सूरदास की झोंपड़ी (Part 2) — NCERT Solutions
Jammu & Kashmir Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for सूरदास की झोंपड़ी (Part 2), Jammu & Kashmir Board Class 12 Hindi: 7 textbook questions solved step by step.
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प्रश्न-अभ्यास — सूरदास की झोंपड़ी (रंगभूमि)
1'चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता?' नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया कथन: नायकराम का यह कथन सूरदास की झोपड़ी जलने के प्रसंग में आया है।
निहित भाव:
नायकराम एक व्यावहारिक और चालाक व्यक्ति है। उसके इस कथन में व्यंग्य और कटु सत्य दोनों छिपे हैं। वह कहना चाहता है कि यदि सूरदास ने अपनी झोपड़ी का चूल्हा स्वयं ठंडा कर लिया होता — अर्थात् अपनी गरीबी और असहायता को स्वीकार कर लिया होता, अपनी जमीन छोड़ दी होती — तो उसके शत्रुओं (भैरों आदि) को उसकी झोपड़ी जलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
दूसरे शब्दों में, नायकराम यह स्पष्ट करता है कि सूरदास की जिद और अपनी जमीन पर अडिग रहने की भावना ही उसके दुश्मनों की ईर्ष्या और क्रोध का कारण बनी। दुश्मनों का 'कलेजा ठंडा होना' अर्थात् उनकी प्रतिशोध की भावना तभी शांत होती जब सूरदास झुक जाता। चूँकि सूरदास नहीं झुका, इसलिए शत्रुओं ने उसकी झोपड़ी जलाकर अपनी दुश्मनी निकाली।
इस प्रकार इस कथन में दुर्बल के प्रतिरोध की कीमत और शोषकों की मानसिकता दोनों का यथार्थ चित्रण है।
2भैरों ने सूरदास की झोपड़ी क्यों जलाई?Show solution
कारण:
भैरों ने सूरदास की झोपड़ी जलाने के पीछे अनेक कारण थे —
- ईर्ष्या और द्वेष: भैरों सूरदास से ईर्ष्या करता था। सूरदास अंधा होते हुए भी अपनी जमीन पर अडिग था और समाज में उसका सम्मान था। यह बात भैरों को सहन नहीं होती थी।
- जमीन का विवाद: सूरदास की जमीन पर कारखाना लगाने की योजना थी। भैरों उन लोगों के साथ था जो सूरदास को उसकी जमीन से हटाना चाहते थे। सूरदास के न मानने पर भैरों ने प्रतिशोध लिया।
- व्यक्तिगत दुश्मनी: भैरों और सूरदास के बीच पहले से ही अदावत (दुश्मनी) थी। सूरदास ने कभी उसकी बेईमानी (टेनी मारना, बाट खोटे रखना) का विरोध किया था, जिससे भैरों उससे नाराज था।
- प्रतिशोध की भावना: भैरों यह सिद्ध करना चाहता था कि सूरदास की जिद का परिणाम बुरा होगा। झोपड़ी जलाकर उसने अपनी क्रोध और प्रतिशोध की भावना को शांत किया।
निष्कर्ष: इस प्रकार भैरों की ईर्ष्या, व्यक्तिगत दुश्मनी और जमीन के विवाद ने मिलकर उसे यह जघन्य कार्य करने पर विवश किया।
3'यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।' संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।Show solution
संदर्भ: यह पंक्ति उस समय की है जब सूरदास की झोपड़ी जलकर राख हो जाती है और वह उस राख के ढेर के पास खड़ा होता है।
विवेचन:
सूरदास एक निर्धन, अंधा भिखारी है, किंतु उसके मन में अनेक सपने और अभिलाषाएँ थीं। वह अपनी छोटी-सी झोपड़ी को अपना संसार मानता था। उस झोपड़ी में उसकी —
- जीवन की सुरक्षा का भाव था,
- स्वाभिमान और स्वतंत्रता की भावना थी,
- परिवार के साथ जीने की इच्छा थी,
- अपनी जमीन पर टिके रहने का संकल्प था।
जब झोपड़ी जलकर राख हो गई, तो केवल फूस (घास-फूस) ही नहीं जला, बल्कि उसके वे सारे सपने और अभिलाषाएँ भी जलकर राख हो गईं जो उसने अपने जीवन के लिए संजो रखी थीं।
लेखक प्रेमचंद इस पंक्ति के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि गरीब और शोषित व्यक्ति की झोपड़ी केवल एक आश्रय-स्थल नहीं होती, वह उसके समस्त स्वप्नों और जीवन-आकांक्षाओं का प्रतीक होती है। उसे नष्ट करना केवल भौतिक क्षति नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को कुचलने जैसा है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति सूरदास की आंतरिक पीड़ा और शोषण की गहराई को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है।
4जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?Show solution
जगधर का ईर्ष्या-भाव:
जगधर सूरदास का पड़ोसी था। जब सूरदास की झोपड़ी जल गई और लोग उसके प्रति सहानुभूति दिखाने लगे, उसकी सहायता करने लगे, तो जगधर के मन में हसद (ईर्ष्या) का भाव जागा।
जगधर को यह देखकर जलन हुई कि —
- सूरदास को सहानुभूति और सहायता मिल रही थी — लोग उसके लिए धन, अनाज और सामग्री लेकर आ रहे थे, जबकि जगधर स्वयं गरीब था और उसे कोई इस प्रकार सहायता नहीं करता था।
- सूरदास का सम्मान बढ़ रहा था — झोपड़ी जलने के बाद भी सूरदास की अडिगता और धैर्य देखकर लोग उसकी प्रशंसा कर रहे थे। यह जगधर को सहन नहीं हुआ।
- आर्थिक लाभ की ईर्ष्या — जगधर सोचने लगा कि काश उसकी झोपड़ी भी जल जाती तो उसे भी इस प्रकार सहायता मिलती। यह सोच उसकी दयनीय मानसिकता को दर्शाती है।
कारण: जगधर की यह ईर्ष्या उसकी अपनी दरिद्रता, असुरक्षा और हीन-भावना से उत्पन्न हुई थी। वह सूरदास की विपत्ति में भी उसके प्रति सहानुभूति न रखकर ईर्ष्या करता है — यह उसके संकुचित और स्वार्थी स्वभाव का परिचायक है।
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Frequently Asked Questions
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