अपना मालवा-खाऊ-उजाड़ सभ्यता में
Manipur Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for अपना मालवा-खाऊ-उजाड़ सभ्यता में — Manipur Board Class 12 Hindi.
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See them allप्रश्न–अभ्यास
1मालवा में जब सब जगह बरसात की झाड़ी लगी रहती है तब मालवा के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता है?Show solution
उत्तर:
मालवा में जब चारों ओर बरसात की झड़ी लगी रहती है तब वहाँ के जनजीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:
1. प्रकृति का सौंदर्य: चारों ओर हरियाली छा जाती है, धरती हरी-भरी हो उठती है और वातावरण में एक अनोखी ताज़गी आ जाती है।
2. कृषि समृद्धि: खेत-खलिहान लहलहा उठते हैं, फसलें अच्छी होती हैं और किसानों के चेहरे पर खुशी आ जाती है।
3. जल-संग्रह: नदी, नाले और तालाब पानी से भर जाते हैं जिससे पूरे वर्ष पानी की कमी नहीं रहती।
4. उत्सव का माहौल: लोग ओटलों (मुख्यद्वार) पर बैठकर बादलों की घऊ-घऊ आवाज़ सुनते हैं, मन प्रसन्न रहता है।
5. समृद्धि का आश्वासन: 'मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर' — यह कहावत चरितार्थ होती है अर्थात् अन्न और जल दोनों की प्रचुरता रहती है।
6. सामाजिक उल्लास: लोग माता की मूर्ति स्थापित करने, पूजा-पाठ करने जैसे शुभ कार्यों की योजना बनाते हैं।
निष्कर्ष: बरसात मालवा के जनजीवन में खुशहाली, समृद्धि और उत्साह भर देती है।
2अब मालवा में बैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था। उसके क्या कारण हैं?Show solution
उत्तर:
मालवा में पहले जैसी वर्षा न होने के निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं:
1. वनों की कटाई: पहले मालवा में घने जंगल थे जो बादलों को रोककर वर्षा कराते थे। आज वे जंगल काटे जा चुके हैं जिससे वर्षा कम हो गई है।
2. औद्योगीकरण: कारखानों और उद्योगों से निकलने वाले धुएँ और प्रदूषण ने वातावरण को दूषित किया है जिससे मौसम का चक्र बिगड़ गया है।
3. कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ना: वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ने से धरती का तापमान बढ़ा है और वर्षा का स्वाभाविक चक्र बाधित हुआ है।
4. जल-स्रोतों की उपेक्षा: पहले के राजाओं ने तालाब, बावड़ियाँ और जलाशय बनवाए थे जो जल-संरक्षण में सहायक थे। आज उनकी देखभाल नहीं होती, वे नष्ट हो रहे हैं।
5. नदियों का प्रदूषण: नदियों को गंदे पानी के नाले बना दिया गया है जिससे जल-चक्र प्रभावित हुआ है।
6. खाऊ-उजाड़ सभ्यता: आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है जिससे पर्यावरण असंतुलित हो गया है।
निष्कर्ष: मनुष्य की अदूरदर्शिता और प्रकृति के प्रति लापरवाही ने मालवा की वर्षा को प्रभावित किया है।
3हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले जमाने के लोग कुछ नहीं जानते थे?Show solution
उत्तर:
आज के इंजीनियर यह समझते हैं कि केवल आधुनिक तकनीक, मशीनें और बड़े-बड़े बाँध ही जल-प्रबंधन के सही तरीके हैं। उनकी इस सोच के निम्नलिखित कारण हैं:
1. आधुनिकता का अहंकार: आज के इंजीनियर पश्चिमी शिक्षा और तकनीक से प्रभावित हैं। वे मानते हैं कि जो कुछ भी पुराना है वह अवैज्ञानिक और पिछड़ा हुआ है।
2. परंपरागत ज्ञान की अनदेखी: उन्हें पुराने तालाबों, बावड़ियों और जलाशयों की वैज्ञानिकता का ज्ञान नहीं है। वे नहीं जानते कि पुराने राजाओं ने कितनी कुशलता से जल-संरक्षण किया था।
3. दिखावे की प्रवृत्ति: बड़े-बड़े बाँध और नहरें बनाना अधिक प्रतिष्ठाजनक लगता है जबकि पुराने छोटे-छोटे तालाब और कुएँ साधारण दिखते हैं।
4. इतिहास से अनभिज्ञता: उन्हें यह नहीं पता कि विक्रमादित्य, भोज और मुंज जैसे राजाओं ने मालवा में जल-प्रबंधन की जो व्यवस्था की थी वह अत्यंत वैज्ञानिक और टिकाऊ थी।
वास्तविकता: पुराने जमाने के लोग प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जल-संरक्षण करते थे जो आज के बड़े बाँधों से कहीं अधिक प्रभावी और पर्यावरण-हितैषी था।
निष्कर्ष: आधुनिक इंजीनियरों की यह सोच उनकी संकीर्णता और परंपरागत ज्ञान के प्रति उपेक्षा का परिणाम है।
4'मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए।' पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए?Show solution
उत्तर:
लेखक का कहना है कि मालवा में विक्रमादित्य, भोज और मुंज जैसे महान राजा पश्चिम के पुनर्जागरण (रिनेसां) से बहुत पहले हो चुके थे। इन राजाओं ने पानी के रखरखाव के लिए निम्नलिखित प्रबंध किए:
1. विशाल तालाबों का निर्माण: राजा भोज ने भोपाल के पास एक विशाल तालाब बनवाया जो 'भोजताल' के नाम से प्रसिद्ध है। यह तालाब इतना बड़ा था कि उसे एक छोटे समुद्र की संज्ञा दी जाती थी।
2. बावड़ियों का निर्माण: पूरे मालवा में सैकड़ों बावड़ियाँ बनवाई गईं जो भूमिगत जल को संरक्षित करती थीं और वर्षभर पानी उपलब्ध कराती थीं।
3. नदियों पर बाँध: नदियों पर छोटे-छोटे बाँध बनाकर पानी को रोका जाता था ताकि सूखे के समय भी पानी की कमी न हो।
4. जलाशयों की श्रृंखला: पूरे क्षेत्र में एक-दूसरे से जुड़े जलाशयों की श्रृंखला बनाई गई थी जिससे एक जलाशय के भरने पर पानी दूसरे में जाता था।
5. सामुदायिक जल-प्रबंधन: जल-संरक्षण को सामाजिक दायित्व माना जाता था और पूरा समाज मिलकर तालाबों और जलाशयों की देखभाल करता था।
निष्कर्ष: इन राजाओं की दूरदर्शिता और वैज्ञानिक सोच के कारण मालवा 'डग-डग रोटी, पग-पग नीर' की धरती बना रहा।
5'हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है।' क्यों और कैसे?Show solution
उत्तर:
आज की औद्योगिक सभ्यता ने नदियों को गंदे पानी के नालों में बदल दिया है। इसके निम्नलिखित कारण और तरीके हैं:
क्यों:
1. औद्योगिक लालच: उद्योगपति अपना कचरा और रासायनिक अपशिष्ट नदियों में बहाते हैं क्योंकि इससे उनका खर्च बचता है।
2. प्रशासनिक उदासीनता: सरकार और प्रशासन नदियों की सफाई के प्रति गंभीर नहीं हैं।
3. जागरूकता की कमी: आम जनता को नदी-प्रदूषण के दुष्परिणामों की जानकारी नहीं है।
कैसे:
1. औद्योगिक कचरा: कारखानों का जहरीला रासायनिक कचरा सीधे नदियों में छोड़ा जाता है।
2. शहरी मल-जल: शहरों का गंदा पानी (सीवेज) बिना शोधन के नदियों में मिला दिया जाता है।
3. कृषि रसायन: खेतों में प्रयुक्त कीटनाशक और रासायनिक खाद बारिश के पानी के साथ बहकर नदियों में पहुँचते हैं।
4. धार्मिक कचरा: मूर्तियाँ, फूल-माला और पूजा सामग्री नदियों में विसर्जित की जाती है।
5. प्लास्टिक प्रदूषण: प्लास्टिक और अन्य अजैव पदार्थ नदियों में फेंके जाते हैं।
परिणाम: नदियों का पानी पीने योग्य नहीं रहा, जलीय जीव मर रहे हैं और नदियाँ 'सदानीरा' से 'गंदे नाले' बन गई हैं।
निष्कर्ष: यह हमारी खाऊ-उजाड़ सभ्यता का सबसे बड़ा पाप है।
6लेखक को क्यों लगता है कि 'हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है'? आप क्या मानते हैं?Show solution
उत्तर:
लेखक का मत:
लेखक को ऐसा लगने के निम्नलिखित कारण हैं:
1. प्राकृतिक संसाधनों का विनाश: औद्योगिक सभ्यता ने जंगल काटे, नदियाँ प्रदूषित कीं, तालाब पाटे और भूमि को बंजर बनाया। यह विकास नहीं, उजाड़ है।
2. पर्यावरण असंतुलन: कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों से धरती का तापमान बढ़ रहा है, ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है, मौसम का चक्र बिगड़ रहा है।
3. खाऊ प्रवृत्ति: यह सभ्यता केवल लेना जानती है, देना नहीं। प्रकृति से अंधाधुंध लेकर भविष्य को खतरे में डाल रही है।
4. असमानता: इस सभ्यता ने अमीर और गरीब के बीच की खाई को और गहरा किया है।
5. परंपरागत ज्ञान की उपेक्षा: पुराने टिकाऊ तरीकों को छोड़कर विनाशकारी तरीके अपनाए जा रहे हैं।
मेरा मत:
मैं लेखक के विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। सच्चा विकास वह है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर चले। जो विकास नदियों को नाला बना दे, जंगलों को उजाड़ दे, वायु को जहरीला बना दे — वह विकास नहीं बल्कि विनाश है। हमें ऐसी जीवन-शैली अपनानी होगी जो पर्यावरण के अनुकूल हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संसाधन बचाकर रखे।
निष्कर्ष: औद्योगिक सभ्यता की 'खाऊ-उजाड़' प्रवृत्ति को बदलकर 'टिकाऊ विकास' की ओर बढ़ना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
7धरती का वातावरण गरम क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए।Show solution
उत्तर:
धरती का वातावरण गर्म होने के कारण:
1. ग्रीनहाउस गैसें: कार्बन डाइऑक्साइड (), मीथेन (), नाइट्रस ऑक्साइड आदि गैसें वातावरण में बढ़ रही हैं। ये गैसें सूर्य की गर्मी को धरती से वापस जाने से रोकती हैं जिससे तापमान बढ़ता है।
2. औद्योगिक प्रदूषण: कारखानों, वाहनों और बिजलीघरों से निकलने वाला धुआँ वातावरण को गर्म करता है।
3. वनों की कटाई: पेड़ सोखते हैं। जंगल कटने से की मात्रा बढ़ रही है।
4. जीवाश्म ईंधन: कोयला, पेट्रोल और डीजल के जलने से भारी मात्रा में निकलती है।
परिणाम: धरती का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है जिससे — ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, मौसम का चक्र बिगड़ रहा है, बाढ़ और सूखे की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
यूरोप और अमेरिका की भूमिका:
1. सर्वाधिक उत्सर्जन: वातावरण को गर्म करने वाली गैसें सबसे अधिक अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों से निकलती हैं।
2. जिम्मेदारी से इनकार: अमेरिका यह मानने को तैयार नहीं कि धरती के गर्म होने से समस्याएँ हो रही हैं।
3. समझौते से इनकार: अमेरिका ने घोषणा की है कि वह अपनी 'खाऊ-उजाड़' जीवन-पद्धति पर कोई समझौता नहीं करेगा।
4. क्योटो प्रोटोकॉल: अमेरिका ने पर्यावरण संरक्षण के अंतर्राष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया।
निष्कर्ष: यह विडंबना है कि जो देश सबसे अधिक प्रदूषण फैलाते हैं, वे ही जिम्मेदारी लेने से मुकरते हैं। इसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है।
योग्यता-विस्तार
1क्या आपको भी पर्यावरण की चिंता है? अगर है तो किस प्रकार? अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
हाँ, मुझे भी पर्यावरण की गहरी चिंता है। आज जब मैं अपने आसपास देखता/देखती हूँ तो पाता/पाती हूँ कि —
1. वायु प्रदूषण: शहरों में साँस लेना कठिन हो गया है। वाहनों और कारखानों का धुआँ हवा को जहरीला बना रहा है।
2. जल प्रदूषण: नदियाँ और तालाब गंदे हो रहे हैं। पीने का साफ पानी मिलना मुश्किल होता जा रहा है।
3. वनों की कटाई: जंगल तेजी से कट रहे हैं जिससे वन्य जीव बेघर हो रहे हैं और वर्षा कम हो रही है।
4. जलवायु परिवर्तन: मौसम अनियमित हो गया है — कभी अत्यधिक गर्मी, कभी बेमौसम बारिश।
मैं क्या करता/करती हूँ:
- पेड़-पौधे लगाता/लगाती हूँ।
- प्लास्टिक का उपयोग कम करता/करती हूँ।
- पानी और बिजली की बचत करता/करती हूँ।
- दूसरों को भी पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करता/करती हूँ।
निष्कर्ष: पर्यावरण की रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है। यदि हम अभी नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बीमार धरती छोड़ जाएँगे।
2विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता है। खाऊ-उजाड़ सभ्यता के संदर्भ में हो रहे पर्यावरण के विनाश पर प्रकाश डालिए।Show solution
खाऊ-उजाड़ सभ्यता का अर्थ:
खाऊ-उजाड़ सभ्यता वह सभ्यता है जो केवल प्रकृति से लेना जानती है, उसे कुछ लौटाना नहीं जानती। यह सभ्यता प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करती है।
पर्यावरण विनाश के प्रमुख पहलू:
1. वायु प्रदूषण: कारखानों और वाहनों से निकलने वाली और अन्य जहरीली गैसों ने वायुमंडल को दूषित किया है। इससे ओज़ोन परत को नुकसान हो रहा है।
2. जल प्रदूषण: नदियों, तालाबों और भूजल को औद्योगिक कचरे और रासायनिक पदार्थों से प्रदूषित किया जा रहा है।
3. भूमि प्रदूषण: रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि की उर्वरता नष्ट हो रही है।
4. वनों का विनाश: उद्योगों और शहरीकरण के लिए जंगल काटे जा रहे हैं जिससे जैव विविधता खतरे में है।
5. जलवायु परिवर्तन: ग्रीनहाउस गैसों के कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है, ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है।
6. प्राकृतिक आपदाएँ: पर्यावरण असंतुलन के कारण बाढ़, सूखा, तूफान जैसी आपदाएँ बढ़ रही हैं।
निष्कर्ष: यदि इस खाऊ-उजाड़ सभ्यता पर अंकुश नहीं लगाया गया तो पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। हमें 'टिकाऊ विकास' की अवधारणा को अपनाना होगा।
3पर्यावरण को विनाश से बचाने के लिए आप क्या कर सकते हैं? उसे कैसे बचाया जा सकता है? अपने विचार लिखिए।Show solution
पर्यावरण को बचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर प्रयास करने होंगे।
व्यक्तिगत स्तर पर:
1. वृक्षारोपण: अधिक से अधिक पेड़ लगाएँ और उनकी देखभाल करें।
2. जल संरक्षण: पानी की बर्बादी रोकें, वर्षा जल संग्रह करें।
3. ऊर्जा बचत: बिजली और ईंधन का कम से कम उपयोग करें, सौर ऊर्जा अपनाएँ।
4. प्लास्टिक का त्याग: प्लास्टिक की थैलियों और वस्तुओं का उपयोग बंद करें।
5. सार्वजनिक परिवहन: निजी वाहन की जगह बस, साइकिल या पैदल चलें।
सामाजिक स्तर पर:
1. जागरूकता अभियान: लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करें।
2. तालाब-नदी सफाई: सामूहिक रूप से जल-स्रोतों की सफाई करें।
3. पारंपरिक ज्ञान: पुराने जल-संरक्षण के तरीकों को पुनः अपनाएँ।
सरकारी स्तर पर:
1. कड़े कानून: प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कड़ी कार्रवाई हो।
2. नवीकरणीय ऊर्जा: सौर, पवन और जल ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाए।
3. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक समझौतों का पालन हो।
निष्कर्ष: पर्यावरण की रक्षा के लिए हमें अपनी जीवन-शैली बदलनी होगी। 'पृथ्वी हमारी माँ है' — इस भावना को अपनाकर ही हम इसे बचा सकते हैं। याद रखें — हमें यह धरती अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली, बल्कि हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है।
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