आत्मत्राण
Jharkhand Board · Class 10 · Hindi
NCERT Solutions for आत्मत्राण — Jharkhand Board Class 10 Hindi.
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Explore the full setप्रश्न-अभ्यास — (क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
1कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है?Show solution
उत्तर:
कवि ईश्वर (करुणामय प्रभु) से प्रार्थना कर रहा है। वह ईश्वर से यह नहीं माँगता कि उसे विपदाओं से बचाया जाए, दुखों से मुक्त किया जाए या सहायक दिया जाए। इसके विपरीत वह प्रार्थना करता है कि —
- विपत्तियों का सामना करने की शक्ति और साहस मिले।
- दुख-ताप सहने की क्षमता मिले।
- जब कोई सहायक न हो तो उसका अपना बल और पौरुष न टूटे।
- हानि उठानी पड़े तो भी मन में क्षय (हार) का भाव न आए।
- सुख के दिनों में भी वह नत-शिर होकर ईश्वर को पहचानता रहे।
- अंत में वह यही अनुनय करता है कि प्रभु उसे कभी धोखा न दें और उस पर उनकी कृपा बनी रहे।
सार: कवि ईश्वर से बाहरी सहायता नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति, साहस और अटूट विश्वास की प्रार्थना करता है।
2'विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं'—कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?Show solution
उत्तर:
इस पंक्ति के द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि वह ईश्वर से कायरों की तरह विपत्तियों से बचाने की प्रार्थना नहीं करता। वह जानता है कि जीवन में कठिनाइयाँ, दुख और विपदाएँ आना स्वाभाविक है। इनसे भागना या इनसे बचाने की याचना करना कमज़ोरी का प्रतीक है।
कवि चाहता है कि उसे इन विपदाओं का वीरतापूर्वक सामना करने की शक्ति मिले। वह आत्मनिर्भर बनना चाहता है। उसकी प्रार्थना का उद्देश्य है — आत्मबल की प्राप्ति, न कि कठिनाइयों से पलायन।
निष्कर्ष: कवि परिस्थितियों को बदलने की नहीं, बल्कि स्वयं को इतना सशक्त बनाने की प्रार्थना करता है कि वह हर परिस्थिति का सामना कर सके।
3कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है?Show solution
उत्तर:
कवि प्रार्थना करता है कि यदि जीवन की कठिन राहों पर उसे कोई सहायक (मददगार) न मिले, तो भी उसका बल और पौरुष (पराक्रम) नष्ट न हो। वह यह नहीं चाहता कि ईश्वर उसे सहायक भेजे, बल्कि वह चाहता है कि उसके भीतर इतनी आत्मशक्ति हो कि वह अकेले ही संकटों का सामना कर सके।
इसी प्रकार वह यह भी प्रार्थना करता है कि यदि उसे जगत् में हानि उठानी पड़े, तो भी उसके मन में क्षय (हार या निराशा) का भाव न आए।
सार: सहायक के अभाव में भी कवि अपने आत्मबल को अक्षुण्ण बनाए रखने की प्रार्थना करता है।
4अंत में कवि क्या अनुनय करता है?Show solution
उत्तर:
कविता के अंत में कवि ईश्वर से यह अनुनय (विनम्र प्रार्थना) करता है कि —
1. सुख के दिनों में भी वह नत-शिर (सिर झुकाकर) ईश्वर के मुख को पहचानता रहे, अर्थात् सुख में भी ईश्वर को न भूले।
2. दुख की रात में जब सारा संसार उसे धोखा दे और वंचना (छल) करे, तब भी वह ईश्वर पर संशय (संदेह) न करे।
3. वह यह प्रार्थना करता है कि ईश्वर में उसकी आस्था और विश्वास अटूट बना रहे — सुख में भी और दुख में भी।
निष्कर्ष: कवि की अंतिम अनुनय यह है कि उसका ईश्वर के प्रति अविचल विश्वास और भक्ति सदा बनी रहे।
5'आत्मत्राण' शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।Show solution
उत्तर:
'आत्मत्राण' का अर्थ है — स्वयं की रक्षा स्वयं करना अथवा आत्मशक्ति द्वारा संकटों से उबरना।
यह शीर्षक कविता के मूल भाव के साथ पूर्णतः सार्थक है, क्योंकि —
- कवि ईश्वर से बाहरी सहायता नहीं माँगता, बल्कि आंतरिक शक्ति माँगता है।
- वह विपदाओं से बचाने की नहीं, बल्कि विपदाओं को सहने की शक्ति माँगता है।
- वह सहायक नहीं माँगता, बल्कि अपने पौरुष को अटूट रखने की प्रार्थना करता है।
- वह चाहता है कि स्वयं के बल पर जीवन की कठिनाइयों को पार करे।
इस प्रकार पूरी कविता 'आत्मत्राण' — अर्थात् स्वयं की आत्मशक्ति से अपनी रक्षा करने — के भाव को व्यक्त करती है। अतः यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक एवं उचित है।
6अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं? लिखिए।Show solution
प्रार्थना के अतिरिक्त अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम निम्नलिखित प्रयास करते हैं —
1. परिश्रम: लक्ष्य प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करते हैं।
2. योजना बनाना: अपने लक्ष्य को पाने के लिए एक सुनियोजित योजना तैयार करते हैं।
3. आत्मविश्वास: स्वयं पर विश्वास रखते हैं और निराश नहीं होते।
4. बड़ों का मार्गदर्शन: माता-पिता, शिक्षकों और अनुभवी लोगों से सलाह लेते हैं।
5. अध्ययन एवं अभ्यास: ज्ञान और कौशल बढ़ाने के लिए नियमित अध्ययन और अभ्यास करते हैं।
6. धैर्य: असफलता मिलने पर भी धैर्य रखते हैं और पुनः प्रयास करते हैं।
7. सकारात्मक सोच: नकारात्मक विचारों को मन में न आने देकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं।
निष्कर्ष: प्रार्थना से आत्मबल मिलता है, किंतु परिश्रम और दृढ़ संकल्प से ही इच्छाएँ पूरी होती हैं।
7क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे?Show solution
हाँ, कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की यह प्रार्थना अन्य प्रार्थना गीतों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट लगती है। इसके कारण निम्नलिखित हैं —
सामान्य प्रार्थना गीतों में:
- लोग ईश्वर से दुखों को दूर करने की विनती करते हैं।
- विपत्तियों से बचाने की याचना की जाती है।
- सुख, समृद्धि और सहायता माँगी जाती है।
इस प्रार्थना में:
- कवि ईश्वर से विपदाओं से बचाने की नहीं, बल्कि उन्हें सहने की शक्ति माँगता है।
- वह सहायक नहीं, बल्कि आत्मबल माँगता है।
- वह दुख हटाने की नहीं, बल्कि दुख में भी ईश्वर पर विश्वास बनाए रखने की प्रार्थना करता है।
- यह प्रार्थना आत्मनिर्भरता और वीरता का संदेश देती है।
निष्कर्ष: यह प्रार्थना एक वीर और आत्मनिर्भर मनुष्य की प्रार्थना है जो परिस्थितियों को बदलने की नहीं, बल्कि स्वयं को सशक्त बनाने की कामना करती है। यही इसे अन्य प्रार्थना गीतों से अलग और श्रेष्ठ बनाता है।
प्रश्न-अभ्यास — (ख) निम्नलिखित अंशों का भाव स्पष्ट कीजिए
1नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।Show solution
भाव स्पष्टीकरण:
इन पंक्तियों में कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि सुख के दिनों में भी वह सिर झुकाकर (नत-शिर होकर) ईश्वर के मुख को प्रतिपल (छिन-छिन में) पहचानता रहे, अर्थात् उन्हें याद करता रहे।
सामान्यतः मनुष्य दुख में ईश्वर को याद करता है, किंतु सुख में भूल जाता है। कवि इस मानवीय दुर्बलता से बचना चाहता है। वह चाहता है कि सुख-समृद्धि के समय भी उसके मन में अहंकार न आए और वह विनम्रतापूर्वक ईश्वर के प्रति कृतज्ञ बना रहे।
विशेष: यह पंक्तियाँ सुख में भी ईश्वर-स्मरण और विनम्रता का संदेश देती हैं।
2हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर बचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।Show solution
भाव स्पष्टीकरण:
इन पंक्तियों में कवि कहता है कि यदि जीवन में लाभ की जगह हानि उठानी पड़े, यदि सफलता न मिले और असफलता ही हाथ लगे, तो भी वह मन में हार (क्षय) न माने।
कवि ईश्वर से यह शक्ति माँगता है कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल हों, उसका आंतरिक मनोबल कभी न टूटे। वह निराश न हो, हताश न हो और जीवन-संघर्ष से पलायन न करे।
विशेष: यह पंक्तियाँ दृढ़ मनोबल, धैर्य और आत्मशक्ति का संदेश देती हैं। कवि का मानना है कि बाहरी हार से बड़ी हार मन की हार होती है।
3तरने की हो शक्ति अनामय
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।Show solution
भाव स्पष्टीकरण:
इन पंक्तियों में कवि ईश्वर से कहता है कि यदि वे उसके जीवन के बोझ (भार) को हल्का (लघु) नहीं करते और सांत्वना (ढाँढ़स) नहीं देते, तो भी कोई बात नहीं — 'नहीं सही' — वह इसे स्वीकार करता है।
किंतु उसकी एकमात्र प्रार्थना यह है कि उसे इस भार को स्वयं वहन करने की शक्ति मिले — वह शक्ति जो अनामय (रोग-रहित, स्वस्थ और निर्मल) हो।
अर्थात् कवि बाहरी सहारे या सहानुभूति का मोहताज नहीं बनना चाहता। वह चाहता है कि उसके भीतर इतनी आत्मशक्ति हो कि वह जीवन के हर कष्ट को स्वयं पार कर सके (तर सके)।
विशेष: यह पंक्तियाँ आत्मनिर्भरता और आंतरिक सामर्थ्य की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति हैं।
योग्यता विस्तार
1रवींद्रनाथ ठाकुर ने अनेक गीतों की रचना की है। उनके गीत-संग्रह में से दो गीत छाँटिए और कक्षा में कविता-पाठ कीजिए।Show solution
रवींद्रनाथ ठाकुर की 'गीतांजलि' उनका सर्वप्रसिद्ध गीत-संग्रह है। इसमें से दो प्रसिद्ध गीत —
गीत 1:
*'जीवन जखन शুকিয়ে যায়'* (जब जीवन सूख जाए) — इसका हिंदी अनुवाद पुस्तकालय से प्राप्त करें।
गीत 2:
*'आमार सोनार बांग्ला'* (मेरा सोने का बंगाल) — यह बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी है।
निर्देश: विद्यार्थी पुस्तकालय से 'गीतांजलि' लेकर अपनी पसंद के दो गीत चुनें और कक्षा में भावपूर्ण वाचन करें।
2अनेक अन्य कवियों ने भी प्रार्थना गीत लिखे हैं। 'इतनी शक्ति हमें देना दाता' और 'आत्मत्राण' में क्या समानता और अंतर है?Show solution
1. दोनों प्रार्थनाएँ ईश्वर से शक्ति और सद्बुद्धि माँगती हैं।
2. दोनों में आत्मबल को महत्त्व दिया गया है।
3. दोनों में सही मार्ग पर चलने की कामना है।
4. दोनों में विनम्रता और भक्ति का भाव है।
अंतर:
| 'आत्मत्राण' | 'इतनी शक्ति हमें देना दाता' |
|---|---|
| व्यक्तिगत प्रार्थना है | सामूहिक प्रार्थना है ('हमें') |
| विपदाओं में साहस माँगता है | नेक रास्ते पर चलने की शक्ति माँगता है |
| आत्मनिर्भरता पर अधिक बल | नैतिकता और सदाचार पर अधिक बल |
| व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष की बात | समाज में अच्छे आचरण की बात |
निष्कर्ष: दोनों प्रार्थनाएँ मनुष्य को सशक्त और नैतिक बनाने का संदेश देती हैं, किंतु उनके दृष्टिकोण में अंतर है।
परियोजना कार्य
1रवींद्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय होने का गौरव प्राप्त है। उनके विषय में जानकारी एकत्र कर परियोजना पुस्तिका में लिखिए।Show solution
- जन्म: 7 मई 1861, कोलकाता
- मृत्यु: 7 अगस्त 1941
- पूरा नाम: रवींद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Tagore)
- भाषा: बांग्ला (मूल रचनाएँ), अनुवाद अंग्रेज़ी में भी
- प्रमुख रचनाएँ: गीतांजलि, गोरा, घरे-बाइरे, चित्रांगदा, रक्तकरबी
- नोबेल पुरस्कार: 1913 में 'गीतांजलि' के लिए — साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय और पहले एशियाई
- राष्ट्रगान: भारत का राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' उन्हीं की रचना है
- शिक्षण संस्थान: शांतिनिकेतन (विश्वभारती विश्वविद्यालय) की स्थापना की
- उपाधि: 'गुरुदेव' के नाम से प्रसिद्ध
- विशेषता: कवि, कथाकार, नाटककार, चित्रकार, संगीतकार — बहुमुखी प्रतिभा के धनी
निर्देश: विद्यार्थी पुस्तकालय और इंटरनेट की सहायता से और अधिक जानकारी एकत्र कर परियोजना पुस्तिका में सुंदर ढंग से लिखें।
2रवींद्रनाथ ठाकुर की 'गीतांजलि' को पुस्तकालय से लेकर पढ़िए।Show solution
'गीतांजलि' रवींद्रनाथ ठाकुर की सर्वश्रेष्ठ काव्य-रचना है। इसमें 103 गीत हैं जो ईश्वर के प्रति भक्ति, प्रेम और समर्पण से भरे हैं। इसी रचना के लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार मिला था।
विद्यार्थी विद्यालय के पुस्तकालय से 'गीतांजलि' का हिंदी अनुवाद प्राप्त करें और उसे पढ़कर अपने विचार कक्षा में साझा करें।
3रवींद्रनाथ ठाकुर ने कलकत्ता (कोलकाता) के निकट एक शिक्षण संस्थान की स्थापना की थी। उसके विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए।Show solution
- स्थान: बोलपुर, पश्चिम बंगाल (कोलकाता से लगभग 160 किमी दूर)
- स्थापना: रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1901 में एक आश्रम विद्यालय के रूप में स्थापना की।
- विश्वविद्यालय: 1921 में इसे विश्वभारती विश्वविद्यालय का रूप दिया गया।
- विशेषता: यहाँ खुले वातावरण में, प्रकृति की गोद में शिक्षा दी जाती थी। पेड़ों के नीचे कक्षाएँ लगती थीं।
- उद्देश्य: भारतीय और पाश्चात्य ज्ञान का समन्वय करना तथा कला, संगीत, साहित्य को बढ़ावा देना।
- वर्तमान: यह आज भी एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में कार्यरत है।
निर्देश: विद्यार्थी पुस्तकालय की सहायता से और अधिक जानकारी एकत्र करें।
4रवींद्रनाथ ठाकुर ने अनेक गीत लिखे जिन्हें रवींद्र संगीत कहा जाता है। यदि संभव हो तो रवींद्र संगीत संबंधी कैसेट/सी.डी. लेकर सुनिए।Show solution
रवींद्रनाथ ठाकुर ने लगभग 2,230 से अधिक गीतों की रचना की, जिन्हें सामूहिक रूप से 'रवींद्र संगीत' कहा जाता है।
विशेषताएँ:
- ये गीत भक्ति, प्रेम, प्रकृति और देशभक्ति के भावों से ओत-प्रोत हैं।
- इनकी धुनें अत्यंत मधुर और भावपूर्ण हैं।
- भारत और बांग्लादेश दोनों के राष्ट्रगान रवींद्रनाथ ठाकुर की ही रचनाएँ हैं।
- रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है।
निर्देश: विद्यार्थी यदि संभव हो तो रवींद्र संगीत की सी.डी. या यूट्यूब पर उपलब्ध गीत सुनें और उनके भाव को समझने का प्रयास करें।
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