भक्तिन
Tripura Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for भक्तिन — Tripura Board Class 12 Hindi.
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1भक्तिन अपना वास्तविक नाम लोगों से क्यों छुपाती थी? भक्तिन को यह नाम किसने और क्यों दिया होगा?Show solution
उत्तर:
भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिन (लक्ष्मी) था। वह इस नाम को छुपाती थी क्योंकि उसका जीवन उस नाम के अनुरूप नहीं था। लक्ष्मी धन-वैभव और सौभाग्य की देवी हैं, किंतु भक्तिन का जीवन दरिद्रता, कष्ट और संघर्ष से भरा था। उसे लगता था कि इतने वैभवशाली नाम और उसकी दयनीय स्थिति में बहुत बड़ा विरोधाभास है, इसलिए वह इस नाम को सुनकर असहज हो जाती थी।
'भक्तिन' नाम किसने और क्यों दिया:
यह नाम लेखिका महादेवी वर्मा ने दिया। भक्तिन के सिर पर हमेशा एक छोटी-सी चोटी रहती थी, वह कानों में ठीक वैसे कुंडल पहनती थी जैसे वैष्णव भक्त पहनते हैं, और उसका आचरण एक समर्पित सेविका जैसा था। उसकी वेशभूषा और भक्तिभाव देखकर लेखिका ने उसे 'भक्तिन' नाम दिया। यह नाम उसके व्यक्तित्व और स्वभाव के अनुकूल था, इसलिए वह इसे सहर्ष स्वीकार करती थी।
2दो कन्या-रत्न पैदा करने पर भक्तिन पुत्र-महिमा में अंधी अपनी जिठानियों द्वारा घृणा व उपेक्षा का शिकार बनी। ऐसी घटनाओं से ही अकसर यह धारणा चलती है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है। क्या इससे आप सहमत हैं?Show solution
उत्तर:
मैं इस धारणा से पूर्णतः सहमत नहीं हूँ कि 'स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है।' इस धारणा के पक्ष और विपक्ष दोनों पर विचार करना आवश्यक है—
धारणा के पक्ष में:
भक्तिन की जिठानियों ने उसे कन्याओं की माँ होने के कारण प्रताड़ित किया। यह सच है कि कभी-कभी स्त्रियाँ ही पितृसत्तात्मक मूल्यों को आगे बढ़ाती हैं और दूसरी स्त्रियों को कुचलती हैं।
धारणा के विपक्ष में:
वास्तव में यह स्त्री की नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही पुरुष-प्रधान सामाजिक व्यवस्था की देन है। जिठानियाँ स्वयं उसी पितृसत्तात्मक सोच की शिकार थीं जो पुत्र को श्रेष्ठ और पुत्री को हीन मानती है। उन्होंने वही किया जो समाज ने उन्हें सिखाया था।
निष्कर्ष:
स्त्री-स्त्री की दुश्मन नहीं होती, बल्कि वह उस सामाजिक ढाँचे की शिकार होती है जो उसे ऐसा सोचने पर मजबूर करता है। जब स्त्री शिक्षित और जागरूक होती है, तो वह दूसरी स्त्री की सबसे बड़ी सहयोगी बनती है।
3भक्तिन की बेटी पर पंचायत द्वारा जबरन पति थोपा जाना एक दुर्घटना भर नहीं, बल्कि विवाह के संदर्भ में स्त्री के मानवाधिकार (विवाह करें या न करें अथवा किससे करें) इसकी स्वतंत्रता को कुचलते रहने की सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपरा का प्रतीक है। कैसे?Show solution
उत्तर:
भक्तिन की बेटी का प्रसंग केवल एक घटना नहीं, बल्कि यह उस सामाजिक परंपरा का प्रतीक है जो सदियों से स्त्री के मानवाधिकारों को कुचलती आई है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है—
1. स्त्री की इच्छा का दमन: भक्तिन की बेटी विधवा थी और वह अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करना चाहती थी, किंतु पंचायत ने उसकी इच्छा को कोई महत्त्व नहीं दिया।
2. पंचायत का एकतरफा निर्णय: पंचायत पुरुष-प्रधान संस्था थी। उसने स्त्री की सहमति लिए बिना ही उसके लिए पति तय कर दिया। यह स्त्री को एक वस्तु की तरह मानने की मानसिकता को दर्शाता है।
3. सामाजिक परंपरा की जड़ें: यह परंपरा सदियों पुरानी है। स्त्री को विवाह में 'दान' की वस्तु माना जाता रहा है। उसकी अपनी पसंद-नापसंद को कभी महत्त्व नहीं दिया गया।
4. मानवाधिकार का हनन: संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा से विवाह करने का अधिकार है। पंचायत का यह निर्णय इस मूल अधिकार का सीधा उल्लंघन था।
निष्कर्ष: इस प्रकार यह घटना एक व्यक्तिगत दुर्घटना नहीं, बल्कि उस व्यापक सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक है जो स्त्री को स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं देती।
4भक्तिन अच्छी है, यह कहना कठिन होगा, क्योंकि उसमें दुर्गुणों का अभाव नहीं — लेखिका ने ऐसा क्यों कहा होगा?Show solution
उत्तर:
लेखिका ने यह इसलिए कहा क्योंकि वे भक्तिन का आदर्शीकृत नहीं, बल्कि यथार्थवादी चित्रण करना चाहती थीं। भक्तिन में निम्नलिखित दुर्गुण विद्यमान थे—
1. हठधर्मिता: भक्तिन अपनी बात पर अड़ी रहती थी और किसी की नहीं सुनती थी।
2. झूठ बोलना: वह अपनी सुविधा के अनुसार झूठ बोल देती थी।
3. चालाकी: वह शास्त्र और नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार तोड़-मरोड़ लेती थी।
4. अंधविश्वास: वह कई अंधविश्वासों में विश्वास रखती थी।
5. दूसरों के काम में दखल: वह लेखिका के अन्य नौकरों और परिचितों के बारे में अपनी राय थोपती थी।
फिर भी लेखिका उसे क्यों पसंद करती हैं:
इन दुर्गुणों के बावजूद भक्तिन में अटूट स्वामिभक्ति, परिश्रम, ईमानदारी और निःस्वार्थ सेवाभाव था। लेखिका का यह कथन यह भी दर्शाता है कि कोई भी मनुष्य पूर्णतः अच्छा या बुरा नहीं होता — मनुष्य का चरित्र गुण-दोषों का मिश्रण होता है। इस प्रकार लेखिका ने भक्तिन को एक जीवंत और विश्वसनीय पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है।
5भक्तिन द्वारा शास्त्र के प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का क्या उदाहरण लेखिका ने दिया है?Show solution
उत्तर:
लेखिका ने इसका एक बहुत रोचक उदाहरण दिया है। भक्तिन के घर में मांस-मछली पकाने और खाने की परंपरा थी, किंतु लेखिका के घर में यह वर्जित था। भक्तिन को लेखिका के घर में रहते हुए इस नियम का पालन करना पड़ता था।
इस पर भक्तिन ने शास्त्र का सहारा लेकर अपनी स्थिति को इस प्रकार सुलझाया — उसने यह तर्क दिया कि जो व्यक्ति जिसके साथ रहता है, उसे उसी के नियमों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार उसने 'यस्मिन् देशे यदाचारः' जैसे शास्त्रीय सिद्धांत को अपनी सुविधा के अनुसार लागू कर लिया।
इसके अतिरिक्त, जब लेखिका के घर में किसी त्योहार पर कोई विशेष नियम होता था, तो भक्तिन उसे भी अपनी व्याख्या से सुलझा लेती थी। इस प्रकार वह बिना किसी शास्त्रीय ज्ञान के भी शास्त्र के प्रश्नों को अपने व्यावहारिक तर्क से हल कर लेती थी। यह उसकी व्यावहारिक बुद्धि और चतुराई का प्रमाण है।
6भक्तिन के आ जाने से महादेवी अधिक देहाती कैसे हो गई?Show solution
उत्तर:
भक्तिन के आने से महादेवी वर्मा निम्नलिखित प्रकार से 'अधिक देहाती' हो गईं—
1. भाषा पर प्रभाव: भक्तिन अवधी-भोजपुरी मिश्रित ग्रामीण भाषा बोलती थी। उसके साथ रहते-रहते लेखिका भी उसी लहजे और शब्दों का प्रयोग करने लगीं।
2. खान-पान: भक्तिन देहाती खाना बनाती थी — मोटे अनाज की रोटी, साग-भाजी आदि। लेखिका भी उसी सादे देहाती भोजन की अभ्यस्त हो गईं।
3. रहन-सहन: भक्तिन की देहाती आदतें और जीवनशैली धीरे-धीरे लेखिका के जीवन में भी समाहित होती गईं।
4. पशु-पक्षियों से लगाव: भक्तिन के प्रभाव से लेखिका का ग्रामीण जीवन के प्रति, पशु-पक्षियों के प्रति लगाव और गहरा हुआ।
5. सोच और दृष्टिकोण: भक्तिन की ग्रामीण सोच, उसके किस्से-कहानियाँ और जीवन-दर्शन ने लेखिका को जमीन से जोड़े रखा।
निष्कर्ष: इस प्रकार भक्तिन ने लेखिका को शहरी परिष्कार से दूर कर ग्रामीण जीवन की सादगी और यथार्थ के करीब ला दिया। यह 'देहातीपन' वास्तव में एक सकारात्मक परिवर्तन था।
पाठ के आसपास
1आलो अंधारि की नायिका और लेखिका बेबी हालदार और भक्तिन के व्यक्तित्व में आप क्या समानता देखते हैं?Show solution
उत्तर:
बेबी हालदार और भक्तिन के व्यक्तित्व में निम्नलिखित समानताएँ हैं—
1. संघर्षशील जीवन: दोनों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत किया। दोनों के जीवन में गरीबी, शोषण और सामाजिक उपेक्षा थी।
2. स्वाभिमान: दोनों स्त्रियाँ अपने स्वाभिमान के प्रति सजग थीं। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने अपना आत्मसम्मान नहीं खोया।
3. परिश्रम और लगन: दोनों अत्यंत परिश्रमी थीं और अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं।
4. निम्न सामाजिक स्तर: दोनों समाज के निचले तबके से आती थीं और घरेलू सेवा के काम से जुड़ी थीं।
5. जिजीविषा: दोनों में जीने की अदम्य इच्छाशक्ति थी। विपरीत परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बनाया।
6. सामाजिक बंधनों से संघर्ष: दोनों ने पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियों से लड़ते हुए अपना रास्ता बनाया।
निष्कर्ष: दोनों पात्र उन लाखों भारतीय महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जो चुपचाप संघर्ष करती हैं और अपनी पहचान बनाती हैं।
3भक्तिन की बेटी के मामले में जिस तरह का फ़ैसला पंचायत ने सुनाया, वह आज भी कोई हैरतअंगेज बात नहीं है। अखबारों या टी. वी. समाचारों में आनेवाली किसी ऐसी ही घटना को भक्तिन के उस प्रसंग के साथ रखकर उस पर चर्चा करें।Show solution
उत्तर (चर्चा के बिंदु):
भक्तिन के प्रसंग का सार: भक्तिन की विधवा बेटी को पंचायत ने जबरन उसके जेठ के साथ विवाह करने पर बाध्य किया। बेटी की अपनी पसंद थी, किंतु पंचायत ने उसे नकार दिया।
आज की समान घटनाएँ:
आज भी देश के कई हिस्सों में खाप पंचायतें इसी प्रकार के फैसले सुनाती हैं—
- एक ही गोत्र में विवाह करने पर दंड देना
- अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़ों को सजा देना
- विधवाओं को जबरन देवर या जेठ से विवाह करने पर मजबूर करना
- लड़कियों के मोबाइल फोन रखने पर प्रतिबंध लगाना
समानता:
दोनों स्थितियों में स्त्री की इच्छा और स्वतंत्रता को कुचला जाता है। पंचायत या खाप का निर्णय ही अंतिम माना जाता है।
निष्कर्ष: यह स्थिति तब तक नहीं बदलेगी जब तक स्त्री-शिक्षा, कानूनी जागरूकता और सामाजिक सोच में परिवर्तन नहीं आता। सरकार और न्यायपालिका को ऐसे मामलों में सख्त कदम उठाने चाहिए।
4पाँच वर्ष की उम्र में ब्याही जानेवाली लड़कियों में सिर्फ भक्तिन नहीं है, बल्कि आज भी हजारों अभागिनियाँ हैं। बाल-विवाह और उम्र के अनमेलपन वाले विवाह की अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर दोस्तों के साथ परिचर्चा करें।Show solution
उत्तर (परिचर्चा के बिंदु):
बाल-विवाह की समस्या:
- भारत में बाल-विवाह निषेध अधिनियम 2006 के अनुसार लड़की की विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष है।
- फिर भी राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में बाल-विवाह की घटनाएँ होती रहती हैं।
बाल-विवाह के दुष्परिणाम:
1. लड़कियों की शिक्षा बाधित होती है।
2. कम उम्र में माँ बनने से स्वास्थ्य को खतरा होता है।
3. बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध होता है।
4. घरेलू हिंसा और शोषण की संभावना बढ़ती है।
अनमेल विवाह की समस्या:
बहुत अधिक उम्र के अंतर वाले विवाह में लड़की का शोषण होता है। उसकी भावनाओं और इच्छाओं की अनदेखी होती है।
समाधान:
- शिक्षा का प्रसार
- कानून का कड़ाई से पालन
- सामाजिक जागरूकता अभियान
- लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना
5महादेवी जी इस पाठ में हिरनी सोना, कुत्ता बसंत, बिल्ली गोधूलि आदि के माध्यम से पशु-पक्षी को मानवीय संवेदना से उकेरने वाले लेखिका के रूप में उभरती हैं। उन्होंने अपने घर में और भी कई पशु-पक्षी पाल रखे थे तथा उन पर रेखाचित्र भी लिखे हैं। शिक्षक की सहायता से उन्हें ढूँढ़कर पढ़ें।Show solution
उत्तर:
महादेवी वर्मा ने अपने पशु-पक्षियों पर 'मेरा परिवार' नामक पुस्तक में रेखाचित्र लिखे हैं। इस पुस्तक में उन्होंने निम्नलिखित पशु-पक्षियों का मार्मिक चित्रण किया है—
1. गिल्लू — एक गिलहरी का रेखाचित्र जो अत्यंत प्रसिद्ध है।
2. सोना — एक हिरनी का रेखाचित्र।
3. नीलकंठ — एक मोर का रेखाचित्र।
4. दुर्मुख — एक बंदर का रेखाचित्र।
5. गौरा — एक गाय का रेखाचित्र।
महादेवी की विशेषता:
महादेवी वर्मा ने इन पशु-पक्षियों को केवल जानवर नहीं माना, बल्कि उन्हें मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर देखा। उनके रेखाचित्रों में पशु-पक्षियों की पीड़ा, प्रेम, स्नेह और मृत्यु का अत्यंत मार्मिक चित्रण है।
विद्यार्थियों के लिए सुझाव: शिक्षक की सहायता से 'मेरा परिवार' पुस्तक पढ़ें और 'गिल्लू' तथा 'नीलकंठ' रेखाचित्र अवश्य पढ़ें।
भाषा की बात
1नीचे दिए गए विशिष्ट भाषा-प्रयोगों के उदाहरणों को ध्यान से पढ़िए और इनकी अर्थ-छवि स्पष्ट कीजिए— (क) पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले (ख) खोटे सिक्कों की टकसाल जैसी पत्नी (ग) अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ और स्पष्ट सहानुभूतिपूर्णShow solution
(क) पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले
अर्थ-छवि: यहाँ 'संस्करण' शब्द पुस्तक-प्रकाशन की भाषा से लिया गया है। जैसे किसी पुस्तक के एक से अधिक संस्करण निकाले जाते हैं, उसी प्रकार भक्तिन ने पहली कन्या के बाद दो और कन्याओं को जन्म दिया। इस प्रयोग में व्यंग्य है — समाज की दृष्टि में कन्याएँ इतनी महत्त्वहीन थीं कि उन्हें 'संस्करण' कहकर उनकी उपेक्षा व्यक्त की गई है। यह प्रयोग पुत्री-विरोधी सामाजिक मानसिकता पर करारा व्यंग्य है।
(ख) खोटे सिक्कों की टकसाल जैसी पत्नी
अर्थ-छवि: 'टकसाल' वह स्थान है जहाँ सिक्के ढाले जाते हैं। 'खोटे सिक्के' वे होते हैं जो मूल्यहीन और अस्वीकार्य होते हैं। यहाँ भक्तिन की जिठानियाँ उसे 'खोटे सिक्कों की टकसाल' कह रही हैं — अर्थात् वह केवल कन्याओं (जिन्हें समाज 'खोटा सिक्का' मानता था) को जन्म देती है। यह प्रयोग पुत्री को हीन मानने वाली सामाजिक सोच पर तीखा व्यंग्य है।
(ग) अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ और स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण
अर्थ-छवि: यह प्रयोग भक्तिन की बातों के संदर्भ में है। जब भक्तिन अपनी व्यथा-कथा सुनाती थी, तो वह कुछ बातें बार-बार दोहराती थी (अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ) और श्रोता उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त करते थे (स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण)। यह प्रयोग ग्रामीण महिलाओं की उस मनोदशा को व्यक्त करता है जो अपनी पीड़ा को पूरी तरह शब्दों में नहीं कह पातीं, किंतु उनकी पीड़ा स्पष्ट रूप से अनुभव होती है।
2'बहनोई' शब्द 'बहन (स्त्री.)+ओई' से बना है। ऐसे कुछ और शब्द और उनमें लगे पुं. प्रत्ययों की हिंदी तथा और भाषाओं में खोज करें।Show solution
उत्तर:
हिंदी में ऐसे शब्द जहाँ स्त्रीलिंग शब्द में पुं. प्रत्यय जोड़कर पुलिंग शब्द बना है—
| स्त्रीलिंग शब्द | पुं. प्रत्यय | पुलिंग शब्द |
|---|---|---|
| बहन | ओई | बहनोई |
| माँ | सा | मामा (माँ+सा → माँसा → मामा) |
| नाना | ई | नानी (यहाँ विपरीत भी होता है) |
| दादा | ई | दादी |
अन्य उदाहरण:
- ननद + ओई = ननदोई (ननद का पति)
- भाभी — यह 'भाई' से बना स्त्रीलिंग रूप है
अन्य भाषाओं में:
- पंजाबी में: भैण (बहन) + ओई = भैणोई
- मराठी में: बहीण + जावई = बहिणजावई (बहन का पति)
निष्कर्ष: हिंदी की यह विशेषता अनन्य है कि यहाँ स्त्रीलिंग शब्द में पुं. प्रत्यय जोड़कर पुलिंग शब्द बनाया जाता है, जो अन्य भाषाओं में प्रायः नहीं होता।
3पाठ में आए लोकभाषा के इन संवादों को समझ कर इन्हें खड़ी बोली हिंदी में डाल कर प्रस्तुत कीजिए। (क) ई कउन बड़ी बात आय... (ख) हमारे मालकिन ती रात-दिन... (ग) ऊ बिचरिअउ ती रात-दिन... (घ) तब ऊ कुच्ची करिहैं-धरिहैं ना... (ङ) तुम पचै का का बताईयाँ... (च) हम कुकुरी बिलारी न होयँ...Show solution
(क) मूल: ई कउन बड़ी बात आय। रोटी बनाय जानित है, दाल रॉथ लेइत है, साग-भाजी छँउक सकित है, अउर बाकी का रहा।
खड़ी बोली: यह कौन बड़ी बात है। रोटी बनाना जानती हूँ, दाल पका लेती हूँ, साग-सब्जी छौंक सकती हूँ, और बाकी क्या रहा।
---
(ख) मूल: हमारे मालकिन ती रात-दिन कितबियन माँ गड़ी रहती हैं। अब हमहूँ पढ़ै लागब तो घर-गिरिस्ती कउन देखी-सुनी।
खड़ी बोली: हमारी मालकिन तो रात-दिन किताबों में डूबी रहती हैं। अब हम भी पढ़ने लगेंगे तो घर-गृहस्थी कौन देखेगा-सुनेगा।
---
(ग) मूल: ऊ बिचरिअउ ती रात-दिन काम माँ झुकी रहती हैं, अउर तुम पचै घूमती-फिरती ही, चली तनिक हाथ बटाय लेउ।
खड़ी बोली: वह बेचारी तो रात-दिन काम में झुकी रहती हैं, और तुम लोग घूमती-फिरती हो, चलो जरा हाथ बँटा लो।
---
(घ) मूल: तब ऊ कुच्ची करिहैं-धरिहैं ना—बस गली-गली गाउत-बजाउत फिरिहैं।
खड़ी बोली: तब वह कुछ करेंगे-धरेंगे नहीं — बस गली-गली गाते-बजाते फिरेंगे।
---
(ङ) मूल: तुम पचै का का बताईयाँ पचास बरिस से संग रहित है।
खड़ी बोली: तुम लोगों को क्या-क्या बताऊँ, पचास वर्षों से साथ रहती हूँ।
---
(च) मूल: हम कुकुरी बिलारी न होयँ, हमार मन पुसाई तौ हम दूसरा के जाब नाहिं त तुम्हार पचै की छाती पै होरहा भूँजब और राज करब, समुझे रहौ।
खड़ी बोली: हम कुत्ती-बिल्ली नहीं हैं, हमारा मन हुआ तो हम दूसरे के यहाँ जाएँगे, नहीं तो तुम लोगों की छाती पर हरे अनाज भूनेंगे और राज करेंगे, समझे रहो।
4भक्तिन पाठ में 'पहली कन्या के दो संस्करण' जैसे प्रयोग लेखिका के खास भाषाई संस्कार की पहचान कराता है। नीचे दिए वाक्यों में किन तीन विशेष प्रकार की शब्दावली का प्रयोग हुआ है?Show solution
1. अरे! उससे सावधान रहना! वह नीचे से ऊपर तक वायरस से भरा हुआ है। जिस सिस्टम में जाता है उसे हैंग कर देता है।
2. घबरा मत! मेरी इनस्वींगर के सामने उसके सारे वायरस घुटने टेकेंगे। अगर ज्यादा फाउल मारा तो रेड कार्ड दिखा के हमेशा के लिए पवेलियन भेज दूँगा।
3. जानी टेंसन नई लेने का वो जिस स्कूल में पढ़ता है अपुन उसका हैडमास्टर है।
उत्तर:
इन वाक्यों में तीन विशेष प्रकार की शब्दावली का प्रयोग हुआ है—
1. कंप्यूटर/तकनीकी शब्दावली:
वायरस, सिस्टम, हैंग — ये शब्द कंप्यूटर की भाषा से लिए गए हैं और यहाँ मनुष्य के दुर्गुणों के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
2. खेल (क्रिकेट/फुटबॉल) की शब्दावली:
इनस्वींगर, फाउल, रेड कार्ड, पवेलियन — ये शब्द क्रिकेट और फुटबॉल की भाषा से लिए गए हैं और यहाँ सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में प्रयुक्त हुए हैं।
3. मुंबइया/बोलचाल की शब्दावली:
जानी, टेंसन नई लेने का, अपुन, हैडमास्टर — ये शब्द मुंबई की बोलचाल की भाषा (हिंदी-मराठी मिश्रित) से लिए गए हैं।
भाषा की समृद्धि में योगदान:
ऐसे प्रयोग भाषा को जीवंत, रोचक और संप्रेषणीय बनाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों की शब्दावली के समावेश से भाषा समृद्ध होती है और अभिव्यक्ति अधिक प्रभावशाली बनती है। हालाँकि इससे भाषा की शुद्धता प्रभावित हो सकती है, किंतु यह भाषा के स्वाभाविक विकास का हिस्सा है।
स्वरचित वाक्य (उदाहरण):
- तकनीकी: उसका दिमाग तो पूरी तरह हैंग हो गया है, कोई नई बात अपलोड ही नहीं होती।
- खेल: जिंदगी के मैच में उसने शानदार सेंचुरी मारी।
- बोलचाल: अरे यार, टेंसन मत ले, सब ठीक हो जाएगा।
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