उषा - (शमशेर बहादुर सिंह) (Part 2) — NCERT Solutions
Bihar Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for उषा - (शमशेर बहादुर सिंह) (Part 2), Bihar Board Class 12 Hindi: 4 textbook questions solved step by step.
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उषा — कविता के साथ (अभ्यास)
1कविता के किन उपमानों को देखकर यह कहा जा सकता है कि उषा कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र है?Show solution
दिया गया: शमशेर बहादुर सिंह की कविता 'उषा' में भोर के आकाश का वर्णन विभिन्न उपमानों के माध्यम से किया गया है।
उत्तर:
कवि ने 'उषा' कविता में जो उपमान चुने हैं, वे सभी ग्रामीण जीवन और ग्रामीण परिवेश से लिए गए हैं। इन्हीं उपमानों के कारण यह कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र बन जाती है। प्रमुख उपमान निम्नलिखित हैं —
- 'राख से लीपा हुआ चौका' — भोर के नभ की तुलना राख से लीपे हुए चौके से की गई है। गाँव में महिलाएँ प्रतिदिन सुबह चूल्हे के पास की जगह (चौका) को राख से लीपती हैं। यह दृश्य पूरी तरह ग्रामीण है।
- 'गीला पड़ा है' — चौके का अभी गीला होना यह बताता है कि सुबह का काम अभी-अभी शुरू हुआ है — यह गाँव की ताज़ी, जीवंत सुबह का संकेत है।
- 'नीला शंख' — आकाश की नीलिमा की तुलना नीले शंख से की गई है। शंख गाँव और मंदिर से जुड़ी वस्तु है।
- 'स्लेट पर लाल खड़िया चाक मल दी हो' — सूर्योदय की लालिमा की तुलना स्लेट पर लाल खड़िया मलने से की गई है। यह उपमान ग्रामीण पाठशाला के परिवेश से लिया गया है।
- 'काली सिल ज़रा से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो' — यह उपमान गाँव की रसोई में मसाले पीसने वाली काली सिल (पत्थर) से लिया गया है।
- 'गोरी चमकीली देह जैसे खिल रहे हों' — उगते सूरज की आभा की तुलना किसी गोरी युवती की देह से की गई है — यह ग्रामीण सौंदर्य-बोध का प्रतीक है।
निष्कर्ष: ये सभी उपमान — चौका, राख, सिल, केसर, खड़िया, शंख — गाँव के दैनिक जीवन से जुड़े हैं और सुबह होने के साथ-साथ बदलते जाते हैं, इसलिए यह कविता गाँव की सुबह का गतिशील (बदलता हुआ) शब्दचित्र है।
2भोर का नभ / राख से लीपा हुआ चौका / (अभी गीला पड़ा है) — नयी कविता में कोष्ठक, विराम चिह्नों और पंक्तियों के बीच का स्थान भी कविता को अर्थ देता है। उपर्युक्त पंक्तियों में कोष्ठक से कविता में क्या विशेष अर्थ पैदा हुआ है? समझाइए।Show solution
दिया गया: कविता की पंक्तियाँ —
अवधारणा: नयी कविता में कोष्ठक का प्रयोग एक अतिरिक्त, सूक्ष्म और व्यक्तिगत टिप्पणी देने के लिए होता है। यह मुख्य कथन से अलग, किंतु उसे और अधिक सजीव बनाने वाला होता है।
विशेष अर्थ:
- ताज़गी और तात्कालिकता का बोध: कोष्ठक में लिखा 'अभी गीला पड़ा है' यह बताता है कि यह दृश्य अभी-अभी का है — सुबह बिल्कुल ताज़ी है, जैसे चौका अभी-अभी लीपा गया हो। इससे भोर की ताज़गी और क्षणभंगुरता का बोध होता है।
- कवि की व्यक्तिगत फुसफुसाहट: कोष्ठक में लिखी बात ऐसी लगती है जैसे कवि पाठक के कान में धीरे से कह रहा हो — यह एक आत्मीय, अनौपचारिक टिप्पणी है जो उपमान को और जीवंत बना देती है।
- उपमान की सटीकता: राख से लीपा चौका तभी भोर के नभ जैसा दिखता है जब वह गीला हो — सूखने पर वह सफ़ेद हो जाता है। कोष्ठक यह स्पष्ट करता है कि उपमान बिल्कुल सटीक है।
- गतिशीलता का संकेत: 'अभी गीला है' — इसका अर्थ है कि थोड़ी देर बाद यह सूख जाएगा, अर्थात् सुबह का यह रंग-रूप बदलता रहेगा। यह भोर की क्षणिकता को दर्शाता है।
निष्कर्ष: कोष्ठक का यह प्रयोग कविता में एक जीवंत, सूक्ष्म और अर्थपूर्ण आयाम जोड़ता है। यह उपमान को केवल दृश्य नहीं, बल्कि एक अनुभव बना देता है।
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Frequently Asked Questions
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