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CBSE Class 10 Hindi - Course A — NCERT Solutions

CBSE Class 10 Hindi - Course A NCERT solutions, chapter by chapter — 216 textbook questions solved across 15 chapters. Follows the CBSE syllabus.

About these solutions

216 NCERT textbook questions for CBSE Class 10 Hindi - Course A, solved step by step across 15 chapters. Each chapter page has every exercise: half the solutions are open to read and the rest are free with a Super Tutor account.

1

सूरदास

15 questions solved

  • पद (ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी / मन की मन ही माँझ रही / हमारैं हरि हारिल की लकरी / हरि हैं राजनीति पढ़ि आए) · 15 questions
Q1.गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?

दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' (भाग्यवान) कहती हैं।

व्यंग्य का स्पष्टीकरण:
गोपियाँ उद्धव को भाग्यवान इसलिए कहती हैं क्योंकि वे प्रेम के बंधन से सर्वथा मुक्त हैं — न उनका मन किसी से जुड़ा है, न वे किसी के प्रेम में पड़े हैं। वे कमल के पत्ते की तरह जल में रहकर भी उससे अलिप्त हैं और तेल लगे घड़े की तरह प्रेम-रस से अछूते हैं।

व्यंग्य यह है कि जो व्यक्ति श्रीकृष्ण जैसे परम प्रेमास्पद के सान्निध्य में रहकर भी उनके प्रेम से वंचित रहा, वह वास्तव में अभागा है, भाग्यवान नहीं। गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कह रही हैं कि उद्धव ने कृष्ण का सामीप्य पाकर भी उनके प्रेम का रसास्वादन नहीं किया — यह उनका दुर्भाग्य है, सौभाग्य नहीं।

निष्कर्ष: 'बड़भागी' शब्द में गहरा व्यंग्य है — उद्धव प्रेम-रस से वंचित रहे, इसीलिए गोपियाँ उन्हें 'भाग्यवान' कहकर वास्तव में उनकी भावशून्यता पर कटाक्ष करती हैं।

Q2.उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?

दिया गया संदर्भ: गोपियाँ उद्धव के व्यवहार की तुलना दो वस्तुओं से करती हैं।

तुलनाएँ:

(i) कमल के पत्ते से:
जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार उद्धव कृष्ण के निकट रहते हुए भी उनके प्रेम से सर्वथा अछूते रहे। उन पर प्रेम का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

(ii) तेल लगे घड़े से:
जिस प्रकार तेल लगे घड़े पर जल की एक बूँद भी नहीं टिकती, उसी प्रकार उद्धव के हृदय पर कृष्ण-प्रेम की एक बूँद भी नहीं ठहरी। वे प्रेम-भावना से सर्वथा निर्लिप्त रहे।

निष्कर्ष: इन दोनों तुलनाओं के माध्यम से गोपियाँ उद्धव की भावशून्यता और प्रेम के प्रति उनकी उदासीनता पर व्यंग्य करती हैं।

All 15 सूरदास solutions
  • अभ्यास प्रश्न (कृतिका-2, कक्षा 10) · 12 questions
Q1.प्रस्तुत पाठ के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बच्चे का अपने पिता से अधिक जुड़ाव था, फिर भी विपदा के समय वह पिता के पास न जाकर माँ की शरण लेता है। आपकी समझ से इसकी क्या वजह हो सकती है?

दिया गया है: पाठ 'माता का अँचल' में भोलानाथ का अपने बाबूजी से गहरा लगाव दिखाया गया है — वह उनके साथ पूजा करता है, उनके साथ खेलता है, उनकी नकल उतारता है। फिर भी साँप देखकर भागने पर वह माँ की गोद में जाकर छिपता है।

कारण:

  1. माँ का आँचल सुरक्षा का प्रतीक है। बच्चे के मन में माँ की गोद सबसे सुरक्षित स्थान होती है। विपदा, भय या दर्द के समय बच्चा स्वाभाविक रूप से माँ के पास दौड़ता है क्योंकि माँ का स्पर्श, उसकी ममता और उसका आँचल तुरंत सांत्वना देते हैं।
  1. पिता का प्रेम खेल-साथी जैसा है। बाबूजी का प्रेम मित्रवत् और उत्साहवर्धक है, जबकि माँ का प्रेम करुणामय और सुरक्षात्मक है। संकट के समय बच्चे को करुणा और ममता की आवश्यकता होती है, न कि साहस की।
  1. माँ की प्रतिक्रिया तत्काल और भावनात्मक होती है। माँ बच्चे को देखते ही रो पड़ती है, उसे गले लगाती है, घावों पर हल्दी लगाती है — यह भावनात्मक सुरक्षा बच्चे को चाहिए होती है।

निष्कर्ष: पिता का प्रेम जहाँ बच्चे को साहसी और क्रियाशील बनाता है, वहीं माँ का प्रेम उसे भावनात्मक आश्रय देता है। इसीलिए विपदा में बच्चा माँ की शरण लेता है।

Q2.आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?

दिया गया है: पाठ में भोलानाथ जब भी रोता है या सिसकता है, तो अपने साथियों को देखकर उसका रोना बंद हो जाता है।

कारण:

  1. बचपन में साथियों का विशेष महत्त्व होता है। बच्चों की दुनिया उनके खेल-साथियों के इर्द-गिर्द घूमती है। साथियों को देखते ही मन में खेल, मस्ती और उत्साह की भावना जाग उठती है जो दुख को पीछे धकेल देती है।
  1. बच्चों का मन चंचल और वर्तमान में जीने वाला होता है। बच्चे अपने दुख को अधिक देर तक नहीं ढोते। साथियों की उपस्थिति उनका ध्यान तुरंत बदल देती है।
  1. साथियों के सामने रोना 'कमज़ोरी' लगती है। बच्चों में यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि वे अपने साथियों के सामने रोकर कमज़ोर नहीं दिखना चाहते।
  1. सामूहिक खेल का आकर्षण। साथियों को देखकर खेल में शामिल होने की इच्छा इतनी प्रबल हो जाती है कि सिसकना स्वतः भूल जाता है।

निष्कर्ष: बचपन में मित्रों की संगति सबसे बड़ी औषधि होती है। साथियों को देखते ही भोलानाथ का मन खेल की ओर मुड़ जाता है और दुख-दर्द पीछे छूट जाता है।

All 12 माता का अँचल-शिवपूजन सहाय solutions
  • अभ्यास प्रश्न (क्षितिज-2, कक्षा 10) · 17 questions
Q1.परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए?

उत्तर:

परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष टूटने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए—

  1. पुराना धनुष था: लक्ष्मण ने कहा कि यह धनुष बहुत पुराना था, इसलिए राम के छूते ही टूट गया। इसमें राम का कोई दोष नहीं है।
  1. बचपन में भी ऐसे धनुष तोड़े हैं: लक्ष्मण ने कहा कि बचपन में भी उन्होंने ऐसे अनेक धनुष तोड़े हैं, तब परशुराम ने क्रोध नहीं किया। इस धनुष पर इतना मोह क्यों?
  1. साधारण धनुष था: लक्ष्मण ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यह कोई विशेष धनुष नहीं था, बस एक पुरानी कमान थी जो टूट गई। इस पर इतना क्रोध उचित नहीं।
  1. राम ने जान-बूझकर नहीं तोड़ा: लक्ष्मण ने स्पष्ट किया कि राम ने जानबूझकर धनुष नहीं तोड़ा, वह तो स्वयंवर की शर्त पूरी करने के लिए धनुष उठाने गए थे और धनुष अपने आप टूट गया।

निष्कर्ष: लक्ष्मण ने अपने तर्कों से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि धनुष टूटना राम की गलती नहीं थी और परशुराम का क्रोध अनुचित है।

Q2.परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुईं उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर:

राम के स्वभाव की विशेषताएँ:

परशुराम के क्रोध करने पर राम ने अत्यंत विनम्रता और शांति से उत्तर दिया। उन्होंने परशुराम को 'गुरु' और 'पिता समान' कहकर संबोधित किया। राम ने स्वयं को परशुराम का दास बताया और कहा कि धनुष तोड़ने में उनका कोई दोष नहीं था। राम के स्वभाव की प्रमुख विशेषताएँ हैं—

  • विनम्रता: वे बड़ों के सामने सदा नम्र रहे।
  • धैर्य: क्रोध की स्थिति में भी वे शांत रहे।
  • मर्यादा का पालन: उन्होंने कभी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी।
  • सहनशीलता: परशुराम की कठोर बातें सुनकर भी वे विचलित नहीं हुए।

लक्ष्मण के स्वभाव की विशेषताएँ:

लक्ष्मण ने परशुराम के क्रोध का डटकर सामना किया। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण और तीखे वचनों से परशुराम को उत्तर दिया। लक्ष्मण के स्वभाव की प्रमुख विशेषताएँ हैं—

  • साहसी और निर्भीक: वे परशुराम जैसे महाक्रोधी ऋषि से भी नहीं डरे।
  • वाक्पटु: उन्होंने तर्कपूर्ण और व्यंग्यात्मक वचनों से परशुराम को निरुत्तर किया।
  • स्वाभिमानी: उन्होंने अपने और राम के सम्मान की रक्षा की।
  • उग्र स्वभाव: वे शीघ्र उत्तेजित हो जाते थे और अन्याय सहन नहीं करते थे।

निष्कर्ष: राम मर्यादा और विनम्रता के प्रतीक हैं जबकि लक्ष्मण साहस और स्वाभिमान के प्रतीक हैं।

All 17 तुलसीदास (राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद) solutions
  • प्रश्न-अभ्यास · 16 questions
Q1.झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था?

झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को मंत्रमुग्ध कर रहा था। उस रात वह इतनी सम्मोहित हो गई कि उसे अपने चारों ओर का सब कुछ स्थगित और अर्थहीन लगने लगा। वह अपनी चेतना, आस-पास की दुनिया और अपने भीतर-बाहर के सब अनुभवों को भूलकर सिर्फ़ उस जादुई, अतीन्द्रिय रोशनी में डूब गई थी। उसी सम्मोहन में उसके होंठों पर प्रार्थना के शब्द आने लगे—“साना-साना हाथ जोड़ि...”

All 16 साना-साना हाथ जोड़ि ...-मधु कांकरिया solutions
  • प्रश्न-उत्तर (क्षितिज-2, कक्षा 10) · 12 questions
Q1.कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?

दिया गया है: जयशंकर प्रसाद की कविता 'आत्मकथ्य' में कवि से आत्मकथा लिखने का आग्रह किया जाता है।

उत्तर:
कवि आत्मकथा लिखने से निम्नलिखित कारणों से बचना चाहता है—

  1. जीवन की असफलताएँ और दुःख: कवि का जीवन सुख-रहित रहा है। उसे जो सुख का स्वप्न था, वह कभी पूरा नहीं हुआ। ऐसे दुःखमय जीवन की कथा सुनाना उसे उचित नहीं लगता।
  1. निजी पीड़ा को उजागर न करना: कवि अपनी प्रेम-विफलता, छल-प्रपंच और व्यक्तिगत कमज़ोरियों को सार्वजनिक नहीं करना चाहता। वह नहीं चाहता कि उसकी निजी पीड़ा दूसरों के लिए हँसी का विषय बने।
  1. जीवन की सामान्यता: कवि मानता है कि उसका जीवन विशेष उपलब्धियों से रहित है — उसकी 'गागर रीती' (मन खाली) है। ऐसे जीवन की आत्मकथा दूसरों के लिए प्रेरणादायक नहीं होगी।
  1. आत्म-प्रशंसा से परहेज: कवि स्वयं की 'उज्ज्वल गाथा' गाना नहीं चाहता क्योंकि यह आत्म-प्रशंसा जैसा लगेगा।

निष्कर्ष: कवि की विनम्रता, आत्म-संकोच और जीवन की पीड़ाओं को सार्वजनिक न करने की इच्छा ही उसे आत्मकथा लिखने से रोकती है।

All 12 जयशंकर प्रसाद (आत्मकथ्य) solutions
  • अभ्यास प्रश्न · 8 questions
Q1.लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?

उत्तर:

लेखक (अज्ञेय) के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव केवल बाहरी घटना का ज्ञान कराता है — वह आँखों से देखा और कानों से सुना हुआ होता है। उससे बुद्धि तो प्रभावित होती है, किंतु हृदय की गहराइयाँ नहीं हिलतीं।

इसके विपरीत अनुभूति वह अवस्था है जब बाहरी घटना भीतर उतरकर संवेदना का हिस्सा बन जाती है — लेखक स्वयं उस पीड़ा या आनंद का भोक्ता बन जाता है। जब कोई बात केवल जानी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है, तभी वह रचना में सच्चाई और प्रामाणिकता ला सकती है।

लेखक ने हिरोशिमा का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया है कि जापान में विस्फोट-स्थल देखने पर भी उन्हें कविता नहीं सूझी, क्योंकि वह केवल प्रत्यक्ष अनुभव था। जब भारत लौटकर एक झुलसी हुई पत्थर की छाया देखकर वह पीड़ा उनके भीतर उतरी — अनुभूति बनी — तभी कविता फूटी। इसीलिए लेखक के लिए अनुभूति, प्रत्यक्ष अनुभव से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।

All 8 मैं क्यों लिखता हूँ-अज्ञेय solutions
  • उत्साह · 4 questions
  • रचना और अभिव्यक्ति (उत्साह) · 1 question
  • अट नहीं रही है · 5 questions
  • रचना और अभिव्यक्ति (अट नहीं रही है) · 1 question
Q1.कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर 'गरजने' के लिए कहता है, क्यों?

दिया गया है: कविता 'उत्साह' में कवि निराला बादल को गरजने के लिए कहते हैं।

उत्तर:
कवि बादल से गरजने के लिए इसलिए कहता है क्योंकि —

  1. सामाजिक संदर्भ में: समाज में चारों ओर निराशा, शोषण और पीड़ा व्याप्त है। लोगों के मन 'प्यासे' हैं — अर्थात् वे क्रांति और परिवर्तन के लिए तरस रहे हैं। केवल फुहार या रिमझिम से यह प्यास नहीं बुझेगी।
  1. क्रांति का आह्वान: कवि चाहता है कि बादल (क्रांतिदूत) अपनी गर्जना से सोए हुए, निराश और उदासीन लोगों को जगाए, उनमें नई चेतना और उत्साह का संचार करे।
  1. नवनिर्माण की आवश्यकता: गरजना विध्वंस और पुनर्निर्माण का प्रतीक है। पुरानी व्यवस्था को तोड़कर नई व्यवस्था लाने के लिए तीव्र और प्रचंड शक्ति की आवश्यकता है, जो केवल गर्जना से ही संभव है।

निष्कर्ष: इस प्रकार कवि बादल को क्रांति के प्रतीक के रूप में देखता है और उससे प्रचंड गर्जना का आह्वान करता है ताकि समाज में नई ऊर्जा और चेतना का उदय हो।

All 11 सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला (उत्साह / अट नहीं रही है) solutions
  • प्रश्नोत्तर · 7 questions
  • फसल — प्रश्नोत्तर · 5 questions
  • पाठेतर सक्रियता · 1 question
Q1.बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

दिया गया: कविता 'यह दंतुरित मुसकान' — नागार्जुन

उत्तर:
बच्चे की दंतुरित (नए-नए दाँतों वाली) मुसकान का कवि के मन पर अत्यंत गहरा और जादुई प्रभाव पड़ता है। कवि कहता है कि वह मुसकान इतनी मनमोहक है कि उसे देखकर पत्थर जैसा कठोर हृदय भी पिघल जाता है। कवि स्वयं को मृतक के समान मानता था, किंतु बच्चे की उस मुसकान ने उसके भीतर नई जीवन-शक्ति और चेतना का संचार कर दिया। ऐसा लगा जैसे तालाब छोड़कर कमल के फूल उसकी झोंपड़ी में खिल उठे हों। अर्थात् बच्चे की मुसकान ने कवि के निर्जीव, उदास जीवन में सौंदर्य और आनंद भर दिया।

All 13 नागार्जुन (यह दंतुरित मुसकान / फसल) solutions
  • बोध-प्रश्न एवं रचना-अभिव्यक्ति (क्षितिज-2, कक्षा 10) · 10 questions
Q1.संगतकार के माध्यम से कवि किस प्रकार के व्यक्तियों की ओर संकेत करना चाह रहा है?

दिया गया है: कविता 'संगतकार' — कवि मंगलेश डबराल

उत्तर:
संगतकार के माध्यम से कवि उन व्यक्तियों की ओर संकेत करना चाहता है जो किसी भी क्षेत्र में मुख्य व्यक्ति के पीछे रहकर उसे सफल बनाते हैं। ये लोग स्वयं प्रतिभावान होते हैं, परंतु अपनी प्रतिभा को मुख्य व्यक्ति की सफलता के लिए समर्पित कर देते हैं। ये सहयोगी, सहायक या पार्श्व-कर्मी होते हैं जो प्रसिद्धि की चाह न रखते हुए भी किसी बड़े काम को संभव बनाते हैं। कवि ऐसे निःस्वार्थ, विनम्र और समर्पित व्यक्तियों को 'मनुष्यता' का प्रतीक मानता है।

All 10 मंगलेश डबराल (संगतकार) solutions
  • Exercises · 8 questions
  • रचना और अभिव्यक्ति · 12 questions
  • भाषा-अध्ययन · 18 questions
  • पाठेतर सक्रियता · 7 questions
Q1.सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?

कहानी में कैप्टन एक बूढ़ा, लँगड़ा, फेरीवाला चश्मेवाला था। वह सेना का सेनानी नहीं था, फिर भी लोग उसे कैप्टन कहते थे क्योंकि वह स्वयं को उसी नाम से प्रस्तुत करता था और चश्मे बेचने का काम करता था। उसके व्यक्तित्व में एक अलग-सी पहचान और गरिमा थी, इसलिए यह नाम उसके साथ जुड़ गया।

All 45 स्वयं प्रकाश (नेताजी का चश्मा) solutions
  • पाठ्यपुस्तक अभ्यास प्रश्न (क्षितिज-2, कक्षा 10) · 14 questions
  • पाठेतर सक्रियता · 2 questions
Q1.खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे?

दिया गया है: बालगोबिन भगत एक गृहस्थ किसान थे, फिर भी उन्हें साधु माना जाता था।

उत्तर:
बालगोबिन भगत निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे —

  1. झूठ न बोलना: वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और खरा व्यवहार करते थे।
  2. किसी से खरा-खरा व्यवहार: किसी को धोखा नहीं देते थे।
  3. किसी की चीज़ न छूना: बिना अनुमति के किसी की वस्तु को हाथ नहीं लगाते थे।
  4. कबीर के आदर्शों पर चलना: वे कबीर को अपना 'साहब' मानते थे और उनके पदों को गाते थे।
  5. फसल पहले 'साहब' को अर्पण: खेत में जो भी उपजता, उसे पहले कबीरपंथी मठ में 'साहब' को भेंट करते और वहाँ से जो 'प्रसाद' मिलता, उसी से गुज़ारा करते।
  6. सामाजिक रूढ़ियों का विरोध: वे प्रचलित सामाजिक मान्यताओं और आडंबरों से दूर रहते थे।

इस प्रकार गृहस्थ होते हुए भी उनका आचरण, विचार और जीवन-शैली पूर्णतः साधु जैसी थी।

All 16 रामवृक्ष बेनीपुरी (बालगोबिन भगत) solutions
  • प्रश्न-अभ्यास (यशपाल) · 9 questions
Q1.लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?

दिया गया है: यशपाल की कहानी 'लखनवी अंदाज़' में लेखक और नवाब साहब एक ही रेल के डिब्बे में यात्रा कर रहे हैं।

उत्तर:
लेखक को नवाब साहब के निम्नलिखित हाव-भावों से यह महसूस हुआ कि वे बातचीत के लिए उत्सुक नहीं हैं—

  1. नज़रें फेर लेना: जब लेखक डिब्बे में दाखिल हुए तो नवाब साहब ने उनकी ओर देखकर तुरंत नज़रें खिड़की की तरफ फेर लीं, जैसे उनका आना अच्छा न लगा हो।
  2. असंतोष का भाव: नवाब साहब के चेहरे पर यह भाव स्पष्ट था कि किसी अपरिचित का एकांत में आ जाना उन्हें पसंद नहीं आया।
  3. संगति के लिए उत्साह न दिखाना: नवाब साहब ने लेखक की उपस्थिति को स्वीकार तो किया, परंतु बातचीत शुरू करने की कोई कोशिश नहीं की।
  4. खीरे में व्यस्त हो जाना: वे लेखक को अनदेखा करते हुए अपने खीरे की तैयारी में लग गए, जिससे स्पष्ट था कि वे अकेले रहना चाहते थे।

निष्कर्ष: इन सभी हाव-भावों से लेखक को स्पष्ट हो गया कि नवाब साहब उनसे बातचीत करने के इच्छुक नहीं हैं।

All 9 यशपाल (लखनवी अंदाज़) solutions
  • बोध-प्रश्न (प्रश्न 1–5) · 5 questions
  • रचना और अभिव्यक्ति (प्रश्न 6–9) · 4 questions
  • भाषा-अध्ययन (प्रश्न 10) · 1 question
Q1.लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?

दिया गया: यह प्रश्न मन्नू भंडारी की आत्मकथ्य 'एक कहानी यह भी' पर आधारित है।

उत्तर:

लेखिका मन्नू भंडारी के व्यक्तित्व पर निम्नलिखित व्यक्तियों का गहरा प्रभाव पड़ा—

  1. पिता जी का प्रभाव: पिता जी एक महत्त्वाकांक्षी, स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी विचारों वाले व्यक्ति थे। उन्होंने लेखिका में देशप्रेम, स्वाभिमान और सामाजिक चेतना के बीज बोए। वे चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर आगे बढ़े। उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता और महत्त्वाकांक्षा का प्रभाव लेखिका पर स्पष्ट दिखता है। साथ ही पिता के अहंकारी और दकियानूसी रवैये ने लेखिका को विद्रोही और स्वतंत्र सोच वाली बनाया।
  1. शीला अग्रवाल (अध्यापिका) का प्रभाव: शीला अग्रवाल लेखिका की हिंदी प्राध्यापिका थीं। उन्होंने लेखिका को साहित्य से परिचित कराया, अच्छी पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा दी और राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके प्रभाव से ही लेखिका में सामाजिक-राजनीतिक चेतना जागी और वे स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हुईं।

निष्कर्ष: इस प्रकार पिता जी ने जहाँ लेखिका को स्वाभिमान और देशप्रेम की भावना दी, वहीं शीला अग्रवाल ने उन्हें साहित्यिक एवं सामाजिक चेतना से जोड़ा। दोनों के प्रभाव ने मिलकर लेखिका के व्यक्तित्व को गढ़ा।

All 10 मन्नू भंडारी (एक कहानी यह भी) solutions
  • Exercises · 7 questions
  • रचना और अभिव्यक्ति · 3 questions
  • भाषा-अध्ययन · 2 questions
Q1.शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?

डुमराँव को शहनाई की दुनिया में इसलिए याद किया जाता है क्योंकि शहनाई बजाने में काम आने वाली रीड डुमराँव में, विशेषतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाने वाली नरकट से बनाई जाती है। साथ ही बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान भी डुमराँव ही था। इसलिए शहनाई और डुमराँव का संबंध बहुत महत्त्वपूर्ण माना गया है।

All 12 यतींद्र मिश्र (नौबतखाने में इबादत) solutions
  • प्रश्न-अभ्यास · 9 questions
  • Exercises · 1 question
Q1.लेखक की दृष्टि में 'सभ्यता' और 'संस्कृति' की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है?

दिया गया है: पाठ 'संस्कृति' में लेखक भदंत आनंद कौसल्यायन ने सभ्यता और संस्कृति की अवधारणा पर विचार किया है।

उत्तर:
लेखक की दृष्टि में 'सभ्यता' और 'संस्कृति' की सही समझ अब तक इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि लोग इन दोनों शब्दों को प्रायः एक-दूसरे का पर्याय मानकर चलते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि संस्कृति मूल है और सभ्यता उसका परिणाम। संस्कृति मनुष्य की वह आंतरिक योग्यता है जो उसे नए आविष्कार करने, त्याग करने और कल्याण की भावना से प्रेरित करती है, जबकि सभ्यता उन आविष्कारों और योग्यताओं के बाहरी परिणाम हैं — जैसे खान-पान के तरीके, वस्त्र, यातायात के साधन आदि। इसके अतिरिक्त लोग 'संस्कृति' के नाम पर पुराने कूड़े-करकट को ढोते रहते हैं और उसे ही संस्कृति समझ लेते हैं। इस भ्रम के कारण ही दोनों की सही समझ नहीं बन पाई है।

All 10 भदंत आनंद कौसल्यायन (संस्कृति) solutions

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