दोपहर का भोजन (अमरकांत)
Chhattisgarh Board · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for दोपहर का भोजन (अमरकांत) — Chhattisgarh Board Class 11 Hindi.
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प्रश्न-अभ्यास
1सिद्धेश्वरी ने अपने बड़े बेटे रामचंद्र से मँझले बेटे मोहन के बारे में झूठ क्यों बोला?Show solution
उत्तर:
सिद्धेश्वरी ने रामचंद्र से मोहन के बारे में झूठ इसलिए बोला क्योंकि —
1. पारिवारिक एकता बनाए रखना: वह नहीं चाहती थी कि घर के सदस्यों के बीच आपसी कटुता या तनाव पैदा हो। यदि रामचंद्र को पता चलता कि मोहन बिना काम के घर पर बैठा है, तो दोनों भाइयों में झगड़ा हो सकता था।
2. मोहन की इज्जत बचाना: मोहन को नौकरी नहीं मिल रही थी, वह बेरोजगार था। यह बात बड़े भाई को बताना मोहन के लिए अपमानजनक होता।
3. घर का माहौल शांत रखना: सिद्धेश्वरी जानती थी कि गरीबी और बेरोजगारी के कारण घर में पहले से ही तनाव है। झूठ बोलकर वह उस तनाव को और बढ़ने से रोकना चाहती थी।
निष्कर्ष: सिद्धेश्वरी का यह झूठ स्वार्थ से नहीं, बल्कि ममता और परिवार को जोड़े रखने की भावना से प्रेरित था।
2कहानी के सबसे जीवंत पात्र के चरित्र की दृढ़ता का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।Show solution
उत्तर:
कहानी का सबसे जीवंत पात्र सिद्धेश्वरी है। वह एक मध्यवर्गीय गरीब परिवार की माँ और पत्नी है। उसके चरित्र की दृढ़ता निम्नलिखित उदाहरणों से स्पष्ट होती है —
1. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य: घर में खाने-पीने का अभाव है, फिर भी वह बिना शिकायत किए परिवार के लिए भोजन बनाती है और सबको खिलाती है।
2. स्वयं भूखी रहना: जब घर में राशन कम होता है, तो वह स्वयं कम खाती है या भूखी रह जाती है, लेकिन परिवार के सदस्यों को पेट भर खिलाने की कोशिश करती है।
3. झूठ बोलकर परिवार को जोड़ना: वह एक सदस्य से दूसरे सदस्य के बारे में झूठ बोलती है ताकि घर में शांति बनी रहे — यह उसकी मानसिक दृढ़ता का प्रमाण है।
4. भावनात्मक संतुलन: जब मुंशी जी (पति) रोटी लेने से मना करते हैं, तब भी वह विचलित नहीं होती, बल्कि शांत भाव से परिस्थिति को संभालती है।
निष्कर्ष: सिद्धेश्वरी का चरित्र भारतीय माँ की उस छवि को प्रस्तुत करता है जो अभाव में भी दृढ़ता से परिवार की धुरी बनी रहती है।
3कहानी के उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे गरीबी की विवशता झाँक रही हो।Show solution
उत्तर:
कहानी में गरीबी की विवशता दर्शाने वाले प्रमुख प्रसंग निम्नलिखित हैं —
1. थोड़े चावल और दाल का भोजन: सिद्धेश्वरी के पास इतना ही राशन है कि वह बड़ी मुश्किल से परिवार के सभी सदस्यों के लिए भोजन बना पाती है। भोजन की मात्रा इतनी कम है कि वह स्वयं भूखी रह जाती है।
2. रोटी न लेने के बहाने: रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी तीनों ही खाते समय रोटी लेने से मना करते हैं। वे जानते हैं कि घर में राशन कम है, इसलिए बहाने बनाकर कम खाते हैं।
3. मोहन की बेरोजगारी: मँझला बेटा मोहन बेरोजगार है और घर पर बैठा है। यह परिवार की आर्थिक विवशता को दर्शाता है।
4. मुंशी जी की दयनीय स्थिति: मुंशी जी (पिता) की नौकरी भी ठीक नहीं है। वे थके-हारे घर आते हैं और उनके चेहरे पर निराशा झलकती है।
5. सिद्धेश्वरी का पानी पीकर भूख मिटाना: सिद्धेश्वरी खाना खाने के बाद लोटा भर पानी गट-गट पी जाती है — यह उसकी भूख और विवशता का मार्मिक चित्रण है।
निष्कर्ष: ये सभी प्रसंग गरीबी की उस मूक पीड़ा को उजागर करते हैं जो शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में झलकती है।
4'सिद्धेश्वरी का एक से दूसरे सदस्य के विषय में झूठ बोलना परिवार को जोड़ने का अनथक प्रयास था' – इस संबंध में आप अपने विचार लिखिए।Show solution
उत्तर:
यह कथन पूर्णतः सत्य और सार्थक है। सिद्धेश्वरी के झूठ को साधारण झूठ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसके पीछे कोई स्वार्थ नहीं है। उसके झूठ बोलने के कारण और उद्देश्य इस प्रकार हैं —
1. परिवार में शांति बनाए रखना:
गरीबी और बेरोजगारी के कारण घर में तनाव का माहौल है। यदि सिद्धेश्वरी सच बोले तो परिवार के सदस्यों में आपसी कलह बढ़ेगी। झूठ बोलकर वह इस कलह को रोकती है।
2. सदस्यों का मनोबल बनाए रखना:
वह रामचंद्र को मोहन के बारे में, मोहन को रामचंद्र के बारे में अच्छी बातें बताती है ताकि दोनों का मनोबल टूटे नहीं।
3. ममता की अभिव्यक्ति:
एक माँ अपने बच्चों को टूटते नहीं देख सकती। उसका झूठ उसकी ममता और त्याग का प्रतीक है।
4. सामाजिक यथार्थ:
समाज में अनेक माताएँ ऐसी होती हैं जो परिवार को एकजुट रखने के लिए छोटे-छोटे झूठ बोलती हैं। यह उनकी विवशता है, दोष नहीं।
मेरे विचार:
मेरे अनुसार सिद्धेश्वरी के ये झूठ नैतिक दृष्टि से भले ही गलत हों, किंतु मानवीय दृष्टि से वे सराहनीय हैं। जो झूठ किसी को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि जोड़ने के लिए बोला जाए, वह 'सौ सत्यों से भारी' होता है।
5'अमरकांत आम बोलचाल की ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे कहानी की संवेदना पूरी तरह उभरकर आ जाती है।' कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।Show solution
उत्तर:
अमरकांत हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार हैं जो सामान्य जन-जीवन को अपनी कहानियों का विषय बनाते हैं। उनकी भाषा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं —
1. सरल और बोलचाल की भाषा:
कहानी में 'गट-गट पानी चढ़ा गई', 'नाक में दम आना', 'जी में जी आना' जैसे मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ है जो आम जीवन से लिए गए हैं।
2. पात्रों के अनुकूल संवाद:
पात्रों के संवाद उनकी सामाजिक स्थिति और मनोदशा के अनुरूप हैं। रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी के संवाद उनकी विवशता और संकोच को स्वाभाविक रूप से व्यक्त करते हैं।
3. वातावरण-चित्रण में सटीकता:
'ओसारा', 'छिपुली', 'अलगनी' जैसे देशज शब्दों के प्रयोग से कहानी का वातावरण जीवंत हो उठता है।
4. संवेदना की अभिव्यक्ति:
सिद्धेश्वरी का 'मतवाले की तरह उठना' और 'लोटा भर पानी गट-गट चढ़ा जाना' — ये वाक्य उसकी भूख और थकान को बिना किसी लंबे वर्णन के पूरी तरह व्यक्त कर देते हैं।
5. मार्मिकता:
भाषा की सरलता के कारण पाठक पात्रों के दुख-दर्द से सीधे जुड़ जाता है और कहानी की संवेदना उसके मन को छू जाती है।
निष्कर्ष: अमरकांत की भाषा उनकी कहानी की सबसे बड़ी शक्ति है — वह जटिल भावनाओं को सरल शब्दों में इस प्रकार व्यक्त करती है कि पाठक का हृदय द्रवित हो जाता है।
6रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी खाते समय रोटी न लेने के लिए बहाने करते हैं, उसमें कैसी विवशता है? स्पष्ट कीजिए।Show solution
उत्तर:
रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी का रोटी न लेना केवल भूख न होने का संकेत नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी विवशता छिपी है —
1. आर्थिक विवशता:
घर में राशन बहुत कम है। तीनों जानते हैं कि यदि वे अधिक खाएँगे तो दूसरों के लिए कम पड़ेगा। इसलिए वे बहाने बनाकर कम खाते हैं।
2. माँ/पत्नी के प्रति संवेदना:
तीनों यह भी जानते हैं कि सिद्धेश्वरी ने बड़ी मुश्किल से यह भोजन बनाया है। वे उसे और कष्ट नहीं देना चाहते।
3. आत्मसम्मान की रक्षा:
बेरोजगारी और आर्थिक तंगी के कारण वे पहले से ही हीनभावना से ग्रस्त हैं। अधिक माँगना उनके आत्मसम्मान को और ठेस पहुँचाएगा।
4. मूक पीड़ा:
तीनों की विवशता यह है कि वे भूखे हैं, फिर भी भूख छिपाते हैं। यह मूक पीड़ा गरीबी की सबसे करुण अभिव्यक्ति है।
5. पारिवारिक प्रेम:
वे एक-दूसरे के लिए अपनी भूख को दबाते हैं — यह उनके पारिवारिक प्रेम और त्याग का प्रतीक है।
निष्कर्ष: इन बहानों में गरीबी की वह विवशता है जो मनुष्य को अपनी मूलभूत आवश्यकता — भोजन — को भी छिपाने पर मजबूर कर देती है।
7सिद्धेश्वरी की जगह आप होते तो क्या करते?Show solution
उत्तर:
यह एक व्यक्तिगत और विचारपरक प्रश्न है। सिद्धेश्वरी की जगह होने पर मैं निम्नलिखित कदम उठाता/उठाती —
1. परिवार से खुलकर बात करना:
मैं परिवार के सभी सदस्यों को एकत्र करके घर की आर्थिक स्थिति के बारे में खुलकर बात करता/करती, ताकि सब मिलकर समाधान निकाल सकें।
2. झूठ की जगह सहानुभूतिपूर्ण सच:
झूठ बोलने की बजाय मैं सहानुभूति के साथ सच बोलता/बोलती, क्योंकि झूठ से अस्थायी राहत मिलती है, स्थायी समाधान नहीं।
3. आय बढ़ाने के प्रयास:
मैं घर पर ही कोई छोटा काम — जैसे सिलाई, पापड़ बनाना आदि — करके परिवार की आय बढ़ाने का प्रयास करता/करती।
4. सिद्धेश्वरी की प्रशंसा:
हालाँकि, मैं यह भी मानता/मानती हूँ कि सिद्धेश्वरी ने जो किया वह उसकी परिस्थितियों में सर्वोत्तम था। उसकी ममता और त्याग अनुकरणीय है।
निष्कर्ष: सिद्धेश्वरी की विवशता को समझते हुए मैं उसके प्रयासों को सराहता/सराहती हूँ और साथ ही परिवार को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करता/करती।
8रसोई संभालना बहुत जिम्मेदारी का काम है – सिद्ध कीजिए।Show solution
उत्तर:
रसोई संभालना केवल खाना बनाने तक सीमित नहीं है, यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं से सिद्ध किया जा सकता है —
1. सीमित साधनों में प्रबंधन:
सिद्धेश्वरी के पास बहुत कम राशन है, फिर भी वह पूरे परिवार के लिए भोजन बनाती है। यह कुशल प्रबंधन की माँग करता है।
2. सभी की रुचि और आवश्यकता का ध्यान:
रसोई संभालने वाले को यह जानना होता है कि किसे क्या पसंद है, किसे कितनी भूख है, किसे क्या स्वास्थ्य-संबंधी आवश्यकता है।
3. समय-प्रबंधन:
सभी सदस्यों के अलग-अलग समय पर आने के बावजूद सिद्धेश्वरी सबके लिए गर्म भोजन तैयार रखती है।
4. भावनात्मक जिम्मेदारी:
रसोई केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि परिवार को एकजुट रखने का माध्यम भी है। सिद्धेश्वरी इसे भलीभाँति समझती है।
5. शारीरिक श्रम:
गर्मी में चूल्हे के सामने बैठकर खाना बनाना अत्यंत कठिन शारीरिक श्रम है।
निष्कर्ष: रसोई संभालना एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसमें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक — तीनों प्रकार के श्रम की आवश्यकता होती है। सिद्धेश्वरी इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाती है।
9आपके अनुसार सिद्धेश्वरी के झूठ सौ सत्यों से भारी कैसे हैं? अपने शब्दों में उत्तर दीजिए।Show solution
उत्तर:
सामान्यतः झूठ को बुरा माना जाता है, किंतु सिद्धेश्वरी के झूठ असाधारण हैं। वे 'सौ सत्यों से भारी' इसलिए हैं —
1. निःस्वार्थ भाव:
सिद्धेश्वरी के झूठ में कोई स्वार्थ नहीं है। वह किसी को धोखा देने के लिए नहीं, बल्कि परिवार को बचाने के लिए झूठ बोलती है।
2. परिणाम की दृष्टि से सकारात्मक:
उसके झूठ से परिवार में शांति बनी रहती है, सदस्यों का मनोबल टूटता नहीं और आपसी प्रेम बना रहता है। एक सच्चाई जो परिवार को तोड़ दे, उससे वह झूठ बेहतर है जो परिवार को जोड़े।
3. त्याग और ममता का प्रतीक:
सिद्धेश्वरी स्वयं भूखी रहकर, कष्ट उठाकर परिवार के लिए झूठ बोलती है। यह उसकी ममता और त्याग की पराकाष्ठा है।
4. नैतिकता की उच्चतर परिभाषा:
नैतिकता केवल सच बोलने में नहीं, बल्कि दूसरों की भलाई में है। सिद्धेश्वरी के झूठ इस उच्चतर नैतिकता का पालन करते हैं।
निष्कर्ष: जो सत्य किसी को पीड़ा दे, परिवार को तोड़े — उससे वह झूठ श्रेष्ठ है जो प्रेम, एकता और शांति की स्थापना करे। इसीलिए सिद्धेश्वरी के झूठ सौ सत्यों से भारी हैं।
10(क)आशय स्पष्ट कीजिए – वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गई।Show solution
आशय:
इस वाक्य में सिद्धेश्वरी की शारीरिक और मानसिक स्थिति का अत्यंत मार्मिक चित्रण है —
1. 'मतवाले की तरह उठी' — इसका अर्थ है कि वह इतनी थकी हुई और कमजोर थी कि उठते समय उसे चक्कर आ रहे थे। भूख, थकान और कमजोरी के कारण उसका शरीर लड़खड़ा रहा था।
2. 'लोटा भर पानी गट-गट चढ़ा गई' — इसका अर्थ है कि उसने पानी पीकर अपनी भूख को दबाने की कोशिश की। वह भूखी थी, लेकिन खाने के लिए कुछ बचा नहीं था, इसलिए पानी पीकर पेट भरने का प्रयास किया।
व्यापक आशय:
यह वाक्य गरीबी की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ एक माँ अपने परिवार को खिलाकर स्वयं भूखी रह जाती है और पानी पीकर संतोष करती है। यह सिद्धेश्वरी के त्याग और विवशता का सबसे मार्मिक चित्रण है।
10(ख)आशय स्पष्ट कीजिए – यह कहकर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोई चोरी की हो।Show solution
आशय:
इस वाक्य में सिद्धेश्वरी की दृष्टि और मोहन की मनोदशा का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण है —
1. 'चोरी की हो' जैसा देखना — सिद्धेश्वरी ने मोहन की ओर इस प्रकार देखा जैसे वह कोई अपराधी हो। यह दृष्टि मोहन की बेरोजगारी और घर पर बैठे रहने की स्थिति को लेकर है।
2. मोहन की विवशता: मोहन बेरोजगार है और घर पर बैठा है। यह स्थिति उसके लिए स्वयं ही शर्मनाक है। माँ की यह दृष्टि उसकी उस हीनभावना को और गहरा कर देती है।
3. माँ की पीड़ा: सिद्धेश्वरी की यह दृष्टि क्रोध या घृणा से नहीं, बल्कि पीड़ा और विवशता से भरी है। वह जानती है कि मोहन की यह स्थिति उसकी इच्छा से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण है।
व्यापक आशय:
यह वाक्य उस सामाजिक यथार्थ को उजागर करता है जहाँ बेरोजगारी एक युवक को 'अपराधी' जैसा महसूस कराती है। माँ और बेटे दोनों की विवशता इस एक वाक्य में समाहित है।
योग्यता-विस्तार
1अपने आस-पास मौजूद समान परिस्थितियों वाले किसी विवश व्यक्ति अथवा विवशतापूर्ण घटना का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।Show solution
नमूना उत्तर:
हमारे मोहल्ले में रमेश नाम का एक व्यक्ति रहता है। वह एक छोटी-सी दुकान चलाता था जो कोरोना महामारी के दौरान बंद हो गई। उसके घर में पत्नी और तीन बच्चे हैं। जब दुकान बंद हुई तो घर में खाने-पीने के लाले पड़ गए।
रमेश की पत्नी प्रतिदिन सुबह उठकर बच्चों के लिए खाना बनाती थी। कभी-कभी घर में इतना कम राशन होता था कि वह स्वयं भूखी रहकर बच्चों को खिला देती थी। रमेश दिनभर काम की तलाश में निकलता और शाम को खाली हाथ लौटता। उसके चेहरे पर निराशा और शर्म दोनों झलकते थे।
इस परिस्थिति में रमेश की पत्नी ने घर पर सिलाई का काम शुरू किया और धीरे-धीरे परिवार की स्थिति सुधरने लगी। यह घटना सिद्धेश्वरी की विवशता की याद दिलाती है — जहाँ गरीबी में भी परिवार के प्रति प्रेम और समर्पण कम नहीं होता।
2'भूख और गरीबी में प्राय: धैर्य और संयम नहीं टिक पाते हैं।' इसके आलोक में सिद्धेश्वरी के चरित्र पर कक्षा में चर्चा कीजिए।Show solution
चर्चा के मुख्य बिंदु:
पक्ष में (सिद्धेश्वरी असाधारण धैर्य की प्रतीक है):
- सिद्धेश्वरी भूखी रहकर भी परिवार को खिलाती है — यह असाधारण धैर्य है।
- वह कभी शिकायत नहीं करती, रोती नहीं, टूटती नहीं।
- परिवार के सदस्यों से झूठ बोलकर भी वह शांति बनाए रखती है।
- उसका संयम यह सिद्ध करता है कि प्रेम और ममता भूख से भी बड़ी शक्ति है।
विपक्ष में (धैर्य की सीमा होती है):
- 'मतवाले की तरह उठना' और 'पानी गट-गट पीना' यह दर्शाता है कि उसका शरीर टूट रहा है।
- उसका धैर्य वास्तव में विवशता है — उसके पास कोई विकल्प नहीं है।
- यदि परिस्थितियाँ और बिगड़तीं तो शायद उसका धैर्य भी टूट जाता।
निष्कर्ष:
सिद्धेश्वरी का चरित्र यह सिद्ध करता है कि माँ का प्रेम और परिवार के प्रति समर्पण मनुष्य को असाधारण धैर्य और संयम प्रदान करता है। वह भारतीय नारी की उस शक्ति का प्रतीक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी परिवार की धुरी बनी रहती है।
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