राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
Jharkhand Board · Class 10 · Hindi
NCERT Solutions for राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद — Jharkhand Board Class 10 Hindi.
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Get startedराम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद — अभ्यास प्रश्न (क्षितिज-2, कक्षा 10)
1परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए?Show solution
परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष टूटने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए—
1. पुराना धनुष था: लक्ष्मण ने कहा कि यह धनुष बहुत पुराना था, इसलिए राम के छूते ही टूट गया। इसमें राम का कोई दोष नहीं है।
2. बचपन में भी ऐसे धनुष तोड़े हैं: लक्ष्मण ने कहा कि बचपन में भी उन्होंने ऐसे अनेक धनुष तोड़े हैं, तब परशुराम ने क्रोध नहीं किया। इस धनुष पर इतना मोह क्यों?
3. साधारण धनुष था: लक्ष्मण ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यह कोई विशेष धनुष नहीं था, बस एक पुरानी कमान थी जो टूट गई। इस पर इतना क्रोध उचित नहीं।
4. राम ने जान-बूझकर नहीं तोड़ा: लक्ष्मण ने स्पष्ट किया कि राम ने जानबूझकर धनुष नहीं तोड़ा, वह तो स्वयंवर की शर्त पूरी करने के लिए धनुष उठाने गए थे और धनुष अपने आप टूट गया।
निष्कर्ष: लक्ष्मण ने अपने तर्कों से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि धनुष टूटना राम की गलती नहीं थी और परशुराम का क्रोध अनुचित है।
2परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुईं उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
राम के स्वभाव की विशेषताएँ:
परशुराम के क्रोध करने पर राम ने अत्यंत विनम्रता और शांति से उत्तर दिया। उन्होंने परशुराम को 'गुरु' और 'पिता समान' कहकर संबोधित किया। राम ने स्वयं को परशुराम का दास बताया और कहा कि धनुष तोड़ने में उनका कोई दोष नहीं था। राम के स्वभाव की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
- विनम्रता: वे बड़ों के सामने सदा नम्र रहे।
- धैर्य: क्रोध की स्थिति में भी वे शांत रहे।
- मर्यादा का पालन: उन्होंने कभी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी।
- सहनशीलता: परशुराम की कठोर बातें सुनकर भी वे विचलित नहीं हुए।
लक्ष्मण के स्वभाव की विशेषताएँ:
लक्ष्मण ने परशुराम के क्रोध का डटकर सामना किया। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण और तीखे वचनों से परशुराम को उत्तर दिया। लक्ष्मण के स्वभाव की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
- साहसी और निर्भीक: वे परशुराम जैसे महाक्रोधी ऋषि से भी नहीं डरे।
- वाक्पटु: उन्होंने तर्कपूर्ण और व्यंग्यात्मक वचनों से परशुराम को निरुत्तर किया।
- स्वाभिमानी: उन्होंने अपने और राम के सम्मान की रक्षा की।
- उग्र स्वभाव: वे शीघ्र उत्तेजित हो जाते थे और अन्याय सहन नहीं करते थे।
निष्कर्ष: राम मर्यादा और विनम्रता के प्रतीक हैं जबकि लक्ष्मण साहस और स्वाभिमान के प्रतीक हैं।
3लक्ष्मण और परशुराम के संवाद का जो अंश आपको सबसे अच्छा लगा उसे अपने शब्दों में संवाद शैली में लिखिए।Show solution
*(यह प्रश्न व्यक्तिपरक है। नीचे एक आदर्श उत्तर दिया जा रहा है।)*
मुझे सबसे अच्छा वह अंश लगा जब परशुराम बार-बार अपना फरसा दिखाकर लक्ष्मण को डराने की कोशिश करते हैं और लक्ष्मण निर्भीकता से उत्तर देते हैं। उसे संवाद शैली में इस प्रकार लिखा जा सकता है—
परशुराम: (क्रोध से) देखो इस फरसे को! यही फरसा सहस्रबाहु की भुजाएँ काट चुका है। तुम बालक हो, इसलिए छोड़ रहा हूँ, नहीं तो अभी...
लक्ष्मण: (मुस्कुराते हुए) हे महामुनि! आप बार-बार यह फरसा दिखा रहे हैं। क्या आप फूँक मारकर पहाड़ उड़ाना चाहते हैं? यहाँ कोई कुम्हड़े की बेल का कमजोर फल नहीं है जो तर्जनी उँगली दिखाने से मर जाए।
परशुराम: (और अधिक क्रोधित होकर) तू जानता नहीं मैं कौन हूँ! मैंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से खाली किया है।
लक्ष्मण: (व्यंग्य से) मुनिवर! वीर पुरुष अपनी वीरता का बखान नहीं करते, वे रणभूमि में अपनी वीरता दिखाते हैं। हम भी क्षत्रिय हैं और युद्ध से नहीं डरते।
परशुराम: (विस्मित होकर) यह बालक तो बड़ा ढीठ है!
लक्ष्मण: हम ढीठ नहीं, स्वाभिमानी हैं। अपने बड़े भाई श्रीराम का अपमान हम सहन नहीं कर सकते।
4परशुराम ने अपने विषय में सभा में क्या-क्या कहा, निम्न पद्यांश के आधार पर लिखिए—
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वविदित क्षत्रियकुल द्रोही।।
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
मातु पितहि जनि सोचबस करसिस महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।Show solution
परशुराम ने सभा में अपने विषय में निम्नलिखित बातें कहीं—
1. बाल ब्रह्मचारी: उन्होंने कहा कि वे जन्म से ब्रह्मचारी हैं अर्थात् उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया है।
2. अत्यंत क्रोधी: उन्होंने स्वयं को बहुत क्रोधी स्वभाव का बताया। उनका क्रोध जगत-प्रसिद्ध है।
3. क्षत्रिय-कुल के शत्रु: उन्होंने कहा कि वे क्षत्रिय वंश के प्रसिद्ध शत्रु हैं। सारा संसार इस बात को जानता है।
4. भुजबल से पृथ्वी को राजाओं से मुक्त किया: उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी भुजाओं के बल से पृथ्वी को राजाओं (क्षत्रियों) से रहित कर दिया और वह भूमि अनेक बार ब्राह्मणों को दान में दे दी।
5. सहस्रबाहु की भुजाएँ काटने वाले: उन्होंने कहा कि यह वही फरसा है जिसने सहस्रबाहु की हजार भुजाएँ काट डाली थीं। हे राजकुमार! इस फरसे को देखो।
6. माता-पिता को चिंता में मत डालो: उन्होंने राजकुमार (लक्ष्मण) को चेतावनी देते हुए कहा कि अपने माता-पिता को चिंता में मत डालो।
7. गर्भ में पल रहे बच्चों का नाश करने वाला फरसा: उन्होंने कहा कि उनका फरसा इतना भयंकर है कि यह गर्भ में पल रहे बच्चों का भी नाश कर सकता है।
निष्कर्ष: परशुराम ने अपनी वीरता, क्रोध और क्षत्रिय-विरोधी स्वभाव का बखान करके सभा को भयभीत करने का प्रयास किया।
5लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या-क्या विशेषताएँ बताईं?Show solution
लक्ष्मण ने परशुराम को उत्तर देते हुए वीर योद्धा की निम्नलिखित विशेषताएँ बताईं—
1. वीर अपनी वीरता का बखान नहीं करते: लक्ष्मण ने कहा कि सच्चे वीर पुरुष अपनी वीरता का गुणगान स्वयं नहीं करते। जो बार-बार अपनी प्रशंसा करे, वह वास्तव में वीर नहीं होता।
2. वीर रणभूमि में अपनी शक्ति दिखाते हैं: सच्चे योद्धा युद्धभूमि में अपनी वीरता प्रदर्शित करते हैं, केवल बातों से नहीं।
3. वीर कायरों और निर्बलों पर शस्त्र नहीं उठाते: लक्ष्मण ने व्यंग्य करते हुए कहा कि परशुराम बार-बार फरसा दिखाकर उन्हें डराना चाहते हैं, जबकि वीर पुरुष ऐसा नहीं करते।
4. वीर निर्भीक होते हैं: सच्चा योद्धा किसी के भी शस्त्र या धमकी से नहीं डरता।
5. वीर शत्रु की शक्ति को कम नहीं आँकते: लक्ष्मण ने संकेत दिया कि वे भी क्षत्रिय हैं और युद्ध करना जानते हैं।
निष्कर्ष: लक्ष्मण ने परशुराम पर व्यंग्य करते हुए यह स्पष्ट किया कि वास्तविक वीरता शब्दों में नहीं, कर्म में होती है।
6साहस और शक्ति के साथ विनम्रता हो तो बेहतर है। इस कथन पर अपने विचार लिखिए।Show solution
यह कथन पूर्णतः सत्य और विचारणीय है। साहस और शक्ति मनुष्य को महान बनाते हैं, परंतु जब इनके साथ विनम्रता भी हो तो व्यक्तित्व और भी निखर जाता है।
साहस और शक्ति का महत्त्व:
साहस और शक्ति के बिना मनुष्य अन्याय का सामना नहीं कर सकता। ये गुण व्यक्ति को आत्मनिर्भर और दृढ़ बनाते हैं।
विनम्रता का महत्त्व:
विनम्रता मनुष्य को सबका प्रिय बनाती है। विनम्र व्यक्ति दूसरों का सम्मान पाता है और समाज में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है।
दोनों का संयोग:
इस पाठ में राम इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। वे अत्यंत शक्तिशाली और साहसी हैं — उन्होंने शिव-धनुष तोड़ा — परंतु परशुराम के क्रोध के सामने वे विनम्रता से बोले। इसके विपरीत परशुराम में शक्ति तो थी, परंतु विनम्रता का अभाव था, इसलिए वे सभा में उपहास के पात्र बने।
निष्कर्ष: साहस और शक्ति से व्यक्ति शत्रु को परास्त करता है, परंतु विनम्रता से वह सबका हृदय जीत लेता है। इसलिए साहस, शक्ति और विनम्रता का संयोग ही आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करता है। जैसा कि कहा गया है — 'विनम्रता वीरों का आभूषण है।'
7(क)भाव स्पष्ट कीजिए—
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुटारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।Show solution
प्रसंग: यह पंक्तियाँ तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' के बालकांड से ली गई हैं। जब परशुराम बार-बार अपना फरसा दिखाकर लक्ष्मण को डराने का प्रयास करते हैं, तब लक्ष्मण मुस्कुराते हुए व्यंग्यपूर्ण उत्तर देते हैं।
भावार्थ:
लक्ष्मण मुस्कुराते हुए कोमल वाणी में बोले — 'अरे! ये तो महामुनि हैं और महान योद्धा भी मानते हैं अपने आप को। ये बार-बार मुझे अपना फरसा दिखा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे ये फूँक मारकर पहाड़ उड़ाना चाहते हों।'
विशेष भाव:
- लक्ष्मण ने 'मृदु बानी' (कोमल वाणी) में व्यंग्य किया, जो उनकी चतुराई दर्शाता है।
- 'फूँकि पहारू उड़ावन' — यह मुहावरा बताता है कि परशुराम की धमकियाँ व्यर्थ हैं। जैसे फूँक से पहाड़ नहीं उड़ता, वैसे ही उनकी धमकियों से लक्ष्मण नहीं डरते।
- इन पंक्तियों में व्यंग्य-सौंदर्य और वीर रस का अद्भुत समन्वय है।
7(ख)भाव स्पष्ट कीजिए—
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।Show solution
प्रसंग: परशुराम जब बार-बार अपना फरसा दिखाकर और धमकी देकर लक्ष्मण को डराने का प्रयास करते हैं, तब लक्ष्मण निर्भीकता से उत्तर देते हैं।
भावार्थ:
लक्ष्मण कहते हैं — 'यहाँ कोई कुम्हड़े की बेल का कमजोर फल (कुम्हड़बतिया) नहीं है जो तर्जनी उँगली दिखाने मात्र से मर जाए। हम तो आपका फरसा और धनुष-बाण देखकर भी कुछ स्वाभिमान के साथ बोल रहे हैं।'
विशेष भाव:
- 'कुम्हड़बतिया' — यह एक अत्यंत सटीक व्यंग्य है। कुम्हड़े का छोटा फल बहुत कमजोर होता है। लक्ष्मण कह रहे हैं कि वे इतने कमजोर नहीं हैं कि केवल उँगली दिखाने से डर जाएँ।
- 'सहित अभिमाना' — लक्ष्मण स्वाभिमान के साथ बोल रहे हैं। वे डरकर नहीं, बल्कि क्षत्रिय-गर्व के साथ उत्तर दे रहे हैं।
- इन पंक्तियों में वीर रस और व्यंग्य का सुंदर मेल है।
- लक्ष्मण का यह कथन परशुराम की अहंकारपूर्ण धमकियों का करारा जवाब है।
8पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा सौंदर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए।Show solution
तुलसीदास हिंदी साहित्य के महाकवि हैं। 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद' के आधार पर उनके भाषा सौंदर्य की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं—
1. अवधी भाषा का प्रयोग: तुलसीदास ने इस प्रसंग में अवधी भाषा का प्रयोग किया है जो सरल, सहज और मधुर है।
2. चौपाई और दोहा छंद: उन्होंने चौपाई और दोहा छंद का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है जिससे भाषा में लय और संगीतात्मकता आती है।
3. अनुप्रास अलंकार: 'बाल ब्रह्मचारी', 'भुजबल भूमि भूप' जैसे स्थलों पर अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
4. व्यंग्य-सौंदर्य: लक्ष्मण के संवादों में व्यंग्य का अद्भुत सौंदर्य है जो भाषा को जीवंत बनाता है।
5. लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रयोग: 'फूँकि पहारू उड़ावन', 'कुम्हड़बतिया' जैसे लोक-प्रचलित प्रयोगों से भाषा में जीवंतता आई है।
6. पात्रानुकूल भाषा: राम की भाषा विनम्र और मर्यादित है, लक्ष्मण की भाषा तीखी और व्यंग्यपूर्ण है तथा परशुराम की भाषा क्रोधपूर्ण है — यह पात्रानुकूलता तुलसी की विशेषता है।
7. उपमा और रूपक: भाषा में उपमा और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग है।
8. संवाद-शैली की जीवंतता: संवाद इतने स्वाभाविक हैं कि पाठक उन्हें पढ़कर दृश्य की कल्पना कर सकता है।
9. भावानुकूल शब्द-चयन: क्रोध, विनम्रता, व्यंग्य — प्रत्येक भाव के लिए उचित शब्दों का चयन किया गया है।
10. संक्षिप्तता और प्रभावशीलता: थोड़े शब्दों में गहरी बात कहने की तुलसी की क्षमता अद्वितीय है।
9इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य है। उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।Show solution
इस प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य है। लक्ष्मण ने परशुराम के अहंकार और क्रोध पर तीखे व्यंग्य किए हैं। कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं—
1. 'अहो मुनीसु महाभट मानी':
लक्ष्मण ने मुस्कुराते हुए परशुराम को 'महान योद्धा' कहा। यह व्यंग्य है क्योंकि परशुराम एक ऋषि हैं और ऋषि का काम युद्ध करना नहीं है। इस प्रकार लक्ष्मण ने उनकी दोहरी भूमिका पर व्यंग्य किया।
2. 'चहत उड़ावन फूँकि पहारू':
परशुराम बार-बार फरसा दिखाकर डराने का प्रयास करते हैं। लक्ष्मण ने व्यंग्य किया कि जैसे फूँक से पहाड़ नहीं उड़ता, वैसे ही उनकी धमकियाँ व्यर्थ हैं।
3. 'इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं':
लक्ष्मण ने कहा कि यहाँ कोई कमजोर व्यक्ति नहीं है जो उँगली दिखाने से डर जाए। यह परशुराम की धमकियों पर सीधा व्यंग्य है।
4. वीरों की प्रशंसा पर व्यंग्य:
लक्ष्मण ने कहा कि वीर पुरुष अपनी वीरता का बखान स्वयं नहीं करते। यह परशुराम के आत्म-प्रशंसा करने के स्वभाव पर व्यंग्य है।
निष्कर्ष: इस प्रसंग में व्यंग्य इतना सटीक और तीखा है कि परशुराम जैसे महाक्रोधी ऋषि भी निरुत्तर हो जाते हैं। तुलसीदास ने व्यंग्य के माध्यम से अहंकार और क्रोध की निरर्थकता को बड़े कुशलता से दर्शाया है।
10(क)निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचान कर लिखिए—
बालकु बोलि बथी नहि तोही।Show solution
पंक्ति: बालकु बोलि बथी नहि तोही।
अलंकार: अनुप्रास अलंकार
स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में 'ब' वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है — 'बालकु बोलि बथी'। जब किसी एक वर्ण की एक ही पंक्ति में एक से अधिक बार आवृत्ति हो तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
10(ख)निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचान कर लिखिए—
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा।Show solution
पंक्ति: कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा।
अलंकार: (1) उपमा अलंकार तथा (2) अनुप्रास अलंकार
स्पष्टीकरण:
- उपमा अलंकार: यहाँ 'बचनु' (वचन) की तुलना 'कोटि कुलिस' (करोड़ों वज्रों) से की गई है। 'सम' उपमावाचक शब्द है। जब किसी वस्तु की तुलना किसी अन्य वस्तु से की जाए तो उपमा अलंकार होता है।
- उपमेय = बचनु (वचन)
- उपमान = कोटि कुलिस (करोड़ों वज्र)
- वाचक शब्द = सम
- अनुप्रास अलंकार: 'कोटि कुलिस' में 'क' वर्ण की आवृत्ति है, अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार भी है।
अतः इस पंक्ति में उपमा और अनुप्रास दोनों अलंकार हैं।
11"सामाजिक जीवन में क्रोध की जरूरत बराबर पड़ती है। यदि क्रोध न हो तो मनुष्य दूसरे के द्वारा पहुँचाए जाने वाले बहुत से कष्टों की चिर-निवृत्ति का उपाय ही न कर सके।" आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि क्रोध हमेशा नकारात्मक भाव लिए नहीं होता बल्कि कभी-कभी सकारात्मक भी होता है। इसके पक्ष या विपक्ष में अपना मत प्रकट कीजिए।Show solution
*(यह प्रश्न व्यक्तिपरक है। नीचे पक्ष में मत प्रस्तुत किया जा रहा है।)*
मैं आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के इस कथन से सहमत हूँ।
क्रोध को सामान्यतः नकारात्मक भाव माना जाता है, परंतु यह सदा नकारात्मक नहीं होता। कभी-कभी क्रोध सकारात्मक परिवर्तन का कारण बनता है।
पक्ष में तर्क:
1. अन्याय के विरुद्ध क्रोध: जब कोई व्यक्ति अन्याय देखकर क्रोधित होता है और उसका प्रतिकार करता है, तो यह क्रोध सकारात्मक है। परशुराम का क्रोध भी इसी श्रेणी में आता है — उन्होंने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए क्रोध किया।
2. सुधार का माध्यम: यदि शिक्षक छात्र की गलती पर क्रोध न करे तो छात्र सुधरेगा नहीं। यहाँ क्रोध सुधार का साधन है।
3. आत्मरक्षा: यदि कोई हम पर अत्याचार करे और हम क्रोध न करें तो हम अपनी रक्षा नहीं कर पाएँगे।
4. राष्ट्रीय स्तर पर: स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों का क्रोध देश को आजाद कराने में सहायक बना।
सीमा: परंतु क्रोध तभी सकारात्मक है जब वह नियंत्रित हो और उचित कारण से हो। अनियंत्रित क्रोध विनाशकारी होता है।
निष्कर्ष: क्रोध एक स्वाभाविक मानवीय भाव है। यदि इसे सही दिशा में प्रयोग किया जाए तो यह समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
12अपने किसी परिचित या मित्र के स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए।Show solution
*(यह प्रश्न व्यक्तिपरक है। नीचे एक आदर्श उत्तर दिया जा रहा है।)*
मेरे मित्र का नाम अनुज है। उसके स्वभाव की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं—
1. मिलनसार: अनुज सबसे हँसकर मिलता है। वह नए लोगों से भी जल्दी घुल-मिल जाता है।
2. परिश्रमी: वह अपने काम में बहुत मेहनती है। पढ़ाई में वह कभी आलस नहीं करता।
3. ईमानदार: अनुज कभी झूठ नहीं बोलता। वह अपनी गलती स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाता।
4. सहायक: जब भी कोई मित्र मुसीबत में होता है, अनुज सबसे पहले मदद के लिए आगे आता है।
5. विनम्र: वह बड़ों का सम्मान करता है और छोटों से प्यार से पेश आता है।
6. धैर्यवान: कठिन परिस्थितियों में भी वह घबराता नहीं और शांत रहकर समस्या का समाधान ढूँढता है।
ऐसे मित्र का साथ जीवन को सुखद और सार्थक बनाता है।
13दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए — इस शीर्षक को ध्यान में रखते हुए एक कहानी लिखिए।Show solution
शीर्षक: दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए
एक गाँव में दो मित्र रहते थे — रमेश और सुरेश। रमेश धनी परिवार का था और सुरेश गरीब। रमेश हमेशा सुरेश को कमजोर और अयोग्य समझता था।
एक बार गाँव में एक चित्रकला प्रतियोगिता हुई। रमेश ने सोचा — 'सुरेश गरीब है, उसके पास अच्छे रंग और कागज भी नहीं हैं। वह क्या जीतेगा?' रमेश ने महँगे रंग और कागज खरीदे और बड़े आत्मविश्वास से प्रतियोगिता में भाग लिया।
सुरेश के पास साधन कम थे, परंतु उसकी लगन और प्रतिभा अद्भुत थी। उसने साधारण रंगों से एक ऐसा चित्र बनाया जो देखने वालों के मन को छू गया।
जब परिणाम आया तो सुरेश प्रथम स्थान पर था। रमेश आश्चर्यचकित रह गया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
सुरेश ने रमेश से कहा — 'मित्र, क्षमता धन से नहीं, लगन और परिश्रम से आती है।'
शिक्षा: हमें कभी भी किसी की क्षमता को उसकी बाहरी परिस्थितियों के आधार पर कम नहीं आँकना चाहिए।
14उन घटनाओं को याद करके लिखिए जब आपने अन्याय का प्रतिकार किया हो।Show solution
*(यह प्रश्न व्यक्तिपरक है। नीचे एक आदर्श उत्तर दिया जा रहा है।)*
एक बार हमारे विद्यालय में एक घटना हुई। हमारी कक्षा का एक छात्र राहुल बहुत शांत और सीधे स्वभाव का था। कुछ बड़े छात्र उसे रोज परेशान करते थे और उसका टिफिन छीन लेते थे। राहुल डर के कारण किसी को नहीं बताता था।
एक दिन मैंने यह सब अपनी आँखों से देखा। मेरे मन में बहुत क्रोध आया। मैंने उन छात्रों को रोका और कहा — 'यह अन्याय है। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।' उन्होंने मुझे भी धमकी दी, परंतु मैं नहीं डरा।
मैंने तुरंत जाकर अपने कक्षाध्यापक को पूरी बात बताई। शिक्षक ने उन छात्रों को बुलाकर समझाया और उचित दंड दिया। राहुल ने मुझे धन्यवाद दिया।
इस घटना से मुझे सीख मिली कि अन्याय को चुपचाप सहना उचित नहीं है। अन्याय का प्रतिकार करना हमारा कर्तव्य है।
15अवधी भाषा आज किन-किन क्षेत्रों में बोली जाती है?Show solution
अवधी भाषा आज निम्नलिखित क्षेत्रों में बोली जाती है—
1. उत्तर प्रदेश: अवधी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में बोली जाती है। इसमें लखनऊ, अयोध्या (फैजाबाद), सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, रायबरेली, उन्नाव, सीतापुर, हरदोई, बाराबंकी, गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती आदि जिले शामिल हैं।
2. मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के कुछ उत्तरी जिलों में भी अवधी बोली जाती है।
3. नेपाल: नेपाल की तराई क्षेत्र में भी अवधी बोलने वाले लोग हैं। वहाँ इसे 'नेपाली अवधी' भी कहते हैं।
4. फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम: इन देशों में भारतीय मूल के लोग बसे हैं जो अवधी बोलते हैं।
5. अन्य देश: दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद आदि देशों में भी अवधी बोलने वाले लोग हैं।
विशेष: अवधी भाषा में तुलसीदास की 'रामचरितमानस' और मलिक मुहम्मद जायसी का 'पद्मावत' जैसी महान रचनाएँ लिखी गई हैं जो इस भाषा की साहित्यिक समृद्धि को दर्शाती हैं।
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