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Chapter 34 of 39
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बादल को घिरते देखा है (नागार्जुन)

Chhattisgarh Board · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for बादल को घिरते देखा है (नागार्जुन) — Chhattisgarh Board Class 11 Hindi.

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12 Questions Solved · 1 Section

प्रश्न-अभ्यास

1इस कविता में बादलों के सौंदर्य चित्रण के अतिरिक्त और किन दृश्यों का चित्रण किया गया है?Show solution
दिया गया है: नागार्जुन की कविता 'बादल को घिरते देखा है'।

उत्तर:
इस कविता में बादलों के सौंदर्य चित्रण के अतिरिक्त निम्नलिखित दृश्यों का चित्रण किया गया है—

1. हिमालय के प्राकृतिक दृश्य: ऊँचे-ऊँचे हिमाच्छादित शिखरों, झीलों, झरनों और हरी-भरी वनस्पतियों का सुंदर चित्रण किया गया है।

2. चकवा-चकई का मिलन: रात भर बिछड़े रहने के बाद प्रातःकाल चकवा-चकई के मिलन और उनके प्रणय-कलह का मनोरम दृश्य प्रस्तुत किया गया है।

3. कस्तूरी मृग की व्याकुलता: कस्तूरी मृग का अपनी ही नाभि से उठने वाली सुगंध के पीछे भटकने और अपने पर चिढ़ने का दृश्य चित्रित है।

4. किन्नर-किन्नरियों का दृश्य: मदमस्त किन्नर-किन्नरियों का वंशी बजाते हुए, द्राक्षासव पीते हुए आनंद में डूबे रहने का दृश्य अंकित है।

5. हंसों का विहार: मानसरोवर में हंसों के तैरने का सुंदर दृश्य प्रस्तुत किया गया है।

6. कालिदास के मेघदूत का स्मरण: कवि को बादलों को देखकर कालिदास के 'मेघदूत' की याद आती है — यह साहित्यिक दृश्य भी कविता में उपस्थित है।

इस प्रकार कवि ने बादलों के साथ-साथ हिमालय की प्रकृति, पशु-पक्षियों के जीवन और देवलोक के काल्पनिक दृश्यों का भी सजीव चित्रण किया है।
2प्रणय-कलह से कवि का क्या तात्पर्य है?Show solution
दिया गया है: 'प्रणय-कलह' पद कविता 'बादल को घिरते देखा है' से।

उत्तर:
'प्रणय-कलह' दो शब्दों से मिलकर बना है — 'प्रणय' अर्थात प्रेम और 'कलह' अर्थात झगड़ा या छेड़छाड़। इस प्रकार प्रणय-कलह का अर्थ है — प्रेमपूर्ण छेड़छाड़ या प्यार-भरी नोक-झोंक।

कविता में चकवा-चकई के संदर्भ में इस पद का प्रयोग हुआ है। चकवा-चकई को रात भर बिछड़े रहने का शाप मिला हुआ है। रात भर वे क्रंदन करते हैं। प्रातःकाल जब वे मिलते हैं तो उनके बीच जो प्रेमपूर्ण छेड़छाड़ होती है — एक-दूसरे को चोंच मारना, पंख फड़फड़ाना, मीठी-मीठी शिकायतें करना — वही 'प्रणय-कलह' है।

यह दृश्य मानसरोवर के किनारे शैवालों की हरी दरी पर घटित होता है। कवि ने इस दृश्य के माध्यम से प्रेम की कोमलता और मिलन की मधुरता को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त किया है।
3कस्तूरी मृग के अपने पर ही चिढ़ने के क्या कारण हैं?Show solution
दिया गया है: कस्तूरी मृग से संबंधित काव्यांश।

उत्तर:
कस्तूरी मृग की नाभि में कस्तूरी होती है जो अत्यंत सुगंधित होती है। इस सुगंध से अनजान मृग उसी सुगंध के पीछे पागल होकर वन-वन भटकता रहता है। वह यह नहीं जानता कि जिस सुगंध को वह बाहर ढूँढ रहा है, वह उसके अपने भीतर ही है।

चिढ़ने के कारण:
- मृग अपनी ही नाभि से उठने वाली उन्मादक सुगंध के पीछे दौड़ता रहता है।
- वह सुगंध के स्रोत को बाहर खोजता है, परंतु वह मिलती नहीं।
- बहुत ढूँढने के बाद भी जब सुगंध का स्रोत नहीं मिलता, तो वह निराश और व्याकुल हो जाता है।
- अंततः उसे अपनी इस मूर्खता पर — कि जो वस्तु उसके पास ही है उसे वह बाहर खोज रहा है — क्रोध और चिढ़ आती है।

कवि ने इस प्रसंग के माध्यम से यह दार्शनिक संदेश दिया है कि मनुष्य भी सुख और आनंद को बाहर खोजता है, जबकि वे उसके अपने भीतर ही विद्यमान हैं।
4बादलों का वर्णन करते हुए कवि को कालिदास की याद क्यों आती है?Show solution
दिया गया है: कविता 'बादल को घिरते देखा है' — नागार्जुन।

उत्तर:
कवि नागार्जुन को बादलों का वर्णन करते हुए कालिदास की याद इसलिए आती है क्योंकि—

1. मेघदूत की याद: कालिदास ने अपने प्रसिद्ध खंडकाव्य 'मेघदूत' में मेघ (बादल) को दूत बनाकर यक्ष और यक्षिणी की प्रेम-कथा का वर्णन किया है। बादलों को देखकर स्वाभाविक रूप से उस काव्य की स्मृति हो आती है।

2. हिमालय और अलका का संबंध: कालिदास के 'मेघदूत' में हिमालय, मानसरोवर और कुबेर की नगरी अलका का वर्णन है। नागार्जुन भी उन्हीं स्थानों का वर्णन कर रहे हैं।

3. प्रकृति-चित्रण की परंपरा: कालिदास प्रकृति के अद्वितीय चितेरे थे। नागार्जुन भी उसी परंपरा में हिमालय की प्रकृति का वर्णन कर रहे हैं, इसलिए उन्हें कालिदास का स्मरण होना स्वाभाविक है।

4. यक्ष-यक्षिणी की खोज: कवि उस स्थान को ढूँढते हैं जहाँ कालिदास ने यक्ष को रखा था, परंतु वह स्थान नहीं मिलता। कवि अंततः मान लेते हैं कि वह 'कवि-कल्पित' था।

इस प्रकार बादल, हिमालय और प्रेम-विरह की भावना — ये सब कालिदास की याद दिलाते हैं।
5कवि ने 'महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है' क्यों कहा है?Show solution
दिया गया है: उक्त पंक्ति कविता 'बादल को घिरते देखा है' से।

उत्तर:
कवि ने यह पंक्ति हिमालय की प्राकृतिक शक्ति और उसके भव्य-विराट रूप को दर्शाने के लिए कही है।

'महामेघ' से तात्पर्य विशाल और घने बादलों से है तथा 'झंझानिल' का अर्थ है तेज आँधी या तूफानी हवा।

कारण:
1. हिमालय के ऊँचे शिखरों पर बादल और तूफानी हवाएँ आपस में टकराती हैं। यह दृश्य अत्यंत भव्य और रोमांचकारी होता है।

2. कवि ने इस दृश्य को प्रत्यक्ष देखा है — विशाल बादल और प्रचंड आँधी के बीच का यह संघर्ष प्रकृति की अपार शक्ति का प्रतीक है।

3. इस पंक्ति के माध्यम से कवि यह बताना चाहता है कि हिमालय पर प्रकृति का रौद्र रूप भी उतना ही अद्भुत है जितना उसका सौम्य रूप।

4. 'गरज-गरज भिड़ते' में बादलों की गर्जना और आँधी के साथ उनके टकराव का सजीव चित्रण है जो पाठक के मन में एक भव्य दृश्य उपस्थित करता है।

इस प्रकार यह पंक्ति हिमालय की प्राकृतिक शक्ति और उसके विराट सौंदर्य को व्यक्त करती है।
6'बादल को घिरते देखा है' पंक्ति को बार-बार दोहराए जाने से कविता में क्या सौंदर्य आया है? अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
दिया गया है: कविता की टेक-पंक्ति 'बादल को घिरते देखा है'।

उत्तर:
'बादल को घिरते देखा है' पंक्ति को बार-बार दोहराने से कविता में निम्नलिखित सौंदर्य आया है—

1. टेक या ध्रुवपद का प्रभाव: यह पंक्ति कविता की 'टेक' (Refrain) का काम करती है। इसे बार-बार दोहराने से कविता में एक संगीतात्मक लय और प्रवाह उत्पन्न होता है।

2. केंद्रीय भाव की पुनरावृत्ति: प्रत्येक बंद के अंत में यह पंक्ति आकर पाठक को याद दिलाती है कि कविता का केंद्रीय विषय बादल है। इससे कविता का मूल भाव सुदृढ़ होता है।

3. अनुभव की प्रामाणिकता: 'देखा है' कहने से कवि अपने प्रत्यक्ष अनुभव पर बल देता है। बार-बार दोहराने से यह विश्वसनीयता और गहरी होती जाती है।

4. विविधता में एकता: प्रत्येक बंद में अलग-अलग दृश्यों का वर्णन है, परंतु यह टेक-पंक्ति सभी को एक सूत्र में पिरोती है। इससे कविता में एकता और संगठन आता है।

5. भावनात्मक गहराई: बार-बार दोहराने से पाठक के मन में बादलों के प्रति एक विशेष आकर्षण और जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

इस प्रकार यह पंक्ति कविता को एक विशेष काव्य-सौंदर्य और संरचनात्मक सुदृढ़ता प्रदान करती है।
7(क)निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए— (क) निशा काल से चिर-अभिशापित / बेबस उस चकवा-चकई का बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें / उस महान सरवर के तीरे शैवालों की हरी दरी पर / प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।Show solution
संदर्भ: यह काव्यांश नागार्जुन की कविता 'बादल को घिरते देखा है' से लिया गया है।

भाव स्पष्टीकरण:

इस काव्यांश में कवि ने चकवा-चकई के मिलन का मनोरम दृश्य प्रस्तुत किया है।

चकवा-चकई को पौराणिक मान्यता के अनुसार यह शाप मिला हुआ है कि वे रात भर एक-दूसरे से बिछड़े रहते हैं। रात के अंधकार में वे अपने प्रिय से दूर रहने की पीड़ा में करुण क्रंदन करते रहते हैं — यही उनका 'चिर-अभिशाप' है।

प्रातःकाल जब सूर्योदय होता है और बादल घिरते हैं, तब उनका यह रुदन बंद होता है। वे मानसरोवर के विशाल तट पर शैवालों (काई) की हरी-भरी दरी पर मिलते हैं। मिलने के बाद उनके बीच प्रेमपूर्ण छेड़छाड़ — प्रणय-कलह — होती है। वे एक-दूसरे को चोंच मारते हैं, पंख फड़फड़ाते हैं, मीठी शिकायतें करते हैं।

विशेष: यह दृश्य विरह के बाद मिलन की मधुरता को व्यक्त करता है। 'शैवालों की हरी दरी' प्रकृति की कोमलता का प्रतीक है। कवि ने पशु-पक्षियों के माध्यम से प्रेम की सार्वभौमिकता को दर्शाया है।
7(ख)निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए— (ख) अलख नाभि से उठनेवाले / निज के ही उन्मादक परिमल— के पीछे धावित हो—होकर / तरल तरुण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है।Show solution
संदर्भ: यह काव्यांश नागार्जुन की कविता 'बादल को घिरते देखा है' से लिया गया है।

भाव स्पष्टीकरण:

इस काव्यांश में कवि ने कस्तूरी मृग के माध्यम से एक गहरा दार्शनिक सत्य प्रस्तुत किया है।

कस्तूरी मृग की नाभि में कस्तूरी होती है जो अत्यंत सुगंधित और नशीली होती है। 'अलख नाभि' का अर्थ है — वह नाभि जिसे मृग स्वयं नहीं देख सकता। उस अदृश्य नाभि से उठने वाली अपनी ही उन्मादक सुगंध के पीछे वह तरुण और चंचल मृग वन-वन दौड़ता रहता है। वह यह नहीं जानता कि जिस सुगंध को वह बाहर खोज रहा है, वह उसके अपने भीतर ही है।

बहुत भटकने के बाद जब सुगंध का स्रोत नहीं मिलता, तो वह अपनी इस मूर्खता पर स्वयं चिढ़ता है।

दार्शनिक संदेश: यह प्रसंग मनुष्य की उस प्रवृत्ति का प्रतीक है जो सुख, शांति और आनंद को बाहर खोजता है, जबकि वे उसके अपने अंतर में ही विद्यमान हैं। आत्मज्ञान के बिना मनुष्य भी इसी मृग की तरह भटकता रहता है।

विशेष: 'तरल तरुण' में अनुप्रास अलंकार है। यह काव्यांश अत्यंत गहन दार्शनिक अर्थ को सरल और सुंदर बिम्ब के माध्यम से व्यक्त करता है।
8(क)संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए— (क) छोटे-छोटे मोती जैसे………कमलों पर गिरते देखा है।Show solution
संदर्भ: यह काव्यांश नागार्जुन द्वारा रचित कविता 'बादल को घिरते देखा है' से लिया गया है। यह कविता पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' (कक्षा 11) में संकलित है।

प्रसंग: कवि हिमालय की ऊँचाइयों पर बादलों को घिरते देखता है और उस समय के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करता है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि उसने हिमालय के ऊँचे शिखरों पर बादलों को घिरते देखा है। उस समय ओस की बूँदें छोटे-छोटे मोतियों के समान चमकती हैं। ये मोती जैसी ओस की बूँदें कमल के फूलों पर गिरती हैं। कमल के पत्तों पर ओस की बूँदें इस प्रकार चमकती हैं जैसे किसी ने मोती बिखेर दिए हों।

यह दृश्य अत्यंत मनोरम और सुंदर है। प्रकृति का यह सौंदर्य कवि को मुग्ध कर देता है।

विशेष:
- 'छोटे-छोटे मोती जैसे' में उपमा अलंकार है।
- 'छोटे-छोटे' में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
- ओस की बूँदों की तुलना मोतियों से करना कवि की सूक्ष्म प्रकृति-दृष्टि का परिचायक है।
- यह काव्यांश हिमालय के प्रातःकालीन सौंदर्य को जीवंत कर देता है।
8(ख)संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए— (ख) समतल देशों से आ-आकर………हंसों को तिरते देखा है।Show solution
संदर्भ: यह काव्यांश नागार्जुन द्वारा रचित कविता 'बादल को घिरते देखा है' से लिया गया है। यह कविता पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' (कक्षा 11) में संकलित है।

प्रसंग: कवि मानसरोवर झील के सौंदर्य का वर्णन करते हुए हंसों के विहार का चित्र प्रस्तुत करता है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि समतल मैदानी प्रदेशों से उड़कर आए हंस मानसरोवर की विशाल झील में तैर रहे हैं। हंस श्वेत और सुंदर होते हैं। नीले जल में श्वेत हंसों का तैरना अत्यंत मनोरम दृश्य उत्पन्न करता है।

हंस मानसरोवर के लिए प्रसिद्ध हैं — यह उनका प्रिय निवास स्थान है। वे दूर-दूर के मैदानी क्षेत्रों से उड़कर यहाँ आते हैं और इस पवित्र सरोवर में विहार करते हैं।

विशेष:
- 'आ-आकर' में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
- हंस पवित्रता, सौंदर्य और विवेक का प्रतीक है।
- मानसरोवर में हंसों का तैरना हिमालय के प्राकृतिक सौंदर्य का एक अविस्मरणीय दृश्य है।
- कवि ने इस दृश्य को अपनी आँखों से देखा है — यह उनके प्रत्यक्ष अनुभव की अभिव्यक्ति है।
8(ग)संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए— (ग) ऋतु वसंत का सुप्रभात था………अगल-बगल स्वर्णिम शिखर थे।Show solution
संदर्भ: यह काव्यांश नागार्जुन द्वारा रचित कविता 'बादल को घिरते देखा है' से लिया गया है। यह कविता पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' (कक्षा 11) में संकलित है।

प्रसंग: कवि हिमालय पर वसंत ऋतु के प्रातःकाल का वर्णन करता है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि वसंत ऋतु का सुंदर प्रभात था। हिमालय के ऊँचे-ऊँचे शिखर सूर्य की प्रथम किरणों से स्वर्णिम (सोने जैसे) हो उठे थे। चारों ओर का वातावरण अत्यंत मनोरम और उल्लासपूर्ण था।

वसंत ऋतु में प्रकृति अपने पूर्ण यौवन पर होती है। हिमालय के शिखरों पर जमी बर्फ सूर्य की किरणों में सोने की तरह चमकती है। यह दृश्य अत्यंत भव्य और अलौकिक लगता है।

विशेष:
- 'स्वर्णिम शिखर' में रूपक अलंकार है — शिखर सोने के समान चमक रहे हैं।
- वसंत ऋतु और सुप्रभात का संयोग प्रकृति के सर्वोत्तम सौंदर्य का प्रतीक है।
- 'अगल-बगल' शब्द दृश्य को और अधिक जीवंत बनाता है।
- यह काव्यांश हिमालय के भव्य और दिव्य सौंदर्य को शब्दों में साकार करता है।
8(घ)संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए— (घ) ढूँढ़ा बहुत परंतु लगा क्या………जाने दो, वह कवि-कल्पित था।Show solution
संदर्भ: यह काव्यांश नागार्जुन द्वारा रचित कविता 'बादल को घिरते देखा है' से लिया गया है। यह कविता पाठ्यपुस्तक 'अंतरा' (कक्षा 11) में संकलित है।

प्रसंग: कवि कालिदास के 'मेघदूत' में वर्णित यक्ष के निवास-स्थान को हिमालय पर ढूँढने का प्रयास करता है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि उसने कालिदास के 'मेघदूत' में वर्णित यक्ष के निवास-स्थान को हिमालय पर बहुत खोजा, परंतु वह स्थान नहीं मिला। बहुत परिश्रम और खोज के बाद भी जब वह स्थान नहीं मिला तो कवि ने निष्कर्ष निकाला — 'जाने दो, वह कवि-कल्पित था।' अर्थात वह स्थान वास्तविकता में था ही नहीं, वह केवल कालिदास की कल्पना की उपज था।

विशेष:
- यह काव्यांश कल्पना और यथार्थ के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।
- 'कवि-कल्पित' शब्द अत्यंत सार्थक है — महान कवि की कल्पना इतनी जीवंत होती है कि पाठक उसे वास्तविक मान लेता है।
- कवि की यह स्वीकृति उनकी बौद्धिक ईमानदारी और यथार्थवादी दृष्टि का परिचय देती है।
- इस पंक्ति में एक हल्की-सी विनोदपूर्ण निराशा भी है जो कविता को मानवीय स्पर्श देती है।
- नागार्जुन यहाँ यह भी संकेत करते हैं कि साहित्यिक कल्पना का अपना एक अलग सत्य होता है जो भौगोलिक यथार्थ से परे है।

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