भदंत आनंद कौसल्यायन (संस्कृति) — NCERT Solutions
Haryana Board · Class 10 · Hindi
NCERT Solutions for भदंत आनंद कौसल्यायन (संस्कृति), Haryana Board Class 10 Hindi: 10 textbook questions solved step by step.
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प्रश्न-अभ्यास
1लेखक की दृष्टि में 'सभ्यता' और 'संस्कृति' की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है?Show solution
दिया गया है: पाठ 'संस्कृति' में लेखक भदंत आनंद कौसल्यायन ने सभ्यता और संस्कृति की अवधारणा पर विचार किया है।
उत्तर:
लेखक की दृष्टि में 'सभ्यता' और 'संस्कृति' की सही समझ अब तक इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि लोग इन दोनों शब्दों को प्रायः एक-दूसरे का पर्याय मानकर चलते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि संस्कृति मूल है और सभ्यता उसका परिणाम। संस्कृति मनुष्य की वह आंतरिक योग्यता है जो उसे नए आविष्कार करने, त्याग करने और कल्याण की भावना से प्रेरित करती है, जबकि सभ्यता उन आविष्कारों और योग्यताओं के बाहरी परिणाम हैं — जैसे खान-पान के तरीके, वस्त्र, यातायात के साधन आदि। इसके अतिरिक्त लोग 'संस्कृति' के नाम पर पुराने कूड़े-करकट को ढोते रहते हैं और उसे ही संस्कृति समझ लेते हैं। इस भ्रम के कारण ही दोनों की सही समझ नहीं बन पाई है।
2आग की खोज एक बहुत बड़ी खोज क्यों मानी जाती है? इस खोज के पीछे रही प्रेरणा के मुख्य स्रोत क्या रहे होंगे?Show solution
दिया गया है: लेखक ने आग की खोज को मानव संस्कृति की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है।
उत्तर:
आग की खोज इसलिए बहुत बड़ी खोज मानी जाती है क्योंकि इसने मानव जीवन को पूरी तरह बदल दिया। आग की सहायता से मनुष्य ने —
- कच्चा भोजन पकाकर खाना सीखा, जिससे उसका स्वास्थ्य सुधरा।
- ठंड और हिंसक जानवरों से अपनी रक्षा की।
- धातुओं को गलाकर नए औज़ार बनाए।
- अंधकार को दूर कर रात में भी काम करना संभव बनाया।
इस प्रकार आग की खोज ने मानव सभ्यता की नींव रखी।
प्रेरणा के मुख्य स्रोत:
आग की खोज के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रेरणाएँ रही होंगी —
- जिज्ञासा — प्रकृति में बिजली गिरने या पत्थरों के टकराने से उत्पन्न आग को देखकर मनुष्य के मन में जिज्ञासा जागी होगी।
- आवश्यकता — ठंड से बचने और भोजन पकाने की आवश्यकता ने उसे आग खोजने के लिए प्रेरित किया होगा।
- सुरक्षा की भावना — जंगली जानवरों से बचाव के लिए आग का उपयोग करने की प्रेरणा रही होगी।
3वास्तविक अर्थों में 'संस्कृत व्यक्ति' किसे कहा जा सकता है?Show solution
दिया गया है: लेखक ने संस्कृत व्यक्ति की अवधारणा पाठ में स्पष्ट की है।
उत्तर:
वास्तविक अर्थों में 'संस्कृत व्यक्ति' उसे कहा जा सकता है जिसमें मानवता के कल्याण की भावना हो और जो अपनी बुद्धि, प्रतिभा एवं योग्यता का उपयोग दूसरों के भले के लिए करे। लेखक के अनुसार संस्कृत व्यक्ति वह है —
- जो किसी नई खोज या आविष्कार से मानव जाति को लाभ पहुँचाए।
- जो अपने सुख-वैभव का त्याग करके दूसरों के सुख के लिए जीए।
- जिसकी योग्यता केवल व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित न हो, बल्कि समाज और मानवता के लिए समर्पित हो।
जैसे — न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का नियम खोजा, सिद्धार्थ ने घर त्यागकर मानवता की मुक्ति का मार्ग खोजा — ये सभी वास्तविक अर्थों में संस्कृत व्यक्ति थे। संक्षेप में, जिस व्यक्ति की योग्यता में कल्याण की भावना निहित हो, वही सच्चे अर्थों में संस्कृत व्यक्ति है।
4न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के पीछे कौन से तर्क दिए गए हैं? न्यूटन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों एवं ज्ञान की कई दूसरी बारीकियों को जानने वाले लोग भी न्यूटन की तरह संस्कृत नहीं कहला सकते, क्यों?Show solution
दिया गया है: लेखक ने न्यूटन को संस्कृत मानव कहा है और इसके कारण स्पष्ट किए हैं।
न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के तर्क:
न्यूटन को संस्कृत मानव इसलिए कहा गया है क्योंकि उनमें वह विशेष मानसिक योग्यता थी जिसने उन्हें गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने एक सेब को गिरते देखकर जो जिज्ञासा अनुभव की और उससे एक महान वैज्ञानिक सिद्धांत की खोज की — यह उनकी आंतरिक सांस्कृतिक योग्यता का प्रमाण है। यह योग्यता ही संस्कृति है।
न्यूटन के सिद्धांत जानने वाले संस्कृत क्यों नहीं:
न्यूटन के सिद्धांतों को पढ़कर जानने वाले लोग उस ज्ञान को ग्रहण तो कर लेते हैं, किंतु उनमें वह मौलिक जिज्ञासा और सृजनात्मक योग्यता नहीं होती जो न्यूटन में थी। वे केवल सभ्यता के उपभोक्ता हैं, संस्कृति के निर्माता नहीं। संस्कृति वह आंतरिक शक्ति है जो नई खोज करवाती है; दूसरों की खोज को जान लेना मात्र सभ्यता का उपयोग है। इसीलिए न्यूटन के सिद्धांत जानने वाले न्यूटन की तरह संस्कृत नहीं कहला सकते।
5किन महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सुई-धागे का आविष्कार हुआ होगा?Show solution
दिया गया है: लेखक ने सुई-धागे के आविष्कार को मानव संस्कृति की उपलब्धि माना है।
उत्तर:
सुई-धागे का आविष्कार निम्नलिखित महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ होगा —
- शरीर ढकने की आवश्यकता: आदिमानव को ठंड, धूप और वर्षा से अपने शरीर की रक्षा के लिए वस्त्रों की ज़रूरत थी। पत्तों और खाल को जोड़ने के लिए सुई-धागे की आवश्यकता पड़ी होगी।
- लज्जा निवारण: सामाजिक विकास के साथ मनुष्य में लज्जा की भावना जागी और शरीर को ढकने के लिए वस्त्र सिलने की ज़रूरत हुई।
- घाव बाँधने की आवश्यकता: शिकार या युद्ध में लगे घावों को बाँधने के लिए भी सुई-धागे का उपयोग हुआ होगा।
- सौंदर्य-बोध: मनुष्य में सौंदर्य की भावना के विकास के साथ वस्त्रों को सजाने-सँवारने के लिए भी सुई-धागे का उपयोग हुआ होगा।
इस प्रकार सुई-धागे का आविष्कार मानव की मूलभूत आवश्यकताओं से प्रेरित था।
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Frequently Asked Questions
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