एक कहानी यह भी
Haryana Board · Class 10 · Hindi
NCERT Solutions for एक कहानी यह भी — Haryana Board Class 10 Hindi.
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See them allएक कहानी यह भी — बोध-प्रश्न (प्रश्न 1–5)
1लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?Show solution
उत्तर:
लेखिका मन्नू भंडारी के व्यक्तित्व पर निम्नलिखित व्यक्तियों का गहरा प्रभाव पड़ा—
1. पिता जी का प्रभाव: पिता जी एक महत्त्वाकांक्षी, स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी विचारों वाले व्यक्ति थे। उन्होंने लेखिका में देशप्रेम, स्वाभिमान और सामाजिक चेतना के बीज बोए। वे चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर आगे बढ़े। उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता और महत्त्वाकांक्षा का प्रभाव लेखिका पर स्पष्ट दिखता है। साथ ही पिता के अहंकारी और दकियानूसी रवैये ने लेखिका को विद्रोही और स्वतंत्र सोच वाली बनाया।
2. शीला अग्रवाल (अध्यापिका) का प्रभाव: शीला अग्रवाल लेखिका की हिंदी प्राध्यापिका थीं। उन्होंने लेखिका को साहित्य से परिचित कराया, अच्छी पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा दी और राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके प्रभाव से ही लेखिका में सामाजिक-राजनीतिक चेतना जागी और वे स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हुईं।
निष्कर्ष: इस प्रकार पिता जी ने जहाँ लेखिका को स्वाभिमान और देशप्रेम की भावना दी, वहीं शीला अग्रवाल ने उन्हें साहित्यिक एवं सामाजिक चेतना से जोड़ा। दोनों के प्रभाव ने मिलकर लेखिका के व्यक्तित्व को गढ़ा।
2इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को 'भटियारखाना' कहकर क्यों संबोधित किया है?Show solution
उत्तर:
लेखिका के पिता एक महत्त्वाकांक्षी, प्रगतिशील और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटियाँ केवल घर-गृहस्थी और रसोई तक सीमित रहें। उनके विचार में रसोई एक ऐसी जगह थी जो स्त्रियों की प्रतिभा, बुद्धि और समय को नष्ट कर देती है।
'भटियारखाना' शब्द उस स्थान के लिए प्रयुक्त होता है जहाँ भट्टी जलती रहती है अर्थात् जहाँ केवल खाना पकाने का काम होता है। पिता जी का मानना था कि रसोई में उलझकर स्त्रियाँ अपनी शिक्षा, प्रतिभा और जीवन के बड़े लक्ष्यों से दूर हो जाती हैं। यह स्थान उनकी बौद्धिक क्षमता को कुंद कर देता है।
इस प्रकार 'भटियारखाना' कहकर पिता जी ने रसोई को एक ऐसी जगह के रूप में चित्रित किया जो स्त्री को केवल घरेलू कार्यों में उलझाए रखती है और उसे आगे बढ़ने से रोकती है। यह उनकी प्रगतिशील सोच का परिचायक है।
3वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?Show solution
उत्तर:
वह घटना थी — लेखिका की बड़ी बहन सुशीला का विवाह।
लेखिका के पिता अपनी बड़ी बेटी सुशीला से बहुत प्यार करते थे और उसे बहुत मानते थे। परंतु एक दिन अचानक यह खबर आई कि पिता जी ने सुशीला दीदी की शादी एक ऐसे व्यक्ति से तय कर दी जो न तो सुंदर था, न ही विशेष रूप से योग्य। इतना ही नहीं, वह व्यक्ति पहले से विवाहित था और उसके बच्चे भी थे।
यह सुनकर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हुआ और न अपने कानों पर, क्योंकि जो पिता जी बेटियों की शिक्षा और प्रगति के इतने हिमायती थे, जो रसोई को 'भटियारखाना' कहते थे, वही पिता जी अपनी बेटी के साथ ऐसा कर सकते हैं — यह बात अविश्वसनीय थी। यह घटना पिता जी के व्यक्तित्व के दोहरेपन को उजागर करती है।
4लेखिका को अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
उत्तर:
लेखिका मन्नू भंडारी और उनके पिता के बीच वैचारिक टकराहट कई स्तरों पर थी—
1. स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी को लेकर: जब लेखिका अपनी अध्यापिका शीला अग्रवाल के प्रभाव में आकर स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हुईं और जुलूसों, सभाओं में भाग लेने लगीं, तो पिता जी को यह पसंद नहीं आया। वे चाहते थे कि बेटी पढ़े, आगे बढ़े, परंतु इस तरह सड़कों पर उतरना उन्हें स्वीकार नहीं था।
2. पिता के अहंकार और दोहरे व्यवहार को लेकर: पिता जी एक ओर प्रगतिशील विचार रखते थे, दूसरी ओर घर में उनका व्यवहार अहंकारी और तानाशाही था। वे घर में अपनी बात को ही सर्वोपरि मानते थे। लेखिका इस दोहरेपन से आहत थीं।
3. बड़ी बहन के विवाह को लेकर: जब पिता जी ने बड़ी बहन सुशीला की शादी एक अयोग्य और पहले से विवाहित व्यक्ति से कर दी, तो लेखिका का पिता जी से मोहभंग हो गया। यह उनके बीच सबसे बड़ी वैचारिक टकराहट थी।
निष्कर्ष: इस प्रकार लेखिका धीरे-धीरे पिता जी की छत्रछाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की ओर अग्रसर हुईं। यह टकराहट उनके व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक सिद्ध हुई।
5इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।Show solution
उत्तर:
स्वाधीनता आंदोलन का परिदृश्य:
सन् 1946-47 का समय भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का चरमोत्कर्ष था। देश भर में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जन-जागरण हो रहा था। विद्यार्थी, युवा, महिलाएँ — सभी वर्ग इस आंदोलन में कूद पड़े थे। हड़तालें, जुलूस, सभाएँ, नारेबाजी — यह सब आम दृश्य थे। कॉलेजों में भी राष्ट्रीय चेतना की लहर थी। छात्र-छात्राएँ अपनी पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में भाग ले रहे थे।
मन्नू जी की भूमिका:
मन्नू भंडारी उस समय अजमेर के एक कॉलेज में पढ़ती थीं। उनकी अध्यापिका शीला अग्रवाल ने उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा। मन्नू जी ने—
- कॉलेज में छात्राओं को जागरूक किया और उन्हें आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
- जुलूसों और सभाओं में सक्रिय रूप से भाग लिया।
- कॉलेज प्रशासन द्वारा प्रवेश निषिद्ध किए जाने पर भी हार नहीं मानी और बाहर रहकर भी आंदोलन जारी रखा।
- उनके और उनके साथियों के दबाव के कारण कॉलेज को अगस्त में थर्ड इयर की कक्षाएँ पुनः खोलनी पड़ीं।
- 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता की खुशी में उन्होंने पूरे उत्साह से भाग लिया।
निष्कर्ष: मन्नू जी की भूमिका एक साहसी, जागरूक और देशभक्त छात्रा की थी जिन्होंने व्यक्तिगत कठिनाइयों की परवाह किए बिना स्वाधीनता आंदोलन में अपना योगदान दिया।
रचना और अभिव्यक्ति (प्रश्न 6–9)
6लेखिका ने बचपन में अपने भाइयों के साथ गिल्ली डंडा तथा पतंग उड़ाने जैसे खेल भी खेले किंतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं या बदल गई हैं, अपने परिवेश के आधार पर लिखिए।Show solution
उत्तर:
लेखिका के समय में लड़कियों का दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। उन्हें खुलकर खेलने, बाहर जाने और अपनी इच्छाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं थी। परंतु आज की स्थिति काफी हद तक बदल गई है—
बदलाव के पक्ष में:
- आज लड़कियाँ क्रिकेट, फुटबॉल, कुश्ती, बॉक्सिंग जैसे खेलों में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही हैं।
- पी.वी. सिंधु, साइना नेहवाल, मैरी कॉम जैसी खिलाड़ी इसके उदाहरण हैं।
- शहरी परिवेश में लड़कियाँ लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं।
- माता-पिता भी अब लड़कियों को प्रोत्साहित करते हैं।
अभी भी बाकी बदलाव:
- ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आज भी लड़कियों पर अनेक प्रतिबंध हैं।
- सुरक्षा की चिंता के कारण लड़कियों को बाहर खेलने से रोका जाता है।
- कुछ परिवारों में आज भी लड़कियों और लड़कों में भेदभाव किया जाता है।
निष्कर्ष: स्थितियाँ बदली हैं, परंतु पूरी तरह नहीं। समाज को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है ताकि हर लड़की को समान अवसर मिल सके।
7मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का बहुत महत्व होता है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः 'पड़ोस कल्चर' से वंचित रह जाते हैं। इस बारे में अपने विचार लिखिए।Show solution
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके जीवन में परिवार के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान पड़ोसियों का होता है। सुख-दुख में पड़ोसी ही सबसे पहले काम आते हैं।
पड़ोस का महत्त्व:
- विपत्ति के समय पड़ोसी तुरंत सहायता करते हैं।
- बच्चों के सामाजिक विकास में पड़ोस की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
- एकाकीपन दूर होता है और जीवन में उत्साह बना रहता है।
- त्योहार और खुशियाँ मिलकर मनाने से जीवन आनंदमय बनता है।
महानगरों में 'पड़ोस कल्चर' का अभाव:
- महानगरों में लोग फ्लैट संस्कृति में रहते हैं जहाँ सभी अपने-अपने दरवाजे बंद रखते हैं।
- व्यस्त जीवनशैली के कारण लोगों के पास पड़ोसियों से मिलने का समय नहीं होता।
- आत्मकेंद्रितता और 'मुझे क्या' की भावना ने पड़ोस की संस्कृति को नष्ट कर दिया है।
- कई बार लोग वर्षों तक अपने पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते।
निष्कर्ष: यह स्थिति चिंताजनक है। हमें अपनी व्यस्तता में से थोड़ा समय निकालकर पड़ोसियों से संपर्क बनाए रखना चाहिए। 'पड़ोस कल्चर' को पुनर्जीवित करना आज की आवश्यकता है।
8लेखिका द्वारा पढ़े गए उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में खोजिए।Show solution
उत्तर:
आत्मकथ्य 'एक कहानी यह भी' में लेखिका मन्नू भंडारी ने अपनी अध्यापिका शीला अग्रवाल के प्रभाव में आकर अनेक साहित्यिक पुस्तकें पढ़ीं। उनके द्वारा पढ़े गए कुछ प्रमुख उपन्यास और साहित्यिक रचनाएँ इस प्रकार हैं—
1. शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास — जैसे 'देवदास', 'चरित्रहीन', 'श्रीकांत' आदि।
2. प्रेमचंद के उपन्यास — जैसे 'गोदान', 'गबन', 'निर्मला' आदि।
3. जैनेंद्र कुमार की रचनाएँ।
4. यशपाल के उपन्यास।
5. भगवतीचरण वर्मा की रचनाएँ — जैसे 'चित्रलेखा'।
विद्यार्थियों के लिए निर्देश: इन उपन्यासों को अपने विद्यालय या सार्वजनिक पुस्तकालय में खोजें और पढ़ें। इससे आपकी भाषा, विचार और साहित्यिक समझ का विकास होगा।
*(नोट: यह एक क्रियाकलाप आधारित प्रश्न है। विद्यार्थी अपने पुस्तकालय में उपलब्ध पुस्तकों की सूची स्वयं तैयार करें।)*
9आप भी अपने दैनिक अनुभवों को डायरी में लिखिए।Show solution
उत्तर (नमूना डायरी लेखन):
दिनांक: ______
प्रिय डायरी,
आज का दिन बहुत अच्छा रहा। सुबह विद्यालय में हिंदी की कक्षा में हमने मन्नू भंडारी की आत्मकथ्य 'एक कहानी यह भी' पढ़ी। इसे पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कितने संघर्ष के बाद हमें यह आजादी दिलाई है।
शीला अग्रवाल जैसी अध्यापिका का जीवन में होना कितना महत्त्वपूर्ण है — यह आज समझ आया। एक अच्छा शिक्षक न केवल पाठ्यक्रम पढ़ाता है, बल्कि जीवन जीने की राह भी दिखाता है।
आज मैंने निश्चय किया कि मैं भी नियमित रूप से अच्छी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ूँगा/पढ़ूँगी।
तुम्हारा/तुम्हारी,
(अपना नाम लिखें)
*(नोट: विद्यार्थी अपने वास्तविक दैनिक अनुभवों को इसी प्रकार डायरी में लिखने का अभ्यास करें।)*
भाषा-अध्ययन (प्रश्न 10)
10इस आत्मकथ्य में मुहावरों का प्रयोग करके लेखिका ने रचना को रोचक बनाया है। रेखांकित मुहावरों को ध्यान में रखकर कुछ और वाक्य बनाएँ—
(क) लू उतारना
(ख) आग लगाकर चले जाना
(ग) धू-धू करके जाना
(घ) आग-बबूला होनाShow solution
उत्तर:
(क) लू उतारना (अर्थ: खूब खरी-खोटी सुनाना / बुरी तरह डाँटना-फटकारना)
मूल वाक्य: *पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्र ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी।*
नए वाक्य:
- जब रमेश ने परीक्षा में नकल की, तो अध्यापक ने सबके सामने उसकी खूब लू उतारी।
- माँ ने देर से घर आने पर बेटे की अच्छी तरह लू उतारी।
---
(ख) आग लगाकर चले जाना (अर्थ: झगड़ा या विवाद खड़ा करके चले जाना; उकसाकर चले जाना)
मूल वाक्य: *वे तो आग लगाकर चले गए और पिता जी सारे दिन भभकते रहे।*
नए वाक्य:
- पड़ोसी ने दोनों भाइयों में आग लगाकर चले गए, अब वे आपस में लड़ रहे हैं।
- नेता जी ने भाषण में आग लगाकर चले गए, भीड़ घंटों उत्तेजित रही।
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(ग) धू-धू करके जाना (अर्थ: बिना किसी काम के आना-जाना; व्यर्थ आना-जाना)
मूल वाक्य: *बस अब यही रह गया है कि लोग घर आकर धू-धू करके चले जाएँ।*
नए वाक्य:
- दफ्तर में काम न होने पर लोग धू-धू करके चले जाते हैं।
- अस्पताल में डॉक्टर न मिलने पर मरीज धू-धू करके लौट जाते हैं।
---
(घ) आग-बबूला होना (अर्थ: अत्यधिक क्रोधित होना)
मूल वाक्य: *पत्र पढ़ते ही पिता जी आग-बबूला।*
नए वाक्य:
- बेटे की शिकायत सुनकर पिता जी आग-बबूला हो गए।
- परीक्षा में फेल होने की खबर पाकर माँ आग-बबूला हो गईं।
- अपनी बात न मानी जाने पर वह आग-बबूला हो उठा।
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