बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार) (Part 2) — NCERT Solutions
Haryana Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार) (Part 2), Haryana Board Class 12 Hindi: 21 textbook questions solved step by step.
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पाठ के साथ
1बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?Show solution
जब बाजार का जादू चढ़ता है:
जब मनुष्य खाली मन लेकर बाजार जाता है, तो बाजार का जादू उस पर पूरी तरह चढ़ जाता है। बाजार की चमक-दमक, सजी हुई दुकानें और आकर्षक वस्तुएँ उसे सम्मोहित कर लेती हैं। वह अनावश्यक वस्तुएँ भी खरीद लेता है। उसकी क्रय-शक्ति (पर्चेजिंग पावर) उसे विवेकहीन बना देती है। वह वस्तुओं का गुलाम बन जाता है और घर लौटने पर पछताता है। उसे लगता है कि उसने जो खरीदा वह न तो जरूरी था और न ही उपयोगी।
जब बाजार का जादू उतरता है:
जब मनुष्य सुनिश्चित उद्देश्य और भरे मन के साथ बाजार जाता है, तो बाजार का जादू उस पर नहीं चढ़ता। वह केवल अपनी जरूरत की चीजें खरीदता है। बाजार की चकाचौंध उसे प्रभावित नहीं कर पाती। ऐसा व्यक्ति बाजार का सदुपयोग करता है और संतुष्ट होकर लौटता है। भगत जी इसी श्रेणी के व्यक्ति हैं जो केवल जरूरत-भर जीरा लेकर संतुष्ट हो जाते हैं।
निष्कर्ष: बाजार का जादू मनुष्य की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। खाली मन बाजार के जादू का शिकार होता है, जबकि भरा और सुनिश्चित मन उससे बचा रहता है।
2बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?Show solution
भगत जी के व्यक्तित्व का सशक्त पहलू:
भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनकी संतुष्टि, निस्पृहता और आत्मसंयम है। वे बाजार में केवल अपनी जरूरत की वस्तु — जरूरत-भर जीरा — लेने जाते हैं और उसके बाद पूरा बाजार उनके लिए 'नहीं के बराबर' हो जाता है। बाजार की चमक-दमक, आकर्षक वस्तुएँ और विज्ञापन उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते। उनका मन 'भरा हुआ' है — वे जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और क्या नहीं। वे लोभ और मोह से मुक्त हैं।
क्या उनका आचरण समाज में शांति स्थापित कर सकता है?
हाँ, भगत जी का आचरण निश्चित रूप से समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है। इसके कारण निम्नलिखित हैं:
- जब व्यक्ति अनावश्यक वस्तुओं की लालसा नहीं रखता, तो उसके मन में ईर्ष्या, द्वेष और असंतोष नहीं पनपता।
- संतुष्ट व्यक्ति दूसरों का शोषण नहीं करता।
- आत्मसंयमी व्यक्ति समाज में सामंजस्य और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है।
- यदि समाज के अधिकांश लोग भगत जी की तरह आचरण करें, तो उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ रुकेगी और समाज में शांति व संतोष का वातावरण बनेगा।
निष्कर्ष: भगत जी का आचरण एक आदर्श जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए कल्याणकारी है।
3'बाजारूपन' से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?Show solution
'बाजारूपन' का तात्पर्य:
'बाजारूपन' से तात्पर्य है — बाजार की उस प्रवृत्ति से जिसमें वस्तुओं की खरीद-बिक्री केवल लाभ-हानि के आधार पर होती है। इसमें ग्राहक और विक्रेता दोनों एक-दूसरे को ठगने की कोशिश में रहते हैं। यहाँ मानवीय संबंध नहीं होते, केवल व्यापारिक स्वार्थ होता है। बाजारूपन में शोषण होता है — कपट सफल होता है और निष्कपट व्यक्ति शिकार बनता है। यह बाजार की वह नकारात्मक शक्ति है जो मनुष्य को वस्तुओं का दास बना देती है।
बाजार को सार्थकता प्रदान करने वाले व्यक्ति:
लेखक के अनुसार वे व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं जो:
- जरूरत के अनुसार खरीदारी करते हैं — जिनके मन में पहले से यह निश्चित होता है कि उन्हें क्या चाहिए।
- संयमी और विवेकशील होते हैं — जो बाजार की चकाचौंध से प्रभावित नहीं होते।
- भरे मन वाले होते हैं — जिनकी आवश्यकताएँ सुनिश्चित होती हैं।
बाजार की सार्थकता:
बाजार की सार्थकता इसमें है कि वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। जब बाजार आवश्यकताओं के आदान-प्रदान का माध्यम बनता है, तब वह सार्थक होता है। भगत जी जैसे व्यक्ति ही बाजार को सच्ची सार्थकता देते हैं क्योंकि वे बाजार का उपयोग करते हैं, उसके शिकार नहीं बनते।
4बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?Show solution
आंशिक सहमति:
इस कथन से मैं आंशिक रूप से सहमत हूँ।
सहमति के कारण:
- बाजार में वास्तव में जाति, धर्म, लिंग या क्षेत्र का भेद नहीं होता। एक दलित और एक ब्राह्मण, एक हिंदू और एक मुसलमान — सभी एक ही दुकान से एक ही कीमत पर सामान खरीद सकते हैं।
- इस अर्थ में बाजार सामाजिक समानता का एक रूप प्रस्तुत करता है।
- बाजार में व्यक्ति की पहचान उसकी क्रय-शक्ति से होती है, न कि उसकी सामाजिक स्थिति से।
असहमति के कारण:
- बाजार केवल क्रय-शक्ति देखता है, इसलिए जिनके पास पैसा नहीं है वे बाजार से बाहर हो जाते हैं। यह एक नई असमानता को जन्म देता है।
- गरीब और अमीर के बीच की खाई बाजार और गहरी कर देता है।
- बाजार की यह 'समता' केवल ऊपरी है। वास्तव में यह आर्थिक असमानता को और बढ़ावा देती है।
- बाजार शोषण का माध्यम भी बन सकता है जब आवश्यकता ही शोषण का रूप ले लेती है।
निष्कर्ष: बाजार सामाजिक समता का भ्रम तो पैदा करता है, लेकिन वास्तविक समता तभी संभव है जब सभी की क्रय-शक्ति समान हो। इसलिए बाजार की यह 'समता' अधूरी और भ्रामक है।
5आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें—
(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।
(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।Show solution
(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ:
एक बार हमारे परिवार में किसी सदस्य की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। रात का समय था और सरकारी अस्पताल में डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में पैसे की शक्ति काम आई — हम एक निजी अस्पताल में गए जहाँ तुरंत इलाज मिला। पैसे के कारण ही समय पर उचित चिकित्सा संभव हो पाई। इसी प्रकार समाज में देखा जाता है कि धनी व्यक्ति अपनी क्रय-शक्ति से बड़े-बड़े काम करवा लेते हैं — चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या व्यापार। पैसा उन्हें समाज में प्रतिष्ठा और शक्ति दिलाता है।
(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई:
एक प्रसंग याद आता है जब हमारे पड़ोस में एक धनी व्यक्ति के घर में उनके माता-पिता बहुत बीमार थे। उनके पास इलाज के लिए पर्याप्त धन था, लेकिन उनके बच्चे विदेश में थे और घर में कोई देखभाल करने वाला नहीं था। पैसे से डॉक्टर और दवाइयाँ तो मिल गईं, लेकिन अपनों का प्यार और देखभाल नहीं मिल सकी। इसी प्रकार समाज में देखा जाता है कि पैसे से रिश्ते, प्रेम, सम्मान और आत्मीयता नहीं खरीदी जा सकती। कबीर ने भी कहा है — 'चाह गई चिंता गई' — अर्थात् सच्चा सुख संतोष में है, धन में नहीं।
निष्कर्ष: पैसा एक साधन है, साध्य नहीं। यह जीवन की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है, लेकिन भावनात्मक और आत्मिक जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है।
पाठ के आसपास
1बाजार दर्शन पाठ में बाजार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का जिक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए।
(क) मन खाली हो
(ख) मन खाली न हो
(ग) मन बंद हो
(घ) मन में नकार होShow solution
(क) मन खाली हो:
जब मन खाली होता है तो बाजार की हर चीज आकर्षक लगती है। एक बार मैं बिना किसी उद्देश्य के बाजार गया। वहाँ की चमक-दमक ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने कई अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लीं — एक महँगी घड़ी, कुछ गैजेट्स और कपड़े जिनकी मुझे कोई जरूरत नहीं थी। घर आकर पछतावा हुआ। लेखक के अनुसार खाली मन बाजार के जादू का सबसे आसान शिकार होता है।
(ख) मन खाली न हो:
जब मन में पहले से यह निश्चित हो कि क्या खरीदना है, तो बाजार की चकाचौंध प्रभावित नहीं करती। एक बार मुझे परीक्षा के लिए कुछ विशेष पुस्तकें खरीदनी थीं। मैं बाजार गया, केवल वही पुस्तकें खरीदीं और वापस आ गया। बाकी दुकानों की ओर ध्यान ही नहीं गया। यही भरे मन की शक्ति है।
(ग) मन बंद हो:
जब मन पूरी तरह बंद हो — अर्थात् व्यक्ति किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए तैयार न हो — तो बाजार उसके लिए निरर्थक हो जाता है। भगत जी का मन इसी प्रकार का है। वे बाजार में जाते हैं लेकिन केवल जरूरत की वस्तु लेते हैं। बाकी सब उनके लिए 'नहीं के बराबर' है।
(घ) मन में नकार हो:
जब मन में पहले से ही यह भाव हो कि 'मुझे कुछ नहीं खरीदना', तो बाजार की शक्ति निष्प्रभावी हो जाती है। ऐसे व्यक्ति बाजार में जाकर भी कुछ नहीं खरीदते। यह नकार सकारात्मक भी हो सकता है — जब व्यक्ति जानता हो कि उसे क्या नहीं चाहिए।
2बाजार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?Show solution
पाठ में वर्णित ग्राहकों के प्रकार:
1. खाली मन वाले ग्राहक: ये वे ग्राहक हैं जो बिना किसी उद्देश्य के बाजार जाते हैं। बाजार की चमक-दमक इन्हें सम्मोहित कर लेती है और ये अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लेते हैं। लेखक के मित्र इसी श्रेणी में आते हैं जो हर बार बाजार से ढेर सारा सामान लेकर आते हैं।
2. भरे मन वाले ग्राहक: ये वे ग्राहक हैं जिनके मन में पहले से यह निश्चित होता है कि उन्हें क्या खरीदना है। ये बाजार का सदुपयोग करते हैं। भगत जी इसी श्रेणी के आदर्श ग्राहक हैं।
3. पर्चेजिंग पावर से प्रभावित ग्राहक: ये वे ग्राहक हैं जो अपनी क्रय-शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए खरीदारी करते हैं। इनके लिए खरीदना एक 'पावर' का अनुभव है।
स्वयं की श्रेणी:
मैं स्वयं को दूसरी श्रेणी — भरे मन वाले ग्राहक — में रखना चाहता/चाहती हूँ, हालाँकि कभी-कभी बाजार की चकाचौंध मुझे भी प्रभावित कर देती है। मेरा प्रयास रहता है कि मैं केवल जरूरत की वस्तुएँ ही खरीदूँ और अनावश्यक खर्च से बचूँ।
3आप बाजार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाजार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेजिंग पावर आपको किस तरह के बाजार में नजर आती है?Show solution
मॉल की संस्कृति और सामान्य बाजार/हाट की संस्कृति में अंतर:
| आधार | मॉल की संस्कृति | सामान्य बाजार/हाट की संस्कृति |
|---|---|---|
| वातावरण | वातानुकूलित, चमकदार, कृत्रिम | खुला, प्राकृतिक, सरल |
| मोलभाव | नहीं होता (निश्चित मूल्य) | होता है, मानवीय संपर्क अधिक |
| उद्देश्य | मनोरंजन + खरीदारी | केवल आवश्यकता की पूर्ति |
| वस्तुएँ | ब्रांडेड, महँगी | सामान्य, सस्ती, स्थानीय |
| ग्राहक वर्ग | मध्यम व उच्च वर्ग | सभी वर्ग |
| मानवीय संबंध | कम, औपचारिक | अधिक, आत्मीय |
| प्रभाव | उपभोक्तावाद को बढ़ावा | वास्तविक जरूरतों की पूर्ति |
पर्चेजिंग पावर कहाँ नजर आती है:
पर्चेजिंग पावर सबसे अधिक मॉल की संस्कृति में नजर आती है। वहाँ व्यक्ति अपनी क्रय-शक्ति का प्रदर्शन करता है। महँगे ब्रांड खरीदना, बड़े-बड़े बिल चुकाना — यह सब पर्चेजिंग पावर का प्रदर्शन है। सामान्य बाजार और हाट में पर्चेजिंग पावर का प्रदर्शन कम होता है क्योंकि वहाँ लोग जरूरत के अनुसार खरीदते हैं।
4लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाज़ार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।Show solution
हाँ, मैं इस विचार से पूर्णतः सहमत हूँ।
तर्क:
1. आवश्यकता की विवशता: जब किसी व्यक्ति को किसी वस्तु की अत्यंत आवश्यकता होती है, तो विक्रेता उसकी इस विवशता का फायदा उठाता है। जैसे — बाढ़ या सूखे के समय खाद्य पदार्थों की कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं। जरूरतमंद व्यक्ति को मजबूरन महँगे दाम पर खरीदना पड़ता है।
2. दवाइयों का उदाहरण: किसी गंभीर बीमारी में जब कोई विशेष दवाई की जरूरत होती है, तो दवा कंपनियाँ उसकी कीमत मनमाने ढंग से बढ़ा देती हैं। रोगी की आवश्यकता ही उसके शोषण का माध्यम बन जाती है।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में: गाँव के किसान जब अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होते हैं, तो बिचौलिए उनकी आवश्यकता का फायदा उठाकर कम दाम पर फसल खरीद लेते हैं।
4. नकली सामान का उदाहरण: जैसा कि पाठ में दिए गए लेख 'नकली सामान पर नकेल जरूरी' में बताया गया है — गाँव के लोगों की जरूरत का फायदा उठाकर कंपनियाँ नकली और घटिया सामान बेचती हैं।
निष्कर्ष: आवश्यकता जब शोषण का रूप लेती है, तो बाजार मानवता के लिए विडंबना बन जाता है। इसलिए उपभोक्ता जागरूकता और नैतिक व्यापार अत्यंत आवश्यक है।
5'स्त्री माया न जोड़े' यहाँ माया शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?Show solution
'माया' शब्द का संकेत:
यहाँ 'माया' शब्द धन-संपत्ति, गहने-जेवर और भौतिक वस्तुओं के संग्रह की ओर संकेत कर रहा है। स्त्रियों द्वारा सोना-चाँदी, गहने और धन जोड़ने की प्रवृत्ति को 'माया जोड़ना' कहा गया है।
माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, परिस्थितिवश है:
लेखक का मानना है कि स्त्रियों में माया जोड़ने की प्रवृत्ति जन्मजात नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ उन्हें ऐसा करने के लिए विवश करती हैं।
वे परिस्थितियाँ जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश करती हैं:
- आर्थिक असुरक्षा: पारंपरिक समाज में स्त्री को संपत्ति का अधिकार नहीं था। पति की मृत्यु या तलाक की स्थिति में उसके पास कोई आर्थिक सहारा नहीं होता था। इसलिए वह गहने-जेवर के रूप में माया जोड़ती थी।
- पराश्रितता: स्त्री पूरी तरह पुरुष पर निर्भर थी। अपनी और बच्चों की जरूरतों के लिए उसे कुछ न कुछ बचाकर रखना पड़ता था।
- भविष्य की अनिश्चितता: वृद्धावस्था में या विपत्ति के समय उसके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं थी, इसलिए वह माया जोड़ती थी।
- सामाजिक दबाव: समाज में स्त्री की प्रतिष्ठा उसके गहनों से आँकी जाती थी, जिससे वह माया जोड़ने के लिए प्रेरित होती थी।
निष्कर्ष: यदि स्त्री को आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुरक्षा और समान अधिकार मिलें, तो माया जोड़ने की यह विवशता समाप्त हो सकती है।
आपसदारी
1'ज़रूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है' — भगत जी की इस संतुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए —
चाह गई चिंता गई मनुओं बेपरवाह
जाके कछु न चाहिए सोइ सहसाह।Show solution
भगत जी की निस्पृहता और कबीर की सूक्ति की तुलना:
भगत जी की निस्पृहता:
भगत जी बाजार में केवल अपनी जरूरत-भर जीरा लेने जाते हैं। एक बार जरूरत पूरी हो जाने के बाद पूरा बाजार उनके लिए 'नहीं के बराबर' हो जाता है। वे बाजार की चमक-दमक, आकर्षक वस्तुओं और विज्ञापनों से प्रभावित नहीं होते। उनकी इच्छाएँ सीमित और नियंत्रित हैं। वे जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और क्या नहीं। यही उनकी संतुष्ट निस्पृहता है।
कबीर की सूक्ति का अर्थ:
कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति की कोई चाह (इच्छा) नहीं रही, उसकी चिंता भी समाप्त हो गई। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह बेपरवाह हो जाता है। जिसे कुछ भी नहीं चाहिए, वही सच्चा 'शहंशाह' (सम्राट) है।
तुलना:
दोनों में गहरी समानता है:
- भगत जी की 'जरूरत-भर' की सोच और कबीर की 'चाह गई' की भावना एक ही है।
- दोनों संतोष और निस्पृहता को सर्वोच्च मानते हैं।
- भगत जी व्यावहारिक जीवन में कबीर के दर्शन को जीते हैं।
- कबीर के अनुसार जो कुछ नहीं चाहता वह सम्राट है — भगत जी भी बाजार के सामने 'सम्राट' की तरह हैं क्योंकि बाजार उन्हें प्रभावित नहीं कर पाता।
निष्कर्ष: भगत जी कबीर के दर्शन के जीवंत उदाहरण हैं। दोनों यह सिखाते हैं कि सच्ची स्वतंत्रता और सुख इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि इच्छाओं के त्याग में है।
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(क) नकली सामान के खिलाफ जागरूकता के लिए आप क्या कर सकते हैं?
(ख) उपभोक्ताओं के हित को मद्देनज़र रखते हुए सामान बनाने वाली कंपनियों का क्या नैतिक दायित्व है?
(ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे छिपी मानसिकता को उजागर कीजिए।
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विज्ञापन की दुनिया
1. विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु
2. विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य
3. विज्ञापन की भाषा
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भाषा की बात
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चर्चा करें
(क) सामाजिक विकास के कार्यों में।
(ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में।
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Frequently Asked Questions
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