गूँगे (रांगेय राघव)
Chhattisgarh Board · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for गूँगे (रांगेय राघव) — Chhattisgarh Board Class 11 Hindi.
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प्रश्न-अभ्यास — गूँगे (रांगेय राघव)
1गूँगे ने अपने स्वाभिमानी होने का परिचय किस प्रकार दिया?Show solution
उत्तर:
गूँगे ने अनेक प्रसंगों में अपने स्वाभिमान का परिचय दिया —
1. सड़क के लड़कों से न दबना: गूँगा होने के बावजूद वह सड़क के लड़कों के सामने झुकने को तैयार नहीं था। उन्होंने उसे पीटा, उसका सिर फट गया, खून बहने लगा — फिर भी उसने अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ा।
2. चमेली की दया अस्वीकार करना: चमेली उस पर दया दिखाती थी, उसे नाली का कीड़ा कहती थी। गूँगे को यह सहानुभूति नहीं चाहिए थी; वह समान व्यवहार और अधिकार चाहता था।
3. आँखों में शिकायत और तिरस्कार: जब बसंता को उससे अधिक महत्त्व दिया जाता था, तो उसकी आँखों में पक्षपात के प्रति तिरस्कार स्पष्ट दिखता था।
निष्कर्ष: गूँगा शारीरिक रूप से असमर्थ था, किंतु मानसिक रूप से वह पूर्णतः स्वाभिमानी था। वह दया का नहीं, सम्मान और अधिकार का भूखा था।
2'मनुष्य की करुणा की भावना उसके भीतर गूँगेपन की प्रतिच्छाया है।' कहानी के इस कथन को वर्तमान सामाजिक परिवेश के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।Show solution
व्याख्या:
लेखक रांगेय राघव का यह कथन अत्यंत गहन है। इसका अर्थ है कि जब मनुष्य किसी दूसरे के दुःख को देखकर करुणा अनुभव करता है, तो वह करुणा वास्तव में उसके अपने भीतर के उस 'गूँगेपन' की झलक है — उस असमर्थता की, जब वह अन्याय देखकर भी कुछ नहीं कर पाता, कुछ कह नहीं पाता।
वर्तमान सामाजिक परिवेश में:
- आज समाज में अनेक लोग अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार देखते हैं, भीतर से छटपटाते हैं, किंतु बोल नहीं पाते — वे भी एक प्रकार के 'गूँगे' हैं।
- जब कोई व्यक्ति किसी गरीब, दलित या दिव्यांग पर अत्याचार होते देखकर करुणा अनुभव करता है, तो वह करुणा उसकी अपनी उस बेबसी की प्रतिध्वनि है जो उसे विरोध करने से रोकती है।
- सोशल मीडिया पर लोग 'लाइक' और 'शेयर' करके करुणा व्यक्त करते हैं, किंतु व्यावहारिक स्तर पर कुछ नहीं करते — यही आधुनिक 'गूँगापन' है।
निष्कर्ष: करुणा और गूँगापन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक मनुष्य अपनी असमर्थता से मुक्त नहीं होगा, उसकी करुणा केवल भावना बनकर रह जाएगी, क्रिया नहीं बन पाएगी।
3'नाली का कीड़ा!' एक छत उठाकर सिर पर रख दीं फिर भी मन नहीं भरा। – चमेली का यह कथन किस संदर्भ में कहा गया है और इसके माध्यम से उसके किन मनोभावों का पता चलता है?Show solution
संदर्भ:
यह कथन उस प्रसंग में कहा गया है जब गूँगा चमेली के घर में रहकर काम करता है और वह उसकी किसी हरकत या व्यवहार से नाराज हो जाती है। चमेली को लगता है कि उसने गूँगे पर बड़ा उपकार किया है — उसे आश्रय दिया, रोटी दी, सिर पर छत दी — फिर भी गूँगा उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप आज्ञाकारी और कृतज्ञ नहीं है।
मनोभावों का विश्लेषण:
1. श्रेष्ठता का भाव (Superiority Complex): चमेली स्वयं को गूँगे से ऊँचा समझती है। 'नाली का कीड़ा' कहकर वह उसे हेय दृष्टि से देखती है।
2. उपकार का अहंकार: वह मानती है कि आश्रय देकर उसने बहुत बड़ा एहसान किया है। वह गूँगे से कृतज्ञता और पूर्ण आज्ञाकारिता की अपेक्षा रखती है।
3. संवेदनहीनता: गूँगे की पीड़ा, उसकी असमर्थता और उसके स्वाभिमान को वह नहीं समझती। उसके लिए गूँगा केवल एक उपकृत व्यक्ति है।
4. सामाजिक पूर्वाग्रह: यह कथन समाज की उस मानसिकता को उजागर करता है जो दिव्यांगों को बराबरी का दर्जा नहीं देती।
निष्कर्ष: चमेली का यह कथन उसकी संकुचित मानसिकता और उपकार के अहंकार को प्रकट करता है।
4यदि बसंता गूँगा होता तो आपकी दृष्टि में चमेली का व्यवहार उसके प्रति कैसा होता?Show solution
उत्तर (कल्पनाशील एवं तर्कसंगत):
यदि बसंता गूँगा होता, तो चमेली का व्यवहार उसके प्रति निश्चित रूप से भिन्न होता —
1. ममता और स्नेह में कमी: चमेली बसंता से स्नेह करती है क्योंकि वह उसका अपना है। यदि वह गूँगा होता, तो प्रारंभ में तो ममता रहती, किंतु धीरे-धीरे वह भी उसे बोझ समझने लगती।
2. सहानुभूति बनाम उपेक्षा: जैसे वह गूँगे पात्र के साथ करती है — उसे 'नाली का कीड़ा' कहती है — वैसा व्यवहार शायद बसंता के साथ न करती, किंतु उसकी सीमाओं के कारण उसे कमतर अवश्य आँकती।
3. पक्षपात का प्रश्न: कहानी में चमेली बसंता को गूँगे से अधिक महत्त्व देती है। यदि बसंता स्वयं गूँगा होता, तो शायद वह उसे भी उसी उपेक्षा की दृष्टि से देखती जैसे वह गूँगे को देखती है।
4. सामाजिक दबाव: समाज में दिव्यांग व्यक्ति को लेकर जो पूर्वाग्रह है, उससे चमेली भी मुक्त नहीं है। अतः बसंता के गूँगे होने पर वह भी उसी सामाजिक दृष्टि से प्रभावित होती।
निष्कर्ष: चमेली का व्यवहार मूलतः सामाजिक पूर्वाग्रह से संचालित है। बसंता के गूँगे होने पर भी वह पूर्णतः समान और सम्मानजनक व्यवहार नहीं कर पाती।
5'उसकी आँखों में पानी भरा था। जैसे उनमें एक शिकायत थी, पक्षपात के प्रति तिरस्कार था।' क्यों?Show solution
संदर्भ एवं कारण:
गूँगे की आँखों में पानी भरा था और उनमें शिकायत तथा तिरस्कार था — इसके निम्नलिखित कारण थे:
1. पक्षपातपूर्ण व्यवहार: चमेली बसंता को गूँगे से अधिक महत्त्व देती थी। बसंता को अच्छा खाना, अच्छा व्यवहार मिलता था, जबकि गूँगे के साथ भेदभाव किया जाता था। यह असमानता गूँगे को भीतर से तोड़ती थी।
2. अधिकार से वंचित होना: गूँगा भी उसी घर में काम करता था, उसी परिश्रम से। किंतु उसे वह सम्मान नहीं मिलता था जिसका वह अधिकारी था। यह अन्याय उसे कचोटता था।
3. अभिव्यक्ति की असमर्थता: वह अपनी पीड़ा, अपनी शिकायत शब्दों में नहीं कह सकता था। इसलिए उसकी आँखें ही उसकी भाषा बन गईं — आँसू उसके मूक विरोध का माध्यम थे।
4. स्वाभिमान को ठेस: 'नाली का कीड़ा' जैसे अपमानजनक शब्द सुनकर उसका स्वाभिमान आहत होता था।
निष्कर्ष: गूँगे की आँखों का पानी उसकी असमर्थता का नहीं, बल्कि उसके स्वाभिमान और न्याय की माँग का प्रतीक था।
6'गूँगा दया या सहानुभूति नहीं, अधिकार चाहता था' – सिद्ध कीजिए।Show solution
सिद्धि (प्रमाण सहित):
1. सड़क के लड़कों से न झुकना:
गूँगा सड़क के लड़कों से पिटकर आया, उसका सिर फट गया — फिर भी उसने उनके सामने घुटने नहीं टेके। यदि वह केवल दया चाहता, तो वह झुक जाता। किंतु उसने अपने बराबरी के अधिकार के लिए संघर्ष किया।
2. चमेली की सहानुभूति से असंतोष:
चमेली उसे आश्रय देती थी, किंतु साथ ही 'नाली का कीड़ा' भी कहती थी। गूँगे को यह दया स्वीकार नहीं थी। वह चाहता था कि उसे एक सामान्य मनुष्य की तरह देखा जाए।
3. पक्षपात के प्रति तिरस्कार:
बसंता के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार देखकर उसकी आँखों में तिरस्कार था — यह इस बात का प्रमाण है कि वह समान अधिकार चाहता था, न कि दयालुता।
4. परिश्रम से अधिकार अर्जित करना:
गूँगा घर में पूरी मेहनत से काम करता था। वह भीख नहीं माँगता था, बल्कि अपने श्रम के बदले उचित सम्मान और अधिकार चाहता था।
निष्कर्ष: गूँगे का पूरा व्यवहार इस बात का प्रमाण है कि वह दया का पात्र नहीं, अधिकार का दावेदार था। वह समाज में समान स्थान और सम्मान चाहता था।
7'गूँगे' कहानी पढ़कर आपके मन में कौन से भाव उत्पन्न होते हैं और क्यों?Show solution
उत्तर (व्यक्तिगत एवं विश्लेषणात्मक):
'गूँगे' कहानी पढ़कर मन में अनेक भाव एक साथ उत्पन्न होते हैं —
1. करुणा और सहानुभूति:
गूँगे की पीड़ा, उसकी अभिव्यक्ति की असमर्थता, उसका खून से भीगा सिर — ये सब पढ़कर हृदय में गहरी करुणा उत्पन्न होती है।
2. क्रोध और आक्रोश:
समाज का पक्षपातपूर्ण व्यवहार, चमेली का अहंकार, सड़क के लड़कों की क्रूरता — ये देखकर मन में क्रोध उत्पन्न होता है।
3. आत्मचिंतन:
कहानी का अंत पढ़कर — 'आज दिन ऐसा कौन है जो गूँगा नहीं है' — मन में आत्मचिंतन होता है। हम स्वयं से पूछते हैं कि क्या हम भी किसी न किसी रूप में 'गूँगे' हैं?
4. प्रेरणा:
गूँगे का स्वाभिमान और संघर्ष प्रेरणादायक है। वह शारीरिक असमर्थता के बावजूद टूटता नहीं — यह हमें जीवन में संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।
5. सामाजिक चेतना:
कहानी पढ़कर मन में यह भाव जागता है कि दिव्यांगों के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदलना चाहिए — दया नहीं, सम्मान और अधिकार देना चाहिए।
निष्कर्ष: यह कहानी केवल एक गूँगे की कहानी नहीं है, यह हर उस व्यक्ति की कहानी है जो बोलना चाहता है पर बोल नहीं पाता।
8कहानी का शीर्षक 'गूँगे' है, जबकि कहानी में एक ही गूँगा पात्र है। इसके माध्यम से लेखक ने समाज की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत किया है?Show solution
उत्तर:
लेखक रांगेय राघव ने शीर्षक 'गूँगे' बहुवचन में रखकर एक गहरा सामाजिक संदेश दिया है। इसके माध्यम से उन्होंने निम्नलिखित प्रवृत्तियों की ओर संकेत किया है —
1. व्यापक प्रतीकात्मकता:
कहानी का गूँगा पात्र केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज के उन सभी लोगों का प्रतीक है जो अन्याय, शोषण और पीड़ा सहते हैं किंतु बोल नहीं पाते।
2. सामाजिक गूँगापन:
लेखक संकेत करते हैं कि समाज में अनेक प्रकार के 'गूँगे' हैं —
- वे जो अत्याचार देखकर भी चुप रहते हैं
- वे जो न्याय माँगना चाहते हैं पर व्यवस्था के डर से नहीं माँग पाते
- वे जिनके पास आवाज़ है पर उस आवाज़ में 'अर्थ' नहीं है
3. कहानी का अंतिम संदेश:
कहानी के अंत में चमेली सोचती है — 'आज दिन ऐसा कौन है जो गूँगा नहीं है।' यह पंक्ति शीर्षक के बहुवचन को सार्थक करती है।
4. दिव्यांगता बनाम सामाजिक असमर्थता:
शारीरिक गूँगापन एक व्यक्ति में है, किंतु सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक गूँगापन पूरे समाज में व्याप्त है।
निष्कर्ष: 'गूँगे' शीर्षक एकल पात्र से आगे बढ़कर समस्त मानव समाज की उस विवशता का प्रतीक है जो उसे सत्य बोलने से रोकती है।
9यदि 'स्किल इंडिया' जैसा कोई कार्यक्रम होता तो क्या गूँगे को दया या सहानुभूति का पात्र बनना पड़ता?Show solution
उत्तर:
नहीं, यदि 'स्किल इंडिया' जैसा कोई कार्यक्रम होता तो गूँगे को दया या सहानुभूति का पात्र नहीं बनना पड़ता। इसके निम्नलिखित कारण हैं —
1. कौशल विकास से आत्मनिर्भरता:
'स्किल इंडिया' जैसे कार्यक्रम दिव्यांगों को विशेष कौशल प्रशिक्षण देते हैं। गूँगा यदि किसी व्यवसाय में प्रशिक्षित होता, तो वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र होता और किसी के आश्रय पर निर्भर नहीं रहता।
2. सम्मानजनक जीवन:
आर्थिक स्वतंत्रता से सामाजिक सम्मान मिलता है। गूँगे को 'नाली का कीड़ा' जैसे अपमानजनक शब्द नहीं सुनने पड़ते।
3. अधिकार की प्राप्ति:
गूँगा दया नहीं, अधिकार चाहता था। कौशल विकास कार्यक्रम उसे वह अधिकार दिलाते जो वह चाहता था — समाज में बराबरी का स्थान।
4. सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन:
जब दिव्यांग व्यक्ति स्वयं कमाने-खाने में सक्षम होता है, तो समाज भी उसे दया की दृष्टि से नहीं, सम्मान की दृष्टि से देखता है।
5. वर्तमान प्रासंगिकता:
आज 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016' और 'स्किल इंडिया' जैसे कार्यक्रम इसी दिशा में काम कर रहे हैं।
निष्कर्ष: कौशल विकास और सशक्तीकरण के कार्यक्रम दिव्यांगों को दया का पात्र नहीं, समाज का सक्रिय और सम्मानित सदस्य बनाते हैं।
10(क)निम्नलिखित गद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए — 'करुणा ने सबको... जी जान से लड़ रहा हो।'Show solution
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि करुणा की भावना ने सभी को एक सूत्र में बाँध दिया। जब गूँगे को पीड़ित देखा जाता है, तो देखने वाले के मन में जो करुणा उत्पन्न होती है, वह वास्तव में उसके अपने भीतर की उस पीड़ा की प्रतिध्वनि है जिसे वह भी व्यक्त नहीं कर पाता।
गूँगा जिस प्रकार अपनी पीड़ा को शब्दों में नहीं कह सकता और भीतर ही भीतर संघर्ष करता रहता है — ठीक उसी प्रकार समाज के अनेक लोग भी अपनी पीड़ा, अपने विरोध को व्यक्त नहीं कर पाते। वे भी जी-जान से अपने भीतर की लड़ाई लड़ते रहते हैं।
विशेष:
- यहाँ 'जी जान से लड़ना' — आंतरिक संघर्ष का प्रतीक है।
- करुणा को 'गूँगेपन की प्रतिच्छाया' बताकर लेखक ने मानवीय संवेदना की गहराई को उजागर किया है।
निष्कर्ष: यह गद्यांश मानवीय करुणा और सामाजिक असमर्थता के बीच के गहरे संबंध को प्रकट करता है।
10(ख)निम्नलिखित गद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए — 'वह लौटकर चूल्हे पर... आदमी गुलाम हो जाता है।'Show solution
व्याख्या:
चमेली चूल्हे पर लौटकर अपने काम में लग जाती है। यह दृश्य प्रतीकात्मक है — यह दर्शाता है कि मनुष्य अपनी दैनिक आवश्यकताओं और जीवन की व्यावहारिकताओं में इतना उलझ जाता है कि वह अपनी संवेदनाओं, अपने विचारों और अपने विरोध को भूल जाता है।
लेखक कहते हैं कि जब मनुष्य रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता में डूब जाता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र सोच खो देता है और व्यवस्था का गुलाम बन जाता है। 'आदमी गुलाम हो जाता है' — यह पंक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह आर्थिक और सामाजिक दासता की ओर संकेत करती है।
विशेष:
- 'चूल्हे पर लौटना' — जीवन की नीरस दिनचर्या का प्रतीक।
- 'गुलाम होना' — सामाजिक और आर्थिक परतंत्रता का प्रतीक।
निष्कर्ष: यह गद्यांश बताता है कि जीवन की भौतिक आवश्यकताएँ मनुष्य की मानसिक और नैतिक स्वतंत्रता को कैसे छीन लेती हैं।
10(ग)निम्नलिखित गद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए — 'और फिर कौन... जिंदगी बिताए।'Show solution
व्याख्या:
लेखक यहाँ एक गहरा प्रश्न उठाते हैं — 'और फिर कौन...' — अर्थात् इस समाज में गूँगे जैसे असमर्थ व्यक्ति की परवाह कौन करेगा? कौन उसके साथ खड़ा होगा? कौन उसे न्याय दिलाएगा?
यह गद्यांश समाज की उदासीनता और स्वार्थपरता को उजागर करता है। हर व्यक्ति अपनी-अपनी जिंदगी में इतना व्यस्त है कि दूसरे की पीड़ा के लिए उसके पास न समय है, न संवेदना। गूँगे जैसे लोग इसी उदासीन समाज में किसी तरह जिंदगी बिताने को मजबूर हैं।
विशेष:
- यह गद्यांश सामाजिक जिम्मेदारी के प्रश्न को उठाता है।
- 'जिंदगी बिताना' — जीना नहीं, बस किसी तरह दिन काटना — यह शब्द-चयन अत्यंत सार्थक है।
निष्कर्ष: यह गद्यांश समाज की संवेदनहीनता और दिव्यांगों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये पर करारा व्यंग्य है।
10(घ)निम्नलिखित गद्यांश की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए — 'और ये गूँगे... क्योंकि वे असमर्थ हैं।'Show solution
मूल गद्यांश: 'और ये गूँगे... अनेक-अनेक हो संसार में भिन्न-भिन्न रूपों में छा गए हैं – जो कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। जिनके हृदय की प्रतिहिंसा न्याय और अन्याय को परखकर भी अत्याचार को चुनौती नहीं दे सकती, क्योंकि बोलने के लिए स्वर होकर भी स्वर में अर्थ नहीं है... क्योंकि वे असमर्थ हैं।'
व्याख्या:
लेखक यहाँ 'गूँगे' शब्द को उसके शाब्दिक अर्थ से बहुत आगे ले जाते हैं। वे कहते हैं कि संसार में ऐसे अनेक-अनेक 'गूँगे' हैं जो भिन्न-भिन्न रूपों में विद्यमान हैं।
'गूँगों' के विभिन्न रूप:
- वे लोग जो अन्याय देखते हैं, समझते हैं, किंतु बोल नहीं पाते।
- वे जिनके पास आवाज़ तो है, किंतु उस आवाज़ में 'अर्थ' नहीं — अर्थात् उनकी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- वे जो अत्याचार को चुनौती देना चाहते हैं, किंतु सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक असमर्थता के कारण नहीं दे पाते।
'स्वर में अर्थ नहीं' — यह पंक्ति अत्यंत गहन है। इसका अर्थ है कि जब शक्तिहीन व्यक्ति बोलता है, तो समाज उसे सुनता नहीं — उसकी आवाज़ निरर्थक हो जाती है।
निष्कर्ष: यह गद्यांश कहानी का केंद्रीय संदेश है। लेखक बताते हैं कि 'गूँगापन' केवल शारीरिक विकलांगता नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक असमर्थता का भी नाम है।
11(क)निम्नलिखित पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए — 'कैसी यातना है कि वह अपने हृदय को उगल देना चाहता है, किंतु उगल नहीं पाता।'Show solution
इस पंक्ति में लेखक ने गूँगे की सबसे बड़ी पीड़ा को व्यक्त किया है — अभिव्यक्ति की असमर्थता।
'हृदय को उगल देना' — एक अत्यंत सशक्त बिम्ब है। इसका अर्थ है कि गूँगे के भीतर भावनाओं, विचारों, पीड़ाओं और विरोध का एक विशाल समुद्र उमड़ता रहता है। वह चाहता है कि सब कुछ बाहर निकाल दे — अपनी पीड़ा कहे, अपना विरोध जताए, अपना प्रेम व्यक्त करे — किंतु वह ऐसा नहीं कर पाता।
यातना का स्वरूप:
- शारीरिक पीड़ा से बड़ी पीड़ा है — मन की बात न कह पाने की पीड़ा।
- जब भावनाएँ भीतर ही भीतर घुटती रहती हैं और बाहर नहीं निकल पातीं, तो वह यातना असहनीय हो जाती है।
- यह केवल गूँगे की नहीं, उन सभी की पीड़ा है जो बोलना चाहते हैं पर बोल नहीं पाते।
व्यापक अर्थ:
यह पंक्ति समाज के उन सभी 'गूँगों' पर लागू होती है जो अन्याय सहते हैं, पर आवाज़ नहीं उठा पाते।
निष्कर्ष: यह पंक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्त्व को रेखांकित करती है और बताती है कि मूक रहने की विवशता मनुष्य के लिए सबसे बड़ी यातना है।
11(ख)निम्नलिखित पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए — 'जैसे मंदिर की मूर्ति कोई उत्तर नहीं देती, वैसे ही उसने भी कुछ नहीं कहा।'Show solution
इस पंक्ति में लेखक ने गूँगे की मौन अवस्था की तुलना मंदिर की मूर्ति से की है। यह उपमा अत्यंत सार्थक और बहुआयामी है।
उपमा का विश्लेषण:
मंदिर की मूर्ति:
- मूर्ति के सामने लोग अपनी पीड़ा, अपनी प्रार्थना, अपनी इच्छाएँ कहते हैं।
- मूर्ति सब सुनती है, सब देखती है — किंतु कोई उत्तर नहीं देती।
- फिर भी उसमें एक दिव्यता है, एक गहराई है।
गूँगे के संदर्भ में:
- गूँगा भी सब सुनता है, सब समझता है — किंतु उत्तर नहीं दे सकता।
- उसकी मौन उपस्थिति में भी एक गहराई है, एक पीड़ा है।
- जैसे मूर्ति की चुप्पी रहस्यमय होती है, वैसे ही गूँगे की चुप्पी भी अनेक अनकही बातों से भरी है।
व्यापक अर्थ:
- यह पंक्ति यह भी संकेत करती है कि समाज में अनेक लोग 'मूर्ति' की तरह हैं — सब देखते हैं, सब समझते हैं, किंतु कुछ नहीं बोलते।
- यह सामाजिक निष्क्रियता और मौन की आलोचना भी है।
निष्कर्ष: यह उपमा गूँगे की विवशता को अत्यंत काव्यात्मक और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है तथा उसकी मौन पीड़ा को एक दिव्य गहराई प्रदान करती है।
योग्यता–विस्तार
1समाज में दिव्यांगों के लिए होने वाले प्रयासों में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं?Show solution
दिव्यांगों के लिए समाज में सहयोग के निम्नलिखित तरीके हो सकते हैं —
व्यक्तिगत स्तर पर:
1. दिव्यांगों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना — दया नहीं, सम्मान देना।
2. उनकी भाषा सीखने का प्रयास करना — जैसे सांकेतिक भाषा (Sign Language)।
3. उन्हें दैनिक कार्यों में सहायता करना जब वे माँगें।
सामाजिक स्तर पर:
1. दिव्यांगों के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना।
2. उनके लिए काम करने वाले NGO में स्वयंसेवक के रूप में कार्य करना।
3. दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने में सहयोग करना।
संस्थागत स्तर पर:
1. विद्यालय और सार्वजनिक स्थानों पर दिव्यांगों के लिए सुविधाएँ सुनिश्चित करने की माँग करना।
2. 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016' के बारे में जागरूकता फैलाना।
3. 'स्किल इंडिया' जैसे कार्यक्रमों में दिव्यांगों की भागीदारी बढ़ाने में सहयोग करना।
निष्कर्ष: दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी — उन्हें बोझ नहीं, समाज का अभिन्न अंग मानना होगा।
2दिव्यांगों की समस्या पर आधारित 'स्पर्श', 'कोशिश' तथा 'इकबाल' फ़िल्में देखिए और समीक्षा कीजिए।Show solution
1. 'स्पर्श' (1980) — निर्देशक: सई परांजपे:
यह फ़िल्म एक नेत्रहीन विद्यालय के प्रधानाचार्य की कहानी है। फ़िल्म बताती है कि दिव्यांग व्यक्ति को दया नहीं, सम्मान और समानता चाहिए। नायक अपनी दिव्यांगता को कमज़ोरी नहीं मानता। यह फ़िल्म 'गूँगे' कहानी के संदेश से पूरी तरह मेल खाती है।
2. 'कोशिश' (1972) — निर्देशक: गुलज़ार:
यह फ़िल्म एक बधिर-मूक दंपति की संघर्षगाथा है। यह फ़िल्म दिखाती है कि दिव्यांग व्यक्ति भी सामान्य जीवन जी सकते हैं, प्रेम कर सकते हैं, परिवार बना सकते हैं — यदि समाज उन्हें अवसर दे। यह फ़िल्म 'गूँगे' कहानी के सबसे निकट है।
3. 'इकबाल' (2005) — निर्देशक: नागेश कुकुनूर:
यह फ़िल्म एक बधिर-मूक युवक की क्रिकेटर बनने की कहानी है। यह फ़िल्म बताती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और कौशल से दिव्यांग व्यक्ति भी अपने सपने पूरे कर सकता है।
तीनों फ़िल्मों का साझा संदेश:
तीनों फ़िल्में 'गूँगे' कहानी के केंद्रीय संदेश को दोहराती हैं — दिव्यांगों को दया नहीं, अधिकार और अवसर चाहिए। समाज को अपनी दृष्टि बदलनी होगी।
निष्कर्ष: ये फ़िल्में देखकर हमारी संवेदनशीलता बढ़ती है और हम दिव्यांगों की समस्याओं को बेहतर समझ पाते हैं।
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