जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा) — NCERT Solutions
Tripura Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा), Tripura Board Class 12 Hindi: 20 textbook questions solved step by step.
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प्रश्न-अभ्यास
1अमझर से आप क्या समझते हैं? अमझर गाँव में सूनापन क्यों है?Show solution
दिया गया है: निर्मल वर्मा के यात्रा-वृत्तांत 'जहाँ कोई वापसी नहीं' में अमझर गाँव का उल्लेख है।
अमझर का अर्थ: 'अमझर' एक ऐसे गाँव का नाम है जो सिंगरौली क्षेत्र में स्थित था। 'अमझर' शब्द का अर्थ है — वह स्थान जहाँ से आम के पेड़ झर (गिर) गए हों अर्थात् जो उजड़ गया हो।
अमझर में सूनापन के कारण:
औद्योगीकरण और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं (जैसे बाँध, कोयला खदान, बिजलीघर आदि) के कारण सिंगरौली क्षेत्र के गाँवों को बार-बार उजाड़ा गया। अमझर गाँव के निवासियों को भी उनकी जमीन और घरों से बेदखल कर दिया गया। लोग विस्थापित होकर इधर-उधर चले गए। जो लोग वहाँ रहते थे, वे अपनी जड़ों से उखड़ गए। इसी कारण अमझर गाँव में गहरा सूनापन छा गया — न घरों में रौनक रही, न खेतों में हलचल। गाँव एक उजड़े हुए खंडहर की तरह हो गया।
निष्कर्ष: अमझर औद्योगीकरण की बलि चढ़े उन अनगिनत गाँवों का प्रतीक है जो विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए।
2आधुनिक भारत के 'नए शरणार्थी' किन्हें कहा गया है?Show solution
दिया गया है: लेखक निर्मल वर्मा ने 'नए शरणार्थी' पद का प्रयोग किया है।
'नए शरणार्थी' की अवधारणा:
सामान्यतः 'शरणार्थी' उन्हें कहा जाता है जो युद्ध, दंगे या प्राकृतिक आपदा के कारण अपना देश या घर छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। किंतु लेखक ने 'नए शरणार्थी' उन लोगों को कहा है जो औद्योगीकरण और विकास परियोजनाओं के कारण अपने घरों, गाँवों और जमीनों से उजाड़े गए हैं।
सिंगरौली जैसे क्षेत्रों में बाँध, कोयला खदान, ताप-विद्युत संयंत्र आदि बनाने के लिए हजारों आदिवासियों और ग्रामीणों को बार-बार विस्थापित किया गया। ये लोग न तो किसी युद्ध के शिकार हैं, न किसी प्राकृतिक आपदा के — बल्कि इन्हें 'विकास' के नाम पर उनकी जड़ों से उखाड़ा गया है। इसीलिए लेखक इन्हें आधुनिक भारत के 'नए शरणार्थी' कहते हैं।
निष्कर्ष: ये वे लोग हैं जो अपनी ही धरती पर बेघर हो गए — विकास की कीमत चुकाने वाले निर्धन, आदिवासी और ग्रामीण।
3प्रकृति के कारण विस्थापन और औद्योगीकरण के कारण विस्थापन में क्या अंतर है?Show solution
दिया गया है: लेखक ने दो प्रकार के विस्थापनों की चर्चा की है।
प्रकृति के कारण विस्थापन:
- बाढ़, भूकंप, सूखा, तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण लोग अपना घर छोड़ने पर मजबूर होते हैं।
- यह विस्थापन अस्थायी होता है — आपदा टलने पर लोग वापस लौट सकते हैं।
- इसमें लोगों की वापसी की संभावना बनी रहती है।
- प्रकृति के प्रति मनुष्य का भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव बना रहता है।
- यह विस्थापन किसी की इच्छा या योजना का परिणाम नहीं होता।
औद्योगीकरण के कारण विस्थापन:
- बाँध, खदान, कारखाने, बिजलीघर आदि बनाने के लिए लोगों को जबरन उजाड़ा जाता है।
- यह विस्थापन स्थायी होता है — लोग कभी वापस नहीं लौट सकते, इसीलिए पाठ का शीर्षक है 'जहाँ कोई वापसी नहीं'।
- इसमें लोगों की जड़ें हमेशा के लिए कट जाती हैं।
- यह विस्थापन मनुष्य की संस्कृति, परंपरा और पहचान को भी नष्ट कर देता है।
- यह मानव-निर्मित और योजनाबद्ध होता है।
निष्कर्ष: प्रकृति के कारण विस्थापन में वापसी की उम्मीद होती है, जबकि औद्योगीकरण के कारण विस्थापन में मनुष्य अपनी जमीन, संस्कृति और अस्मिता सब कुछ खो देता है।
4यूरोप और भारत की पर्यावरण संबंधी चिंताएँ किस प्रकार भिन्न हैं?Show solution
दिया गया है: लेखक ने यूरोप और भारत की पर्यावरण-चिंताओं की तुलना की है।
यूरोप की पर्यावरण संबंधी चिंता:
- यूरोप में पर्यावरण का प्रश्न मुख्यतः मनुष्य और भूगोल के बीच संतुलन बनाए रखने का है।
- वहाँ सांस्कृतिक विरासत म्यूजियम और संग्रहालयों में सुरक्षित है, इसलिए पर्यावरण की चिंता केवल भौतिक और भौगोलिक स्तर पर है।
- यूरोप में प्रकृति और संस्कृति अलग-अलग हैं — संस्कृति को बचाने के लिए प्रकृति को बचाना अनिवार्य नहीं।
भारत की पर्यावरण संबंधी चिंता:
- भारत में पर्यावरण का प्रश्न केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मनुष्य और उसकी संस्कृति के बीच पारंपरिक संबंध बनाए रखने का है।
- भारत की सांस्कृतिक विरासत म्यूजियम में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपनी धरती, जंगलों, नदियों से जीवंत रिश्तों में बसी है।
- यहाँ अतीत का मिथक-संसार पोथियों में नहीं, रिश्तों की अदृश्य लिपि में जीवित है।
- इसलिए भारत में पर्यावरण नष्ट होने का अर्थ है — संस्कृति और परंपरा का भी नष्ट होना।
निष्कर्ष: यूरोप में पर्यावरण-चिंता भौतिक है, जबकि भारत में यह सांस्कृतिक और आत्मिक भी है।
5लेखक के अनुसार स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी 'ट्रेजेडी' क्या है?Show solution
दिया गया है: लेखक निर्मल वर्मा ने स्वतंत्रता के बाद के भारत की सबसे बड़ी त्रासदी का उल्लेख किया है।
स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी 'ट्रेजेडी':
लेखक के अनुसार स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि शासक वर्ग ने औद्योगीकरण का मार्ग चुना। औद्योगिक विकास आवश्यक भी था।
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमारे पश्चिम-शिक्षित सत्ताधारियों ने पश्चिम की देखादेखी और नकल में योजनाएँ बनाते समय यह कभी नहीं सोचा कि —
- प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाजुक संतुलन किस प्रकार बनाए रखा जाए।
- भारत की अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धारित किया जा सकता था, किंतु ऐसा कभी नहीं हुआ।
- पश्चिम को मॉडल मानकर चलने से भारत की सांस्कृतिक जड़ें कट गईं और लाखों लोग विस्थापित हो गए।
निष्कर्ष: लेखक की दृष्टि में असली त्रासदी यह है कि विकास की प्रक्रिया में भारतीय संदर्भ, संस्कृति और मानवीय संवेदना को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
6औद्योगीकरण ने पर्यावरण का संकट पैदा कर दिया है, क्यों और कैसे?Show solution
दिया गया है: लेखक ने सिंगरौली क्षेत्र के उदाहरण से औद्योगीकरण और पर्यावरण-संकट का संबंध स्पष्ट किया है।
औद्योगीकरण द्वारा पर्यावरण-संकट के कारण और तरीके:
(i) वनों की कटाई: कारखानों, खदानों और बाँधों के निर्माण के लिए घने जंगल काटे गए, जिससे वन्य जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हुआ।
(ii) नदियों का प्रदूषण: औद्योगिक कचरा और रसायन नदियों में बहाए गए, जिससे जल-प्रदूषण बढ़ा और जलीय जीवन समाप्त होने लगा।
(iii) भूमि का विनाश: खनन कार्यों से भूमि की उर्वरता नष्ट हुई और बड़े-बड़े गड्ढे बन गए।
(iv) वायु प्रदूषण: कोयला आधारित बिजलीघरों और कारखानों से निकलने वाले धुएँ ने वायु को प्रदूषित किया।
(v) मानव-विस्थापन: लाखों लोगों को उनकी जमीन से उजाड़ा गया, जिससे मनुष्य और प्रकृति का परंपरागत संबंध टूट गया।
(vi) सांस्कृतिक विनाश: प्रकृति के साथ मनुष्य की संस्कृति भी नष्ट हुई क्योंकि भारत में दोनों अविभाज्य हैं।
निष्कर्ष: औद्योगीकरण ने केवल भौतिक पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि मनुष्य के सांस्कृतिक और सामाजिक पर्यावरण को भी गहरी क्षति पहुँचाई है।
7क्या स्वच्छता अभियान की जरूरत गाँव से ज्यादा शहरों में है? (विस्थापित लोगों, मजदूर बस्तियों, स्लमस क्षेत्रों, शहरों में बसी झुग्गी बस्तियों के संदर्भ में लिखिए।)Show solution
दिया गया है: यह प्रश्न विस्थापित लोगों और शहरी झुग्गी बस्तियों के संदर्भ में स्वच्छता की आवश्यकता पर विचार करने को कहता है।
विचार:
स्वच्छता अभियान की आवश्यकता गाँव और शहर दोनों में है, किंतु शहरों में विस्थापित मजदूर बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में यह आवश्यकता कहीं अधिक गंभीर और तात्कालिक है।
कारण:
(i) अत्यधिक जनसंख्या घनत्व: झुग्गी बस्तियों में बहुत कम जगह में बहुत अधिक लोग रहते हैं, जिससे गंदगी तेजी से फैलती है।
(ii) मूलभूत सुविधाओं का अभाव: इन बस्तियों में शौचालय, स्वच्छ पेयजल, नाली और कूड़ा-निपटान की व्यवस्था नहीं होती।
(iii) बीमारियों का खतरा: गंदगी के कारण हैजा, टाइफाइड, मलेरिया जैसी बीमारियाँ तेजी से फैलती हैं।
(iv) विस्थापित मजदूरों की दुर्दशा: औद्योगिक परियोजनाओं के लिए विस्थापित लोग शहरों में मजदूर बस्तियों में रहने को मजबूर हैं जहाँ स्वच्छता की कोई व्यवस्था नहीं।
(v) सरकारी उपेक्षा: गाँवों में स्वच्छता अभियान पहुँचता है, किंतु शहरी झुग्गियाँ प्रायः उपेक्षित रहती हैं।
निष्कर्ष: स्वच्छता अभियान को शहरी झुग्गी बस्तियों और मजदूर कॉलोनियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि ये लोग पहले से ही विस्थापन की पीड़ा झेल रहे हैं और अस्वच्छ वातावरण उनकी दुर्दशा को और बढ़ाता है।
8(क)निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए — (क) आदमी उजड़ेंगे तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे?Show solution
दिया गया है: यह पंक्ति निर्मल वर्मा के पाठ 'जहाँ कोई वापसी नहीं' से ली गई है।
आशय:
इस पंक्ति में लेखक ने मनुष्य और प्रकृति के अन्योन्याश्रित संबंध को बड़े मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है।
सामान्यतः पर्यावरण आंदोलन में यह तर्क दिया जाता है कि पेड़ों को बचाने के लिए मनुष्यों को हटाया जाए। किंतु लेखक इस तर्क को उलटते हुए कहते हैं कि यदि मनुष्य ही उजड़ जाएगा — अपनी जड़ों से, अपनी संस्कृति से, अपनी धरती से — तो पेड़ों का जीवित रहना किस काम का?
भारत में मनुष्य और प्रकृति का संबंध केवल भौतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक है। पेड़-पौधे, नदियाँ, जंगल — ये सब मनुष्य की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दर्शन से जुड़े हैं। यदि मनुष्य ही विस्थापित हो जाए तो प्रकृति का संरक्षण निरर्थक हो जाता है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति बताती है कि पर्यावरण-संरक्षण और मानव-कल्याण साथ-साथ चलने चाहिए। मनुष्य को उजाड़कर पेड़ बचाना वास्तविक पर्यावरण-चेतना नहीं है।
8(ख)निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए — (ख) प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है?Show solution
दिया गया है: यह पंक्ति निर्मल वर्मा के पाठ से ली गई है।
आशय:
इस पंक्ति में लेखक प्रकृति और इतिहास की प्रकृति (स्वभाव) में मूलभूत अंतर को स्पष्ट करते हैं।
इतिहास का स्वभाव है — आगे बढ़ना, परिवर्तन होना। इतिहास में जो एक बार नष्ट हो जाता है, वह वापस नहीं आता। इतिहास की घटनाएँ अपरिवर्तनीय होती हैं।
प्रकृति का स्वभाव है — पुनर्जन्म, पुनरुत्थान। प्रकृति में नष्ट होने के बाद भी पुनः जीवन संभव है — बाढ़ के बाद धरती फिर हरी होती है, सूखे के बाद वर्षा आती है, जंगल जलने के बाद फिर उगते हैं।
किंतु जब औद्योगीकरण के कारण प्रकृति का विनाश होता है, तो वह विनाश इतिहास की तरह स्थायी और अपरिवर्तनीय हो जाता है — खदानें खुद जाती हैं, नदियाँ प्रदूषित हो जाती हैं, जंगल हमेशा के लिए कट जाते हैं। इस अर्थ में प्रकृति और इतिहास के बीच का अंतर मिट जाता है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति बताती है कि मानव-जनित विनाश प्रकृति की पुनर्जीवन-शक्ति को भी नष्ट कर देता है, जो एक गहरी त्रासदी है।
9(क)निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए — (क) आधुनिक शरणार्थीShow solution
आधुनिक शरणार्थी
पारंपरिक अर्थ में 'शरणार्थी' वे लोग होते हैं जो युद्ध, दंगे या प्राकृतिक आपदा के कारण अपना घर-देश छोड़ने पर विवश होते हैं। किंतु निर्मल वर्मा ने 'आधुनिक शरणार्थी' की एक नई अवधारणा प्रस्तुत की है।
आधुनिक भारत में औद्योगीकरण और विकास परियोजनाओं — जैसे बाँध, कोयला खदान, ताप-विद्युत संयंत्र, राजमार्ग आदि — के निर्माण के लिए लाखों आदिवासियों, किसानों और ग्रामीणों को उनकी जमीन और घरों से जबरन विस्थापित किया गया। ये लोग किसी बाहरी शत्रु के नहीं, बल्कि अपने ही देश की विकास-नीतियों के शिकार हैं।
सिंगरौली क्षेत्र इसका ज्वलंत उदाहरण है जहाँ एक ही परिवार को कई बार उजाड़ा गया। ये 'आधुनिक शरणार्थी' न तो किसी देश की सीमा पार करते हैं, न किसी शिविर में रहते हैं — वे अपनी ही धरती पर बेघर होकर भटकते हैं। इनकी न कोई सुनता है, न इनके लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय सहायता आती है।
निष्कर्ष: आधुनिक शरणार्थी विकास की क्रूर विडंबना के प्रतीक हैं — जो लोग देश की समृद्धि के लिए सबसे अधिक कुर्बानी देते हैं, वे ही सबसे अधिक उपेक्षित और बेसहारा रहते हैं।
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Frequently Asked Questions
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