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Chapter 34 of 38
NCERT Solutions

शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी) (Part 2) — NCERT Solutions

Manipur Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी) (Part 2), Manipur Board Class 12 Hindi: 15 textbook questions solved step by step.

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एक शिरीष वृक्ष का चित्रण जो जेठ की जलती धूप में भी फूलों से लदा हुआ है, उसकी छायादार और घनी हरीतिमा को दर्शाता है। इसमें शिरीष के फूलों की कोमलता और फलों की दृढ़ता भी दिखाई गई है।
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One of 5 illustrations for शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी) in Super Tutor — alongside flashcards, concept maps and practice questions.

15 Questions Solved · 3 Sections

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पाठ के साथ

1लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?Show solution

दिया गया है: हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध 'शिरीष के फूल'।

उत्तर:

लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत इसलिए माना है क्योंकि शिरीष का वृक्ष उन सभी विशेषताओं से युक्त है जो एक सच्चे अवधूत (संन्यासी) में होती हैं—

  1. बाहरी परिस्थितियों से निर्लिप्तता: ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में, जब लू के थपेड़े चलते हैं और धरती तवे की तरह तपती है, तब भी शिरीष शांत भाव से फूला रहता है। वह न गर्मी से विचलित होता है, न वर्षा से।
  1. कोमलता और कठोरता का समन्वय: शिरीष के फूल अत्यंत कोमल होते हैं, किंतु उसके पुराने फलों के खोखे इतने कठोर होते हैं कि नए फूल आने पर भी वे डाल नहीं छोड़ते। यह कोमलता और कठोरता का अद्भुत संयोग अवधूत की पहचान है।
  1. वायुमंडल से रस ग्रहण करना: शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर जीवित रहता है। वह बाहरी संघर्षों और उथल-पुथल से अप्रभावित रहता है—ठीक उसी प्रकार जैसे एक अवधूत संसार के बीच रहकर भी उससे अलिप्त रहता है।
  1. कालजयी स्वभाव: काल की मार से बचते हुए वह दीर्घजीवी बना रहता है। लेखक ने गांधीजी से उसकी तुलना करते हुए कहा है कि जैसे गांधीजी मार-काट, अग्निदाह और खून-खच्चर के बवंडर में भी स्थिर रहे, वैसे ही शिरीष भी विषम परिस्थितियों में अविचल रहता है।

निष्कर्ष: इन्हीं सब कारणों से लेखक ने शिरीष को 'कालजयी अवधूत' की संज्ञा दी है।

2हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है— प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।Show solution

दिया गया है: पाठ 'शिरीष के फूल' — हजारी प्रसाद द्विवेदी।

उत्तर:

लेखक ने शिरीष के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि कोमलता और कठोरता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं—

  1. शिरीष का उदाहरण: शिरीष के फूल अत्यंत कोमल और नाजुक होते हैं, किंतु उसके पुराने फलों के खोखे इतने कठोर होते हैं कि वे नए फूलों के आने पर भी डाल नहीं छोड़ते। यह कठोरता ही उसकी कोमलता की रक्षा करती है।
  1. गांधीजी का उदाहरण: लेखक ने गांधीजी को भी इसी संदर्भ में उद्धृत किया है। गांधीजी का हृदय अत्यंत कोमल था—वे सबसे प्रेम करते थे, सबके दुःख से द्रवित होते थे। किंतु अपने सिद्धांतों और आदर्शों के प्रति वे अत्यंत कठोर थे। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उनका अहिंसक संघर्ष, उनके व्यवहार की कठोरता का ही प्रमाण है। यदि वे कठोर न होते तो उनकी आंतरिक कोमलता को संसार की क्रूरता नष्ट कर देती।
  1. साहित्यकार के संदर्भ में: लेखक कहते हैं कि एक सच्चे कवि के लिए भी यही आवश्यक है। उसे अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता चाहिए ताकि वह संसार के प्रलोभनों और दबावों से अपनी संवेदनशीलता को बचा सके।

निष्कर्ष: इस प्रकार पाठ यह स्पष्ट करता है कि हृदय की कोमलता की रक्षा के लिए बाहरी व्यवहार में कठोरता आवश्यक है। बिना कठोरता के कोमलता टिक नहीं सकती।

3द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रह कर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।Show solution

दिया गया है: पाठ 'शिरीष के फूल' — हजारी प्रसाद द्विवेदी।

उत्तर:

द्विवेदी जी ने शिरीष वृक्ष को जीवन-दर्शन का प्रतीक बनाकर यह सिखाया है कि विषम परिस्थितियों में भी जीने की इच्छा (जिजीविषा) बनाए रखनी चाहिए—

  1. प्रतिकूल परिस्थितियों में खिलना: शिरीष ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में फूलता है, जब अन्य वनस्पतियाँ मुरझा जाती हैं। लू के थपेड़ों और तपती धरती के बीच भी वह अपनी जीवन-शक्ति बनाए रखता है। यह संदेश देता है कि जीवन के कोलाहल और संघर्ष में भी मनुष्य को अपनी जिजीविषा नहीं खोनी चाहिए।
  1. अविचलता का गुण: शिरीष न वर्षा की परवाह करता है, न गर्मी की। वह बाहरी उथल-पुथल से निर्लिप्त रहकर अपना काम करता रहता है। यह अविचलता ही उसे दीर्घजीवी बनाती है।
  1. गतिशीलता का संदेश: लेखक कहते हैं—'जमे कि मरे।' अर्थात् जो व्यक्ति परिस्थितियों के साथ बदलता नहीं, वह नष्ट हो जाता है। शिरीष की तरह हिलते-डुलते, आगे बढ़ते रहना ही जीवन है।
  1. गांधीजी का उदाहरण: देश में मार-काट, अग्निदाह और खून-खच्चर के बवंडर के बीच भी गांधीजी शिरीष की तरह अविचल रहे। उन्होंने जिजीविषा का परिचय दिया।

निष्कर्ष: इस प्रकार द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से यह प्रेरणा दी है कि जीवन के संघर्षों में न घबराएँ, न रुकें—अविचल और जिजीविषु बने रहें।

4'हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!' ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?Show solution

दिया गया है: पाठ 'शिरीष के फूल' — हजारी प्रसाद द्विवेदी।

उत्तर:

लेखक ने 'हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!' कहकर गांधीजी की याद की है और साथ ही वर्तमान सभ्यता के एक गहरे संकट की ओर संकेत किया है—

  1. आत्मबल बनाम देह-बल: गांधीजी आत्मबल के प्रतीक थे। उन्होंने बिना किसी शस्त्र के, केवल सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी। वे शिरीष की तरह वायुमंडल से रस खींचकर—अर्थात् जन-जन की भावनाओं और आत्मशक्ति से ऊर्जा लेकर—इतने कोमल और इतने कठोर बन सके।
  1. वर्तमान सभ्यता का संकट: आज की सभ्यता में आत्मबल का स्थान देह-बल ने ले लिया है। मार-काट, हिंसा, लूट-पाट, अग्निदाह—ये सब देह-बल के प्रतीक हैं। आज शक्ति का अर्थ शस्त्र-बल, धन-बल और शारीरिक बल हो गया है। आत्मिक शक्ति, नैतिक साहस और सत्य की ताकत को भुला दिया गया है।
  1. लेखक की पीड़ा: लेखक को पीड़ा है कि गांधीजी जैसा अवधूत—जो आत्मबल का जीवंत उदाहरण था—आज नहीं रहा। उनके जाने के बाद समाज में देह-बल का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।

निष्कर्ष: इस प्रकार लेखक ने यह संकेत दिया है कि जब तक समाज में आत्मबल की जगह देह-बल को महत्व दिया जाता रहेगा, तब तक सभ्यता का संकट बना रहेगा।

5कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय— एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ।Show solution

दिया गया है: पाठ 'शिरीष के फूल' — हजारी प्रसाद द्विवेदी।

उत्तर:

द्विवेदी जी ने साहित्यकार के लिए दो परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले गुणों को एक साथ आवश्यक बताया है—

1. अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता:

  • 'अनासक्त' का अर्थ है—विषय-भोग, लोभ, मोह और सांसारिक प्रलोभनों से ऊपर उठा हुआ।
  • 'स्थिर प्रज्ञता' का अर्थ है—अविचल बुद्धि, जो सुख-दुःख, लाभ-हानि, यश-अपयश में समान रहे।
  • एक साहित्यकार को इसलिए यह गुण चाहिए ताकि वह संसार की क्षणिक घटनाओं, राजनीतिक दबावों, आर्थिक प्रलोभनों और व्यक्तिगत स्वार्थों से प्रभावित हुए बिना सत्य का साक्षात्कार कर सके।
  • जो कवि 'किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया', वह सच्चा कवि नहीं हो सकता।

2. विदग्ध प्रेमी का हृदय:

  • 'विदग्ध' का अर्थ है—अच्छी तरह तपा हुआ, परिपक्व।
  • एक प्रेमी का हृदय संवेदनशील होता है—वह दूसरों के दुःख-सुख को अनुभव करता है, प्रकृति की सुंदरता से आनंदित होता है, मानवीय पीड़ा से द्रवित होता है।
  • बिना इस संवेदनशीलता के साहित्य निर्जीव हो जाता है।

दोनों का समन्वय क्यों आवश्यक है:

  • यदि केवल अनासक्ति हो तो साहित्यकार ठंडा और निर्भाव हो जाएगा—उसकी रचना में जीवन नहीं होगा।
  • यदि केवल प्रेमी का हृदय हो तो वह भावनाओं में बह जाएगा, वस्तुनिष्ठता खो देगा।
  • दोनों का संयोग ही महान साहित्य की रचना करता है—जैसे शिरीष कोमल भी है और कठोर भी।

ऊँचा मानदंड: लेखक ने यह कहकर साहित्य-कर्म को एक साधना बताया है। यह मानदंड इसलिए ऊँचा है क्योंकि इन दोनों गुणों को एक साथ साधना अत्यंत कठिन है।

निष्कर्ष: इस प्रकार द्विवेदी जी ने साहित्यकार के लिए एक आदर्श निर्धारित किया है जो उसे सामान्य लेखक से ऊपर उठाकर एक दार्शनिक-संवेदनशील व्यक्तित्व बनाता है।

6सर्वप्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रही स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।Show solution

दिया गया है: पाठ 'शिरीष के फूल' — हजारी प्रसाद द्विवेदी।

उत्तर:

लेखक ने इस विचार को शिरीष वृक्ष और जीवन-दर्शन के माध्यम से स्पष्ट किया है—

1. काल की अनिवार्यता:
काल (समय) सर्वभक्षी है—वह सबको निगल जाता है। जो इसके साथ नहीं चलता, वह नष्ट हो जाता है। लेखक कहते हैं—'दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है।'

2. जड़ता = मृत्यु:
जो व्यक्ति या समाज एक ही स्थान पर जमा रहता है, परिवर्तन को स्वीकार नहीं करता, वह काल की मार से नहीं बच सकता। लेखक ने स्पष्ट कहा है—'जमे कि मरे।'

3. गतिशीलता = जीवन:
शिरीष इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। वह ऋतु के अनुसार बदलता है—गर्मी में फूलता है, वर्षा में हरा-भरा रहता है। वह परिस्थितियों के साथ अपनी गतिशीलता बनाए रखता है। इसीलिए वह दीर्घजीवी है।

4. व्यावहारिक संदेश:
लेखक कहते हैं—'हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो।' अर्थात् जो व्यक्ति नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालता है, नए विचारों को अपनाता है और आगे बढ़ता रहता है—वही काल की मार से बचता है।

5. सभ्यता के संदर्भ में:
यही बात समाज और सभ्यता पर भी लागू होती है। जो सभ्यताएँ जड़ हो गईं, वे नष्ट हो गईं। जो गतिशील रहीं, वे दीर्घजीवी हुईं।

निष्कर्ष: इस प्रकार पाठ यह सिखाता है कि जड़ता त्यागकर, परिवर्तन को स्वीकार करते हुए और गतिशील बने रहकर ही मनुष्य काल की मार से बच सकता है और दीर्घजीवी हो सकता है।

7(क)आशय स्पष्ट कीजिए— दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।Show solution

दिया गया है: पाठ 'शिरीष के फूल' — हजारी प्रसाद द्विवेदी।

आशय:

इस अंश में लेखक ने जीवन और काल के शाश्वत संघर्ष को व्यक्त किया है—

  1. 'दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष': जीवन (प्राणधारा) और मृत्यु/काल (कालाग्नि) के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता है। काल सर्वभक्षी है—वह सबको नष्ट करता है। किंतु जीवन भी दुरंत (अजेय) है—वह बार-बार नए रूप में उभरता है।
  1. 'मूर्ख समझते हैं... कालदेवता की आँख बचा पाएँगे': जो लोग सोचते हैं कि एक ही स्थान पर जमे रहने से, परिवर्तन न करने से वे काल से बच जाएँगे—वे मूर्ख हैं। जड़ता कभी भी काल से नहीं बचाती।
  1. 'हिलते-डुलते रहो... आगे की ओर मुँह किए रहो': लेखक का संदेश है कि गतिशीलता ही जीवन है। जो व्यक्ति परिस्थितियों के साथ बदलता है, नई दिशाओं में आगे बढ़ता है, वही काल की मार से कुछ हद तक बच सकता है।
  1. 'जमे कि मरे': यह पंक्ति पूरे अंश का सार है। जड़ता और ठहराव मृत्यु के समान है। जो रुक गया, वह मर गया—चाहे वह व्यक्ति हो, समाज हो या सभ्यता।

निष्कर्ष: यह अंश जीवन में गतिशीलता, परिवर्तनशीलता और प्रगतिशीलता का संदेश देता है।

7(ख)आशय स्पष्ट कीजिए— जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?...मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो।Show solution

दिया गया है: पाठ 'शिरीष के फूल' — हजारी प्रसाद द्विवेदी।

आशय:

इस अंश में लेखक ने सच्चे कवि/साहित्यकार की परिभाषा दी है—

  1. 'अनासक्त नहीं रह सका': जो कवि सांसारिक मोह-माया, लोभ, यश और पुरस्कार की लालसा से मुक्त नहीं हो सका, वह सच्चा कवि नहीं है। अनासक्ति का अर्थ है—फल की चिंता किए बिना सृजन करना।
  1. 'फक्कड़ नहीं बन सका': 'फक्कड़' का अर्थ है—निश्चिंत, मस्त, बेपरवाह। जो कवि समाज की परवाह किए बिना, आलोचना-प्रशंसा से निर्लिप्त होकर सत्य नहीं लिख सकता, वह कवि नहीं है।
  1. 'किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया': जो कवि अपने लाभ-हानि का हिसाब लगाता रहता है—कि इस रचना से क्या मिलेगा, कौन नाराज होगा, कौन खुश होगा—वह सच्चा साहित्यकार नहीं हो सकता।
  1. 'फक्कड़ बनो': लेखक का आह्वान है कि सच्चे कवि को फक्कड़ होना चाहिए—शिरीष की तरह, जो बिना किसी की परवाह किए भीषण गर्मी में भी फूलता रहता है।

निष्कर्ष: यह अंश साहित्य-सृजन की स्वतंत्रता और निर्भीकता का संदेश देता है। सच्चा कवि वही है जो अनासक्त, निर्लोभ और फक्कड़ हो।

7(ग)आशय स्पष्ट कीजिए— फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।

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Frequently Asked Questions

What are the important topics in शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी) for Manipur Board Class 12 Hindi?
Key topics in शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी) include रचना का स्वरूप और केंद्रीय विचार, शिरीष का प्राकृतिक और सांस्कृतिक चित्र, शिरीष और कोमलता का प्रसंग, पुरानी और नई पीढ़ी का द्वंद्व. Study these first, then practise questions on each for the Manipur Board Class 12 board exam.
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How should I revise शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी) for the Manipur Board Class 12 board exam?
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Sources & Official References

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