बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी)
Chhattisgarh Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी) — Chhattisgarh Board Class 12 Hindi.
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Get startedप्रश्न-अभ्यास — बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी)
1अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।Show solution
अगहन मास की विशेषता:
अगहन (मार्गशीर्ष) का महीना शीत ऋतु का आरंभ होता है। इस मास में ठंड बढ़ने लगती है, रातें लंबी और दिन छोटे हो जाते हैं। प्रकृति में एक प्रकार की सुस्ती और शीतलता छा जाती है। खेतों में फसल पकने लगती है और वातावरण में हल्की-हल्की ठंडक घर करने लगती है।
विरहिणी नागमती की व्यथा:
अगहन मास में जब सामान्य स्त्रियाँ अपने पतियों के साथ शीत का आनंद लेती हैं, तब नागमती का प्रिय (रत्नसेन) उससे दूर है। ठंड की रातें उसके लिए और भी असह्य हो जाती हैं। शीतल हवाएँ उसके विरह की आग को और भड़काती हैं। जहाँ दूसरी स्त्रियाँ अपने पतियों की गर्म बाँहों में सिमटती हैं, वहाँ नागमती अकेली ठिठुरती रहती है। उसका हृदय विरह की पीड़ा से व्याकुल है। ठंड का प्रत्येक झोंका उसे प्रिय की याद दिलाता है और उसकी वेदना को और गहरा कर देता है। इस प्रकार अगहन मास की शीतलता विरहिणी के लिए काल के समान बन जाती है।
2'जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा' पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।Show solution
व्याख्या एवं विरह-दशा का वर्णन:
इस पंक्ति में नागमती कहती है कि विरह की अग्नि ऐसी निर्मम है जो जीते-जी उसे खाए जा रही है और मरने पर भी उसका पीछा नहीं छोड़ती। अर्थात् विरह की पीड़ा इतनी गहरी और असह्य है कि न जीने में चैन है, न मरने में मुक्ति।
नायिका की दशा अत्यंत दयनीय है — उसका शरीर विरह की आग में जल-जलकर क्षीण हो गया है। रक्त सूख गया है, माँस गल गया है और हड्डियाँ शंख के समान सफेद हो गई हैं। वह सारस पक्षी की भाँति अपने प्रिय को पुकार-पुकारकर तड़प रही है। विरह उसे जीवित रहते हुए भी नष्ट कर रहा है। यह पंक्ति विरह की उस चरम अवस्था को व्यक्त करती है जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों ही पीड़ादायक हो जाते हैं। नायिका के लिए विरह एक ऐसा शत्रु है जो न जीने देता है, न मरने देता है — यही उसकी सबसे बड़ी त्रासदी है।
3माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है?Show solution
माघ महीने में विरहिणी की अनुभूति:
माघ का महीना शीत ऋतु का सबसे कठोर महीना होता है। इस मास में विरहिणी नागमती को निम्नलिखित अनुभूतियाँ होती हैं —
1. पाले की मार: माघ में पाला पड़ने लगता है। विरहिणी के लिए यह पाला विरह-काल (मृत्यु के समान) बन जाता है।
2. कँपकँपी और भय: तन पर रुई के वस्त्र ओढ़ने पर भी हृदय थर-थर काँपता रहता है। ठंड इतनी असह्य है कि कोई उपाय काम नहीं आता।
3. सूर्य (पति) की कामना: वह कहती है कि यदि उसका प्रिय (सूर्य के समान) आ जाए तो उसके शरीर की ठंड दूर हो सकती है। पति के बिना माघ की ठंड से मुक्ति संभव नहीं।
4. नेत्रों से अश्रुपात: उसके नेत्रों से आँसू इस प्रकार बहते हैं जैसे माघ मास में माहुट (माघ की वर्षा) का जल बहता है। वे आँसू शरीर पर लगकर तीर की तरह चुभते हैं।
5. ओलों की मार: विरह की पीड़ा ओलों की बूँदों की तरह टूट-टूटकर गिरती है और विरह की पवन झकझोर देती है।
इस प्रकार माघ मास में विरहिणी की पीड़ा चरम पर होती है — बाहर की ठंड और भीतर की विरह-अग्नि दोनों मिलकर उसे असह्य यातना देते हैं।
4वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें किस माह में गिरते हैं? इससे विरहिणी का क्या संबंध है?Show solution
माह का नाम:
वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें (झाड़ियाँ/पत्तियाँ) फागुन (फाल्गुन) मास में गिरती हैं। फागुन में बसंत ऋतु के आगमन से पहले पुराने पत्ते झड़ जाते हैं, वृक्ष पत्रहीन हो जाते हैं और वन की शाखाएँ फूल-फल से रहित हो जाती हैं।
विरहिणी से संबंध:
कवि ने प्रकृति के इस दृश्य को विरहिणी की दशा से जोड़ा है —
1. जिस प्रकार वृक्ष पत्तों के झड़ने से सूना और निर्जीव हो जाता है, उसी प्रकार विरहिणी नागमती का तन-मन प्रिय के वियोग में सूना और निस्तेज हो गया है।
2. उसका शरीर पीले पत्ते की भाँति हो गया है — पीला, कमज़ोर और मुरझाया हुआ।
3. जब सारी वनस्पति नए उल्लास से भर उठती है और लोग फाग खेलते हैं, होली मनाते हैं, तब विरहिणी के लिए यह उत्सव होली की आग की तरह जलाने वाला बन जाता है।
4. प्रकृति का यह पतझड़ विरहिणी के जीवन के पतझड़ का प्रतीक है — जैसे शाखाएँ फूल-फल से रहित हो गई हैं, वैसे ही उसका जीवन प्रेम और सुख से रहित हो गया है।
इस प्रकार प्रकृति का पतझड़ और विरहिणी का वियोग एक-दूसरे के पूरक बनकर काव्य में गहरी संवेदना उत्पन्न करते हैं।
5(क)निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए —
(क) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग।Show solution
व्याख्या:
नागमती भँवरे और कौए से कहती है — हे भँवरे! हे कौए! तुम मेरे प्रिय (रत्नसेन) के पास जाकर यह संदेश कहना कि उसकी प्रिया (नागमती) विरह की अग्नि में जल-जलकर मर गई है और उसके जलने का धुआँ (अर्थात् उसकी विरह-वेदना की गंध/स्मृति) अब भी वातावरण में व्याप्त है।
काव्य-सौंदर्य:
- 'धुआँ हम लाग' अत्यंत मार्मिक बिम्ब है — जैसे जलती हुई वस्तु का धुआँ दूर-दूर तक फैलता है, वैसे ही विरहिणी की पीड़ा की गंध उसके प्रिय तक पहुँचे।
- भँवरा और काग (कौआ) — दोनों पारंपरिक संदेशवाहक हैं। भँवरा प्रेम का प्रतीक है और कौआ शकुन का।
- 'जरि मुई' में विरह की चरम अवस्था का चित्रण है।
- यह पंक्ति विरहिणी की असहाय दशा और प्रिय के प्रति गहरे प्रेम को एक साथ व्यक्त करती है।
5(ख)निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए —
(ख) रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।।Show solution
व्याख्या:
नागमती कहती है — विरह की अग्नि में जलते-जलते उसका रक्त सूख गया है, माँस गल गया है और हड्डियाँ शंख की भाँति सफेद हो गई हैं। वह सारस पक्षी की तरह अपने प्रिय को रट-रटकर (पुकार-पुकारकर) मर गई है। अब वह अपने प्रिय से कहती है — आओ और मेरे पंखों को (अर्थात् मेरे अवशेषों को) समेट लो।
काव्य-सौंदर्य:
- 'रकत ढरा, माँसू गरा, हाड़ भए संख' — यह क्रमिक शारीरिक क्षय का अत्यंत यथार्थ और मार्मिक चित्रण है।
- सारस का प्रतीक अत्यंत सार्थक है — सारस अपने जोड़े के बिछड़ने पर रट-रटकर प्राण त्याग देता है। यह विरहिणी की एकनिष्ठ प्रेम-भावना का प्रतीक है।
- 'हाड़ भए सब संख' में उपमा अलंकार है।
- 'ररि मुई' में विरह की पराकाष्ठा है।
- यह पंक्ति शारीरिक वर्णन के माध्यम से आत्मिक पीड़ा को व्यक्त करती है — यही जायसी की काव्य-कला की विशेषता है।
5(ग)निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए —
(ग) तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल।
तेहि पर बिरह जराई कै, चहै उड़ावा झोल।।Show solution
व्याख्या:
नागमती कहती है — हे प्रिय! तुम्हारे बिना मैं (धनि = पत्नी) इतनी दुर्बल और हल्की हो गई हूँ कि मेरा शरीर तिनके की तरह डोलने लगा है (अर्थात् अत्यंत क्षीण हो गया है)। और उस पर भी विरह की अग्नि ने जला-जलाकर मुझे इतना हल्का कर दिया है कि अब वह (विरह) मुझे राख की तरह उड़ा देना चाहता है।
काव्य-सौंदर्य:
- 'तन तिनुवर भा डोल' — तन का तिनके से तुलना अत्यंत सटीक उपमा है जो विरहिणी की शारीरिक क्षीणता को व्यक्त करती है।
- 'बिरह जराई कै' — विरह को अग्नि के रूप में चित्रित किया गया है जो शरीर को जलाकर राख कर देती है।
- 'झोल उड़ावा' — राख को हवा में उड़ाने का बिम्ब अत्यंत मार्मिक है — जैसे जली हुई राख हवा में उड़ जाती है, वैसे ही विरहिणी का अस्तित्व समाप्त होने को है।
- इस पंक्ति में विरह की चरम अवस्था — शारीरिक क्षय और अस्तित्व के विलोप — का सजीव चित्रण है।
5(घ)निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए —
(घ) यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ।
मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहाँ पाउ।।Show solution
व्याख्या:
नागमती कहती है — मैं अपने इस शरीर को जलाकर राख कर दूँगी और उस राख को पवन (हवा) से उड़वा दूँगी। मेरी यह इच्छा है कि शायद (कदाचित) वह राख उसी मार्ग पर जा पड़े जहाँ मेरे प्रिय (कंत) के पाँव पड़ते हों — अर्थात् जिस रास्ते से वे चलते हों, उसी पर मेरी राख बिछ जाए।
काव्य-सौंदर्य:
- यह पंक्ति प्रेम की पराकाष्ठा और आत्म-समर्पण की भावना को व्यक्त करती है। विरहिणी मृत्यु के बाद भी अपने प्रिय के चरणों की धूल बनना चाहती है।
- 'मकु' (कदाचित/शायद) शब्द में एक करुण आशा है — निश्चितता नहीं, केवल एक क्षीण आशा।
- यह भाव सूफी प्रेम-दर्शन का प्रतीक है जहाँ प्रेमी अपने प्रिय में पूर्णतः विलीन हो जाना चाहता है।
- 'कंत धरैं जहाँ पाउ' — प्रिय के चरणों की धूल बनने की कामना भक्ति और प्रेम दोनों की उच्चतम अभिव्यक्ति है।
- इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार ('छार कै... कहौं कि') और बिम्ब-योजना अत्यंत प्रभावशाली है।
6प्रथम दो छंदों में से अलंकार छाँटकर लिखिए और उनसे उत्पन्न काव्य-सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए।Show solution
प्रथम छंद (कार्तिक मास) से अलंकार:
1. उपमा अलंकार:
- 'हाड़ भए सब संख' — हड्डियों की तुलना शंख से की गई है।
- 'धनि सारस होइ ररि मुई' — विरहिणी की तुलना सारस पक्षी से।
- काव्य-सौंदर्य: इन उपमाओं से विरहिणी की शारीरिक क्षीणता और मानसिक पीड़ा का सजीव चित्र उभरता है। सारस की उपमा विशेष रूप से मार्मिक है क्योंकि सारस एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक है।
2. रूपक अलंकार:
- 'बिरह अगिनि' — विरह को अग्नि का रूप दिया गया है।
- काव्य-सौंदर्य: विरह और अग्नि का तादात्म्य विरह की दाहकता को और प्रभावशाली बनाता है।
3. अनुप्रास अलंकार:
- 'रकत ढरा माँसू गरा' — 'र' और 'ग' वर्णों की आवृत्ति।
- 'ररि मुई' — 'र' की आवृत्ति।
- काव्य-सौंदर्य: अनुप्रास से पंक्तियों में संगीतात्मकता और प्रवाह आता है।
द्वितीय छंद (अगहन मास) से अलंकार:
1. उपमा अलंकार:
- 'तन जस पियर पात' — शरीर की तुलना पीले पत्ते से।
- काव्य-सौंदर्य: पीले पत्ते की उपमा विरहिणी की पीलाहट, कमज़ोरी और मुरझाहट को एक साथ व्यक्त करती है।
2. अनुप्रास अलंकार:
- 'पहल पहल' — 'प' वर्ण की आवृत्ति।
- 'हहलि हहलि' — 'ह' वर्ण की आवृत्ति।
- काव्य-सौंदर्य: इन शब्दों की पुनरावृत्ति से ठंड की कँपकँपी का ध्वन्यात्मक प्रभाव उत्पन्न होता है।
3. पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार:
- 'पहल पहल', 'हहलि हहलि' — एक ही शब्द की पुनरावृत्ति।
- काव्य-सौंदर्य: पुनरावृत्ति से ठंड की निरंतरता और विरहिणी की बार-बार होने वाली कँपकँपी का भाव व्यक्त होता है।
4. प्रतीक:
- 'सूर' (सूर्य) — पति का प्रतीक। सूर्य के बिना ठंड न जाने का भाव पति के बिना जीवन की निरर्थकता का प्रतीक है।
- काव्य-सौंदर्य: प्रकृति और मानव-जीवन का यह समन्वय जायसी की काव्य-कला की विशेषता है।
सामान्य टिप्पणी: जायसी ने इन छंदों में प्रकृति के उपादानों को विरहिणी की मनोदशा से जोड़कर एक अद्भुत काव्य-सौंदर्य की सृष्टि की है। अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक और भावानुकूल है जो पाठक के हृदय में करुणा और सहानुभूति जगाता है।
योग्यता-विस्तार
1किसी अन्य कवि द्वारा रचित विरह वर्णन की दो कविताएँ चुनकर लिखिए और अपने अध्यापक को दिखाइए।Show solution
सुझाव:
1. मीराबाई — 'पायो जी मैंने राम रतन धन पायो' अथवा 'बिरह की जलन' से संबंधित पद जिनमें कृष्ण-विरह का मार्मिक चित्रण है।
2. सूरदास — 'भ्रमरगीत' के पद जिनमें गोपियों की विरह-दशा का वर्णन है, जैसे — 'ऊधो मन न भए दस बीस।'
छात्र इन कविताओं को लिखकर अपने अध्यापक को दिखाएँ।
2'नागमती वियोग खंड' पूरा पढ़िए और जायसी के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।Show solution
जायसी के बारे में संक्षिप्त जानकारी:
मलिक मुहम्मद जायसी हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सूफी काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के जायस नगर में हुआ था, इसीलिए वे 'जायसी' कहलाए। उनकी प्रमुख रचना 'पद्मावत' (1540 ई.) है जो अवधी भाषा में लिखी गई एक महाकाव्यात्मक प्रेमाख्यान है। इसमें चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेम-कथा के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के मिलन का सूफी दर्शन प्रस्तुत किया गया है। 'नागमती वियोग खंड' इसी महाकाव्य का एक भाग है जिसमें रत्नसेन की पहली पत्नी नागमती की विरह-वेदना का बारह महीनों के क्रम में वर्णन किया गया है। छात्र पुस्तकालय से 'पद्मावत' प्राप्त कर पूरा वियोग खंड पढ़ें।
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