कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी)
Manipur Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी) — Manipur Board Class 12 Hindi.
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Explore the full setप्रश्न-अभ्यास — कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी)
1कुटज को 'गाढ़े के साथी' क्यों कहा गया है?Show solution
उत्तर:
'गाढ़े के साथी' उसे कहते हैं जो विपत्ति और कठिनाई के समय साथ न छोड़े। कुटज का पौधा उन पहाड़ी, पथरीली, बंजर और सूखी भूमि पर उगता है जहाँ भीषण गर्मी में लू के थपेड़े चलते हैं, जल का नामोनिशान नहीं होता और जीवन-यापन अत्यंत कठिन होता है। ऐसे विकट वातावरण में भी कुटज न केवल जीवित रहता है, बल्कि हरा-भरा रहकर खिलता भी है। जब सब कुछ सूख जाता है, तब भी कुटज अपनी जीवनी-शक्ति से भरपूर रहता है। इसीलिए लेखक ने उसे 'गाढ़े के साथी' कहा है — वह संकट और विपत्ति में भी साथ देता है, हिम्मत नहीं हारता।
2'नाम' क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
उत्तर:
लेखक के अनुसार 'रूप' व्यक्ति-सत्य है और 'नाम' समाज-सत्य। रूप तो क्षणिक और नश्वर होता है — वह बदलता रहता है, नष्ट हो जाता है। किंतु नाम स्थायी होता है। नाम वह पद है जिस पर समाज की मुहर लगी होती है, जिसे इतिहास प्रमाणित करता है और जो समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात होता है। नाम को 'सोशल सैंक्शन' (सामाजिक स्वीकृति) प्राप्त होती है। इसीलिए नाम बड़ा है — वह व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है। लेखक का मन नाम के लिए व्याकुल है क्योंकि नाम में समाज की सामूहिक स्मृति और स्वीकृति निहित होती है, जो रूप से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और टिकाऊ है।
3'कुट', 'कुटज' और 'कुटनी' शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।Show solution
शब्द-विश्लेषण:
1. कुट — संस्कृत में 'कुट' का अर्थ है घड़ा, पर्वत-शिखर अथवा घर। यह मूल शब्द है।
2. कुटज — 'कुट' (घड़े/पर्वत) से 'ज' (जन्मा हुआ) अर्थात् जो घड़े से या पर्वत पर जन्मा हो। यह उस पौधे का नाम है जो पहाड़ी और कठिन भूमि पर उगता है। एक कथा के अनुसार यह पौधा अगस्त्य मुनि के कमंडल (घड़े) से उत्पन्न हुआ था, इसलिए भी इसे 'कुटज' कहते हैं।
3. कुटनी — 'कुट' से बना यह शब्द उस स्त्री के लिए प्रयुक्त होता है जो कूटनीति करती है, षड्यंत्र रचती है, दूसरों के घरों में दलाली करती है।
आपसी संबंध: तीनों शब्दों का मूल 'कुट' है। 'कुटज' में 'कुट' का सकारात्मक और प्राकृतिक अर्थ है — पर्वत पर जन्मा, निर्मल और स्वाभिमानी। 'कुटनी' में 'कुट' का नकारात्मक अर्थ है — कूटनीति करने वाली, छल-कपट में लिप्त। लेखक इस विरोधाभास के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि एक ही मूल से उत्पन्न शब्द कितने भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकते हैं।
4कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?Show solution
उत्तर:
कुटज अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा निम्नलिखित प्रकार से करता है —
1. विषम परिस्थितियों में जीवित रहना: भीषण गर्मी, लू के थपेड़े, पानी का अभाव और पथरीली बंजर भूमि — इन सब विपरीत परिस्थितियों में भी कुटज हरा-भरा रहता है और फूलों से लद जाता है।
2. पाषाण को चीरकर जल खींचना: वह कठोर पत्थरों की छाती फाड़कर किसी अज्ञात गहरे जलस्रोत से रस खींच लेता है। यह उसकी अदम्य जिजीविषा का प्रमाण है।
3. 'हृद्येनापराजित' की घोषणा: वह अपने हृदय से अपराजित है — सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय किसी से भी विचलित नहीं होता।
4. अकुतोभय वृत्ति: उसे किसी से भी भय नहीं है। वह निर्भय होकर अपना जीवन जीता है।
5. वशी और वैरागी: वह अपने मन का स्वामी है, मन उसका स्वामी नहीं। इस प्रकार कुटज अपने अस्तित्व मात्र से यह घोषणा करता है कि जीवन-शक्ति किसी भी बाधा से पराजित नहीं होती।
5'कुटज' हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।Show solution
उत्तर:
कुटज का जीवन स्वयं एक उपदेश है। वह बिना कुछ कहे अपने अस्तित्व से हमें निम्नलिखित शिक्षाएँ देता है —
1. विपरीत परिस्थितियों में भी जीना सीखो: कुटज कठिन से कठिन परिस्थिति में भी जीवित रहता है और खिलता है। हमें भी जीवन की कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए।
2. स्वाभिमान के साथ जियो: कुटज न किसी के सामने झुकता है, न किसी की खुशामद करता है। वह अपनी शर्तों पर जीता है।
3. मन को वश में रखो: कुटज मन का स्वामी है, दास नहीं। हमें भी अपने मन को नियंत्रित करना चाहिए।
4. वैराग्य और भोग का संतुलन: राजा जनक की भाँति कुटज संसार में रहकर भी उससे मुक्त है। हमें भी सांसारिक भोगों में लिप्त हुए बिना जीना चाहिए।
5. निर्भयता: कुटज अकुतोभय है — उसे किसी का भय नहीं। हमें भी निर्भय होकर जीवन जीना चाहिए।
निष्कर्ष: कुटज का उपदेश है — 'जियो, स्वाभिमान से जियो, निर्भय होकर जियो और अपने मन के स्वामी बनो।'
6कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?Show solution
उत्तर:
कुटज के जीवन से हमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण सीखें मिलती हैं —
1. संघर्षशीलता: कुटज पथरीली, बंजर और सूखी भूमि पर भी जीवित रहता है। यह हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन हों, हार नहीं माननी चाहिए।
2. आत्मनिर्भरता: वह किसी पर निर्भर नहीं रहता, स्वयं अपना भोजन (रस) पत्थरों से खींच लेता है। हमें भी आत्मनिर्भर बनना चाहिए।
3. सादगी और निश्छलता: कुटज में कोई आडंबर नहीं है, कोई दिखावा नहीं। वह जो है, वही दिखता है।
4. मानसिक दृढ़ता: सुख-दुख, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में वह विचलित नहीं होता। यह मानसिक दृढ़ता हमें भी अपनानी चाहिए।
5. जीवन का आनंद: विपरीत परिस्थितियों में भी कुटज फूलों से लद जाता है — यह सिखाता है कि जीवन का आनंद परिस्थितियों पर नहीं, अपनी वृत्ति पर निर्भर करता है।
सार: कुटज का जीवन यह सिखाता है कि सच्चा जीवन वह है जो स्वाभिमान, निर्भयता और आत्मशक्ति के साथ जिया जाए।
7कुटज क्या केवल जी रहा है — लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमजोरियों पर टिप्पणी की है?Show solution
उत्तर:
लेखक ने 'कुटज क्या केवल जी रहा है?' — यह प्रश्न उठाकर यह स्पष्ट किया है कि कुटज केवल जी नहीं रहा, बल्कि वह पूरी शान और स्वाभिमान के साथ जी रहा है। इस प्रश्न के माध्यम से लेखक ने निम्नलिखित मानवीय कमजोरियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है —
1. स्वार्थपरता: मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के मन में घुसता रहता है, षड्यंत्र रचता है।
2. मिथ्याचार और आडंबर: मनुष्य अपनी कमजोरियाँ छिपाने के लिए झूठा दिखावा करता है, जबकि कुटज में कोई आडंबर नहीं।
3. मन की दासता: मनुष्य अपने मन को वश में नहीं कर पाता और मन का दास बन जाता है। कुटज इसके विपरीत मन का स्वामी है।
4. भय और कायरता: मनुष्य परिस्थितियों से डरता है, जबकि कुटज अकुतोभय है।
5. खुशामद और चापलूसी: मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की खुशामद करता है (निपोरना), जबकि कुटज किसी के सामने नहीं झुकता।
निष्कर्ष: लेखक यह बताना चाहते हैं कि मनुष्य इन कमजोरियों के कारण 'जी' तो रहा है, किंतु सच्चे अर्थों में जीवन नहीं जी रहा। कुटज का जीवन इन सब कमजोरियों से मुक्त है।
8लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।Show solution
उत्तर:
लेखक का मानना है कि मनुष्य के जीवन में स्वार्थ और जिजीविषा (जीने की इच्छा) दो बड़ी शक्तियाँ हैं, किंतु इनसे भी परे कोई और महान शक्ति है जो मनुष्य को महान कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
कारण:
- यदि मनुष्य केवल स्वार्थ के लिए जीता, तो वह कभी परोपकार नहीं करता।
- यदि केवल जिजीविषा (जीने की इच्छा) होती, तो वह केवल अपने प्राण बचाने तक सीमित रहता।
- किंतु मनुष्य इससे आगे जाकर दूसरों के लिए अपना जीवन न्योछावर करता है, सत्य के लिए लड़ता है, सौंदर्य की सृष्टि करता है।
उदाहरण:
1. कुटज का उदाहरण: कुटज केवल जीने के लिए नहीं जीता — वह पत्थरों को चीरकर रस खींचता है, फूलों से लद जाता है और अपनी सुंदरता से सबको आनंदित करता है। यह केवल जिजीविषा नहीं, कुछ और है।
2. महापुरुषों का उदाहरण: गाँधी, बुद्ध जैसे महापुरुषों ने स्वार्थ और जिजीविषा से ऊपर उठकर मानवता की सेवा की।
निष्कर्ष: लेखक के अनुसार यह शक्ति है — प्रेम, सौंदर्य-बोध और परमार्थ की भावना — जो मनुष्य को पशु से देवता बनाती है।
9'कुटज' पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।'Show solution
उत्तर:
लेखक ने 'कुटज' पाठ में यह सिद्ध किया है कि सुख और दुख वस्तुतः बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि मन की अवस्था पर निर्भर करते हैं —
1. कुटज का उदाहरण:
कुटज भीषण गर्मी, लू, पानी के अभाव और पथरीली भूमि जैसी दुखद परिस्थितियों में रहता है, फिर भी वह हरा-भरा और प्रसन्न रहता है। यदि सुख-दुख बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर होते, तो कुटज को दुखी होना चाहिए था। किंतु वह 'हृद्येनापराजित' है — हृदय से अपराजित।
2. मन की भूमिका:
लेखक कहते हैं कि जो मन को वश में कर लेता है, वह सुख-दुख दोनों से परे हो जाता है। कुटज मन का स्वामी है, इसलिए वह न सुख से उत्तेजित होता है, न दुख से विचलित।
3. राजा जनक का उदाहरण:
जनक संसार के समस्त भोगों को भोगते हुए भी उनसे मुक्त थे — यह इसलिए संभव था क्योंकि उनका मन विकल्पों से परे था।
4. द्वंद्वातीत स्थिति:
कुटज द्वंद्वातीत है — वह सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय के द्वंद्व से ऊपर उठ चुका है।
निष्कर्ष: इस प्रकार 'कुटज' पाठ यह सिद्ध करता है कि सुख और दुख वस्तुतः मन के विकल्प हैं — मन जैसा सोचे, वैसा ही अनुभव होता है।
10(क)निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए — 'कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहेवा दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।'Show solution
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि कुटज का पौधा ऊपर से देखने पर साधारण और बेढंगा (बेहेवा) लगता है — न बहुत ऊँचा, न बहुत सुंदर, न बहुत आकर्षक। किंतु उसकी जड़ें पत्थरों को चीरकर बहुत गहराई तक पहुँची होती हैं। वह उस अज्ञात और अगम जलस्रोत से अपना पोषण खींच लेता है जो पत्थरों के नीचे कहीं छिपा होता है।
मानवीय संदर्भ: यह केवल कुटज की बात नहीं है। लेखक यहाँ उन मनुष्यों की ओर संकेत कर रहे हैं जो बाहर से साधारण, सरल और अनाकर्षक दिखते हैं, किंतु उनके भीतर असाधारण शक्ति, धैर्य और संकल्प होता है। ऐसे लोग विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर जीवित रहते हैं और सफल होते हैं।
विशेषता: यह गद्यांश लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और गहरी मानवीय समझ का परिचय देता है। 'पाषाण की छाती फाड़कर' और 'अतल गह्वर' जैसे प्रयोग भाषा को सशक्त और चित्रात्मक बनाते हैं।
10(ख)निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए — 'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे 'सोशल सैक्शन' कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!'Show solution
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि किसी वस्तु या व्यक्ति का 'रूप' (आकार, बनावट, दिखावट) केवल उस व्यक्ति या वस्तु तक सीमित सत्य है — यह व्यक्तिगत और क्षणिक है। किंतु 'नाम' सामाजिक सत्य है। नाम वह पहचान है जिसे समाज ने स्वीकार किया है, जिसे इतिहास ने प्रमाणित किया है। आधुनिक भाषा में इसे 'सोशल सैंक्शन' (सामाजिक स्वीकृति) कहते हैं।
लेखक का मन उस नाम के लिए व्याकुल है जो —
- समाज द्वारा स्वीकृत हो,
- इतिहास द्वारा प्रमाणित हो,
- और समस्त मानव-जाति की चेतना की गंगा में स्नान किया हो अर्थात् जो सार्वभौमिक और शाश्वत हो।
विशेषता: 'समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात' — यह अत्यंत काव्यात्मक और दार्शनिक प्रयोग है। इसका अर्थ है कि वह नाम जो सम्पूर्ण मानव-जाति की सामूहिक चेतना में रचा-बसा हो। लेखक यहाँ नाम की सामाजिक और ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करते हैं।
10(ग)निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए — 'रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दोरुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।'Show solution
व्याख्या:
लेखक कुटज की शोभा पर मुग्ध होकर कहते हैं — इसके रूप की क्या बात करें! इसकी मादक (मन को मोह लेने वाली) सुंदरता पर न्योछावर हो जाने को जी चाहता है।
चारों ओर भीषण गर्मी है — लू इस प्रकार धधक रही है जैसे क्रोधित यमराज की भयंकर साँसें हों। ऐसे विकट वातावरण में भी कुटज —
- हरा भी है — जीवित है, मुरझाया नहीं,
- भरा भी है — फूलों और पत्तियों से लदा हुआ है।
यह इसलिए संभव है क्योंकि वह दुर्जन के हृदय से भी अधिक कठोर पत्थरों की जेल (कारा) में बंद किसी अज्ञात जलस्रोत से जबरदस्ती रस खींच लेता है और स्वयं को सरस (रसपूर्ण) बनाए रखता है।
मानवीय संदर्भ: यह गद्यांश उन मनुष्यों के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी आंतरिक शक्ति से जीवन-रस खींचकर जीवित और प्रसन्न रहते हैं।
भाषा-सौंदर्य: 'कुपित यमराज के दोरुण निःश्वास' — यह उपमा लू की भयंकरता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। 'दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण' — यह उपमा पत्थर की कठोरता को मानवीय संदर्भ देती है।
10(घ)निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए — 'हृद्येनापराजित:! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्टि!'Show solution
व्याख्या:
'हृद्येनापराजित:' — यह संस्कृत पद है जिसका अर्थ है 'हृदय से अपराजित'। लेखक कुटज को इस विशेषण से विभूषित करते हैं।
लेखक विस्मय से पूछते हैं — वह हृदय कितना विशाल होगा जो सुख से भी विचलित न हो और दुख से भी नहीं, जो प्रिय वस्तु के मिलने पर उत्तेजित न हो और अप्रिय के आने पर व्याकुल न हो! ऐसा हृदय ही सच्चे अर्थों में महान है।
कुटज को देखकर लेखक को रोमांच हो आता है — उनके मन में श्रद्धा और विस्मय का भाव जागता है। वे प्रश्न करते हैं — कुटज को यह अकुतोभया वृत्ति (किसी से भी न डरने की प्रवृत्ति), अपराजित स्वभाव (कभी न हारने का स्वभाव) और अविचल जीवन-दृष्टि (स्थिर और दृढ़ जीवन-दर्शन) कहाँ से मिली है?
मानवीय संदर्भ: लेखक यहाँ परोक्ष रूप से मनुष्य को यह संदेश देते हैं कि हमें भी ऐसा विशाल हृदय विकसित करना चाहिए जो सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान से विचलित न हो।
भाषा-सौंदर्य: संस्कृत पद 'हृद्येनापराजित:' का प्रयोग गद्य को गरिमा और गहराई प्रदान करता है। 'अकुतोभया वृत्ति', 'अपराजित स्वभाव', 'अविचल जीवन-दृष्टि' — ये तीन पद कुटज के व्यक्तित्व के तीन आयामों को सुंदर ढंग से उजागर करते हैं।
योग्यता-विस्तार — कुटज
1'कुटज' की तर्ज पर किसी जंगली फूल पर लेख अथवा कविता लिखने का प्रयास कीजिए।Show solution
पलाश! तुम्हें देखकर मन में एक अजीब-सी उत्तेजना जाग उठती है। फागुन की उस बेला में जब पेड़-पौधे अभी भी पत्तियों की प्रतीक्षा में हैं, तुम बिना पत्तों के ही आग की तरह दहक उठते हो। न कोई सहारा, न कोई साथी — फिर भी तुम्हारे लाल-नारंगी फूल जंगल को रंग देते हैं।
कोई तुम्हें 'जंगल की आग' कहता है, कोई 'ढाक' — पर तुम्हें क्या? तुम तो अपनी धुन में मस्त हो। न किसी बगीचे की चाहत, न किसी माली की देखभाल। तुम स्वयंभू हो, स्वाभिमानी हो।
पलाश, तुम भी कुटज की भाँति 'गाढ़े के साथी' हो। जब सब सूना होता है, तब तुम रंग बिखेरते हो। तुम्हारी यह निर्भयता, यह स्वाभिमान — यही तुम्हारी असली पहचान है।
*(नोट: विद्यार्थी इसी प्रकार किसी भी जंगली फूल — जैसे सेमल, करौंदा, बाँस के फूल — पर अपनी कल्पना और अनुभव के आधार पर लेख या कविता लिख सकते हैं।)*
2लेखक ने 'कुटज' को ही क्यों चुना? उसको अपनी रचना के लिए जंगल में पेड़-पौधे तथा फूलों-वनस्पतियों की कोई कमी नहीं थी।Show solution
लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'कुटज' को इसलिए चुना क्योंकि कुटज उनके जीवन-दर्शन का सबसे उपयुक्त प्रतीक था। इसके कारण निम्नलिखित हैं —
1. विषम परिस्थितियों में जीवन: कुटज उन स्थानों पर उगता है जहाँ जीवन लगभग असंभव है — पथरीली, बंजर, सूखी भूमि पर। यह लेखक के उस संदेश का प्रतीक है कि कठिनाइयों में भी जीवन संभव है।
2. स्वाभिमान और निर्भयता: कुटज किसी का मोहताज नहीं — न माली की, न बगीचे की। यह स्वाभिमानी जीवन का प्रतीक है।
3. सौंदर्य और शक्ति का संयोग: कुटज में सुंदरता भी है और जीवनी-शक्ति भी — यह दोनों का अद्भुत संयोग है।
4. दार्शनिक गहराई: कुटज के माध्यम से लेखक नाम-रूप, सुख-दुख, वैराग्य-भोग जैसे गहरे दार्शनिक प्रश्नों को उठा सके।
5. सामान्य में असामान्य: कुटज एक साधारण जंगली पौधा है, किंतु उसमें असाधारण गुण हैं। लेखक सामान्य में असाधारण खोजने के पक्षधर थे।
निष्कर्ष: कुटज लेखक के जीवन-दर्शन — 'विपरीत परिस्थितियों में भी स्वाभिमान के साथ जीओ' — का सर्वोत्तम प्रतीक था।
3कुटज के बारे में उसकी विशेषताओं को बताने वाले दस वाक्य पाठ से छाँटिए और उनकी मानवीय संदर्भ में विवेचना कीजिए।Show solution
1. 'यह हरा भी है और भरा भी है' — मानवीय संदर्भ: विपत्ति में भी जो व्यक्ति जीवंत और उत्साही रहे, वही सच्चा जीवट वाला है।
2. 'पाषाण की छाती फाड़कर अपना भोग्य खींच लाते हैं' — मानवीय संदर्भ: कठिन परिस्थितियों में भी अपना मार्ग स्वयं बनाना चाहिए।
3. 'हृद्येनापराजित:' — मानवीय संदर्भ: सच्चा मनुष्य वह है जो हृदय से कभी न हारे।
4. 'अकुतोभया वृत्ति' — मानवीय संदर्भ: निर्भयता ही सच्ची स्वतंत्रता है।
5. 'वह वशी है, वह वैरागी है' — मानवीय संदर्भ: मन को वश में रखने वाला ही सच्चा विजेता है।
6. 'द्वंद्वातीत' — मानवीय संदर्भ: सुख-दुख के द्वंद्व से ऊपर उठना ही परिपक्वता है।
7. 'मिथ्याचारों से मुक्त' — मानवीय संदर्भ: सच्चाई और निश्छलता ही सर्वोत्तम जीवन-पद्धति है।
8. 'अपने मन पर सवारी करता है' — मानवीय संदर्भ: जो अपने मन का स्वामी है, वही जीवन में सफल है।
9. 'संपूर्ण भोगों को भोगकर भी उनसे मुक्त' — मानवीय संदर्भ: संसार में रहकर भी आसक्ति से मुक्त रहना आदर्श जीवन है।
10. 'अविचल जीवन-दृष्टि' — मानवीय संदर्भ: जीवन में स्थिर और दृढ़ दृष्टिकोण रखना सफलता की कुंजी है।
4'जीना भी एक कला है' — कुटज के आधार पर सिद्ध कीजिए।Show solution
कुटज का जीवन यह सिद्ध करता है कि जीना वास्तव में एक कला है —
1. परिस्थितियों के अनुकूल ढलना:
कुटज पथरीली, बंजर और सूखी भूमि पर भी जीवित रहता है। वह परिस्थितियों का रोना नहीं रोता, बल्कि उनके अनुकूल अपनी जड़ें गहरी करता है। यह जीने की कला है।
2. संसाधनों का सदुपयोग:
कुटज पत्थरों के नीचे छिपे जलस्रोत से रस खींच लेता है। जो उपलब्ध है, उसी से काम चलाना — यह कला है।
3. सौंदर्य का सृजन:
कुटज केवल जीता नहीं, बल्कि फूलों से लदकर अपने आसपास के वातावरण को सुंदर बनाता है। जीवन को सुंदर बनाना भी एक कला है।
4. मन पर नियंत्रण:
कुटज अपने मन का स्वामी है। मन को नियंत्रित करके जीना — यह सबसे बड़ी कला है।
5. निर्भयता और स्वाभिमान:
कुटज बिना किसी के सहारे, बिना किसी की खुशामद किए जीता है। यह आत्मसम्मान के साथ जीने की कला है।
6. द्वंद्वातीत जीवन:
सुख-दुख से विचलित न होना — यह जीवन की सर्वोच्च कला है जो कुटज में है।
निष्कर्ष: कुटज का जीवन यह सिखाता है कि जीना केवल साँस लेना नहीं है — बल्कि स्वाभिमान, निर्भयता, सौंदर्य-बोध और मानसिक दृढ़ता के साथ जीना ही सच्ची जीवन-कला है।
5राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी पर बनाई फिल्म देखिए।Show solution
1. हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय।
2. उनकी प्रमुख रचनाएँ और उनका साहित्यिक योगदान।
3. उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ।
4. 'कुटज' जैसे ललित निबंधों की रचना-प्रक्रिया।
5. उनके जीवन-दर्शन का उनकी रचनाओं पर प्रभाव।
*(यह प्रश्न स्व-अध्ययन और दृश्य-श्रव्य माध्यम से सीखने के लिए है। विद्यार्थी फिल्म देखकर अपनी डायरी में नोट्स बनाएँ।)*
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