कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूरच्छा और राम का विलाप-(तुलसीदास) (Part 2) — NCERT Solutions
Haryana Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूरच्छा और राम का विलाप-(तुलसीदास) (Part 2), Haryana Board Class 12 Hindi: 13 textbook questions.
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पाठ के साथ
1कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।Show solution
दिया गया है: कवितावली के उत्तर कांड से लिए गए छंद।
उत्तर:
तुलसीदास केवल भक्त कवि नहीं थे, वे अपने युग के鋭 सामाजिक-आर्थिक द्रष्टा भी थे। कवितावली के छंदों में उन्होंने अपने समय की आर्थिक विषमता का यथार्थ चित्रण किया है। इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं:
- बेरोज़गारी का चित्रण: तुलसी लिखते हैं कि लोग किसी भी प्रकार का काम करने को तैयार हैं — कोई खेती करता है, कोई मज़दूरी, कोई भीख माँगता है, कोई चोरी करता है। इससे स्पष्ट है कि उस युग में रोज़गार का घोर अभाव था।
- भूख की विकरालता: "पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी" — यह पंक्ति बताती है कि लोग पेट भरने के लिए अपनी संतानों तक को बेचने पर विवश थे। यह आर्थिक विषमता की चरम सीमा है।
- विभिन्न वर्गों की दुर्दशा: किसान, मज़दूर, कारीगर, भिखारी — सभी वर्गों की दयनीय स्थिति का वर्णन करके तुलसी ने समाज के हर तबके की पीड़ा को उजागर किया है।
- ऊँच-नीच सभी पीड़ित: "ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि" — यह पंक्ति दर्शाती है कि आर्थिक संकट ने ऊँच-नीच सभी को प्रभावित किया था और लोग धर्म-अधर्म की परवाह किए बिना पेट भरने में लगे थे।
निष्कर्ष: इस प्रकार तुलसीदास ने अपने युग की आर्थिक विषमता — बेरोज़गारी, भुखमरी, बाल-विक्रय, वर्ग-शोषण — का सजीव चित्रण किया है, जो उनकी गहरी सामाजिक समझ का प्रमाण है।
2पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है— तुलसी का यह काव्य-सत्य क्या इस समय का भी युग-सत्य है? तर्कसंगत उत्तर दीजिए।Show solution
दिया गया है: तुलसी का काव्य-कथन कि राम-भक्ति रूपी मेघ ही पेट की आग बुझा सकता है।
उत्तर:
तुलसीदास का यह काव्य-सत्य आंशिक रूप से आज के युग-सत्य से मेल खाता है, परंतु पूर्णतः नहीं। इसे दो दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है:
पक्ष में तर्क (हाँ, यह आज भी सत्य है):
- आज भी करोड़ों लोग भुखमरी, बेरोज़गारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
- जब भौतिक साधन असफल हो जाते हैं, तब मनुष्य ईश्वर की शरण में जाता है और उसे मानसिक शांति मिलती है।
- भक्ति मनुष्य को निराशा से उबारती है और जीने की शक्ति देती है — यह मनोवैज्ञानिक सत्य आज भी प्रासंगिक है।
- सामाजिक समरसता और नैतिक बल के लिए आध्यात्मिक आधार आज भी आवश्यक है।
विपक्ष में तर्क (नहीं, केवल भक्ति पर्याप्त नहीं):
- आज के युग में भूख की समस्या का समाधान केवल भक्ति से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक नीतियों, रोज़गार सृजन और सामाजिक न्याय से होगा।
- आधुनिक विज्ञान, तकनीक और सरकारी योजनाएँ भूख मिटाने में अधिक सक्षम हैं।
- केवल ईश्वर-भरोसे बैठे रहना पलायनवाद है; कर्म और प्रयास भी आवश्यक हैं।
निष्कर्ष: तुलसी का यह कथन आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक धरातल पर आज भी सत्य है, किंतु व्यावहारिक धरातल पर भक्ति के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक प्रयास भी अनिवार्य हैं। भक्ति आंतरिक शक्ति देती है, बाहरी संघर्ष मनुष्य को स्वयं करना होता है।
3तुलसी ने यह कहने की जरूरत क्यों समझी?
धृत कहो, अवधृत कहो, रजपूत कहो, जोलहा कहो कोऊ / काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?Show solution
दिया गया है: तुलसी का सवैया जिसमें वे जाति-पाँति की परवाह न करने की बात कहते हैं।
तुलसी को यह कहने की ज़रूरत क्यों पड़ी:
तुलसीदास के युग में जाति-व्यवस्था अत्यंत कठोर थी। समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियों के बीच विवाह-संबंध वर्जित थे। जाति के आधार पर भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक उत्पीड़न चरम पर था। तुलसी स्वयं एक ऐसे भक्त थे जो राम-भक्ति को सर्वोपरि मानते थे और जाति-बंधन को व्यर्थ समझते थे।
उन्होंने यह इसलिए कहा क्योंकि:
- समाज में उन पर जाति-भ्रष्ट होने के आरोप लगाए जाते थे।
- वे स्पष्ट करना चाहते थे कि वे किसी की जाति नहीं बिगाड़ रहे — न बेटे का विवाह किसी अन्य जाति में करेंगे, न बेटी का।
- यह उनका आत्मसम्मान और स्वाभिमान का वक्तव्य था।
यदि "काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब" कहते तो सामाजिक अर्थ:
यदि तुलसी "बेटी" का विवाह न करने की बात कहते, तो सामाजिक अर्थ में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आता:
- कन्यादान की परंपरा: भारतीय समाज में बेटी देना (कन्यादान) अधिक संवेदनशील विषय था। बेटी देने में जाति की शुद्धता का प्रश्न अधिक गहरा था।
- सामाजिक दबाव: बेटी का विवाह अन्य जाति में करना उस समाज में अधिक बड़ा अपराध माना जाता था, क्योंकि इससे "कुल" की मर्यादा पर प्रश्नचिह्न लगता था।
- स्त्री की स्वायत्तता: बेटी के संदर्भ में यह कथन स्त्री को वस्तु की तरह देखने की परंपरा को और उजागर करता।
- अर्थ में तीव्रता: "बेटी न ब्याहब" कहने से तुलसी का विद्रोह और अधिक तीखा होता, क्योंकि यह समाज की सबसे संवेदनशील नस को छूता।
निष्कर्ष: तुलसी ने "बेटा" का उल्लेख करके अपेक्षाकृत सौम्य रूप में अपनी बात कही। "बेटी" का उल्लेख करने पर सामाजिक विद्रोह और अधिक प्रखर होता तथा स्त्री की सामाजिक स्थिति पर भी प्रश्न उठता।
4धृत कहो... वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?Show solution
दिया गया है: तुलसी का वह सवैया जिसमें वे कहते हैं — चाहे कोई कुछ भी कहे, मैं किसी की जाति नहीं बिगाड़ूँगा।
उत्तर:
मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। इसके निम्नलिखित आधार हैं:
1. बाहरी सरलता, भीतरी दृढ़ता:
तुलसीदास की भाषा सरल और सहज है, वे विनम्र भाव से बात करते हैं — "माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो" — अर्थात् माँगकर खाएँगे, मस्जिद में सोएँगे। यह बाहरी निरीहता है। परंतु भीतर से वे अत्यंत दृढ़ और स्वाभिमानी हैं।
2. जाति-प्रथा को चुनौती:
"धृत कहो, अवधृत कहो, रजपूत कहो, जोलहा कहो कोऊ" — यहाँ तुलसी स्पष्ट कह रहे हैं कि समाज चाहे उन्हें किसी भी जाति का कहे, उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। यह एक स्वाभिमानी व्यक्ति का उद्घोष है।
3. राम-भक्ति ही पहचान:
तुलसी की असली पहचान उनकी राम-भक्ति है, जाति नहीं। वे कहते हैं — "तुलसी सरनाम गुलाम है राम को" — अर्थात् वे केवल राम के दास हैं। यह भक्त का परम स्वाभिमान है।
4. सामाजिक दबाव से निर्भयता:
उस युग में जाति-व्यवस्था के विरुद्ध बोलना साहस का काम था। तुलसी ने निर्भीकता से कहा कि वे किसी के दबाव में नहीं आएँगे — न विवाह-संबंध बदलेंगे, न अपनी भक्ति।
5. "लैबोको एकु न दैबको दोऊ":
यह पंक्ति दर्शाती है कि तुलसी न किसी से कुछ लेने की चाह रखते हैं, न देने की — यह पूर्ण आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का प्रतीक है।
निष्कर्ष: तुलसीदास की यह भीतरी असलियत — एक स्वाभिमानी, निर्भीक, राम-शरणागत भक्त की — उनके काव्य में स्पष्ट झलकती है। वे बाहर से जितने विनम्र हैं, भीतर से उतने ही दृढ़ और आत्मसम्मानी हैं।
5व्याख्या करें—
(क) मर्म हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।
जी जनतेऊँ बन बंधु बिछोह। पितु बचन मनतेऊँ नहिं ओह।।
(ख) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जी जड़ दैव जिआवै मोही।।
(ग) माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।
(घ) ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।।Show solution
(क) व्याख्या:
मूल पंक्तियाँ: *मर्म हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।
जी जनतेऊँ बन बंधु बिछोह। पितु बचन मनतेऊँ नहिं ओह।।*
प्रसंग: लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम विलाप करते हुए कहते हैं।
व्याख्या: राम कहते हैं — हे लक्ष्मण! तुमने मेरे (भाई के) प्रेम के लिए माता-पिता को त्याग दिया। वन में ठंड, धूप और तूफान सहे। यदि मुझे पहले से पता होता कि वन में भाई का वियोग होगा, तो मैं पिता की आज्ञा कभी नहीं मानता। यह राम की पश्चाताप-भरी वेदना है। वे स्वयं को लक्ष्मण के कष्टों का उत्तरदायी मानते हैं। यहाँ भ्रातृप्रेम की गहराई और राम की मानवीय संवेदनशीलता का मार्मिक चित्रण है।
(ख) व्याख्या:
मूल पंक्तियाँ: *जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जी जड़ दैव जिआवै मोही।।*
प्रसंग: राम लक्ष्मण की मूर्छा पर विलाप करते हुए उपमाएँ देते हैं।
व्याख्या: राम कहते हैं — जैसे पंखों के बिना पक्षी अत्यंत दीन-हीन हो जाता है, जैसे नागमणि के बिना साँप और सूँड के बिना हाथी असहाय हो जाता है — ठीक उसी प्रकार हे भाई! तुम्हारे बिना मेरा जीवन निरर्थक है। फिर भी यह निष्ठुर विधाता मुझे जीवित रखे हुए है। यहाँ तीन सुंदर उपमाओं के माध्यम से राम की विवशता और लक्ष्मण के प्रति उनके अगाध प्रेम को व्यक्त किया गया है।
(ग) व्याख्या:
मूल पंक्तियाँ: माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।
प्रसंग: तुलसीदास अपनी स्वतंत्र जीवन-शैली का वर्णन करते हैं।
व्याख्या: तुलसी कहते हैं — मैं माँगकर खाऊँगा, मस्जिद में सोऊँगा (अर्थात् किसी के भी आश्रय में रहूँगा), न किसी से कुछ लेने की इच्छा है, न किसी को कुछ देने की। यह पंक्ति तुलसी की निर्लिप्तता, स्वाभिमान और सांसारिक बंधनों से मुक्ति की भावना को व्यक्त करती है। वे किसी पर आश्रित नहीं रहना चाहते और न ही किसी को कुछ देने का दायित्व लेना चाहते। यह उनकी फकीराना वृत्ति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
(घ) व्याख्या:
मूल पंक्तियाँ: ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।।
प्रसंग: तुलसी अपने युग की आर्थिक विपन्नता का चित्रण करते हैं।
व्याख्या: तुलसी कहते हैं — लोग ऊँचे-नीचे सभी प्रकार के काम करते हैं, धर्म-अधर्म की परवाह किए बिना, केवल पेट भरने के लिए। यहाँ तक कि वे अपने बेटे-बेटियों को भी बेच देते हैं। यह पंक्ति तुलसी के युग की भयावह आर्थिक विषमता का यथार्थ चित्र है। भूख इतनी भयंकर है कि मनुष्य नैतिकता, धर्म और पारिवारिक संबंध सब भूल जाता है। यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
6भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है। क्या आप इससे सहमत हैं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।Show solution
दिया गया है: राम का लक्ष्मण-मूर्छा पर विलाप।
उत्तर:
हाँ, मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। तुलसीदास ने राम के भ्रातृशोक को दैवीय लीला के रूप में नहीं, बल्कि एक सच्चे मानव की वेदना के रूप में चित्रित किया है। इसके निम्नलिखित प्रमाण हैं:
1. पश्चाताप की भावना:
राम कहते हैं — "जी जनतेऊँ बन बंधु बिछोह। पितु बचन मनतेऊँ नहिं ओह।" — यदि पहले जानता कि वन में भाई का वियोग होगा, तो पिता की आज्ञा न मानता। यह एक सामान्य मनुष्य का पश्चाताप है, ईश्वर का नहीं।
2. आत्म-दोष:
राम स्वयं को लक्ष्मण के कष्टों का कारण मानते हैं — "मेरे कारण तुमने माता-पिता छोड़े, वन के कष्ट सहे।" यह मानवीय अपराध-बोध है।
3. उपमाओं में मानवीय संवेदना:
"जथा पंख बिनु खग अति दीना" — पंखहीन पक्षी, मणिहीन साँप, सूँडहीन हाथी की उपमाएँ देकर राम अपनी असहायता व्यक्त करते हैं। यह एक भाई की वेदना है।
4. सांसारिक चिंताएँ:
राम सोचते हैं — "जैहऊँ अवध कवन मुहुँ लाई" — अयोध्या किस मुँह से जाऊँगा? माँ सुमित्रा को क्या उत्तर दूँगा? यह एक पुत्र और भाई की लौकिक चिंता है।
5. "नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई":
राम स्वयं को धिक्कारते हैं कि स्त्री (सीता) के लिए प्रिय भाई खो दिया। यह आत्म-ग्लानि पूर्णतः मानवीय है।
निष्कर्ष: तुलसीदास ने राम को यहाँ अवतार के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रेमी भाई के रूप में चित्रित किया है। यही इस काव्य की विशेषता है — राम की दिव्यता के साथ-साथ उनकी मानवीयता का यह चित्रण पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करता है।
7शोकप्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है?Show solution
दिया गया है: लक्ष्मण-मूर्छा के प्रसंग में हनुमान का संजीवनी लेकर आना।
उत्तर:
लक्ष्मण की मूर्छा के कारण पूरे वातावरण में शोक और निराशा का साम्राज्य था। राम विलाप कर रहे थे, वानर-सेना भयभीत और दुखी थी, सुग्रीव आदि भी शोकाकुल थे। यह पूरा दृश्य करुण रस से ओत-प्रोत था।
ऐसे में हनुमान का संजीवनी बूटी लेकर आगमन एक नाटकीय परिवर्तन लाता है:
1. वीरता का प्रदर्शन:
हनुमान ने अकेले हिमालय जाकर संजीवनी लाने का दुष्कर कार्य किया। यह असाधारण वीरता और पराक्रम का कार्य था।
2. निराशा से आशा की ओर:
जब सब निराश थे, हनुमान ने अपने बल और बुद्धि से असंभव को संभव कर दिखाया। यह वीर रस का मूल भाव है — संकट में भी निर्भीक रहना।
3. शोक का अंत:
हनुमान के आते ही करुण रस का वातावरण बदल गया। लक्ष्मण को होश आया, राम का विलाप थमा और सेना में उत्साह का संचार हुआ।
4. रस-परिवर्तन:
काव्यशास्त्र में जब एक रस के बीच दूसरा रस प्रकट होता है, तो वह संचारी भाव की तरह कार्य करता है। यहाँ करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव काव्य को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
निष्कर्ष: हनुमान का यह अवतरण शोक-संतप्त वातावरण में आशा, उत्साह और वीरता का संचार करता है। इसीलिए इसे करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव कहा गया है — यह काव्य की रस-योजना का सुंदर उदाहरण है।
बरु अपजस सहतेऊँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।
भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप-वचन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?
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Frequently Asked Questions
What are the important topics in कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूरच्छा और राम का विलाप-(तुलसीदास) for Haryana Board Class 12 Hindi?
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