संवदिया (फणीश्वरनाथ 'रेणु')
Bihar Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for संवदिया (फणीश्वरनाथ 'रेणु') — Bihar Board Class 12 Hindi.
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1संवदिया की क्या विशेषताएँ हैं और गाँववालों के मन में संवदिया की क्या अवधारणा है?Show solution
संवदिया की विशेषताएँ:
1. विश्वसनीयता: संवदिया एक ऐसा व्यक्ति होता है जिस पर संदेश भेजने वाला पूरा भरोसा करता है। वह गोपनीय बातें भी उसी को सौंपता है।
2. स्मरण-शक्ति: संवदिया को संदेश मौखिक रूप से याद रखना होता है और ज्यों-का-त्यों पहुँचाना होता है। उसकी स्मरण-शक्ति तीव्र होती है।
3. वाक्पटुता: वह संदेश को उसी भाव, स्वर और लहजे में सुनाता है जिस प्रकार संदेश देने वाले ने कहा हो।
4. निष्ठा एवं ईमानदारी: संवदिया संदेश में कोई मिलावट नहीं करता, वह पूरी निष्ठा से अपना कार्य करता है।
5. शारीरिक सक्षमता: लंबी यात्राएँ करने के लिए उसे शारीरिक रूप से सक्षम होना आवश्यक है।
गाँववालों की अवधारणा:
गाँववालों के मन में संवदिया के प्रति एक विशेष धारणा है — 'संवदिया डटकर खाता है और अफर कर सोता है।' अर्थात् लोग समझते हैं कि संवदिया का काम आसान है — वह जहाँ जाता है, वहाँ खाता-पीता है और आराम से सोता है। लोग उसे एक साधारण दूत मानते हैं जिसका काम केवल संदेश पहुँचाना है, परंतु वास्तव में यह कार्य अत्यंत जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का होता है।
निष्कर्ष: संवदिया केवल संदेशवाहक नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच भावनात्मक सेतु होता है।
2बड़ी हवेली से बुलावा आने पर हरगोबिन के मन में किस प्रकार की आशंका हुई?Show solution
हरगोबिन की आशंकाएँ:
बड़ी हवेली से बुलावा आने पर हरगोबिन के मन में अनेक प्रकार की आशंकाएँ उत्पन्न हुईं —
1. दंड का भय: हरगोबिन को लगा कि शायद उससे कोई गलती हुई है और हवेली के मालिक उसे दंड देना चाहते हैं।
2. बकाया का डर: उसे आशंका हुई कि शायद हवेली का कोई पुराना हिसाब-किताब बाकी है जिसके लिए उसे बुलाया जा रहा है।
3. अपमान का भय: चूँकि हवेली की शान पहले जैसी नहीं रही थी, फिर भी उसके मन में यह डर था कि कहीं उसे अपमानित न किया जाए।
4. अनिश्चितता: हरगोबिन का कलेजा धड़कने लगा क्योंकि वह नहीं जानता था कि बुलावे का कारण क्या है।
इस प्रकार बुलावे की सूचना पाते ही हरगोबिन के मन में भय, आशंका और घबराहट का मिला-जुला भाव उत्पन्न हो गया। वह सोचने लगा कि न जाने क्या होगा।
3बड़ी बहुरिया अपने मायके संदेश क्यों भेजना चाहती थी?Show solution
संदेश भेजने के कारण:
बड़ी बहुरिया की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उसके संदेश भेजने के निम्नलिखित कारण थे —
1. आर्थिक दुर्दशा: हवेली की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी। पहले की समृद्धि समाप्त हो चुकी थी। बड़ी बहुरिया को दो वक्त का भोजन भी ठीक से नहीं मिलता था।
2. एकाकीपन और उपेक्षा: ससुराल में उसकी कोई सुध लेने वाला नहीं था। देवर-जेठ सब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त थे। वह अकेलेपन से त्रस्त थी।
3. मायके जाने की इच्छा: वह अपने मायके वालों को संदेश भेजकर यह जानना चाहती थी कि क्या वे उसे अपने पास बुला सकते हैं। वह ससुराल की दुर्दशा से मुक्ति चाहती थी।
4. भावनात्मक पीड़ा: 'बधुआ साग खाकर कब तक जीऊँ' — इस कथन से स्पष्ट है कि वह अपनी दुर्दशा से व्यथित थी और मायके में सुख की आशा रखती थी।
निष्कर्ष: बड़ी बहुरिया की विवशता, एकाकीपन और आर्थिक कष्ट ने उसे मायके संदेश भेजने पर विवश किया।
4हरगोबिन बड़ी हवेली में पहुँचकर अतीत की किन स्मृतियों में खो जाता है?Show solution
अतीत की स्मृतियाँ:
हरगोबिन जब बड़ी हवेली में पहुँचता है तो वह अतीत की निम्नलिखित स्मृतियों में खो जाता है —
1. हवेली की पुरानी शान: हरगोबिन को याद आता है कि कभी यह हवेली कितनी भव्य और समृद्ध थी। यहाँ हाथी-घोड़े बँधते थे, नौकर-चाकर थे और चारों ओर रौनक थी।
2. बड़े बाबू की याद: उसे हवेली के पूर्व मालिक बड़े बाबू की याद आती है जो बड़े रौबदार और दयालु थे। उनके समय में हवेली में जीवन था।
3. उत्सव और समारोह: पहले हवेली में त्योहार, विवाह और अन्य उत्सव धूमधाम से मनाए जाते थे। उन दिनों की खुशहाली उसे याद आती है।
4. अपना बचपन: हरगोबिन को अपने बचपन की स्मृतियाँ भी आती हैं जब वह इस हवेली में आता-जाता था और यहाँ के लोग उसे स्नेह देते थे।
5. हवेली की वर्तमान दुर्दशा: अतीत की स्मृतियों से तुलना करते हुए वह वर्तमान की जर्जर हवेली को देखकर दुखी होता है।
निष्कर्ष: अतीत की स्मृतियाँ हरगोबिन को भावुक कर देती हैं और वह हवेली के पतन पर मन-ही-मन दुखी होता है।
5संवाद कहते वक्त बड़ी बहुरिया की आँखें क्यों छलछला आई?Show solution
आँखें छलछलाने के कारण:
संवाद कहते समय बड़ी बहुरिया की आँखें निम्नलिखित कारणों से छलछला आईं —
1. अपनी दुर्दशा का स्मरण: जब वह अपनी पीड़ा, एकाकीपन और आर्थिक कष्ट को शब्दों में व्यक्त करने लगी तो उसका दर्द उमड़ पड़ा।
2. मायके की याद: मायके के लोगों को संदेश भेजते समय उसे अपने सुखद बचपन और मायके के प्रेम की याद आई जिससे वह भावुक हो गई।
3. विवशता का बोध: वह जानती थी कि एक विवाहिता स्त्री के लिए मायके से सहायता माँगना कितना कठिन और अपमानजनक है, फिर भी विवशता में उसे ऐसा करना पड़ रहा था।
4. ससुराल की उपेक्षा: ससुराल में उसकी उपेक्षा और अकेलेपन की पीड़ा जब शब्दों में ढली तो वह रो पड़ी।
5. भविष्य की अनिश्चितता: उसे यह भी नहीं पता था कि मायके वाले उसे स्वीकार करेंगे या नहीं, इस अनिश्चितता ने भी उसे भावुक किया।
निष्कर्ष: बड़ी बहुरिया की आँखों का छलछलाना उसकी संचित पीड़ा, विवशता और भावनात्मक टूटन का प्रतीक है।
6गाड़ी पर सवार होने के बाद संवदिया के मन में काँटे की चुभन का अनुभव क्यों हो रहा था। उससे छुटकारा पाने के लिए उसने क्या उपाय सोचा?Show solution
काँटे की चुभन का कारण:
गाड़ी पर सवार होने के बाद हरगोबिन के मन में काँटे की चुभन इसलिए हो रही थी क्योंकि —
1. संदेश की प्रकृति: बड़ी बहुरिया का संदेश अत्यंत करुण और पीड़ादायक था। वह एक असहाय स्त्री की व्यथा थी जिसे वह मायके तक पहुँचाने जा रहा था।
2. नैतिक द्वंद्व: हरगोबिन के मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि क्या वह इस संदेश को सुनाने में सक्षम होगा। एक विवाहिता स्त्री की इस प्रकार की पीड़ा को दूसरों के सामने कहना उसे उचित नहीं लग रहा था।
3. बड़ी बहुरिया के प्रति सहानुभूति: वह बड़ी बहुरिया को माँ के समान मानता था, इसलिए उनकी पीड़ा उसे भीतर तक कचोट रही थी।
4. संदेश सुनाने की कठिनाई: उसे लग रहा था कि 'किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा' — यह विचार उसे बेचैन कर रहा था।
उपाय:
इस चुभन से छुटकारा पाने के लिए हरगोबिन ने यह उपाय सोचा कि वह जलालगढ़ पहुँचकर बड़ी बहुरिया के भाई को संदेश नहीं सुनाएगा, बल्कि उन्हें स्वयं गाँव चलकर अपनी बहन की स्थिति देखने के लिए कहेगा। इस प्रकार वह संदेश की पीड़ादायक विषयवस्तु को सीधे शब्दों में कहने से बच सकता था।
निष्कर्ष: हरगोबिन की यह बेचैनी उसकी संवेदनशीलता और बड़ी बहुरिया के प्रति उसके आदर का प्रमाण है।
7बड़ी बहुरिया का संवाद हरगोबिन क्यों नहीं सुना सका?Show solution
संवाद न सुना पाने के कारण:
हरगोबिन बड़ी बहुरिया का संदेश निम्नलिखित कारणों से नहीं सुना सका —
1. भावनात्मक कमज़ोरी: बड़ी बहुरिया का संदेश इतना करुण और हृदयविदारक था कि हरगोबिन उसे दूसरों के सामने कहते-कहते भावुक हो जाता था।
2. नैतिक संकोच: एक विवाहिता स्त्री की पीड़ा और उसकी ससुराल की दुर्दशा को मायके वालों के सामने उजागर करना उसे नैतिक रूप से उचित नहीं लगा।
3. बड़ी बहुरिया के प्रति आदर: वह बड़ी बहुरिया को माँ के समान मानता था। उनकी व्यथा को शब्दों में कहना उसे उनका अपमान लगा।
4. संदेश की संवेदनशीलता: संदेश में बड़ी बहुरिया ने अपनी दुर्दशा, भूख और एकाकीपन का वर्णन किया था। इसे सुनाना हरगोबिन के लिए असह्य था।
5. मायके वालों की प्रतिक्रिया का भय: उसे डर था कि यदि उसने संदेश सुनाया तो मायके वाले बड़ी बहुरिया को लेकर चले जाएँगे और गाँव उनसे वंचित हो जाएगा।
निष्कर्ष: हरगोबिन की संवेदनशीलता, नैतिकता और बड़ी बहुरिया के प्रति गहरा लगाव — ये सब मिलकर उसे संदेश सुनाने से रोकते रहे।
8'संवदिया डटकर खाता है और अफर कर सोता है' से क्या आशय है?Show solution
आशय:
इस कथन का शाब्दिक अर्थ है — संवदिया जहाँ भी जाता है, वहाँ पेट भरकर खाता है और आराम से सोता है।
व्यंग्यात्मक अर्थ:
1. गाँव वालों की यह धारणा है कि संवदिया का काम बहुत आसान है। वह केवल संदेश लेकर जाता है और जहाँ पहुँचता है, वहाँ उसका खूब आतिथ्य-सत्कार होता है।
2. लोग समझते हैं कि संवदिया को कोई कठिनाई नहीं होती — न शारीरिक, न मानसिक। वह मुफ्त में खाता-पीता और मौज करता है।
3. इस कथन में संवदिया के प्रति एक प्रकार का व्यंग्य और हल्की ईर्ष्या भी है।
वास्तविकता:
किंतु वास्तव में संवदिया का काम अत्यंत जिम्मेदारी का होता है। उसे संदेश को ज्यों-का-त्यों याद रखना होता है, लंबी यात्राएँ करनी होती हैं और दूसरों की भावनाओं का बोझ उठाना होता है। हरगोबिन का उदाहरण इसी बात को सिद्ध करता है।
निष्कर्ष: यह कथन समाज की उस सतही सोच को उजागर करता है जो किसी के काम की गहराई और कठिनाई को नहीं समझती।
9जलालगढ़ पहुँचने के बाद बड़ी बहुरिया के सामने हरगोबिन ने क्या संकल्प लिया?Show solution
हरगोबिन का संकल्प:
जलालगढ़ से वापस आने के बाद जब हरगोबिन बड़ी बहुरिया के सामने आया तो उसने निम्नलिखित संकल्प लिए —
1. क्षमा-याचना: हरगोबिन ने बड़ी बहुरिया के पैर पकड़कर कहा — "मुझे माफ़ करो। मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका।" उसने अपनी असफलता स्वीकार की।
2. गाँव न छोड़ने की विनती: उसने बड़ी बहुरिया से विनती की — "तुम गाँव छोड़कर मत जाओ।"
3. सेवा का संकल्प: उसने कहा — "मैं तुम्हारा बेटा! बड़ी बहुरिया, तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो!" उसने उन्हें माँ का दर्जा दिया।
4. निठल्लापन छोड़ने का वचन: उसने संकल्प लिया — "मैं अब निठल्ला बैठा नहीं रहूँगा।"
5. सेवा करने का वचन: उसने कहा — "तुम्हारा सब काम करूँगा" और यह भी कि "तुमको कोई कष्ट नहीं होने दूँगा।"
निष्कर्ष: हरगोबिन का यह संकल्प उसकी संवेदनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और बड़ी बहुरिया के प्रति गहरे आदर का प्रतीक है। वह एक सच्चे संवदिया से आगे बढ़कर एक समर्पित पुत्र की भूमिका निभाने को तैयार हो जाता है।
10'डिजिटल इंडिया' के दौर में संवदिया की क्या कोई भूमिका हो सकती है?Show solution
'डिजिटल इंडिया' के दौर में संवदिया की भूमिका:
आज के डिजिटल युग में मोबाइल, इंटरनेट, ई-मेल और सोशल मीडिया के माध्यम से संदेश पल भर में पहुँच जाते हैं। ऐसे में पारंपरिक संवदिया की भूमिका सीमित हो गई है, फिर भी उसकी प्रासंगिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है —
1. भावनात्मक संदेश: डिजिटल माध्यम शब्द तो पहुँचाते हैं, परंतु भावनाएँ, आँसू और हृदय की गहराई नहीं पहुँचा सकते। संवदिया वह सब कुछ पहुँचाता है जो शब्दों से परे है।
2. डिजिटल वंचित वर्ग: आज भी देश के अनेक दूरदराज गाँवों में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच नहीं है। वहाँ संवदिया जैसे व्यक्ति की आवश्यकता बनी रहती है।
3. वृद्ध और अशिक्षित वर्ग: जो लोग डिजिटल तकनीक का उपयोग नहीं कर सकते, उनके लिए संवदिया जैसा विश्वसनीय व्यक्ति आज भी उपयोगी है।
4. नई भूमिका: आज संवदिया 'सामाजिक कार्यकर्ता' या 'सामुदायिक दूत' के रूप में काम कर सकता है जो सरकारी योजनाओं की जानकारी गाँव-गाँव तक पहुँचाए।
5. मानवीय स्पर्श: डिजिटल संचार में मानवीय संवेदना का अभाव होता है। संवदिया वह मानवीय स्पर्श प्रदान करता है जो किसी भी तकनीक से संभव नहीं।
निष्कर्ष: 'डिजिटल इंडिया' के दौर में संवदिया की पारंपरिक भूमिका भले ही कम हो गई हो, परंतु मानवीय संवेदना, भावनात्मक संचार और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उसकी भूमिका आज भी अपरिहार्य है।
भाषा-शिल्प
1इन शब्दों का अर्थ समझिए— काबुली-कायदा, रोम-रोम कलपने लगा, अगहनी धानShow solution
'काबुली' का अर्थ है काबुल (अफगानिस्तान) से संबंधित और 'कायदा' का अर्थ है नियम या तरीका। 'काबुली-कायदा' से तात्पर्य उस कठोर और निर्मम तरीके से है जिसमें कोई दया या रियायत नहीं होती। यह उस व्यवहार को दर्शाता है जो बिल्कुल कठोर, बेरहम और व्यावसायिक हो — जैसे काबुली साहूकार का व्यवहार होता था जो बिना किसी दया के कर्ज वसूलते थे।
रोम-रोम कलपने लगा:
'रोम-रोम' का अर्थ है शरीर का प्रत्येक रोमकूप अर्थात् पूरा शरीर। 'कलपना' का अर्थ है तड़पना, व्याकुल होना या पीड़ा से छटपटाना। इस मुहावरे का अर्थ है — पूरे शरीर में, मन की गहराई तक पीड़ा और व्याकुलता का अनुभव होना। जब कोई बात इतनी दुखद हो कि व्यक्ति का रोम-रोम तड़प उठे।
अगहनी धान:
'अगहन' हिंदी पंचांग का एक महीना है जो नवंबर-दिसंबर के बीच आता है। 'अगहनी धान' उस धान की फसल को कहते हैं जो अगहन के महीने में काटी जाती है। यह खरीफ की फसल होती है और इसे सबसे उत्तम धान माना जाता है। ग्रामीण जीवन में अगहनी धान समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है।
2पाठ से प्रश्नवाचक वाक्यों को छाँटिए और संदर्भ के साथ उन पर टिप्पणी लिखिए।Show solution
(1) 'किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा?'
संदर्भ: यह प्रश्न हरगोबिन के मन में तब उठता है जब वह बड़ी बहुरिया का करुण संदेश लेकर जलालगढ़ की ओर जा रहा होता है।
टिप्पणी: यह प्रश्न हरगोबिन की नैतिक पीड़ा और संवेदनशीलता को व्यक्त करता है। वह एक विवाहिता स्त्री की दुर्दशा को दूसरों के सामने कहने में असमर्थ महसूस करता है। यह प्रश्न उसके अंतर्द्वंद्व का प्रतीक है।
(2) 'बड़ी बहुरिया, तुम... तुम गाँव छोड़कर चली तो नहीं जाओगी? बोलो...!'
संदर्भ: यह प्रश्न हरगोबिन तब पूछता है जब वह जलालगढ़ से वापस आकर बड़ी बहुरिया के सामने होता है।
टिप्पणी: यह प्रश्न हरगोबिन के हृदय की गहरी भावना को व्यक्त करता है। वह बड़ी बहुरिया को गाँव की माँ मानता है और उनके जाने से गाँव का सूनापन उसे असह्य लगता है। यह प्रश्न उसकी विनती और आग्रह दोनों है।
(3) 'हरगोबिन भाई, अब जी कैसा है?'
संदर्भ: यह प्रश्न बड़ी बहुरिया तब पूछती है जब हरगोबिन बेहोश होकर गिर पड़ता है और होश में आता है।
टिप्पणी: यह प्रश्न बड़ी बहुरिया की ममता और करुणा को व्यक्त करता है। वह हरगोबिन की चिंता करती है और उसे दूध पिलाती है। यह प्रश्न उनके मातृत्व भाव का प्रतीक है।
3(क)इन पंक्तियों की व्याख्या कीजिए— (क) बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति का अर्थ है कि जो हवेली कभी अपनी भव्यता, समृद्धि और वैभव के लिए प्रसिद्ध थी, वह अब केवल नाम की ही 'बड़ी हवेली' रह गई है। उसकी वास्तविक बड़ाई और शान समाप्त हो चुकी है।
विस्तार:
- पहले इस हवेली में हाथी-घोड़े बँधते थे, नौकर-चाकर थे, उत्सव होते थे।
- अब हवेली जर्जर हो चुकी है, रौनक समाप्त हो गई है।
- बड़ी बहुरिया को दो वक्त का भोजन भी ठीक से नहीं मिलता।
- हवेली का नाम तो 'बड़ी हवेली' है परंतु उसमें बड़प्पन का कोई चिह्न नहीं बचा।
व्यापक अर्थ: यह पंक्ति सामंती व्यवस्था के पतन और जमींदारी प्रथा के अंत का प्रतीक है। यह उस सामाजिक परिवर्तन को दर्शाती है जिसमें पुरानी व्यवस्थाएँ टूट रही थीं और नई व्यवस्था अभी स्थापित नहीं हुई थी।
3(ख)(ख) हरगोबिन ने देखी अपनी आँखों से द्रौपदी की चीरहरण लीला।Show solution
व्याख्या:
इस पंक्ति में लेखक ने महाभारत के 'द्रौपदी चीरहरण' प्रसंग का प्रतीकात्मक उपयोग किया है।
शाब्दिक अर्थ: महाभारत में जब दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया था, तब वह एक असहाय स्त्री की पीड़ा का प्रतीक बन गया था।
प्रतीकात्मक अर्थ: यहाँ बड़ी बहुरिया की स्थिति की तुलना द्रौपदी से की गई है। जिस प्रकार द्रौपदी भरी सभा में असहाय थी, उसी प्रकार बड़ी बहुरिया अपनी ही हवेली में असहाय, उपेक्षित और पीड़ित है। उसके देवर-जेठ उसकी सुध नहीं लेते, वह भूखी-प्यासी रहती है।
भावार्थ: हरगोबिन ने बड़ी बहुरिया की इस दुर्दशा को देखकर महसूस किया कि यह किसी पौराणिक कथा से कम नहीं — एक सम्मानित स्त्री का इस प्रकार अपमान और उपेक्षा होना 'चीरहरण' से कम नहीं है।
3(ग)(ग) बधुआ साग खाकर कब तक जीऊँ?Show solution
व्याख्या:
शाब्दिक अर्थ: 'बधुआ साग' एक जंगली साग होता है जो अत्यंत सस्ता और निम्न कोटि का होता है। इसे गरीब और विवश लोग खाते हैं। बड़ी बहुरिया कह रही है कि वह इस निम्न कोटि के साग पर कब तक जीवित रह सकती है।
प्रतीकात्मक अर्थ:
1. यह पंक्ति बड़ी बहुरिया की आर्थिक दुर्दशा को व्यक्त करती है। जो स्त्री कभी हवेली की मालकिन थी, वह आज साधारण साग पर जीवन बिता रही है।
2. 'बधुआ साग' केवल भोजन का प्रतीक नहीं, बल्कि उसकी समग्र दुर्दशा, उपेक्षा और अपमान का प्रतीक है।
3. यह पंक्ति उसकी विवशता और मायके जाने की इच्छा को व्यक्त करती है।
भावार्थ: बड़ी बहुरिया इस पंक्ति के माध्यम से अपने मायके वालों को बताना चाहती है कि उसकी स्थिति असह्य हो गई है और वह अब और इस प्रकार नहीं जी सकती।
3(घ)(घ) किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा।Show solution
व्याख्या:
शाब्दिक अर्थ: 'किस मुँह से' एक मुहावरेदार अभिव्यक्ति है जिसका अर्थ है — किस साहस से, किस हिम्मत से या किस प्रकार। हरगोबिन सोच रहा है कि वह इतना करुण और पीड़ादायक संदेश कैसे सुनाएगा।
भावार्थ:
1. नैतिक संकोच: एक विवाहिता स्त्री की पीड़ा और उसकी ससुराल की दुर्दशा को दूसरों के सामने कहना हरगोबिन को नैतिक रूप से उचित नहीं लगता।
2. संवेदनशीलता: वह बड़ी बहुरिया को माँ मानता है, इसलिए उनकी पीड़ा को शब्दों में कहना उसे उनका अपमान लगता है।
3. असमर्थता का बोध: यह पंक्ति हरगोबिन की उस मानसिक स्थिति को व्यक्त करती है जहाँ वह अपने कर्तव्य और अपनी भावनाओं के बीच फँसा हुआ है।
व्यापक अर्थ: यह पंक्ति संवदिया के उस अंतर्द्वंद्व को उजागर करती है जो उसे एक साधारण संदेशवाहक से अलग करता है। हरगोबिन केवल संदेश नहीं पहुँचाता, वह उस संदेश की पीड़ा को भी महसूस करता है।
योग्यता-विस्तार
1संवदिया की भूमिका आपको मिले तो आप क्या करेंगे? संवदिया बनने के लिए किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है?Show solution
यदि मुझे संवदिया की भूमिका मिले तो मैं निम्नलिखित कार्य करूँगा/करूँगी —
1. संदेश को ध्यानपूर्वक सुनूँगा/सुनूँगी: संदेश देने वाले की हर बात को ध्यान से सुनूँगा/सुनूँगी और उसके भाव, स्वर और भावना को भी समझने का प्रयास करूँगा/करूँगी।
2. विश्वसनीयता बनाए रखूँगा/रखूँगी: संदेश में कोई परिवर्तन नहीं करूँगा/करूँगी और उसे ज्यों-का-त्यों पहुँचाऊँगा/पहुँचाऊँगी।
3. संवेदनशीलता: यदि संदेश पीड़ादायक हो तो उसे सुनाने का उचित समय और तरीका चुनूँगा/चुनूँगी।
4. गोपनीयता: संदेश की बात किसी अन्य को नहीं बताऊँगा/बताऊँगी।
संवदिया बनने के लिए आवश्यक बातें:
1. तीव्र स्मरण-शक्ति: संदेश को शब्द-दर-शब्द याद रखने की क्षमता।
2. विश्वसनीयता: संदेश भेजने वाले का पूर्ण विश्वास अर्जित करना।
3. वाक्पटुता: संदेश को उसी भाव और लहजे में सुनाने की कला।
4. संवेदनशीलता: दूसरों की भावनाओं को समझने और उनका सम्मान करने की क्षमता।
5. शारीरिक सक्षमता: लंबी यात्राएँ करने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम होना।
6. गोपनीयता: संदेश को गुप्त रखने की क्षमता।
7. निष्पक्षता: संदेश में अपनी राय न मिलाना।
निष्कर्ष: संवदिया बनना एक बड़ी जिम्मेदारी है जिसके लिए केवल शारीरिक क्षमता नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक परिपक्वता भी आवश्यक है।
2इस कहानी का नाट्य रूपांतरण कर विद्यालय के मंच पर प्रस्तुत कीजिए।Show solution
पात्र:
1. हरगोबिन (संवदिया)
2. बड़ी बहुरिया
3. गाँव के लोग (सामूहिक पात्र)
4. जलालगढ़ के पात्र (बड़ी बहुरिया के मायके वाले)
5. सूत्रधार (कथावाचक)
दृश्य विभाजन:
दृश्य 1 — गाँव में:
हरगोबिन को बड़ी हवेली से बुलावा आता है। गाँव वाले आपस में बातें करते हैं।
दृश्य 2 — बड़ी हवेली में:
हरगोबिन हवेली में पहुँचता है। बड़ी बहुरिया उसे संदेश सुनाती है। उनकी आँखें छलछला आती हैं।
दृश्य 3 — यात्रा का दृश्य:
हरगोबिन गाड़ी पर सवार होकर जलालगढ़ की ओर जाता है। उसके मन का अंतर्द्वंद्व एकालाप के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
दृश्य 4 — जलालगढ़ में:
हरगोबिन संदेश नहीं सुना पाता और वापस लौट आता है।
दृश्य 5 — अंतिम दृश्य:
हरगोबिन बड़ी बहुरिया के सामने संकल्प लेता है।
मंच-सज्जा: ग्रामीण परिवेश, हवेली का जर्जर दरवाजा, बैलगाड़ी का दृश्य।
संगीत: लोकगीत और ग्रामीण वाद्ययंत्रों का उपयोग।
नोट: विद्यार्थी इस रूपरेखा के आधार पर पूर्ण नाटक तैयार करें और विद्यालय के मंच पर प्रस्तुत करें।
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