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Chapter 29 of 32
NCERT Solutions

संस्कृति

Himachal Pradesh Board · Class 10 · Hindi

NCERT Solutions for संस्कृति — Himachal Pradesh Board Class 10 Hindi.

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9 Questions Solved · 1 Section

पाठ: संस्कृति (भदंत आनंद कौसल्यायन) — प्रश्न-अभ्यास

1लेखक की दृष्टि में 'सभ्यता' और 'संस्कृति' की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है?Show solution
दिया गया है: पाठ 'संस्कृति' में लेखक भदंत आनंद कौसल्यायन ने सभ्यता और संस्कृति की अवधारणा पर विचार किया है।

उत्तर:
लेखक की दृष्टि में 'सभ्यता' और 'संस्कृति' की सही समझ अब तक इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि लोग इन दोनों शब्दों को प्रायः एक-दूसरे का पर्याय मानकर चलते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि संस्कृति मूल है और सभ्यता उसका परिणाम। संस्कृति मनुष्य की वह आंतरिक योग्यता है जो उसे नए आविष्कार करने, त्याग करने और कल्याण की भावना से प्रेरित करती है, जबकि सभ्यता उन आविष्कारों और योग्यताओं के बाहरी परिणाम हैं — जैसे खान-पान के तरीके, वस्त्र, यातायात के साधन आदि। इसके अतिरिक्त लोग 'संस्कृति' के नाम पर पुराने कूड़े-करकट को ढोते रहते हैं और उसे ही संस्कृति समझ लेते हैं। इस भ्रम के कारण ही दोनों की सही समझ नहीं बन पाई है।
2आग की खोज एक बहुत बड़ी खोज क्यों मानी जाती है? इस खोज के पीछे रही प्रेरणा के मुख्य स्रोत क्या रहे होंगे?Show solution
दिया गया है: लेखक ने आग की खोज को मानव संस्कृति की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है।

उत्तर:
आग की खोज इसलिए बहुत बड़ी खोज मानी जाती है क्योंकि इसने मानव जीवन को पूरी तरह बदल दिया। आग की सहायता से मनुष्य ने —
- कच्चा भोजन पकाकर खाना सीखा, जिससे उसका स्वास्थ्य सुधरा।
- ठंड और हिंसक जानवरों से अपनी रक्षा की।
- धातुओं को गलाकर नए औज़ार बनाए।
- अंधकार को दूर कर रात में भी काम करना संभव बनाया।

इस प्रकार आग की खोज ने मानव सभ्यता की नींव रखी।

प्रेरणा के मुख्य स्रोत:
आग की खोज के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रेरणाएँ रही होंगी —
1. जिज्ञासा — प्रकृति में बिजली गिरने या पत्थरों के टकराने से उत्पन्न आग को देखकर मनुष्य के मन में जिज्ञासा जागी होगी।
2. आवश्यकता — ठंड से बचने और भोजन पकाने की आवश्यकता ने उसे आग खोजने के लिए प्रेरित किया होगा।
3. सुरक्षा की भावना — जंगली जानवरों से बचाव के लिए आग का उपयोग करने की प्रेरणा रही होगी।
3वास्तविक अर्थों में 'संस्कृत व्यक्ति' किसे कहा जा सकता है?Show solution
दिया गया है: लेखक ने संस्कृत व्यक्ति की अवधारणा पाठ में स्पष्ट की है।

उत्तर:
वास्तविक अर्थों में 'संस्कृत व्यक्ति' उसे कहा जा सकता है जिसमें मानवता के कल्याण की भावना हो और जो अपनी बुद्धि, प्रतिभा एवं योग्यता का उपयोग दूसरों के भले के लिए करे। लेखक के अनुसार संस्कृत व्यक्ति वह है —
- जो किसी नई खोज या आविष्कार से मानव जाति को लाभ पहुँचाए।
- जो अपने सुख-वैभव का त्याग करके दूसरों के सुख के लिए जीए।
- जिसकी योग्यता केवल व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित न हो, बल्कि समाज और मानवता के लिए समर्पित हो।

जैसे — न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का नियम खोजा, सिद्धार्थ ने घर त्यागकर मानवता की मुक्ति का मार्ग खोजा — ये सभी वास्तविक अर्थों में संस्कृत व्यक्ति थे। संक्षेप में, जिस व्यक्ति की योग्यता में कल्याण की भावना निहित हो, वही सच्चे अर्थों में संस्कृत व्यक्ति है।
4न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के पीछे कौन से तर्क दिए गए हैं? न्यूटन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों एवं ज्ञान की कई दूसरी बारीकियों को जानने वाले लोग भी न्यूटन की तरह संस्कृत नहीं कहला सकते, क्यों?Show solution
दिया गया है: लेखक ने न्यूटन को संस्कृत मानव कहा है और इसके कारण स्पष्ट किए हैं।

न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के तर्क:
न्यूटन को संस्कृत मानव इसलिए कहा गया है क्योंकि उनमें वह विशेष मानसिक योग्यता थी जिसने उन्हें गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने एक सेब को गिरते देखकर जो जिज्ञासा अनुभव की और उससे एक महान वैज्ञानिक सिद्धांत की खोज की — यह उनकी आंतरिक सांस्कृतिक योग्यता का प्रमाण है। यह योग्यता ही संस्कृति है।

न्यूटन के सिद्धांत जानने वाले संस्कृत क्यों नहीं:
न्यूटन के सिद्धांतों को पढ़कर जानने वाले लोग उस ज्ञान को ग्रहण तो कर लेते हैं, किंतु उनमें वह मौलिक जिज्ञासा और सृजनात्मक योग्यता नहीं होती जो न्यूटन में थी। वे केवल सभ्यता के उपभोक्ता हैं, संस्कृति के निर्माता नहीं। संस्कृति वह आंतरिक शक्ति है जो नई खोज करवाती है; दूसरों की खोज को जान लेना मात्र सभ्यता का उपयोग है। इसीलिए न्यूटन के सिद्धांत जानने वाले न्यूटन की तरह संस्कृत नहीं कहला सकते।
5किन महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सुई-धागे का आविष्कार हुआ होगा?Show solution
दिया गया है: लेखक ने सुई-धागे के आविष्कार को मानव संस्कृति की उपलब्धि माना है।

उत्तर:
सुई-धागे का आविष्कार निम्नलिखित महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ होगा —

1. शरीर ढकने की आवश्यकता: आदिमानव को ठंड, धूप और वर्षा से अपने शरीर की रक्षा के लिए वस्त्रों की ज़रूरत थी। पत्तों और खाल को जोड़ने के लिए सुई-धागे की आवश्यकता पड़ी होगी।

2. लज्जा निवारण: सामाजिक विकास के साथ मनुष्य में लज्जा की भावना जागी और शरीर को ढकने के लिए वस्त्र सिलने की ज़रूरत हुई।

3. घाव बाँधने की आवश्यकता: शिकार या युद्ध में लगे घावों को बाँधने के लिए भी सुई-धागे का उपयोग हुआ होगा।

4. सौंदर्य-बोध: मनुष्य में सौंदर्य की भावना के विकास के साथ वस्त्रों को सजाने-सँवारने के लिए भी सुई-धागे का उपयोग हुआ होगा।

इस प्रकार सुई-धागे का आविष्कार मानव की मूलभूत आवश्यकताओं से प्रेरित था।
6"मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।" किन्हीं दो प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जब— (क) मानव संस्कृति को विभाजित करने की चेष्टाएँ की गईं। (ख) जब मानव संस्कृति ने अपने एक होने का प्रमाण दिया।Show solution
दिया गया है: लेखक का कथन है कि मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।

(क) मानव संस्कृति को विभाजित करने की चेष्टाएँ:

1. धर्म के नाम पर विभाजन: भारत में हिंदू-मुसलिम के नाम पर संस्कृति को विभाजित करने की कोशिश की गई। सांप्रदायिक दंगों और 1947 के विभाजन के समय धर्म के आधार पर मानव संस्कृति को तोड़ने का प्रयास हुआ।

2. जाति और वर्ग के नाम पर विभाजन: समाज में ऊँच-नीच, छुआछूत और जातिवाद के आधार पर मानव संस्कृति को बाँटने की चेष्टाएँ की गईं। उपनिवेशवाद के दौर में भी 'श्वेत' और 'अश्वेत' के नाम पर संस्कृति को विभाजित किया गया।

(ख) मानव संस्कृति के एक होने के प्रमाण:

1. प्राकृतिक आपदाओं के समय: जब भी भूकंप, बाढ़ या महामारी जैसी आपदाएँ आती हैं, तो विभिन्न धर्मों, जातियों और देशों के लोग एकजुट होकर पीड़ितों की सहायता करते हैं। यह मानव संस्कृति की एकता का प्रमाण है।

2. वैज्ञानिक खोजों का सार्वभौमिक लाभ: न्यूटन, आइंस्टीन या किसी भी वैज्ञानिक की खोज किसी एक देश या जाति तक सीमित नहीं रही — उसका लाभ पूरी मानव जाति को मिला। यह सिद्ध करता है कि मानव संस्कृति अविभाज्य है।
7आशय स्पष्ट कीजिए— (क) मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार करती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति?Show solution
दिया गया है: यह पंक्ति पाठ 'संस्कृति' से ली गई है।

आशय:
इस पंक्ति में लेखक एक गहरा प्रश्न उठाता है। लेखक के अनुसार संस्कृति वह मानवीय योग्यता है जो कल्याण की भावना से प्रेरित होती है। किंतु जब मनुष्य अपनी बुद्धि और योग्यता का उपयोग परमाणु बम, रासायनिक हथियार और अन्य विनाशकारी साधनों के निर्माण में करता है — जो स्वयं मनुष्य के ही विनाश का कारण बनते हैं — तो क्या उस योग्यता को संस्कृति कहना उचित होगा?

लेखक का स्पष्ट मत है कि ऐसी योग्यता को संस्कृति नहीं, बल्कि असंस्कृति कहना चाहिए। क्योंकि संस्कृति का मूल आधार कल्याण की भावना है। जब योग्यता कल्याण के स्थान पर विनाश की ओर ले जाए, तो वह संस्कृति नहीं रहती। इसी प्रकार उन विनाशकारी साधनों को सभ्यता नहीं, असभ्यता कहना उचित होगा।

संक्षेप में, लेखक यह कहना चाहता है कि संस्कृति और सभ्यता का मूल्यांकन उनके कल्याणकारी या विनाशकारी स्वरूप के आधार पर होना चाहिए।
8लेखक ने अपने दृष्टिकोण से सभ्यता और संस्कृति की एक परिभाषा दी है। आप सभ्यता और संस्कृति के बारे में क्या सोचते हैं, लिखिए। (रचना और अभिव्यक्ति)Show solution
दिया गया है: यह रचना और अभिव्यक्ति पर आधारित प्रश्न है।

उत्तर:
लेखक ने संस्कृति को मनुष्य की आंतरिक योग्यता और सभ्यता को उसका बाहरी परिणाम बताया है। मैं भी इस विचार से सहमत हूँ।

मेरे विचार में संस्कृति मनुष्य के मन, विचार और आत्मा की वह शक्ति है जो उसे सृजन, त्याग और कल्याण की ओर प्रेरित करती है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने वाले मूल्यों, आदर्शों, कलाओं और परंपराओं का समुच्चय है। संस्कृति मनुष्य को पशु से अलग करती है।

सभ्यता उन भौतिक साधनों और तरीकों का नाम है जो संस्कृति के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं — जैसे भवन, वाहन, वस्त्र, तकनीक आदि। सभ्यता बदलती रहती है, किंतु संस्कृति के मूल मूल्य स्थायी होते हैं।

यदि सभ्यता कल्याण की भावना से जुड़ी हो तो वह मानवता को आगे ले जाती है, किंतु यदि वह विनाश का साधन बन जाए तो वह असभ्यता है। इसलिए सच्ची संस्कृति और सभ्यता वही है जो मानव मात्र के कल्याण में सहायक हो।
9निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह करके समास का भेद भी लिखिए— गलत-सलत, महामानव, हिंदू-मुसलिम, सप्तर्षि, आत्म-विनाश, पददलित, यथोचित, सुलोचना (भाषा-अध्ययन)Show solution
दिया गया है: सामासिक पदों का विग्रह और समास-भेद बताना है।

अवधारणा: समास वह प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक शब्द मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं।

| सामासिक पद | विग्रह | समास का भेद |
|---|---|---|
| गलत-सलत | गलत और सलत (अर्थहीन शब्द के साथ) | द्वंद्व समास |
| महामानव | महान है जो मानव | कर्मधारय समास |
| हिंदू-मुसलिम | हिंदू और मुसलिम | द्वंद्व समास |
| सप्तर्षि | सात ऋषियों का समूह | द्विगु समास |
| आत्म-विनाश | आत्मा का विनाश | तत्पुरुष समास (संबंध तत्पुरुष) |
| पददलित | पद से दलित (कुचला हुआ) | तत्पुरुष समास (करण तत्पुरुष) |
| यथोचित | जो उचित हो उसके अनुसार | अव्ययीभाव समास |
| सुलोचना | सुंदर हैं लोचन (नेत्र) जिसके | बहुव्रीहि समास |

विशेष नोट:
- द्वंद्व समास — दोनों पद प्रधान होते हैं।
- कर्मधारय समास — विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय संबंध।
- द्विगु समास — पहला पद संख्यावाचक होता है।
- तत्पुरुष समास — उत्तर पद प्रधान होता है।
- अव्ययीभाव समास — पूर्व पद अव्यय होता है।
- बहुव्रीहि समास — दोनों पद मिलकर किसी तीसरे का बोध कराते हैं।

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Frequently Asked Questions

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