जूझ
Manipur Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for जूझ — Manipur Board Class 12 Hindi.
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Get startedअभ्यास — जूझ (वितान, कक्षा 12)
1'जूझ' शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथा नायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है?Show solution
विचार एवं उत्तर:
'जूझ' का शाब्दिक अर्थ है — संघर्ष करना, जूझते रहना, हार न मानना। यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक एवं औचित्यपूर्ण है।
शीर्षक की सार्थकता निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होती है:
1. परिस्थितियों से संघर्ष: कथा नायक (लेखक स्वयं) एक गरीब किसान परिवार से है। उसके पिता उसे खेत में काम करवाना चाहते हैं और पढ़ाई बंद करवा देते हैं। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी लेखक पढ़ने की इच्छा नहीं छोड़ता — यही 'जूझना' है।
2. पिता के विरोध से संघर्ष: पिता का रवैया उदासीन और विरोधी है। लेखक अपनी माँ और दत्ता जी राव की सहायता से पिता को मनाने में सफल होता है — यह भी एक प्रकार का संघर्ष है।
3. अकेलेपन और कठिनाइयों से संघर्ष: स्कूल जाने के साथ-साथ खेत में भी काम करना पड़ता है। दोनों जिम्मेदारियाँ निभाते हुए पढ़ाई जारी रखना कठिन था, फिर भी लेखक डटा रहा।
4. केंद्रीय चारित्रिक विशेषता: लेखक की सबसे बड़ी विशेषता है — अदम्य जिजीविषा और संघर्षशीलता। वह कभी निराश नहीं होता, हर बाधा को पार करता है। यही 'जूझना' उसके चरित्र का केंद्र-बिंदु है।
निष्कर्ष: 'जूझ' शीर्षक न केवल कहानी की विषयवस्तु को व्यक्त करता है, बल्कि कथा नायक की केंद्रीय चारित्रिक विशेषता — संघर्षशीलता — को भी पूरी तरह उजागर करता है। अतः यह शीर्षक पूर्णतः उचित एवं सार्थक है।
2स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ?Show solution
उत्तर:
लेखक के मन में कविता रचने का आत्मविश्वास निम्नलिखित चरणों में विकसित हुआ:
1. श्री सौदलगेकर का प्रभाव: मराठी के अध्यापक श्री सौदलगेकर कविताओं को इतने भाव-विभोर होकर, लय और ताल के साथ पढ़ाते थे कि लेखक के मन में कविता के प्रति गहरी रुचि जागृत हो गई।
2. कविताओं का कंठस्थ होना: सौदलगेकर जी की कक्षा में लेखक ने अनेक कविताएँ याद कर लीं। कविताओं की भाषा, लय, छंद और भाव उसके मन में गहरे उतर गए।
3. प्रकृति का अवलोकन: खेत में काम करते समय लेखक प्रकृति को ध्यान से देखता था — बादल, पक्षी, पेड़-पौधे आदि। इन दृश्यों को वह कविता में पढ़े गए बिंबों से जोड़ने लगा।
4. अनुकरण से सृजन की ओर: पहले लेखक ने पढ़ी हुई कविताओं की शैली में अनुकरण करने का प्रयास किया। धीरे-धीरे उसे लगा कि वह भी उसी प्रकार शब्दों को लय में पिरो सकता है।
5. सौदलगेकर जी की प्रशंसा: जब लेखक ने अपनी पहली कविता सौदलगेकर जी को दिखाई, तो उन्होंने उसकी प्रशंसा की और उसे प्रोत्साहित किया। इस प्रशंसा ने लेखक के आत्मविश्वास को दृढ़ कर दिया।
निष्कर्ष: इस प्रकार एक अच्छे शिक्षक की प्रेरणा, कविताओं के प्रति लगाव, प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन और प्रोत्साहन ने मिलकर लेखक के मन में स्वयं कविता रचने का आत्मविश्वास उत्पन्न किया।
3श्री सौदलगेकर के अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई।Show solution
उत्तर:
श्री सौदलगेकर के अध्यापन की निम्नलिखित विशेषताओं ने लेखक के मन में कविता के प्रति गहरी रुचि जगाई:
1. भाव-विभोर होकर पढ़ाना: सौदलगेकर जी कविता पढ़ाते समय स्वयं उसमें डूब जाते थे। उनके चेहरे पर भाव स्पष्ट दिखते थे, जिससे विद्यार्थी भी कविता के भाव में खिंच जाते थे।
2. लय और ताल के साथ पाठ: वे कविता को उचित लय, ताल और गति के साथ पढ़ते थे। इससे कविता संगीत की तरह कानों में रस घोलती थी और मन में बस जाती थी।
3. अर्थ को सरल बनाना: वे कठिन शब्दों और भावों को सरल भाषा में समझाते थे, जिससे कविता का अर्थ विद्यार्थियों के मन में स्पष्ट हो जाता था।
4. कविता को जीवन से जोड़ना: सौदलगेकर जी कविता के भावों को वास्तविक जीवन और प्रकृति से जोड़कर समझाते थे, जिससे कविता जीवंत लगती थी।
5. कंठस्थ कराना: वे कविताएँ याद करवाते थे। इससे कविता की भाषा और लय लेखक के मन में गहरे उतर गई।
6. प्रोत्साहन देना: जब लेखक ने स्वयं कविता लिखी, तो सौदलगेकर जी ने उसकी प्रशंसा की और आगे लिखने के लिए प्रेरित किया।
निष्कर्ष: सौदलगेकर जी एक आदर्श अध्यापक थे जो केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाते थे, बल्कि विद्यार्थियों के मन में साहित्य के प्रति सच्चा प्रेम जगाते थे। उनकी यही विशेषताएँ लेखक को कवि बनाने में सहायक सिद्ध हुईं।
4कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की धारणा में क्या बदलाव आया?Show solution
उत्तर:
कविता से पहले अकेलेपन की धारणा:
कविता से पहले लेखक के लिए अकेलापन एक कष्टदायक अनुभव था। खेत में अकेले काम करते समय, घर और स्कूल के बीच अकेले आते-जाते समय वह उदास और बोझिल महसूस करता था। अकेलापन उसे काटने को दौड़ता था। समय काटना मुश्किल लगता था और मन में निराशा घर कर लेती थी।
कविता से लगाव के बाद अकेलेपन की धारणा:
कविता के प्रति लगाव होने के बाद लेखक की अकेलेपन की धारणा पूरी तरह बदल गई:
1. अकेलापन साथी बन गया: अब अकेलेपन में वह कविताएँ याद करता, उनके भावों पर विचार करता और स्वयं नई कविताएँ रचने लगा।
2. प्रकृति से संवाद: खेत में अकेले काम करते समय वह प्रकृति के दृश्यों को देखता और उन्हें कविता में ढालने का प्रयास करता। पेड़, पक्षी, बादल — सब उसके काव्य-विषय बन गए।
3. आनंद का स्रोत: अकेलापन अब दुःख का नहीं, बल्कि सृजन और आनंद का समय बन गया।
4. आत्मनिर्भरता: कविता ने उसे मानसिक रूप से इतना समृद्ध कर दिया कि उसे बाहरी संगति की आवश्यकता कम महसूस होने लगी।
निष्कर्ष: कविता से पहले अकेलापन लेखक के लिए पीड़ादायक था, परंतु कविता के प्रति लगाव के बाद वही अकेलापन उसके लिए सृजन, चिंतन और आत्म-अभिव्यक्ति का सुनहरा अवसर बन गया।
5आपके ख्याल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था या लेखक के पिता का? तर्क सहित उत्तर दें।Show solution
उत्तर:
मेरे विचार से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था, न कि लेखक के पिता का।
लेखक के पिता का रवैया:
लेखक के पिता का मानना था कि खेती-बाड़ी ही जीवन का आधार है और पढ़ाई-लिखाई में समय और पैसा बर्बाद करना उचित नहीं। वे चाहते थे कि लेखक खेत में काम करे।
यह रवैया गलत क्यों था:
1. दूरदर्शिता का अभाव: शिक्षा व्यक्ति को आत्मनिर्भर और सक्षम बनाती है। केवल खेती पर निर्भर रहना दीर्घकालिक दृष्टि से उचित नहीं।
2. प्रतिभा की अनदेखी: लेखक में पढ़ने-लिखने की असाधारण प्रतिभा थी। उसे दबाना उसके भविष्य के साथ अन्याय था।
3. बच्चे की इच्छा की अवहेलना: बच्चे की रुचि और इच्छा को नजरअंदाज करना उसके मानसिक विकास के लिए हानिकारक है।
लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही क्यों था:
1. शिक्षा का महत्त्व: दत्ता जी राव समझते थे कि शिक्षा से ही जीवन में उन्नति संभव है।
2. प्रतिभा को पहचानना: उन्होंने लेखक की पढ़ने की लगन को पहचाना और उसे प्रोत्साहित किया।
3. व्यावहारिक समाधान: उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लेखक पढ़ाई के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियाँ भी निभाए — यह संतुलित दृष्टिकोण था।
निष्कर्ष: शिक्षा मनुष्य का सबसे बड़ा हथियार है। लेखक और दत्ता जी राव का दृष्टिकोण न केवल व्यक्तिगत विकास के लिए, बल्कि समाज के लिए भी उचित था। पिता का रवैया अल्पकालिक सोच पर आधारित था।
6दत्ता जी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि झूठ का सहारा न लेना पड़ता तो आगे का घटनाक्रम क्या होता? अनुमान लगाएँ!Show solution
उत्तर (अनुमान):
यदि लेखक और उसकी माँ झूठ का सहारा न लेते, तो संभावित घटनाक्रम इस प्रकार हो सकता था:
स्थिति 1 — पिता का विरोध जारी रहता:
लेखक के पिता स्वभाव से जिद्दी और अपनी बात पर अड़े रहने वाले थे। यदि दत्ता जी राव बिना किसी ठोस कारण के उनसे बात करते, तो पिता शायद उनकी बात को भी नजरअंदाज कर देते। लेखक की पढ़ाई फिर से बंद हो जाती।
स्थिति 2 — लेखक का भविष्य अंधकारमय होता:
पढ़ाई न होने की स्थिति में लेखक को जीवन भर खेत में ही काम करना पड़ता। उसकी साहित्यिक प्रतिभा कभी विकसित न हो पाती और वह एक महान लेखक नहीं बन पाता।
स्थिति 3 — माँ की असहायता:
माँ अकेले पिता को नहीं मना सकती थी। बिना किसी बाहरी दबाव के पिता का हठ टूटना लगभग असंभव था।
झूठ की विवशता पर विचार:
यहाँ यह भी विचारणीय है कि लेखक और माँ ने जो झूठ बोला, वह स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि एक उचित उद्देश्य — शिक्षा प्राप्त करने — के लिए बोला था। कभी-कभी परिस्थितियाँ इतनी विवश कर देती हैं कि सत्य का मार्ग बंद लगता है।
निष्कर्ष: यदि झूठ का सहारा न लिया जाता, तो संभवतः लेखक की पढ़ाई हमेशा के लिए बंद हो जाती, उसकी प्रतिभा दब जाती और हिंदी साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण आत्मकथात्मक रचना 'जूझ' कभी नहीं मिलती। यह घटना यह भी सिखाती है कि समाज में जब उचित मार्ग बंद हो जाते हैं, तो कमजोर वर्ग को विवशतावश अनुचित साधनों का सहारा लेना पड़ता है — यह व्यवस्था की विफलता है।
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