तन:

(i) राजनीति में लिप्त हो जाना: कृष्ण जो पहले प्रेम और भक्ति के प्रतीक थे, अब राजनीति पढ़ आए हैं — वे राजनीतिक चालें चलने लगे हैं।

(ii) प्रेम के बदले योग का संदेश भेजना: पहले कृष्ण स्वयं प्रेम करते थे, अब उन्होंने योग का नीरस संदेश भेजा — यह उनके स्वभाव में बड़ा परिवर्तन है।

(iii) अनीति का आचरण: कृष्ण ने गोपियों के साथ अन्याय किया — उनकी विरह-वेदना की उपेक्षा की।

(iv) मर्यादा का उल्लंघन: कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा नहीं रखी — यह उनके पूर्व स्वभाव के विपरीत है।

(v) परहित से स्वार्थ की ओर: पहले कृष्ण दूसरों के कल्याण के लिए घूमते-फिरते थे, अब वे स्वयं राजसत्ता में लिप्त हो गए हैं।

निष्कर्ष: कृष्ण के इन परिवर्तनों को देखकर गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं कि यदि कृष्ण ऐसे हो गए हैं तो वे अपना मन वापस पा लेना चाहती हैं।
11गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए।Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ सामान्य ग्रामीण स्त्रियाँ हैं, फिर भी उन्होंने ज्ञानी उद्धव को वाद-विवाद में परास्त कर दिया।

वाक्चातुर्य की विशेषताएँ:

(i) व्यंग्यात्मकता: गोपियाँ सीधे आरोप न लगाकर व्यंग्य के माध्यम से अपनी बात कहती हैं — जैसे उद्धव को 'बड़भागी' कहना।

(ii) तर्कसंगतता: गोपियाँ अपनी बात को तर्कों से सिद्ध करती हैं। वे कहती हैं कि जिनका मन अस्थिर है उन्हें योग दो, हमें नहीं — यह तर्क अकाट्य है।

(iii) उपयुक्त उदाहरणों का प्रयोग: हारिल पक्षी, कमल-पत्र, तेल-घड़ा, गुड़-चींटी जैसे सटीक उदाहरणों से वे अपनी बात को प्रभावशाली बनाती हैं।

(iv) भावनात्मक अपील: गोपियाँ अपनी विरह-वेदना को इस प्रकार प्रस्तुत करती हैं कि उद्धव निरुत्तर हो जाते हैं।

(v) प्रत्युत्पन्नमतित्व: गोपियाँ तत्काल उचित उत्तर देने में सक्षम हैं — उद्धव के हर तर्क का जवाब उनके पास है।

(vi) सरल भाषा में गहरी बात: गोपियाँ सरल ब्रजभाषा में ऐसी गहरी बातें कहती हैं जो उद्धव के ज्ञान को चुनौती देती हैं।

(vii) निडरता: गोपियाँ बिना किसी भय के कृष्ण पर भी आरोप लगाती हैं — 'हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।'

निष्कर्ष: गोपियों का वाक्चातुर्य व्यंग्य, तर्क, उदाहरण और भावना के अद्भुत समन्वय से युक्त है जिसने ज्ञानी उद्धव को भी निरुत्तर कर दिया।
12संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए।Show solution
दिया गया संदर्भ: सूरदास के भ्रमरगीत में गोपियाँ उद्धव (भ्रमर/मधुकर) को उत्तर देती हैं।

भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ:

(i) सगुण भक्ति की श्रेष्ठता: भ्रमरगीत में सगुण (साकार) कृष्ण-प्रेम को निर्गुण (निराकार) ब्रह्म की उपासना से श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है।

(ii) विरह-वर्णन: गोपियों की विरह-वेदना का अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रण इसकी प्रमुख विशेषता है।

(iii) व्यंग्य और वाक्चातुर्य: गोपियाँ व्यंग्यपूर्ण भाषा में उद्धव के ज्ञान को चुनौती देती हैं — यह भ्रमरगीत की अनूठी विशेषता है।

(iv) उपमाओं और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग: हारिल, कमल-पत्र, तेल-घड़ा, गुड़-चींटी जैसे सजीव प्रतीकों का प्रयोग काव्य को सजीव बनाता है।

(v) लोकजीवन से जुड़ाव: गोपियों की भाषा और उदाहरण लोकजीवन से लिए गए हैं जो इसे सहज और प्रभावशाली बनाते हैं।

(vi) ज्ञान पर प्रेम की विजय: भ्रमरगीत में प्रेम (भक्ति) को ज्ञान से श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है।

(vii) ब्रजभाषा का माधुर्य: सूरदास ने ब्रजभाषा की मधुर शैली में इन पदों की रचना की है।

(viii) नारी-मनोविज्ञान का चित्रण: गोपियों के माध्यम से प्रेमिका के हृदय की गहराइयों का सुंदर चित्रण किया गया है।

निष्कर्ष: सूर का भ्रमरगीत विरह-वर्णन, व्यंग्य, सगुण भक्ति और वाक्चातुर्य का अनूठा संगम है।
13गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए। (रचना और अभिव्यक्ति)Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश को अस्वीकार करने के लिए अनेक तर्क देती हैं।

कल्पना से अतिरिक्त तर्क:

(i) प्रेम का अनुभव ज्ञान से बड़ा है: हे उद्धव! तुम ज्ञान की बातें करते हो, किंतु जिसने प्रेम का अनुभव नहीं किया, वह प्रेम का मूल्य क्या जाने? जैसे अंधे को रंगों का ज्ञान नहीं होता, वैसे ही तुम्हें प्रेम का बोध नहीं है।

(ii) योग मन को और अधिक भटकाएगा: जो मन कृष्ण में रमा है, उसे योग द्वारा कृष्ण से हटाने का प्रयास करोगे तो वह और अधिक व्याकुल हो जाएगा — जैसे बाँध तोड़ने पर नदी और उफन पड़ती है।

(iii) निर्गुण ब्रह्म को देखा-सुना नहीं जा सकता: हम तो उसी को प्रेम करती हैं जिसे देखा है, सुना है, जिसके साथ खेली हैं। जो दिखता ही नहीं, उसे कैसे प्रेम करें?

(iv) प्रेम छोड़ना मृत्यु के समान है: जैसे मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही हम कृष्ण-प्रेम के बिना जीवित नहीं रह सकतीं — योग हमारे लिए विष के समान है।

निष्कर्ष: ये तर्क गोपियों की प्रेम-भावना की गहराई और उनकी तर्कशक्ति को और अधिक उजागर करते हैं।
14उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखरित हो उठी? (रचना और अभिव्यक्ति)Show solution
दिया गया संदर्भ: उद्धव शास्त्र-ज्ञानी और नीतिज्ञ थे, फिर भी गोपियों ने उन्हें परास्त कर दिया।

गोपियों की शक्ति:

(i) अनन्य प्रेम की शक्ति: गोपियों के पास कृष्ण के प्रति अटूट, निःस्वार्थ और एकनिष्ठ प्रेम था। यह प्रेम उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी। सच्चे प्रेम से उत्पन्न वाणी में एक विशेष प्रभाव होता है जो शास्त्र-ज्ञान को भी परास्त कर देता है।

(ii) भावनात्मक सत्य: गोपियाँ जो कह रही थीं वह उनका जीया हुआ सत्य था — उनकी पीड़ा वास्तविक थी। इस भावनात्मक सत्य के सामने उद्धव का शास्त्रीय ज्ञान निष्प्रभावी हो गया।

(iii) व्यावहारिक बुद्धि: गोपियाँ भले ही शास्त्र नहीं जानती थीं, किंतु उनके पास तीव्र व्यावहारिक बुद्धि थी जिससे वे उद्धव के हर तर्क का उचित उत्तर दे सकीं।

(iv) निडरता और आत्मविश्वास: प्रेम ने गोपियों को निडर बना दिया था। वे बिना किसी भय के अपनी बात कह सकती थीं।

(v) लोकज्ञान और अनुभव: गोपियों के पास जीवन का व्यावहारिक अनुभव था जो उनके उदाहरणों और तर्कों में प्रकट होता है।

निष्कर्ष: गोपियों की शक्ति उनका अनन्य प्रेम, भावनात्मक सत्य और व्यावहारिक बुद्धि थी — यही उनके वाक्चातुर्य का स्रोत था।
15गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नज़र आता है, स्पष्ट कीजिए। (रचना और अभिव्यक्ति)Show solution
दिया गया संदर्भ: गोपियाँ कहती हैं — 'हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।'

गोपियों के कथन का आशय:
गोपियाँ यह इसलिए कहती हैं क्योंकि कृष्ण ने मथुरा जाकर राजनीति सीख ली है। अब वे प्रेम और भावना की भाषा नहीं बोलते, बल्कि चतुराई और स्वार्थ की भाषा बोलते हैं। उन्होंने गोपियों की विरह-वेदना को दूर करने के बजाय योग का नीरस संदेश भेजा — यह राजनीतिक चालाकी है। राजनीति में संबंध स्वार्थ पर आधारित होते हैं, प्रेम पर नहीं।

समकालीन राजनीति में विस्तार:
हाँ, गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है:

(i) आज के राजनेता भी चुनाव से पहले जनता से अनेक वादे करते हैं, किंतु सत्ता में आने के बाद उन वादों को भूल जाते हैं — ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण ने गोपियों से किए वचन भूल गए।

(ii) राजनीति में भावना और प्रेम का स्थान स्वार्थ और सत्ता ले लेती है।

(iii) जनता की पीड़ा को दूर करने के बजाय नेता उन्हें 'योग' जैसे उपदेश देते हैं — अर्थात् समस्याओं का समाधान न करके उपदेश देते हैं।

निष्कर्ष: गोपियों का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है — राजनीति में आने के बाद व्यक्ति अपने मूल स्वभाव और प्रेम को भूल जाता है तथा स्वार्थ और चतुराई को अपना लेता है।

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