Skip to main content
Chapter 27 of 38
NCERT Solutions

सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी)

Chhattisgarh Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) — Chhattisgarh Board Class 12 Hindi.

44 questions20 flashcards3 concepts

Interactive on Super Tutor

Studying सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी)? Get the full interactive chapter.

Quizzes, flashcards, AI doubt-solver and a step-by-step study plan — built for ncert solutions and more.

1,000+ Class 12 students started this chapter today

An infographic detailing the life, linguistic abilities, literary contributions (journals, stories), and academic career of Pandit Chandradhar Sharma Guleri.
Super Tutor

Learn better with visuals Super Tutor has hundreds of illustrations like this across every chapter — all free to try.

Get started
27 Questions Solved · 6 Sections

प्रश्न-अभ्यास — (क) बालक बच गया

1बालक से उसकी उम्र और योग्यता से ऊपर के कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए?Show solution
दिया गया है: पाठ 'सुमिरिनी के मनके' में एक बालक से वार्षिकोत्सव के अवसर पर प्रश्न पूछे जाते हैं।

उत्तर:
बालक से उसकी उम्र और योग्यता से कहीं ऊपर के निम्नलिखित प्रश्न पूछे गए—
1. देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति के बारे में प्रश्न।
2. स्वराज्य और राष्ट्रसेवा के बारे में प्रश्न।
3. जीवन का लक्ष्य क्या है — इस प्रकार के दार्शनिक प्रश्न।
4. बड़े होकर क्या करोगे — इस प्रकार के भविष्य-संबंधी प्रश्न जो एक छोटे बालक की समझ से परे थे।

ये सभी प्रश्न उस बालक की आयु और मानसिक स्तर के अनुकूल नहीं थे। ये प्रश्न बड़े-बड़े नेताओं और विद्वानों के लिए उचित होते, किसी छोटे बच्चे के लिए नहीं।
2बालक ने क्यों कहा कि मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा?Show solution
दिया गया है: बालक से उसके जीवन के लक्ष्य के बारे में पूछा गया।

उत्तर:
बालक ने 'यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा' इसलिए कहा क्योंकि—
1. उसे बड़ों द्वारा रटाया-पढ़ाया गया था। वह स्वयं इस उत्तर का अर्थ नहीं जानता था।
2. वार्षिकोत्सव जैसे सार्वजनिक अवसरों पर बच्चों को ऐसे 'आदर्श' उत्तर देने के लिए तैयार किया जाता था जो बड़ों को प्रभावित करें।
3. यह उत्तर उसकी अपनी स्वाभाविक इच्छा नहीं थी, बल्कि बड़ों की अपेक्षाओं के अनुरूप रटा हुआ जवाब था।
4. बच्चे पर समाज और परिवार का दबाव था कि वह 'बड़ी-बड़ी' बातें करे, जिससे सभी उसकी प्रशंसा करें।

इस प्रकार यह उत्तर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्ति का नहीं, बल्कि थोपी गई मानसिकता का परिणाम था।
3बालक द्वारा इनाम में लड्डू माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों भरी?Show solution
दिया गया है: बालक ने इनाम में लड्डू माँगा, जिस पर लेखक ने राहत की साँस ली।

उत्तर:
लेखक ने सुख की साँस इसलिए भरी क्योंकि—
1. लड्डू माँगना बालक की स्वाभाविक, निर्दोष और उम्र के अनुकूल इच्छा थी। इससे सिद्ध हुआ कि बालक के भीतर का बच्चा अभी जीवित है।
2. इससे लेखक को विश्वास हुआ कि बालक की प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ पूरी तरह नष्ट नहीं हुई हैं।
3. लेखक के अनुसार यह 'जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर' था — अर्थात् बालक में जीवन की स्वाभाविक स्पंदन अभी शेष थी।
4. यदि बालक ने कोई 'आदर्शवादी' या रटा हुआ उत्तर दिया होता, तो वह 'मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट' होती।

इस प्रकार लड्डू माँगना इस बात का प्रमाण था कि बालक की बाल-सुलभ स्वाभाविकता अभी जीवित है और उसे बचाया जा सकता है।
4बालक की प्रवृत्तियों का गला घोटना अनुचित है, पाठ में ऐसा आभास किन स्थलों पर होता है कि उसकी प्रवृत्तियों का गला घोटा जाता है?Show solution
दिया गया है: पाठ में बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों को दबाने के संकेत मिलते हैं।

उत्तर:
पाठ में निम्नलिखित स्थलों पर बालक की प्रवृत्तियों का गला घोटने का आभास होता है—

1. उम्र से बड़े प्रश्न पूछना: बालक से राष्ट्रसेवा, स्वराज्य जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे जाते हैं जो उसकी समझ से परे हैं। इससे उसकी बाल-सुलभ जिज्ञासा दब जाती है।

2. रटे-रटाए उत्तर देना: बालक को 'यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा' जैसे उत्तर रटाए जाते हैं। इससे उसकी मौलिक सोच और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का गला घुटता है।

3. सार्वजनिक प्रदर्शन: वार्षिकोत्सव में बालक को नुमाइश की वस्तु बनाया जाता है। उससे बड़ों को प्रभावित करने वाले उत्तर दिलवाए जाते हैं।

4. स्वाभाविक इच्छाओं की उपेक्षा: बालक की स्वाभाविक इच्छाएँ — खेलना, खाना, मस्ती करना — इन सबको दबाकर उसे 'आदर्श बालक' बनाने की कोशिश की जाती है।

इस प्रकार शिक्षा और समाज दोनों मिलकर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का गला घोटते हैं, जो अनुचित है।
5'बालक बच गया। उसके बचने की आशा है क्योंकि वह लड्डू की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था, मरे काठ की अलमारी की सिर दुखानेवाली खड़खड़ाहट नहीं' — कथन के आधार पर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।Show solution
दिया गया है: उपर्युक्त कथन लेखक गुलेरी जी का है जो बालक की स्वाभाविकता के बारे में है।

प्रयुक्त प्रतीक:
- 'जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर' = बालक की स्वाभाविक, निर्दोष, जीवंत प्रवृत्तियाँ।
- 'मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट' = रटे-रटाए, कृत्रिम, थोपे गए विचार।

बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ:

1. भोजन की स्वाभाविक इच्छा: लड्डू माँगना — यह उसकी उम्र के अनुकूल, निर्दोष और प्राकृतिक इच्छा है।

2. सरलता और निश्छलता: बालक में कोई दिखावा नहीं है। वह जो चाहता है, सीधे माँग लेता है।

3. मौलिकता: रटे हुए उत्तरों के बावजूद उसके भीतर का बच्चा अपनी असली इच्छा व्यक्त कर देता है।

4. जिज्ञासा और खेल-भावना: बच्चे की स्वाभाविक प्रवृत्ति खेलना, खाना और आनंद लेना है।

5. स्वतंत्र अभिव्यक्ति: बड़ों के दबाव के बावजूद वह अपनी असली भावना व्यक्त कर देता है।

निष्कर्ष: लेखक का मानना है कि ऐसी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ ही बालक के सच्चे विकास का आधार हैं। इन्हें दबाना उचित नहीं।
6उम्र के अनुसार बालक में योग्यता का होना आवश्यक है किन्तु उसका ज्ञानी या दार्शनिक होना जरूरी नहीं। 'लर्निंग आउटकम' के बारे में विचार कीजिए।Show solution
दिया गया है: शिक्षा में 'लर्निंग आउटकम' (अधिगम परिणाम) की अवधारणा।

विचार:

'लर्निंग आउटकम' का अर्थ है — शिक्षा के बाद बालक में क्या परिवर्तन आया, उसने क्या सीखा और वह उसे व्यावहारिक जीवन में कैसे उपयोग कर सकता है।

मुख्य बिंदु:

1. उम्र के अनुकूल शिक्षा: प्रत्येक आयु-वर्ग के लिए अलग-अलग 'लर्निंग आउटकम' निर्धारित होने चाहिए। छोटे बच्चे से दार्शनिक प्रश्नों की अपेक्षा रखना अनुचित है।

2. रटना बनाम समझना: वास्तविक 'लर्निंग आउटकम' तब प्राप्त होता है जब बालक रटे नहीं, बल्कि समझे। रटी हुई बातें 'मरे काठ की खड़खड़ाहट' हैं।

3. समग्र विकास: 'लर्निंग आउटकम' केवल परीक्षा में अंक नहीं है, बल्कि बालक का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास है।

4. स्वाभाविक प्रवृत्तियों का सम्मान: सच्चा 'लर्निंग आउटकम' वही है जो बालक की स्वाभाविक जिज्ञासा और रचनात्मकता को बढ़ावा दे।

5. व्यावहारिक ज्ञान: बालक को ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए जो उसके दैनिक जीवन में काम आए।

निष्कर्ष: गुलेरी जी का संदेश यही है कि शिक्षा बालक की उम्र, रुचि और स्वाभाविक प्रवृत्तियों के अनुकूल होनी चाहिए। तभी सच्चा 'लर्निंग आउटकम' प्राप्त होगा।

प्रश्न-अभ्यास — (ख) घड़ी के पुर्जे

1लेखक ने धर्म का रहस्य जानने के लिए 'घड़ी के पुर्जे' का दृष्टांत क्यों दिया है?Show solution
दिया गया है: लेखक गुलेरी जी ने धर्म को समझाने के लिए 'घड़ी के पुर्जे' का उदाहरण दिया है।

उत्तर:
लेखक ने 'घड़ी के पुर्जे' का दृष्टांत निम्नलिखित कारणों से दिया है—

1. धर्म की जटिलता को सरल बनाना: जिस प्रकार घड़ी के पुर्जों को समझना एक विशेष कला है, उसी प्रकार धर्म के रहस्य को समझना भी जटिल है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आम आदमी इसे समझ ही नहीं सकता।

2. एकाधिकार पर व्यंग्य: जैसे कोई घड़ी को बंद करके रख दे और दूसरों को हाथ न लगाने दे, वैसे ही कुछ धर्माचार्य धर्म को अपनी मुट्ठी में बंद रखते हैं। यह दृष्टांत इस एकाधिकार पर व्यंग्य करता है।

3. सामान्य जन का अधिकार: घड़ी का उपयोग सभी करते हैं, उसके पुर्जे जानना सबके लिए आवश्यक नहीं। किंतु जो जानना चाहे, उसे रोकना अनुचित है। इसी प्रकार धर्म पर सबका अधिकार है।

4. व्यावहारिक उदाहरण: घड़ी एक ऐसी वस्तु है जिसे सभी समझते हैं। इसके माध्यम से लेखक ने धर्म की जटिल बात को सरल और प्रभावशाली ढंग से समझाया है।

निष्कर्ष: यह दृष्टांत धर्म पर कुछ लोगों के एकाधिकार का विरोध करता है और आम आदमी के धर्म-संबंधी अधिकार की पुष्टि करता है।
2'धर्म का रहस्य जानना वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है।' आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? धर्म संबंधी अपने विचार व्यक्त कीजिए।Show solution
दिया गया है: उपर्युक्त कथन धर्म पर धर्माचार्यों के एकाधिकार की बात करता है।

मेरे विचार:

मैं इस कथन से आंशिक रूप से सहमत हूँ। मेरे विचार निम्नलिखित हैं—

सहमति के बिंदु:
- वेदशास्त्रों का गहन अध्ययन करने वाले विद्वान धर्म के सूक्ष्म रहस्यों को बेहतर समझ सकते हैं।
- धर्म-ग्रंथों की व्याख्या के लिए विशेष ज्ञान आवश्यक है।

असहमति के बिंदु:
1. धर्म केवल कर्मकांड और शास्त्र-ज्ञान तक सीमित नहीं है। धर्म का मूल अर्थ है — सत्य, अहिंसा, करुणा, न्याय — जिन्हें कोई भी सामान्य व्यक्ति समझ और अपना सकता है।
2. यदि धर्म केवल धर्माचार्यों की मुट्ठी में रहे तो आम आदमी उससे कट जाएगा और धर्म का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
3. कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने बिना किसी विशेष शास्त्र-ज्ञान के धर्म के सच्चे स्वरूप को समझा और समाज को दिखाया।
4. धर्म व्यक्तिगत आचरण और नैतिकता का विषय है, जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से जुड़ा है।

निष्कर्ष: धर्म का रहस्य जानने का अधिकार सबको है। धर्माचार्य मार्गदर्शक हो सकते हैं, एकाधिकारी नहीं।
3घड़ी समय का ज्ञान कराती है। क्या धर्म संबंधी मान्यताएँ या विचार अपने समय का बोध नहीं कराते?Show solution
दिया गया है: घड़ी और धर्म की तुलना के संदर्भ में यह प्रश्न है।

उत्तर:
हाँ, धर्म संबंधी मान्यताएँ और विचार निश्चित रूप से अपने समय का बोध कराते हैं। इसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है—

1. सामाजिक दर्पण: प्रत्येक युग की धर्म-संबंधी मान्यताएँ उस युग की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करती हैं। जैसे वैदिक काल की मान्यताएँ उस समय के कृषि-प्रधान समाज को दर्शाती हैं।

2. परिवर्तन का संकेत: जब धर्म में सुधार आंदोलन होते हैं — जैसे भक्ति आंदोलन, आर्य समाज — तो वे अपने समय की सामाजिक आवश्यकताओं का बोध कराते हैं।

3. नैतिक मानदंड: धर्म की मान्यताएँ बताती हैं कि उस समय समाज में क्या उचित और क्या अनुचित माना जाता था।

4. किंतु सीमा भी है: जब धर्म की मान्यताएँ समय के साथ नहीं बदलतीं और पुरानी रूढ़ियों से चिपकी रहती हैं, तो वे 'बंद घड़ी' की तरह हो जाती हैं — जो समय नहीं बताती।

निष्कर्ष: धर्म की जीवंत मान्यताएँ समय का बोध कराती हैं, किंतु जड़ और रूढ़िवादी मान्यताएँ समय से पीछे रह जाती हैं।
4धर्म अगर कुछ विशेष लोगों — वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों, मठाधीशों, पंडे-पुजारियों की मुट्ठी में है तो आम आदमी और समाज का उससे क्या संबंध होगा? अपनी राय लिखिए।Show solution
दिया गया है: धर्म पर कुछ विशेष लोगों के एकाधिकार की स्थिति।

मेरी राय:

यदि धर्म केवल कुछ विशेष लोगों की मुट्ठी में रहे तो आम आदमी और समाज पर इसके निम्नलिखित दुष्प्रभाव होंगे—

1. अंधविश्वास का प्रसार: आम आदमी धर्म को समझे बिना केवल अंधे विश्वास से उसका पालन करेगा। इससे समाज में अंधविश्वास और पाखंड बढ़ेगा।

2. शोषण: धर्म के ठेकेदार आम आदमी का शोषण करेंगे। पंडे-पुजारी और मठाधीश अपने स्वार्थ के लिए धर्म का दुरुपयोग करेंगे।

3. सामाजिक विभाजन: धर्म पर एकाधिकार से समाज में ऊँच-नीच और जाति-भेद बढ़ेगा।

4. धर्म का संकुचन: धर्म का वास्तविक स्वरूप — सत्य, करुणा, न्याय — छिप जाएगा और केवल कर्मकांड रह जाएगा।

5. आम आदमी की दूरी: आम आदमी धर्म से कट जाएगा या उसके प्रति विद्रोही हो जाएगा।

निष्कर्ष: धर्म समाज की संपत्ति है। उसे किसी की मुट्ठी में बंद नहीं रहना चाहिए। धर्म का संबंध प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और आचरण से है।
5'जहाँ धर्म पर कुछ मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार धर्म को संकुचित अर्थ प्रदान करता है वहीं धर्म का आम आदमी से संबंध उसके विकास एवं विस्तार का द्योतक है।' तर्क सहित व्याख्या कीजिए।Show solution
दिया गया है: उपर्युक्त कथन धर्म के दो पक्षों — एकाधिकार और जन-संबंध — की बात करता है।

व्याख्या:

प्रथम भाग — एकाधिकार से धर्म का संकुचन:

जब धर्म केवल वेदशास्त्रज्ञों, मठाधीशों और पंडे-पुजारियों तक सीमित रहता है, तो—
- धर्म का अर्थ केवल कर्मकांड, यज्ञ, पूजा-पाठ तक सिमट जाता है।
- धर्म के व्यापक मानवीय मूल्य — सत्य, अहिंसा, करुणा, न्याय — उपेक्षित हो जाते हैं।
- धर्म एक 'बंद घड़ी' बन जाता है जो समय नहीं बताती।
- समाज में पाखंड और अंधविश्वास पनपते हैं।

द्वितीय भाग — आम आदमी से संबंध से धर्म का विकास:

जब धर्म आम आदमी के जीवन से जुड़ता है, तो—
- धर्म व्यावहारिक और जीवंत बनता है।
- कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने आम जनता से जुड़कर धर्म को नया अर्थ और विस्तार दिया।
- भक्ति आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है — जिसने धर्म को जाति और वर्ग की सीमाओं से मुक्त किया।
- धर्म सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा का साधन बनता है।

निष्कर्ष: धर्म का सच्चा विकास और विस्तार तभी संभव है जब वह आम आदमी के जीवन से जुड़े और उसकी मुट्ठीभर लोगों की कैद से मुक्त हो।
6(क)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है कि घड़ी के पुर्जे जानें, तुम्हें इससे क्या?'Show solution
आशय:

इस कथन में लेखक उन धर्माचार्यों और पंडे-पुजारियों पर व्यंग्य कर रहे हैं जो आम आदमी को धर्म के रहस्य से दूर रखते हैं।

विस्तृत आशय:

'घड़ी के पुर्जे' धर्म के रहस्यों और शास्त्रों का प्रतीक है। धर्माचार्य कहते हैं कि धर्म की गहराई को समझना केवल उन्हीं का काम है, आम आदमी को इसमें दखल देने की आवश्यकता नहीं।

यह कथन उस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जो—
1. धर्म को आम जनता की पहुँच से दूर रखना चाहती है।
2. अपने ज्ञान और अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए आम आदमी को अज्ञानी बनाए रखती है।
3. धर्म को एक विशेषाधिकार बना देती है।

लेखक इस मानसिकता का विरोध करते हैं। उनका मानना है कि धर्म सबका है और सबको उसे समझने का अधिकार है।
6(ख)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो पर जो घड़ीसाजी का इम्तहान पास कर आया है, उसे तो देखने दो।'Show solution
आशय:

इस कथन में लेखक एक तर्कसंगत और न्यायपूर्ण बात कह रहे हैं।

विस्तृत आशय:

'घड़ी' = धर्म, 'अनाड़ी' = अज्ञानी व्यक्ति, 'घड़ीसाजी का इम्तहान पास करना' = धर्म-शास्त्रों का अध्ययन करना।

लेखक का तर्क है—
1. यदि कोई व्यक्ति सच में अज्ञानी है और धर्म को नहीं समझता, तो उसे धर्म की व्याख्या करने से रोका जा सकता है — यह उचित है।
2. किंतु जो व्यक्ति शास्त्रों का अध्ययन कर चुका है, जिसने धर्म को समझने की योग्यता प्राप्त की है — उसे धर्म पर विचार करने और अपनी राय देने से रोकना सर्वथा अनुचित है।
3. यह कथन उन धर्माचार्यों पर व्यंग्य है जो अपने से बाहर किसी को भी — चाहे वह कितना भी विद्वान हो — धर्म पर बोलने का अधिकार नहीं देते।

निष्कर्ष: लेखक का संदेश है कि ज्ञान और योग्यता के आधार पर धर्म-चर्चा का अधिकार सबको मिलना चाहिए।
6(ग)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्जे सुधारना, तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।'Show solution
आशय:

यह कथन पाठ का सबसे महत्त्वपूर्ण और व्यंग्यपूर्ण कथन है।

प्रतीकार्थ:
- 'परदादा की घड़ी' = पूर्वजों से मिला धर्म और उसकी परंपराएँ।
- 'बंद हो गई है' = धर्म की मान्यताएँ पुरानी और अप्रासंगिक हो गई हैं।
- 'चाबी देना न आना' = धर्म को नए युग के अनुसार व्याख्यायित करने में असमर्थता।
- 'पुर्जे सुधारना न आना' = धर्म में आवश्यक सुधार करने की इच्छाशक्ति और क्षमता का अभाव।
- 'दूसरों को हाथ न लगाने देना' = सुधारकों और विद्वानों को धर्म पर विचार करने से रोकना।

विस्तृत आशय:

लेखक का व्यंग्य यह है कि धर्म के ठेकेदार पुरानी परंपराओं को जस का तस लेकर चल रहे हैं। वे न तो उन्हें नए युग के अनुसार बदल सकते हैं और न ही किसी सुधारक को बदलने देते हैं। यह स्थिति उस व्यक्ति जैसी है जो बंद पड़ी घड़ी को जेब में रखे घूमता है — न खुद ठीक करता है, न किसी घड़ीसाज को देता है।

निष्कर्ष: यह कथन धार्मिक रूढ़िवाद और सुधार-विरोध पर तीखा व्यंग्य है।

प्रश्न-अभ्यास — (ग) ढेले चुन लो

1वैदिककाल में हिंदुओं में कैसी लाटरी चलती थी जिसका जिक्र लेखक ने किया है?Show solution
दिया गया है: पाठ में वैदिककालीन विवाह-परंपरा का वर्णन है।

उत्तर:
वैदिककाल में हिंदुओं में 'मिट्टी के ढेलों की लाटरी' चलती थी। इसका विवरण इस प्रकार है—

प्रक्रिया:
1. विवाह के इच्छुक नर (वर) बेटी के पिता के घर पहुँचता था।
2. वह पहले एक गाय भेंट करता था।
3. फिर वह कन्या के सामने कई मिट्टी के ढेले रख देता था।
4. कन्या को उनमें से एक ढेला उठाना होता था।

ढेलों के प्रकार और उनका अर्थ:
- वेदि की मट्टी — संतान 'वैदिक पंडित' होगी।
- गौशाला की मट्टी — संतान 'पशुओं का धनी' होगी।
- खेत की मट्टी — संतान 'जमींदार' होगी।
- चौराहे की मट्टी — व्यापारी होगी।
- मसान की धूल — अत्यंत अशुभ मानी जाती थी।

विशेषता: नर जानता था कि कौन-सा ढेला कहाँ की मिट्टी का है, किंतु कन्या नहीं जानती थी। इसीलिए इसे 'लाटरी' कहा गया।

इस परंपरा का उल्लेख आश्वलायन, गौभिल, भारद्वाज आदि गृह्यसूत्रों में मिलता है।
2'दुर्लभ बंधु' की पेटियों की कथा लिखिए।Show solution
दिया गया है: लेखक ने शेक्सपियर के नाटक 'मर्चेंट ऑफ बेनिस' की कथा का संदर्भ दिया है।

उत्तर:
शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक 'मर्चेंट ऑफ बेनिस' में 'दुर्लभ बंधु' (पोर्शिया) की पेटियों की कथा इस प्रकार है—

1. पोर्शिया एक सुंदर और धनी युवती थी जिसके विवाह के लिए उसके पिता ने एक अनोखी शर्त रखी थी।

2. पोर्शिया के विवाह के इच्छुक प्रत्येक राजकुमार को तीन पेटियों में से एक चुननी होती थी—
- सोने की पेटी — जिस पर लिखा था 'जो मुझे चुनेगा वह बहुतों की इच्छा पाएगा।'
- चाँदी की पेटी — जिस पर लिखा था 'जो मुझे चुनेगा वह उतना पाएगा जितने का वह हकदार है।'
- सीसे की पेटी — जिस पर लिखा था 'जो मुझे चुनेगा उसे सब कुछ दाँव पर लगाना होगा।'

3. पोर्शिया की प्रतिमूर्ति (चित्र) सीसे की पेटी में थी। जो राजकुमार सही पेटी चुनता, वही पोर्शिया से विवाह कर सकता था।

4. लेखक ने इस कथा का उल्लेख वैदिककालीन 'मिट्टी के ढेलों की लाटरी' से तुलना करने के लिए किया है — दोनों में ही जीवनसाथी का चुनाव एक प्रकार की 'लाटरी' पर निर्भर था।
3'जीवन साथी' का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ने के कौन-कौन से फल प्राप्त होते हैं?Show solution
दिया गया है: वैदिककालीन मिट्टी के ढेलों की परंपरा के संदर्भ में यह प्रश्न है।

उत्तर:
मिट्टी के ढेलों के अनुसार जीवनसाथी चुनने के निम्नलिखित फल बताए गए हैं—

शुभ फल:
1. वेदि की मट्टी — यदि कन्या वेदि का ढेला उठाए तो उसकी संतान 'वैदिक पंडित' होगी — अर्थात् विद्वान और धार्मिक।

2. गौशाला की मट्टी — यदि गोबर वाला ढेला उठाए तो संतान 'पशुओं का धनी' होगी — अर्थात् समृद्ध पशुपालक।

3. खेत की मट्टी — यदि खेत की मिट्टी उठाए तो संतान 'जमींदार' होगी — अर्थात् भूमि का स्वामी।

4. चौराहे की मट्टी — संतान व्यापारी होगी।

अशुभ फल:
5. मसान की धूल — यह अत्यंत अशुभ मानी जाती थी। यदि कन्या मसान की मिट्टी उठाए तो उस नर के साथ विवाह होने पर घर 'मसान' हो जाएगा — अर्थात् जीवनभर दुख और मृत्यु का साया रहेगा।

विशेष: यदि एक नर के सामने मसान की मिट्टी उठ जाए तो इसका अर्थ यह नहीं कि उस कन्या का विवाह कभी नहीं होगा। किसी दूसरे नर के सामने वह वेदि का ढेला उठा सकती है।
4मिट्टी के ढेलों के संदर्भ में कबीर की साखी की व्याख्या कीजिए — पत्थर पूजे हरि मिलें तो तू पूज पहार। इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।Show solution
दिया गया है: कबीर की यह साखी पाठ के अंत में उद्धृत है।

साखी का शाब्दिक अर्थ:
- यदि पत्थर पूजने से ईश्वर मिलते हैं, तो पहाड़ पूज लो — वह तो बहुत बड़ा पत्थर है।
- इससे तो चक्की (पत्थर की) अच्छी है जो पीसकर संसार का पेट भरती है।

मिट्टी के ढेलों के संदर्भ में व्याख्या:

कबीर की यह साखी पाठ के संदर्भ में अत्यंत सार्थक है। लेखक ने इसे वैदिककालीन मिट्टी के ढेलों की परंपरा और ज्योतिष-विश्वास पर व्यंग्य के रूप में प्रयोग किया है—

1. अंधविश्वास पर व्यंग्य: जो लोग मिट्टी के ढेलों पर जीवनसाथी का चुनाव छोड़ते हैं या मंगल-शनि जैसे ग्रहों की 'कल्पित चाल' पर विश्वास करते हैं — वे पत्थर पूजने जैसा ही काम कर रहे हैं।

2. व्यावहारिकता का संदेश: कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर में ही शक्ति है तो चक्की का पत्थर अधिक उपयोगी है — वह कम से कम अनाज पीसकर लोगों का पेट भरता है। इसी प्रकार, यदि मिट्टी पर ही भरोसा करना है तो अपनी आँखों से देखी, हाथ से चुनी मिट्टी पर भरोसा करो — लाखों कोस दूर के ग्रहों पर नहीं।

3. तर्कशीलता का आग्रह: कबीर और लेखक दोनों का संदेश एक ही है — अंधविश्वास छोड़ो, तर्क और व्यावहारिक बुद्धि से काम लो।

निष्कर्ष: यह साखी अंधविश्वास और पाखंड पर करारा व्यंग्य है और व्यावहारिक बुद्धि अपनाने का आग्रह करती है।
5जन्मभर के साथी का चुनाव मिट्टी के ढेले पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिए बेटी का शिक्षित होना अनिवार्य है। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के संदर्भ में विचार कीजिए।Show solution
दिया गया है: वैदिककालीन मिट्टी के ढेलों की परंपरा और आधुनिक 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान का संदर्भ।

विचार:

मिट्टी के ढेलों की परंपरा की सीमाएँ:
1. जीवनसाथी का चुनाव संयोग पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है।
2. इस परंपरा में कन्या की अपनी पसंद, इच्छा और विवेक का कोई स्थान नहीं था।
3. कन्या को केवल एक निष्क्रिय भागीदार बनाया गया था।

'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के संदर्भ में:

1. शिक्षा से विवेक: शिक्षित बेटी अपने जीवनसाथी का चुनाव स्वयं विवेकपूर्ण ढंग से कर सकती है। वह न मिट्टी के ढेलों पर निर्भर रहेगी, न ज्योतिष पर।

2. आत्मनिर्भरता: शिक्षित बेटी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होगी और किसी भी अनुचित परंपरा को मानने के लिए बाध्य नहीं होगी।

3. अंधविश्वास से मुक्ति: शिक्षा से वैज्ञानिक सोच विकसित होती है जो अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाती है।

4. सामाजिक परिवर्तन: शिक्षित बेटी न केवल अपने जीवन को बेहतर बनाती है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन लाती है।

5. स्वतंत्र निर्णय: शिक्षित बेटी अपने विवाह, करियर और जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय स्वयं ले सकती है।

निष्कर्ष: 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान का मूल उद्देश्य यही है कि बेटियाँ शिक्षित होकर अपने जीवन के निर्णय स्वयं लें — न कि मिट्टी के ढेलों या ग्रह-नक्षत्रों पर छोड़ें।
6(क)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मिट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है और लाखों करोड़ों कोस दूर बैठे बड़े-बड़े मट्टी और आग के ढेलों — मंगल, शनिश्चर और बृहस्पति की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा करना क्यों अच्छा है।'Show solution
आशय:

यह कथन लेखक गुलेरी जी का है जिसमें वे ज्योतिष-विश्वास पर तीखा व्यंग्य कर रहे हैं।

विस्तृत आशय:

प्रथम भाग: 'अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मिट्टी के डगलों पर भरोसा करना' — अर्थात् वैदिककालीन मिट्टी के ढेलों की परंपरा। इसमें कम से कम यह गुण था कि—
- मिट्टी वास्तविक थी, काल्पनिक नहीं।
- उसे आँखों से देखा और हाथों से छुआ जा सकता था।
- वह स्थानीय और परिचित थी।

द्वितीय भाग: 'लाखों-करोड़ों कोस दूर बैठे मंगल, शनि, बृहस्पति की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब' — अर्थात् ज्योतिष। इसमें—
- ग्रह लाखों कोस दूर हैं — उनका हमारे जीवन पर प्रभाव कल्पित है।
- उनकी 'चाल' का 'हिसाब' भी कल्पित है।
- फिर भी लोग इस पर अंधा विश्वास करते हैं।

व्यंग्य का केंद्र: लेखक व्यंग्यपूर्वक कह रहे हैं कि जो लोग पास की, देखी-भाली मिट्टी पर भरोसा नहीं करते, वे लाखों कोस दूर के ग्रहों की काल्पनिक चाल पर भरोसा करते हैं — यह कितनी बड़ी विडंबना है!

निष्कर्ष: यह कथन ज्योतिष और अंधविश्वास पर तर्कपूर्ण व्यंग्य है।
6(ख)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल की मोहर से। आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस के तेज पिंड से।'Show solution
आशय:

यह कथन वात्स्यायन के एक सूत्र पर आधारित है जिसे लेखक ने अपने तर्क को पुष्ट करने के लिए प्रयोग किया है।

शाब्दिक अर्थ:
- आज का कबूतर (जो हाथ में है) कल के मोर (जो मिलने की उम्मीद है) से बेहतर है।
- आज का पैसा (जो जेब में है) कल की मोहर (जो मिलने की आशा है) से बेहतर है।
- इसी प्रकार, आँखों से देखा हुआ मिट्टी का ढेला लाखों कोस दूर के चमकते ग्रह (मंगल, शनि, बृहस्पति) से बेहतर होना चाहिए।

विस्तृत आशय:

1. वास्तविकता बनाम कल्पना: जो वस्तु सामने है, जिसे देखा-छुआ जा सकता है — वह उस वस्तु से बेहतर है जो केवल कल्पना में है।

2. ज्योतिष पर व्यंग्य: मंगल, शनि, बृहस्पति — ये 'तेज पिंड' (चमकते ग्रह) लाखों कोस दूर हैं। इनकी 'चाल' का हमारे जीवन पर प्रभाव केवल कल्पना है। जबकि मिट्टी का ढेला वास्तविक और सामने है।

3. व्यावहारिक बुद्धि का आग्रह: लेखक कहते हैं कि व्यावहारिक और तर्कसंगत बुद्धि से काम लो। जो सामने है, जो वास्तविक है — उस पर भरोसा करो।

निष्कर्ष: यह कथन अंधविश्वास और काल्पनिक आस्था के स्थान पर व्यावहारिक और तर्कसंगत दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह करता है।

योग्यता-विस्तार — (क) बालक बच गया

1बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों के विकास में 'रटना' बाधक है — कक्षा में संवाद कीजिए।Show solution
संवाद (कक्षा में):

रमेश: मुझे लगता है कि रटना बालक के विकास में बाधक है। जब हम रटते हैं तो केवल शब्द याद रहते हैं, अर्थ नहीं।

सुनीता: हाँ, मैं सहमत हूँ। जब मैंने गणित के सूत्र रटे थे, तो परीक्षा में तो लिख दिए, लेकिन उन्हें प्रयोग करना नहीं आया।

अध्यापक: बिल्कुल सही। रटना 'मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट' है। इससे ज्ञान नहीं, केवल शब्दों का भंडार बनता है।

अनिल: लेकिन कुछ चीजें तो रटनी ही पड़ती हैं — जैसे पहाड़े, वर्णमाला।

अध्यापक: हाँ, कुछ आधारभूत बातें याद करनी होती हैं। लेकिन समझ के साथ याद करना और बिना समझे रटना — इन दोनों में बड़ा अंतर है। बालक की जिज्ञासा, रचनात्मकता और स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ तभी विकसित होती हैं जब वह समझकर सीखे।

निष्कर्ष: रटना बालक की मौलिक सोच और स्वाभाविक प्रवृत्तियों का गला घोंटता है। शिक्षा का उद्देश्य समझ विकसित करना होना चाहिए।
2ज्ञान के क्षेत्र में 'रटने' का निषेध है किंतु क्या आप रटने में विश्वास करते हैं। अपने विचार प्रकट कीजिए।Show solution
मेरे विचार:

मैं रटने में पूर्णतः विश्वास नहीं करता, किंतु इसे पूरी तरह निरर्थक भी नहीं मानता।

रटने के विरुद्ध तर्क:
1. रटने से केवल स्मृति का विकास होता है, बुद्धि का नहीं।
2. रटी हुई बातें जल्दी भूल जाती हैं।
3. रटने से बालक की मौलिकता और रचनात्मकता नष्ट होती है।
4. रटा हुआ ज्ञान व्यावहारिक जीवन में काम नहीं आता।
5. गुलेरी जी के शब्दों में — यह 'मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट' है।

रटने के पक्ष में सीमित तर्क:
1. कुछ आधारभूत तथ्य — जैसे पहाड़े, सूत्र, तिथियाँ — याद करने पड़ते हैं।
2. भाषा सीखने में कुछ शब्द और व्याकरण के नियम याद करने होते हैं।

निष्कर्ष:
रटना एक सीमित और अस्थायी उपाय है। सच्चा ज्ञान समझ से आता है। शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए कि बालक समझे, प्रश्न करे, खोजे और अपनी मौलिक सोच विकसित करे। रटना इस लक्ष्य में बाधक है।

योग्यता-विस्तार — (ख) घड़ी के पुर्जे

1धर्म संबंधी अपनी मान्यता पर लेख/निबंध लिखिए।Show solution
धर्म — मेरी दृष्टि में

धर्म शब्द संस्कृत की 'धृ' धातु से बना है जिसका अर्थ है — धारण करना। अर्थात् जो समाज और व्यक्ति को धारण करे, उसे एकजुट रखे — वही धर्म है।

धर्म का वास्तविक स्वरूप:
मेरी मान्यता है कि धर्म केवल पूजा-पाठ, कर्मकांड और मंदिर-मस्जिद तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप है — सत्य बोलना, अहिंसा का पालन करना, दूसरों के प्रति करुणा रखना, न्याय करना और ईमानदारी से जीवन जीना।

धर्म और समाज:
धर्म समाज की नींव है। जब धर्म का अर्थ नैतिकता और मानवता से जुड़ता है, तो वह समाज को जोड़ता है। किंतु जब धर्म को कुछ लोग अपनी मुट्ठी में बंद कर लेते हैं और उसे स्वार्थ का साधन बनाते हैं, तो वह समाज को तोड़ता है।

धर्म और विज्ञान:
धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं हैं। सच्चा धर्म तर्क और विवेक का विरोधी नहीं होता। जो धर्म अंधविश्वास और पाखंड को बढ़ावा देता है, वह वास्तव में धर्म नहीं है।

निष्कर्ष:
मेरी मान्यता है कि धर्म का सार है — 'परोपकार'। जो दूसरों के लिए जीए, जो सत्य और न्याय का पालन करे — वही सच्चा धार्मिक है।
2'धर्म का रहस्य जानना सिर्फ धर्माचार्यों का काम नहीं, कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर उस रहस्य को जानने की कोशिश कर सकता है, अपनी राय दे सकता है' — टिप्पणी कीजिए।Show solution
टिप्पणी:

यह कथन पूर्णतः सत्य और न्यायसंगत है। इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं—

1. ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं: ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और न ही उस पर किसी वर्ग विशेष का एकाधिकार होता है। धर्म का ज्ञान भी इसका अपवाद नहीं है।

2. ऐतिहासिक प्रमाण: कबीर, रैदास, मीरा — ये सभी सामान्य परिवारों से थे, किंतु इन्होंने धर्म के सच्चे स्वरूप को समझा और समाज को दिखाया। इनके पास कोई विशेष शास्त्र-ज्ञान नहीं था।

3. व्यक्तिगत अनुभव: प्रत्येक व्यक्ति का धर्म के साथ व्यक्तिगत संबंध होता है। वह अपने अनुभव और विवेक से धर्म को समझ सकता है।

4. लोकतांत्रिक दृष्टिकोण: आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में प्रत्येक व्यक्ति को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। धर्म पर भी अपनी राय देने का अधिकार सबको है।

5. धर्म का विकास: जब आम आदमी धर्म पर विचार करता है तो धर्म जीवंत और प्रासंगिक बना रहता है।

निष्कर्ष: धर्म का रहस्य जानने का प्रयास प्रत्येक जिज्ञासु व्यक्ति का अधिकार है। इसे किसी वर्ग विशेष तक सीमित रखना धर्म के साथ अन्याय है।

योग्यता-विस्तार — (ग) ढेले चुन लो

1समाज में धर्म संबंधी अंधविश्वास पूरी तरह व्याप्त है। वैज्ञानिक प्रगति के संदर्भ में धर्म, विश्वास और आस्था पर निबंध लिखिए।Show solution
धर्म, विश्वास और आस्था — वैज्ञानिक युग में

प्रस्तावना:
आज का युग विज्ञान और तकनीक का युग है। मनुष्य चाँद पर पहुँच चुका है, जीन की संरचना जान चुका है। फिर भी समाज में धर्म संबंधी अंधविश्वास पूरी तरह व्याप्त है। यह एक विचारणीय विरोधाभास है।

धर्म और अंधविश्वास में अंतर:
धर्म और अंधविश्वास दो अलग-अलग चीजें हैं। धर्म का आधार नैतिकता, करुणा और सत्य है। अंधविश्वास का आधार भय, अज्ञान और स्वार्थ है। जब धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाया जाता है, तो वह धर्म का दुरुपयोग है।

वैज्ञानिक प्रगति और धर्म:
वैज्ञानिक प्रगति ने अनेक अंधविश्वासों को तोड़ा है। ग्रहण को राहु-केतु का काम नहीं, बल्कि खगोलीय घटना सिद्ध किया। बीमारियों का कारण भूत-प्रेत नहीं, बल्कि जीवाणु-विषाणु सिद्ध किया। फिर भी लोग ज्योतिष, टोना-टोटका और अंधविश्वासों पर भरोसा करते हैं।

आस्था का महत्त्व:
आस्था और विश्वास मनुष्य को मानसिक शक्ति देते हैं। किंतु आस्था तर्कसंगत होनी चाहिए। जो आस्था शोषण का साधन बने, वह त्याज्य है।

निष्कर्ष:
वैज्ञानिक प्रगति और धर्म विरोधी नहीं हैं। सच्चा धर्म विज्ञान का विरोधी नहीं होता। हमें अंधविश्वास छोड़कर तर्कसंगत आस्था अपनानी चाहिए।
2अपने घर में या आस-पास दिखाई देने वाले किसी रिवाज या अंधविश्वास पर एक लेख लिखिए।Show solution
काली बिल्ली और अंधविश्वास

हमारे समाज में एक प्रचलित अंधविश्वास है — यदि रास्ता चलते काली बिल्ली सामने से निकल जाए तो काम बिगड़ जाता है। इसलिए लोग रुक जाते हैं, किसी दूसरे के पहले जाने का इंतजार करते हैं या रास्ता बदल लेते हैं।

इस अंधविश्वास की जड़:
यह विश्वास कहाँ से आया, इसका कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। संभवतः प्राचीन काल में रात के अंधेरे में काली बिल्ली दिखाई नहीं देती थी और अचानक सामने आने से भय लगता था। धीरे-धीरे यह भय अंधविश्वास बन गया।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
बिल्ली का रंग और हमारे काम का कोई संबंध नहीं है। बिल्ली एक निरीह प्राणी है। उसके सामने से निकलने से न काम बनता है, न बिगड़ता है। हमारे काम का परिणाम हमारी मेहनत, योग्यता और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

दुष्प्रभाव:
ऐसे अंधविश्वास समय और ऊर्जा की बर्बादी करते हैं। इनसे मानसिक कमजोरी बढ़ती है और व्यक्ति अपनी असफलता का कारण बाहरी शक्तियों में ढूँढने लगता है।

निष्कर्ष:
हमें ऐसे अंधविश्वासों से मुक्त होना चाहिए। शिक्षा और वैज्ञानिक सोच ही इनसे मुक्ति का मार्ग है।

Stuck on a step?

Ask Super Tutor AI to explain any solution on this page in a simpler way — free, 24x7.

Ask a Doubt Free

Frequently Asked Questions

What are the important topics in सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) for Chhattisgarh Board Class 12 Hindi?
सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) covers several key topics that are frequently asked in Chhattisgarh Board Class 12 board exams. Focus on the core concepts listed on this page and practise related questions to build confidence.
How to score full marks in सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) — Chhattisgarh Board Class 12 Hindi?
Understand the core concepts first, then work through the 44 practice questions available for this chapter. Revise formulas and definitions regularly, and use flashcards for quick recall before the exam.
Where can I get free NCERT Solutions for सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) Class 12 Hindi?
This page has free step-by-step NCERT Solutions for every exercise question in सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) (Chhattisgarh Board Class 12 Hindi) — written the way examiners award marks: given, formula, working, answer.

Sources & Official References

Content is aligned to the official syllabus. Refer to the board website for the latest curriculum.

For serious students

Get the full सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) chapter — for free.

Quizzes, flashcards, AI doubt-solver and a step-by-step study plan for Chhattisgarh Board Class 12 Hindi.