पहलवान की ढोलक
Bihar Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for पहलवान की ढोलक — Bihar Board Class 12 Hindi.
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1कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन के दौंव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।Show solution
तालमेल:
कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन के दाँव-पेंच में अद्भुत तालमेल था। ढोल की हर थाप लुट्टन को एक नया संदेश देती थी और उसके अनुसार वह अपने दाँव-पेंच बदलता था। ढोल की आवाज उसे प्रेरणा, उत्साह और शक्ति देती थी। जब ढोल 'धाक-धिना, तिरकट-तिना' बजता था तो लुट्टन उसी लय में अपने प्रतिद्वंद्वी पर टूट पड़ता था। ढोल की आवाज मानो उसे निर्देश देती थी—
- 'चटाक्-चट्-धा' — यानी 'चित करो, चित करो।'
- 'धिना-धिना, धिक्-धिना' — यानी 'दाँव काटो, बाहर हो जाओ।'
- 'धाक-धिना, तिरकट-तिना' — यानी 'मत डरो, मत डरो।'
इस प्रकार ढोल की हर थाप लुट्टन के लिए एक गुरु-मंत्र का काम करती थी।
ध्वन्यात्मक शब्दों से उत्पन्न ध्वनि:
पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द जैसे 'धाक-धिना', 'तिरकट-तिना', 'चटाक्-चट्-धा', 'धिना-धिना' आदि मन में एक जोशीली, उत्साहवर्धक और युद्ध जैसी ध्वनि पैदा करते हैं। ये शब्द कानों में गूँजते हैं और शरीर में एक स्फूर्ति का संचार करते हैं। ये ध्वनियाँ मन में ऐसी तरंगें उत्पन्न करती हैं जैसे कोई वीर योद्धा रणभूमि में उतर रहा हो।
2कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?Show solution
लुट्टन के जीवन में आए परिवर्तन:
पहला मोड़ — बचपन में माता-पिता की मृत्यु:
लुट्टन नौ वर्ष की आयु में अनाथ हो गया। उसकी विधवा सास ने उसे पाला। इस कठिन परिस्थिति ने उसे संघर्षशील बनाया।
दूसरा मोड़ — श्यामनगर के दंगल में चाँद सिंह को हराना:
लुट्टन ने बिना किसी प्रशिक्षण के 'शेर के बच्चे' कहे जाने वाले चाँद सिंह को हरा दिया। इससे उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और राजा साहब ने उसे अपने दरबार में रख लिया। यह उसके जीवन का सबसे बड़ा सुनहरा मोड़ था।
तीसरा मोड़ — राजा साहब की मृत्यु और दरबार से निष्कासन:
राजा साहब के निधन के बाद नए राजा ने लुट्टन को दरबार से निकाल दिया। वह अपने दोनों बेटों के साथ गाँव लौट आया। यह उसके जीवन का दुखद मोड़ था।
चौथा मोड़ — महामारी और बेटों की मृत्यु:
गाँव में मलेरिया और हैजे की महामारी फैली। उसके दोनों बेटे इस महामारी की चपेट में आकर मर गए। इस असहनीय दुख में भी लुट्टन ने ढोल बजाना नहीं छोड़ा।
पाँचवाँ मोड़ — लुट्टन की मृत्यु:
अंततः लुट्टन स्वयं भी महामारी का शिकार हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। मरते समय भी उसके हाथ ढोल बजाने की मुद्रा में थे।
3लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?Show solution
आशय एवं कारण:
लुट्टन पहलवान ने यह बात इसलिए कही होगी क्योंकि उसने कुश्ती की कोई औपचारिक शिक्षा किसी गुरु से नहीं ली थी। उसे कुश्ती के दाँव-पेंच सिखाने वाला कोई पहलवान गुरु नहीं था। उसने जो कुछ भी सीखा, वह ढोल की आवाज से प्रेरणा लेकर सीखा।
ढोल की थाप उसे युद्ध के समय निर्देश देती थी, उत्साहित करती थी और सही दाँव लगाने की प्रेरणा देती थी। ढोल की हर ताल उसे बताती थी कि कब आगे बढ़ना है, कब पीछे हटना है, कब प्रतिद्वंद्वी पर टूट पड़ना है और कब सावधान रहना है।
इस प्रकार ढोल ने उसके लिए एक सच्चे गुरु की भूमिका निभाई। ढोल की आवाज ने उसे शक्ति, साहस और दिशा दी। इसीलिए लुट्टन ने ढोल को ही अपना गुरु माना। यह कथन उसकी ढोल के प्रति अगाध श्रद्धा और कृतज्ञता को भी व्यक्त करता है।
4गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?Show solution
कारण:
गाँव में मलेरिया और हैजे की भयंकर महामारी फैली हुई थी। चारों ओर मृत्यु का तांडव था। लोग निराश, हताश और भयभीत थे। ऐसे में लुट्टन ने ढोल बजाना इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि—
1. जीवन-शक्ति का संचार: ढोल की आवाज मृतप्राय गाँव में संजीवनी का काम करती थी। उसकी धाप सुनकर रोगी और निराश लोगों में जीने की इच्छाशक्ति जागती थी।
2. साहस और प्रेरणा: ढोल की आवाज लोगों को बताती थी कि अभी कोई जीवित है, अभी हार नहीं मानी गई। यह आवाज उनके मनोबल को बनाए रखती थी।
3. अपने बेटों की स्मृति: अपने बेटों की मृत्यु के बाद भी लुट्टन ने ढोल बजाया क्योंकि वह जानता था कि उसके बेटे भी चाहते थे कि ढोल बजता रहे। यह उनके प्रति श्रद्धांजलि भी थी।
4. कर्तव्यबोध: लुट्टन को लगता था कि यदि उसने ढोल बजाना बंद कर दिया तो गाँव के लोग पूरी तरह टूट जाएँगे। वह अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहता था।
5. ढोल से आत्मीय संबंध: ढोल उसके जीवन का अभिन्न अंग था। वह ढोल के बिना अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता था।
इस प्रकार लुट्टन का ढोल बजाना उसकी जीवटता, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय संवेदना का प्रतीक था।
5ढोलक की आवाज का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?Show solution
ढोलक की आवाज का असर:
महामारी से पीड़ित गाँव पर ढोलक की आवाज का गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता था—
1. मनोबल में वृद्धि: रात के सन्नाटे में जब चारों ओर मृत्यु का भय व्याप्त था, तब ढोलक की आवाज लोगों के मनोबल को बनाए रखती थी।
2. जीवन-शक्ति का संचार: पाठ में लिखा है — 'ढोलक की धाप मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी।' अर्थात् ढोल की आवाज सुनकर मरणासन्न रोगियों में भी जीने की इच्छा जागती थी।
3. भय का नाश: रात की भयावह नीरवता को ढोलक की आवाज तोड़ती थी और लोगों के मन से मृत्यु का भय कम होता था।
4. जागरण: ढोलक की आवाज सुनकर बुखार से तपते हुए लोगों की आँखें खुल जाती थीं और वे अपनी पीड़ा को कुछ देर के लिए भूल जाते थे।
5. एकता का भाव: ढोलक की आवाज पूरे गाँव को एक सूत्र में बाँधती थी और यह अहसास दिलाती थी कि वे अकेले नहीं हैं।
इस प्रकार ढोलक की आवाज उस विपत्तिकाल में गाँव के लिए एक अमृत-वर्षा के समान थी।
6महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?Show solution
सूर्योदय का दृश्य:
सूर्योदय के समय गाँव में थोड़ी हलचल होती थी। लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकलते थे। रात भर की मृत्यु का हिसाब लगाया जाता था। जो लोग रात को मरे थे, उनके शव उठाए जाते थे। रोने-धोने की आवाजें आती थीं। दिन के उजाले में लोग एक-दूसरे का हाल जानते थे। सूर्योदय के साथ जीवन की थोड़ी-बहुत गतिविधि दिखती थी।
सूर्यास्त का दृश्य:
सूर्यास्त होते ही गाँव में भयावह सन्नाटा छा जाता था। लोग अपने-अपने घरों में दुबक जाते थे। रात का अँधेरा मृत्यु के भय को और गहरा कर देता था। न कोई बाहर निकलता था, न कोई आवाज आती थी। केवल ढोलक की आवाज उस सन्नाटे को चीरती थी।
अंतर का सार:
सूर्योदय जहाँ थोड़ी जीवन-गतिविधि और आशा का प्रतीक था, वहीं सूर्यास्त भय, निराशा और मृत्यु की आशंका का प्रतीक बन गया था। दिन में लोग एक-दूसरे के दुख में शामिल होते थे, परंतु रात होते ही सब अपने-अपने दुख में अकेले हो जाते थे। केवल लुट्टन की ढोलक उस रात के अँधेरे में जीवन की आवाज बनकर गूँजती रहती थी।
7कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था— (क) ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है? (ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है? (ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?Show solution
(क) ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है?
पहले कुश्ती और दंगल राजाओं के संरक्षण में फलते-फूलते थे। राजा पहलवानों को आश्रय, धन और सम्मान देते थे। परंतु अब ऐसी स्थिति नहीं रही क्योंकि—
- राजाओं का युग समाप्त हो गया और उनके साथ पहलवानों का संरक्षण भी समाप्त हो गया।
- आधुनिक जीवनशैली में लोगों की रुचि बदल गई है।
- कुश्ती में धन और प्रसिद्धि की संभावना अन्य खेलों की तुलना में कम है।
- मीडिया का ध्यान क्रिकेट जैसे खेलों पर अधिक है।
- कुश्ती के लिए आवश्यक अखाड़े और प्रशिक्षण केंद्र कम होते जा रहे हैं।
(ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है?
कुश्ती की जगह अब निम्नलिखित खेलों ने ले ली है—
- क्रिकेट — यह आज भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है।
- फुटबॉल — युवाओं में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।
- बैडमिंटन — पी.वी. सिंधु जैसे खिलाड़ियों के कारण यह लोकप्रिय हुआ है।
- कबड्डी — प्रो-कबड्डी लीग के कारण यह फिर से लोकप्रिय हो रहा है।
- टेनिस और हॉकी भी लोकप्रिय हैं।
(ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?
- सरकार द्वारा कुश्ती को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष योजनाएँ बनाई जाएँ।
- प्रत्येक जिले में आधुनिक अखाड़े और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएँ।
- कुश्ती लीग का आयोजन किया जाए जैसे क्रिकेट में IPL है।
- पहलवानों को उचित वेतन, पुरस्कार और सरकारी नौकरी में आरक्षण दिया जाए।
- स्कूल और कॉलेज स्तर पर कुश्ती को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
- मीडिया में कुश्ती प्रतियोगिताओं का अधिक प्रसारण किया जाए।
- ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहलवानों को राष्ट्रीय सम्मान दिया जाए।
8आशय स्पष्ट करें— आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।Show solution
प्रसंग:
यह पंक्तियाँ उस समय के वातावरण का वर्णन करती हैं जब गाँव में महामारी फैली हुई थी और रात का घना अँधेरा छाया हुआ था।
आशय:
इन पंक्तियों में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। लेखक कहता है कि उस भयावह रात में आकाश के तारे भी पृथ्वी पर आने का साहस नहीं कर पाते थे। यदि कोई संवेदनशील और भावुक तारा पृथ्वी पर आना भी चाहता — अर्थात् यदि कोई थोड़ी-सी रोशनी या उम्मीद की किरण उस अँधेरे को दूर करना चाहती — तो वह रास्ते में ही समाप्त हो जाती थी। उस घने अँधेरे और निराशा के वातावरण में आशा की कोई किरण टिक नहीं पाती थी।
अन्य तारों का 'खिलखिलाकर हँसना' यह दर्शाता है कि प्रकृति भी उस दुखद स्थिति पर उदासीन थी। वह मानवीय पीड़ा से बेपरवाह थी।
व्यापक अर्थ:
इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक यह बताना चाहता है कि महामारी के समय गाँव की स्थिति इतनी भयावह थी कि न प्रकृति में, न आकाश में, न पृथ्वी पर कहीं कोई आशा की किरण नहीं थी। चारों ओर निराशा, मृत्यु और अँधेरा ही था। केवल लुट्टन की ढोलक ही उस अँधेरे में जीवन की एकमात्र आवाज थी।
9पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पाठ में से ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए।Show solution
मानवीकरण के प्रमुख अंश और उनका आशय:
अंश 1: *'रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ललकारती रहती थी।'*
आशय: यहाँ रात्रि को एक भयावह शत्रु के रूप में चित्रित किया गया है जिसे ढोलक ललकार रही है। रात्रि मानो एक जीवित प्राणी की तरह भयंकर रूप धारण किए हुए है।
अंश 2: *'आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।'*
आशय: तारों को मानवीय भावनाओं — भावुकता, हँसी — से युक्त दिखाया गया है। यह महामारी की भयावहता और निराशा के वातावरण को व्यक्त करता है।
अंश 3: *'बादल गरजते, बिजली चमकती और पहलवान की ढोलक धाँय-धाँय बजती रहती।'*
आशय: यहाँ बादल और बिजली को मानो ढोलक के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए दिखाया गया है। प्रकृति की शक्तियाँ मानो लुट्टन को चुनौती दे रही हैं।
अंश 4: *'अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहाती रहती थी।'*
आशय: रात को एक दुखी मानव की तरह चित्रित किया गया है जो चुपचाप रोती है। यह गाँव की दयनीय स्थिति और सामूहिक वेदना को व्यक्त करता है।
इन सभी उदाहरणों में प्रकृति के तत्वों को मानवीय भावनाओं और क्रियाओं से जोड़कर कहानी के भावनात्मक प्रभाव को और गहरा किया गया है।
पाठ के आसपास
1पाठ में मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव की दयनीय स्थिति को चित्रित किया गया है। आप ऐसी किसी अन्य आपद स्थिति की कल्पना करें और लिखें कि आप ऐसी स्थिति का सामना कैसे करेंगे/करेंगी?Show solution
आपद स्थिति — बाढ़:
मान लीजिए कि हमारे गाँव या शहर में भयंकर बाढ़ आ गई है। चारों ओर पानी ही पानी है। घर डूब रहे हैं, फसलें नष्ट हो रही हैं, लोग बेघर हो रहे हैं और बीमारियाँ फैल रही हैं।
ऐसी स्थिति में मैं निम्नलिखित कार्य करूँगा/करूँगी:
1. तत्काल सहायता: सबसे पहले बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने में मदद करूँगा/करूँगी।
2. प्रशासन को सूचना: जिला प्रशासन, NDRF और राज्य सरकार को तुरंत सूचित करूँगा/करूँगी।
3. राहत सामग्री: खाने-पीने की वस्तुएँ, दवाइयाँ और कपड़े एकत्र करके वितरित करूँगा/करूँगी।
4. स्वयंसेवी दल: युवाओं का एक स्वयंसेवी दल बनाकर राहत कार्य में लगाऊँगा/लगाऊँगी।
5. मनोबल बनाए रखना: लोगों को निराश न होने देने के लिए उनसे बात करूँगा/करूँगी और उन्हें प्रेरित करूँगा/करूँगी।
6. स्वच्छता: बाढ़ के बाद फैलने वाली बीमारियों से बचाव के लिए स्वच्छता अभियान चलाऊँगा/चलाऊँगी।
इस प्रकार संकट की घड़ी में धैर्य, साहस और सामूहिक प्रयास से किसी भी आपदा का सामना किया जा सकता है।
2ढोलक की धाप मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी— कला से जीवन के संबंध को ध्यान में रखते हुए चर्चा कीजिए।Show solution
कला और जीवन का संबंध:
कला और जीवन का संबंध अत्यंत गहरा और अटूट है। कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवन को जीने की शक्ति देती है।
ढोलक और संजीवनी शक्ति:
पाठ में लुट्टन की ढोलक महामारी से पीड़ित गाँव में संजीवनी का काम करती है। ढोलक की आवाज सुनकर मरणासन्न लोगों में भी जीने की इच्छा जागती है। यह कला की शक्ति का सबसे सुंदर उदाहरण है।
कला जीवन को कैसे प्रभावित करती है:
1. मनोबल: संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि कलाएँ मनुष्य के मनोबल को बनाए रखती हैं। युद्ध के मैदान में भी सैनिकों को प्रेरित करने के लिए संगीत का प्रयोग होता था।
2. उपचार: संगीत चिकित्सा (Music Therapy) आज एक मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति है। संगीत से मानसिक रोगों का उपचार किया जाता है।
3. एकता: कला लोगों को एक सूत्र में बाँधती है। त्योहारों पर गाए जाने वाले लोकगीत समाज में एकता और आनंद का संचार करते हैं।
4. संस्कृति का संरक्षण: कला किसी भी समाज की संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखती है।
5. भावनात्मक मुक्ति: कला मनुष्य को अपनी पीड़ा, खुशी और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम देती है।
निष्कर्ष: इस प्रकार कला और जीवन एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ जीवन है, वहाँ कला है और जहाँ कला है, वहाँ जीवन की संभावना है।
3चर्चा करें— कलाओं का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज नहीं है।Show solution
कलाओं का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज नहीं:
यह कथन पूर्णतः सत्य है। कला का जन्म मनुष्य की आंतरिक अभिव्यक्ति की इच्छा से होता है, न कि किसी व्यवस्था या संरक्षण से।
पाठ के संदर्भ में:
लुट्टन पहलवान को जब राजा साहब के दरबार से निकाल दिया गया, तब भी उसने ढोल बजाना नहीं छोड़ा। व्यवस्था ने उसका साथ छोड़ दिया, परंतु उसकी कला जीवित रही। यह इस बात का प्रमाण है कि कला किसी व्यवस्था की मोहताज नहीं होती।
ऐतिहासिक उदाहरण:
1. कबीर — कबीर किसी राजदरबार के आश्रित नहीं थे, फिर भी उनकी कविता आज भी जीवित है।
2. मीराबाई — मीरा को राजपरिवार ने प्रताड़ित किया, परंतु उनके भजन आज भी गाए जाते हैं।
3. लोककलाएँ — ग्रामीण लोककलाएँ बिना किसी सरकारी संरक्षण के सदियों से जीवित हैं।
आधुनिक संदर्भ:
आज भी सड़क पर गाने वाले कलाकार, दीवारों पर चित्र बनाने वाले कलाकार बिना किसी व्यवस्था के अपनी कला को जीवित रखते हैं।
निष्कर्ष:
कला मनुष्य की आत्मा की आवाज है। यह व्यवस्था मिलने पर फलती-फूलती है, परंतु व्यवस्था न मिलने पर भी समाप्त नहीं होती। कला का अस्तित्व मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ा है, न कि किसी राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था से।
भाषा की बात
1हर विषय, क्षेत्र, परिवेश आदि के कुछ विशिष्ट शब्द होते हैं। पाठ में कुश्ती से जुड़ी शब्दावली का बहुतायत प्रयोग हुआ है। उन शब्दों की सूची बनाइए। साथ ही नीचे दिए गए क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले कोई पाँच-पाँच शब्द बताइए— चिकित्सा, क्रिकेट, न्यायालय, या अपनी पसंद का कोई क्षेत्र।Show solution
कुश्ती से जुड़े शब्द (पाठ से):
दंगल, अखाड़ा, दाँव-पेंच, पट, चित, मल्ल, पहलवान, कुश्ती, ढोलक, चुनौती, पकड़, दाँव, गर्दन, कमर, पैंतरा, ललकार, जोड़, मुकाबला, विजेता, पराजित।
चिकित्सा क्षेत्र के पाँच शब्द:
1. निदान (Diagnosis)
2. शल्य-चिकित्सा (Surgery)
3. औषधि (Medicine)
4. रोगी (Patient)
5. टीकाकरण (Vaccination)
क्रिकेट के पाँच शब्द:
1. विकेट
2. बाउंड्री
3. ओवर
4. एलबीडब्ल्यू (LBW)
5. नो-बॉल
न्यायालय के पाँच शब्द:
1. वादी (Plaintiff)
2. प्रतिवादी (Defendant)
3. साक्ष्य (Evidence)
4. अभियोजन (Prosecution)
5. निर्णय/फैसला (Verdict)
संगीत क्षेत्र के पाँच शब्द (अपनी पसंद का क्षेत्र):
1. राग
2. ताल
3. सुर
4. लय
5. आलाप
2पाठ में अनेक अंश ऐसे हैं जो भाषा के विशिष्ट प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत करते हैं। भाषा का विशिष्ट प्रयोग न केवल भाषाई सर्जनात्मकता को बढ़ावा देता है बल्कि कथ्य को भी प्रभावी बनाता है। कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं— 'फिर बात की तरह उस पर टूट पड़ा।', 'राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चौदे लगा दिए।', 'पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी।' इन विशिष्ट भाषा-प्रयोगों का प्रयोग करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए।Show solution
अनुच्छेद:
रामलाल एक साधारण किसान था, परंतु उसके हाथों में जादू था। जब भी वह खेत में काम करता, बात की तरह उस पर टूट पड़ता और देखते-देखते सारा काम निपटा देता। उसकी मेहनत और लगन को देखकर गाँव के मुखिया ने उसे अपना सहायक बना लिया। मुखिया जी की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रतिष्ठा में चार चौदे लगा दिए और वह पूरे गाँव में सम्मानित हो गया। दुर्भाग्य से उसकी पत्नी दो बच्चों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी। परंतु रामलाल ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने दोनों बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और उन्हें योग्य नागरिक बनाया। आज उसके बच्चे उसका नाम रोशन कर रहे हैं।
विशेष: इस अनुच्छेद में तीनों विशिष्ट भाषा-प्रयोगों का स्वाभाविक रूप से उपयोग किया गया है जो कथ्य को प्रभावी और रोचक बनाते हैं।
3जैसे क्रिकेट की कमेंट्री की जाती है वैसे ही इसमें कुश्ती की कमेंट्री की गई है? आपको दोनों में क्या समानता और अंतर दिखाई पड़ता है?Show solution
समानताएँ:
1. जीवंत वर्णन: दोनों में खेल का जीवंत और रोमांचक वर्णन किया जाता है जिससे दर्शक/पाठक खेल में डूब जाते हैं।
2. तकनीकी शब्दावली: दोनों में अपने-अपने खेल की विशिष्ट शब्दावली का प्रयोग होता है।
3. उत्साहवर्धन: दोनों प्रकार की कमेंट्री दर्शकों/पाठकों में उत्साह और रोमांच का संचार करती है।
4. क्षण-प्रतिक्षण वर्णन: दोनों में हर पल का विस्तृत वर्णन किया जाता है।
अंतर:
| क्रिकेट कमेंट्री | कुश्ती कमेंट्री (पाठ में) |
|---|---|
| मौखिक और प्रसारित होती है | लिखित रूप में है |
| संख्याओं और आँकड़ों का प्रयोग अधिक | भावनात्मक और काव्यात्मक भाषा का प्रयोग |
| तकनीकी शब्द अधिक (LBW, no-ball) | ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग (धाक-धिना) |
| एक से अधिक कमेंटेटर | एकल वर्णन |
| वास्तविक समय में होती है | साहित्यिक वर्णन है |
निष्कर्ष:
पाठ में कुश्ती की कमेंट्री अधिक काव्यात्मक, भावनात्मक और साहित्यिक है। इसमें ढोल की आवाज और पहलवान के दाँव-पेंच का ऐसा तालमेल बिठाया गया है जो क्रिकेट कमेंट्री में नहीं मिलता। क्रिकेट कमेंट्री अधिक तथ्यात्मक होती है जबकि यह कुश्ती कमेंट्री पूरी तरह साहित्यिक सौंदर्य से भरपूर है।
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