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Chapter 4 of 32
NCERT Solutions

साखी

Haryana Board · Class 10 · Hindi

NCERT Solutions for साखी — Haryana Board Class 10 Hindi.

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कबीर के जन्म, जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों (काशी, मगहर), और मृत्यु को दर्शाने वाली एक समयरेखा।
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16 Questions Solved · 5 Sections

प्रश्न-अभ्यास — (क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?Show solution
दिया गया विषय: मीठी वाणी का प्रभाव

उत्तर:
कबीर कहते हैं कि जब हम मीठी और विनम्र वाणी बोलते हैं तो उसका प्रभाव दो स्तरों पर पड़ता है—

1. दूसरों पर प्रभाव: मीठे वचन सुनकर सुनने वाले के मन में प्रसन्नता और शांति का अनुभव होता है। कठोर शब्द जहाँ दूसरों को पीड़ा देते हैं, वहीं मधुर वाणी उनके हृदय को सुख और संतोष प्रदान करती है।

2. स्वयं पर प्रभाव: मीठी वाणी बोलने से वक्ता के अपने मन और तन में भी शीतलता आती है। जब हम क्रोध या कटुता छोड़कर मधुर बोलते हैं, तो हमारे भीतर की उत्तेजना और तनाव समाप्त हो जाता है और मन शांत हो जाता है।

इस प्रकार मीठी वाणी एक ऐसी औषधि है जो बोलने वाले और सुनने वाले दोनों को लाभ पहुँचाती है।
2दीपक दिखाई देने पर औंधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया विषय: ज्ञान-दीपक और अज्ञान-अंधकार

उत्तर:
इस साखी में कबीर ने दीपक को ज्ञान का और अँधियारा को अज्ञान का प्रतीक माना है।

जिस प्रकार एक दीपक जलते ही कमरे का सारा अंधकार तत्काल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार जब मनुष्य के हृदय में ज्ञान का दीपक प्रज्वलित होता है तो उसके भीतर का अज्ञान, भ्रम और मोह का अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है।

कबीर का आशय है कि जब साधक को आत्म-ज्ञान या ईश्वर-ज्ञान की प्राप्ति होती है, तब उसके मन से सांसारिक माया, अहंकार और भटकाव रूपी अंधेरा मिट जाता है और वह सत्य को स्पष्ट रूप से देख पाता है। ज्ञान और अज्ञान एक साथ नहीं रह सकते — जैसे प्रकाश और अंधकार एक साथ नहीं रह सकते।
3ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?Show solution
दिया गया विषय: ईश्वर की सर्वव्यापकता और मनुष्य की अज्ञानता

उत्तर:
कबीर के अनुसार ईश्वर घट-घट में, कण-कण में व्याप्त है — वह हमारे भीतर भी है और बाहर भी। फिर भी हम उसे नहीं देख पाते, इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—

1. अज्ञान और माया: हमारा मन माया और सांसारिक मोह में इतना उलझा रहता है कि हम बाहरी वस्तुओं में ईश्वर को खोजते हैं।

2. अहंकार: 'मैं' का भाव (आपा) इतना प्रबल होता है कि वह ईश्वर और हमारे बीच पर्दा बन जाता है।

3. बाहरी खोज: जैसे कस्तूरी मृग अपनी नाभि में बसी कस्तूरी की सुगंध को वन-वन ढूँढता फिरता है, उसी प्रकार मनुष्य ईश्वर को मंदिर-मस्जिद, तीर्थ-स्थानों में बाहर खोजता है, जबकि वह उसके भीतर ही विद्यमान है।

इस प्रकार अज्ञान, अहंकार और बाहरी आडंबर के कारण हम सर्वव्यापी ईश्वर को नहीं देख पाते।
4संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया विषय: सुख-दुख का वास्तविक अर्थ

उत्तर:

सुखी व्यक्ति: कबीर के अनुसार वह व्यक्ति सुखी है जो सांसारिक मोह-माया, लालच और अहंकार से मुक्त होकर ईश्वर-भक्ति में लीन है। ऐसा व्यक्ति सांसारिक चिंताओं से निश्चिंत होकर 'सोया' हुआ है अर्थात् संसार की आसक्ति से विरक्त है।

दुखी व्यक्ति: वह व्यक्ति दुखी है जो सांसारिक विषय-वासनाओं में 'जागता' है अर्थात् जो धन, मान, यश और भोग-विलास की चिंता में रात-दिन लगा रहता है।

'सोना' और 'जागना' के प्रतीकार्थ:
- 'सोना' — सांसारिक मोह-माया और आसक्ति से विरक्ति का प्रतीक है। जो व्यक्ति संसार के प्रति उदासीन (विरक्त) है, वह 'सोया' हुआ है।
- 'जागना' — सांसारिक विषयों में सक्रिय रूप से लिप्त रहने का प्रतीक है।

प्रयोग का कारण: कबीर ने इन प्रतीकों का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि सामान्यतः 'जागना' सचेत रहने का और 'सोना' बेसुध रहने का प्रतीक माना जाता है। कबीर ने इसे उलट कर यह बताया कि जो व्यक्ति संसार में 'जागता' (लिप्त) है, वह वास्तव में अज्ञान की नींद में सोया है और जो सांसारिकता से 'सोया' (विरक्त) है, वही वास्तव में जागरूक और सुखी है।
5अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?Show solution
दिया गया विषय: स्वभाव की निर्मलता का उपाय

उत्तर:
कबीर ने अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए निंदक को निकट रखने का उपाय सुझाया है।

कबीर कहते हैं कि निंदक (आलोचना करने वाला) को अपने आँगन में कुटिया बनाकर रखना चाहिए। इसके पीछे तर्क यह है—

1. निंदक हमारी कमियों और दोषों को उजागर करता है, जिससे हमें अपनी बुराइयों का पता चलता है।
2. जब हम अपनी कमियाँ जानते हैं तो उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं।
3. निंदक बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को साफ कर देता है — अर्थात् बिना किसी बाहरी साधन के हमारे अवगुण दूर हो जाते हैं।

इस प्रकार कबीर का मानना है कि आलोचना को सकारात्मक रूप से स्वीकार करने से व्यक्ति का स्वभाव निर्मल और विनम्र बनता है।
6'ऐके अपिर पीव का, पढ़े सु पॉडित होइ'—इस पॉक्त द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?Show solution
दिया गया विषय: प्रेम का एक अक्षर पढ़ने का महत्त्व

उत्तर:
इस पंक्ति में कबीर कहते हैं — "प्रेम का एक अक्षर पढ़ने वाला ही सच्चा पंडित (विद्वान) होता है।"

कवि का आशय यह है कि बड़ी-बड़ी पोथियाँ (धर्मग्रंथ) पढ़ लेने से कोई वास्तविक ज्ञानी नहीं बनता। शास्त्रों का रटन-पाठन केवल बाहरी ज्ञान है। सच्चा ज्ञान तो ईश्वर के प्रति प्रेम में निहित है।

जो व्यक्ति ईश्वर-प्रेम के एक अक्षर को — अर्थात् प्रेम के सार को — हृदय से समझ लेता है और उसे अपने जीवन में उतार लेता है, वही सच्चा पंडित है। बाहरी पांडित्य का कोई मूल्य नहीं यदि हृदय में ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और भक्ति न हो।

कबीर यहाँ बाह्याडंबर और पुस्तकीय ज्ञान की व्यर्थता बताते हुए आंतरिक प्रेम और भक्ति को सर्वोच्च ज्ञान घोषित करते हैं।
7कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया विषय: कबीर की साखियों की भाषागत विशेषताएँ

उत्तर:
कबीर की साखियों की भाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. सधुक्कड़ी / पंचमेल खिचड़ी भाषा: कबीर की भाषा में हिंदी, राजस्थानी, पंजाबी, अवधी, ब्रज आदि अनेक भाषाओं के शब्द मिले-जुले हैं। जैसे — 'माँहि', 'नेड़ा', 'आँगणि', 'साबण', 'पीव' आदि।

2. सरलता और सहजता: भाषा अत्यंत सरल और बोलचाल की है, जो आम जनता को सहज ही समझ में आती है।

3. प्रतीकात्मकता: कबीर ने 'दीपक', 'अँधियारा', 'कस्तूरी', 'साबण', 'सोना-जागना' जैसे प्रतीकों का सुंदर प्रयोग किया है।

4. दोहा छंद: साखियाँ दोहा छंद में हैं जो संक्षिप्त किंतु गहरे अर्थ वाली हैं।

5. व्यावहारिकता: भाषा में लोकजीवन से जुड़े उदाहरण और बिंब हैं जो पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं।

6. तत्सम शब्दों का अभाव: कबीर ने संस्कृत के क्लिष्ट शब्दों से बचकर देशज और विदेशी (अरबी-फारसी) शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग किया है।

प्रश्न-अभ्यास — (ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए

1विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।Show solution
भाव स्पष्टीकरण:

इस पंक्ति में कबीर कहते हैं — "विरह रूपी साँप शरीर में बस जाए तो कोई मंत्र काम नहीं करता।"

भाव: जब किसी साधक के हृदय में ईश्वर के प्रति विरह (वियोग की पीड़ा) जाग जाती है, तो वह पीड़ा इतनी गहरी और तीव्र होती है कि उसे किसी भी उपाय से शांत नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार साँप के काटने पर यदि विष पूरे शरीर में फैल जाए तो कोई मंत्र या दवा काम नहीं करती, उसी प्रकार ईश्वर-विरह की पीड़ा इतनी व्यापक और गहरी होती है कि कोई सांसारिक सुख, भोग या उपाय उसे दूर नहीं कर सकता। यह विरह तब तक शांत नहीं होता जब तक ईश्वर की प्राप्ति न हो जाए।
2कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि।Show solution
भाव स्पष्टीकरण:

इस पंक्ति में कबीर कहते हैं — "कस्तूरी हिरण की नाभि में बसती है, पर वह उसे वन-वन में ढूँढता फिरता है।"

भाव: कस्तूरी मृग को अपनी नाभि से एक सुगंध आती है, पर वह यह नहीं जानता कि यह सुगंध उसी के भीतर से आ रही है। वह उस सुगंध के स्रोत को बाहर जंगल में खोजता भटकता रहता है।

कबीर इस उदाहरण के माध्यम से मनुष्य की स्थिति पर व्यंग्य करते हैं। ईश्वर हर मनुष्य के भीतर — उसके हृदय में — विद्यमान है, परंतु मनुष्य उसे मंदिर, मस्जिद, तीर्थ-स्थानों और बाहरी कर्मकांडों में खोजता फिरता है। अपने भीतर झाँकने की बजाय वह बाहर भटकता रहता है। यह उसकी अज्ञानता और भ्रम का परिणाम है।
3जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।Show solution
भाव स्पष्टीकरण:

इस पंक्ति में कबीर कहते हैं — "जब मेरे भीतर 'मैं' (अहंकार) था, तब ईश्वर नहीं था; अब जब ईश्वर है तो 'मैं' नहीं रहा।"

भाव: यह पंक्ति अहंकार और ईश्वर-प्राप्ति के संबंध को स्पष्ट करती है। जब तक मनुष्य के भीतर 'मैं' अर्थात् अहंकार (आपा) विद्यमान रहता है, तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं होता। अहंकार और ईश्वर एक साथ नहीं रह सकते।

जब साधक अपने अहंकार को पूरी तरह मिटा देता है — अर्थात् जब 'मैं' समाप्त हो जाता है — तभी ईश्वर का साक्षात्कार होता है। यह आत्मा और परमात्मा के मिलन की अवस्था है जहाँ व्यक्तित्व का विसर्जन होकर ईश्वर में विलीन हो जाता है। यह भाव अद्वैत दर्शन से मेल खाता है।
4पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पॉडित भया न कोइ।Show solution
भाव स्पष्टीकरण:

इस पंक्ति में कबीर कहते हैं — "बड़ी-बड़ी पोथियाँ (ग्रंथ) पढ़-पढ़कर सारा संसार मर गया, पर कोई सच्चा पंडित (ज्ञानी) नहीं बना।"

भाव: कबीर यहाँ बाह्य पुस्तकीय ज्ञान और शास्त्रों के रटन-पाठन की व्यर्थता पर प्रहार करते हैं। उनका मानना है कि केवल ग्रंथ पढ़ लेने से कोई वास्तविक ज्ञानी नहीं बनता। लोग जीवन भर शास्त्र पढ़ते रहते हैं, पर उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आता — वे उसी मोह, अहंकार और आसक्ति में जीते और मर जाते हैं।

सच्चा ज्ञान वह है जो हृदय में उतरे, जो ईश्वर-प्रेम और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाए। प्रेम का एक अक्षर समझ लेना लाखों पोथियाँ पढ़ने से श्रेष्ठ है। कबीर यहाँ आडंबरी पांडित्य का विरोध करते हैं।

भाषा अध्ययन

1पाठ में आप निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप उदाहरण के अनुसार लिखिए— उदाहरण— जिवै — जीना। औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेडा, आँगनिण, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास।Show solution
उदाहरण: जिवै — जीना

निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप—

| पाठ का शब्द | प्रचलित रूप |
|---|---|
| औरन | औरों / दूसरों |
| माँहि | में |
| देख्या | देखा |
| भुवंगम | भुजंग / साँप |
| नेडा | निकट / पास |
| आँगनिण | आँगन |
| साबण | साबुन |
| मुवा | मरा / मर गया |
| पीव | प्रिय / प्रियतम |
| जालौं | जलाऊँ |
| तास | उसको / उसके |

नोट: ये शब्द कबीर की सधुक्कड़ी भाषा के हैं जिनमें राजस्थानी, पंजाबी और ब्रज भाषा के शब्दों का मिश्रण है।

योग्यता विस्तार

1'साधु में निंदा सहन करने से विनयशीलता आती है' तथा 'व्यक्ति को मीठी व कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए'—इन विषयों पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।Show solution
संकेत बिंदु (परिचर्चा हेतु):

विषय 1 — निंदा सहन करने से विनयशीलता:
- निंदक हमारी कमियाँ बताता है जो मित्र नहीं बताते।
- आलोचना को सकारात्मक रूप से लेने से आत्म-सुधार होता है।
- निंदा सहन करने से धैर्य और विनम्रता का विकास होता है।
- कबीर का उदाहरण — निंदक नियरे राखिए।

विषय 2 — मीठी व कल्याणकारी वाणी:
- मीठी वाणी से संबंध मधुर बनते हैं।
- कटु वचन से मन आहत होता है, मीठे वचन से प्रसन्नता मिलती है।
- वाणी में शक्ति होती है — 'वाणी से वैर और वाणी से प्रेम।'
- तुलसीदास का दोहा — 'तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजत चहुँ ओर।'

निर्देश: विद्यार्थी कक्षा में इन बिंदुओं पर अपने विचार प्रस्तुत करें और उदाहरण सहित चर्चा करें।
2कस्तूरी के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।Show solution
कस्तूरी के विषय में जानकारी:

1. कस्तूरी एक सुगंधित पदार्थ है जो कस्तूरी मृग (Musk Deer) की नाभि में स्थित एक ग्रंथि से प्राप्त होता है।

2. कस्तूरी मृग मुख्यतः हिमालय के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है।

3. कस्तूरी की सुगंध अत्यंत तीव्र और मनमोहक होती है। इसका उपयोग इत्र और औषधि बनाने में होता है।

4. कस्तूरी मृग अपनी नाभि से आने वाली सुगंध को पहचान नहीं पाता और उसे वन में बाहर खोजता फिरता है — यही कबीर के दोहे का आधार है।

5. कस्तूरी मृग एक संकटग्रस्त प्रजाति है और इसका शिकार प्रतिबंधित है।

6. इसे 'मृगनाभि' भी कहते हैं।

परियोजना कार्य

1मीठी वाणी / बोली संबंधी व ईश्वर प्रेम संबंधी दोहों का संकलन कर चार्ट पर लिखकर भित्ति पत्रिका पर लगाइए।Show solution
संकेत एवं नमूना संकलन:

मीठी वाणी संबंधी दोहे:

1. कबीर — *"ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।"*

2. तुलसीदास — *"तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। वशीकरण यह मंत्र है, तजिए वचन कठोर।"*

ईश्वर प्रेम संबंधी दोहे:

1. कबीर — *"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि। प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाँहि।"*

2. कबीर — *"कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि। ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाँहि।"*

निर्देश: विद्यार्थी इन दोहों को सुंदर लेखन से चार्ट पर लिखें और कक्षा की भित्ति पत्रिका (Wall Magazine) पर लगाएँ।
2कबीर की साखियों को याद कीजिए और कक्षा में अत्याक्षरी में उनका प्रयोग कीजिए।Show solution
संकेत:

विद्यार्थी पाठ में दी गई निम्नलिखित साखियों को कंठस्थ करें और अंत्याक्षरी में प्रयोग करें—

1. *"ऐसी वाणी बोलिए..."* (वर्ण — ऐ)
2. *"निंदक नियरे राखिए..."* (वर्ण — नि)
3. *"कस्तूरी कुंडलि बसै..."* (वर्ण — क)
4. *"जब मैं था तब हरि नहीं..."* (वर्ण — ज)
5. *"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा..."* (वर्ण — प)
6. *"विरह भुवंगम तन बसै..."* (वर्ण — वि)

अंत्याक्षरी नियम: एक साखी के अंतिम वर्ण से अगली साखी शुरू होनी चाहिए। इससे स्मरण-शक्ति और भाषा-कौशल दोनों का विकास होगा।

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Frequently Asked Questions

What are the important topics in साखी for Haryana Board Class 10 Hindi?
Key topics in साखी include कबीर की साखियाँ — मुख्य विषय एवं प्रतीक, कबीर की साखियाँ — सम्पूर्ण अवधारणा मानचित्र, साखी - संपूर्ण अवधारणा मानचित्र. These are the concepts Haryana Board Class 10 examiners draw on most — study them first, then practise related questions.
How to score full marks in साखी — Haryana Board Class 10 Hindi?
Understand the core concepts first, then work through the 47 practice questions available for this chapter. Revise formulas and definitions regularly, and use flashcards for quick recall before the exam.
Where can I get free NCERT Solutions for साखी Class 10 Hindi?
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Sources & Official References

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