पहलवान की ढोलक-(फणीश्वर नाथ रेणु) (Part 2) — NCERT Solutions
Chhattisgarh Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for पहलवान की ढोलक-(फणीश्वर नाथ रेणु) (Part 2), Chhattisgarh Board Class 12 Hindi: 15 textbook questions solved step by step.
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One of 7 illustrations for पहलवान की ढोलक-(फणीश्वर नाथ रेणु) in Super Tutor — alongside flashcards, concept maps and practice questions.
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पाठ के साथ
1कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।Show solution
कुश्ती के समय ढोल की थाप और लुट्टन के दाँव-पेंच में पूरा तालमेल था। ढोल की आवाज उसे बार-बार उत्तेजित, सावधान और सक्रिय करती थी। पाठ में ढोल की ध्वनि जैसे शब्द आए हैं—‘चट्-धा, गिड्-धा’, ‘चटाक्-चट्-धा’, ‘ढाक्-ढिना’, ‘धाक-धिना’, ‘धिना-धिना, धिक-धिना’, ‘धा-गिड़-गिड़’। इनसे कानों में ऐसी ध्वनि गूँजती है जैसे कोई तेज, तालबद्ध, युद्ध-सी ललकार हो रही हो। यह ध्वनि मन में जोश, ललकार, उठाकर पटक देने और सामने वाले को चुनौती देने जैसा प्रभाव पैदा करती है। ढोल मानो लुट्टन को दाँव काटने, बाहर निकलने, और जोर लगाकर चित करने का संकेत देता है।
2कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?Show solution
कहानी में लुट्टन के जीवन में कई मोड़ आते हैं। पहले वह एक अनाथ बालक था, जिसे सास ने पाला। कसरत की धुन उसके बचपन के अपमान और बदले की भावना से शुरू हुई। फिर वह गाँव का सबसे अच्छा पहलवान बना। श्यामनगर मेले में चाँद सिंह को चुनौती देकर उसने अपनी वीरता सिद्ध की और राज-पहलवान बन गया। इसके बाद उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। आगे चलकर बूढ़े राजा के मरने और नए राजकुमार के सत्ता में आने पर वह दरबार से हटाकर गाँव भेज दिया गया। वहाँ उसने गाँव के नौजवानों और अपने पुत्रों को कुश्ती सिखाई। फिर अकाल, मलेरिया, हैजा के समय उसने ढोल बजाकर गाँव में हिम्मत बनाए रखी। अंत में उसके दोनों बेटों की मृत्यु और फिर स्वयं उसकी मृत्यु हुई। इस तरह उसका जीवन अनाथ बालक → पहलवान → राज-पहलवान → गाँव का गुरु → त्रासदीग्रस्त संघर्षशील पिता के रूप में बदलता गया।
3लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?Show solution
लुट्टन ने कहा होगा कि उसका गुरु कोई पहलवान नहीं, बल्कि ढोल है, क्योंकि उसकी कुश्ती-विद्या और उत्साह का असली आधार ढोल की थाप थी। पाठ में दिखाया गया है कि ढोल की आवाज उसे दाँव काटने, बाहर निकलने, जोर लगाने, चित करने का साहस देती थी। वह दंगल में ढोल की लय के अनुसार अपने शरीर और मन को साधता था। इसलिए उसके लिए ढोल केवल वाद्य नहीं, बल्कि प्रेरक गुरु, उत्साह देने वाला साथी और जीवन-शक्ति था।
4गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?Show solution
गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के मर जाने के बावजूद लुट्टन ढोल बजाता रहा, क्योंकि ढोल उसके लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि जीवन-रक्षा की शक्ति था। उसकी थाप मृतप्राय लोगों में संजीवनी भरती थी। वह जानता था कि बीमारी और मृत्यु को वह रोक नहीं सकता, पर ढोल की आवाज से वह गाँव वालों के भीतर हिम्मत, जीने की इच्छा और मृत्यु से न डरने का साहस जगा सकता है। अपने बेटों की मृत्यु के बाद भी वह इसलिए बजाता रहा कि वह स्वयं टूट न जाए और दूसरों की टूटती हुई हिम्मत को सहारा दे सके।
5ढोलक की आवाज का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?Show solution
ढोलक की आवाज का पूरे गाँव पर गहरा असर होता था। वह मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती थी। उसकी थाप से बूढ़ों, बच्चों और जवानों के भीतर फिर से साहस और जीने की शक्ति जाग उठती थी। लोग अपनी बीमारी और कमजोरी भूलकर दंगल का दृश्य मन में देखने लगते थे। ढोल की आवाज उन्हें मृत्यु से डरने से बचाती थी और दुख के बीच भी उन्हें मनोबल देती थी।
6महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?Show solution
महामारी फैलने के बाद सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में बहुत अंतर था। दिन में, सूर्य के प्रकाश में लोग घरों से बाहर निकलकर एक-दूसरे को ढाढ़स देते थे, रोते हुए भी कुछ बोल लेते थे। लेकिन सूर्यास्त के बाद गाँव अपनी झोंपड़ियों में घुसकर बिल्कुल निस्तब्ध हो जाता था; किसी में बोलने की शक्ति नहीं रहती थी, यहाँ तक कि मरते हुए पुत्र को अंतिम बार पुकारने की भी हिम्मत नहीं होती थी। इसलिए सूर्योदय में थोड़ी मानवीय हलचल और सहारा, जबकि सूर्यास्त में डर, चुप्पी और मृत्यु-सा सन्नाटा दिखाई देता था।
7कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था—Show solution
पहले कुश्ती और दंगल लोगों तथा राजाओं का प्रिय शौक थे, इसलिए पहलवानों को विशेष सम्मान मिलता था। लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है, क्योंकि समाज की रुचियाँ बदल गई हैं और मनोरंजन के नए साधन आ गए हैं। पाठ के अनुसार दंगल की जगह घोड़े की रेस ने ले ली। आज के समय में कुश्ती को फिर से प्रिय बनाने के लिए विद्यालयों, अखाड़ों और गाँवों में इसका अभ्यास कराया जा सकता है; खिलाड़ियों को उचित प्रशिक्षण, पोषण, सुविधाएँ और सम्मान दिया जा सकता है; तथा लोक-खेलों के महत्व को जन-जागरण के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है।
8आशय स्पष्ट करें—Show solution
इस पंक्ति का आशय यह है कि प्रकृति में भी भावनाएँ और मानवीय गुण दिखाई जा सकते हैं। यहाँ तारे को एक भावुक व्यक्ति की तरह दिखाया गया है जो पृथ्वी पर आना चाहता है, पर उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही समाप्त हो जाती है। अन्य तारे उसकी असफलता पर हँसते हैं। इससे अंधेरी, निराशाजनक स्थिति और असफल प्रयास का चित्र बनता है।
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Frequently Asked Questions
What are the important topics in पहलवान की ढोलक-(फणीश्वर नाथ रेणु) for Chhattisgarh Board Class 12 Hindi?
Are these NCERT Solutions for पहलवान की ढोलक-(फणीश्वर नाथ रेणु) free?
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