देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत (जयशंकर प्रसाद)
Meghalaya Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत (जयशंकर प्रसाद) — Meghalaya Board Class 12 Hindi.
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See them allदेवसेना का गीत — प्रश्न-अभ्यास
1"मैंने धर्मवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई" — पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।Show solution
इस पंक्ति में देवसेना अपने जीवन की त्रासदी को व्यक्त कर रही है। 'मधुकरियों की भीख' का अर्थ है — वह प्रेम, सुख और आनंद जो उसने जीवन भर थोड़ा-थोड़ा करके (जैसे भौंरा फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस लेता है) संचित किया था।
'धर्मवश' का अर्थ है — अपने कर्तव्य, प्रेम और समर्पण के वशीभूत होकर। देवसेना कहती है कि उसने जो भी जीवन में थोड़ा-थोड़ा सुख, प्रेम और आशा एकत्रित की थी, वह सब उसने अपने प्रिय (स्कंदगुप्त) के प्रति अपने धर्म (प्रेम-धर्म) का पालन करते हुए लुटा दी — अर्थात् व्यर्थ गँवा दी।
सारांश: देवसेना ने जीवन भर जो प्रेम और सुख की छोटी-छोटी आशाएँ संजोई थीं, वे सब अपने प्रेम-धर्म के निर्वाह में नष्ट हो गईं और उसे बदले में कुछ न मिला। यह पंक्ति उसके निःस्वार्थ प्रेम और उसकी व्यर्थता की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
2कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?Show solution
कवि जयशंकर प्रसाद ने आशा को 'बावली' (पागल) इसलिए कहा है क्योंकि आशा का स्वभाव ही विवेकहीन और अतार्किक होता है। देवसेना के संदर्भ में —
1. निरंतर प्रतीक्षा: देवसेना जानती है कि उसका प्रिय स्कंदगुप्त उसे कभी नहीं मिलेगा, फिर भी आशा उसे बार-बार प्रतीक्षा करने के लिए प्रेरित करती रही।
2. व्यर्थ उम्मीद: आशा बिना किसी आधार के, बिना किसी तर्क के मन में जीवित रहती है — ठीक एक पागल व्यक्ति की तरह जो वास्तविकता से परे रहता है।
3. निराशा का कारण: इसी बावली आशा के कारण देवसेना जीवन भर दुःख उठाती रही। यदि वह आशा न रखती तो शायद इतनी पीड़ा न होती।
निष्कर्ष: आशा को 'बावली' कहकर कवि ने यह व्यंजित किया है कि आशा तर्कहीन होती है — वह असंभव को भी संभव मानकर मनुष्य को भटकाती रहती है।
3"मैंने निज दुर्बल … होड़ लगाई" — इन पंक्तियों में 'दुर्बल पद बल' और 'हारी होड़' में निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए।Show solution
'दुर्बल पद बल' की व्यंजना:
'दुर्बल पद बल' का शाब्दिक अर्थ है — कमज़ोर पैरों का बल। यहाँ 'दुर्बल पद' देवसेना की असहाय, निर्बल और एकाकी स्थिति का प्रतीक है। वह एक साधारण, कोमल स्त्री है जिसके पास न शक्ति है, न साधन। 'बल' शब्द व्यंग्यात्मक है — उसके पास जो एकमात्र 'बल' था वह था उसका प्रेम और समर्पण, जो वास्तव में सांसारिक दृष्टि से दुर्बलता ही है।
'हारी होड़' की व्यंजना:
'हारी होड़' का अर्थ है — वह प्रतिस्पर्धा जो पहले से ही हारी हुई थी। देवसेना ने अपने दुर्बल प्रेम को लेकर जीवन की विषम परिस्थितियों से, नियति से और समय से होड़ लगाई — किंतु यह होड़ असमान थी। एक कोमल हृदय का संघर्ष क्रूर नियति से — यह तो हारनी ही थी।
समग्र व्यंजना: इन दोनों पदों में कवि ने यह व्यंजित किया है कि देवसेना का प्रेम-संघर्ष आरंभ से ही असंभव था। उसकी निर्बलता और नियति की प्रबलता के बीच की यह होड़ उसकी अवश्यंभावी पराजय की ओर संकेत करती है। यह जीवन की उस विडंबना को उजागर करता है जहाँ निष्कपट प्रेम सदा पराजित होता है।
4काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए — (क) श्रमित स्वप्न की मधुमाया ………………… तान उठाई। (ख) लौटा लो …………………………… लाज गँवाई।Show solution
भाव-सौंदर्य: इन पंक्तियों में देवसेना कहती है कि उसके थके हुए स्वप्नों की मधुर माया (मीठी कल्पनाएँ) ने उसे जीवन भर भटकाया। उसने उनींदी (अर्धनिद्रा में) अवस्था में विहाग राग की तान उठाई — अर्थात् अपने अधूरे प्रेम-स्वप्नों में ही जीती रही।
शिल्प-सौंदर्य:
- 'श्रमित स्वप्न' — विशेषण-विपर्यय (Transferred Epithet) का सुंदर प्रयोग; स्वप्न थके नहीं होते, देवसेना थकी है।
- 'मधुमाया' — श्रुतिमधुर सामासिक पद; मीठे भ्रम का बोध कराता है।
- 'उनींदी श्रुति' — मानवीकरण अलंकार।
- 'विहाग' — अर्धरात्रि का राग; अधूरेपन और विरह का प्रतीक।
- छायावादी शैली में कोमल कांत पदावली का प्रयोग।
- संगीतात्मकता और लय की दृष्टि से पंक्तियाँ अत्यंत प्रभावशाली हैं।
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(ख) 'लौटा लो … लाज गँवाई' — काव्य-सौंदर्य:
भाव-सौंदर्य: देवसेना अपनी आशा से कहती है — जो मैंने तुम्हारे कारण खोया (अपनी लाज/मान-सम्मान), वह लौटा दो। यह पंक्ति देवसेना की चरम निराशा और आत्म-समर्पण की स्थिति को व्यक्त करती है। उसे लगता है कि आशा ने उसे छला और उसकी लाज (आत्मसम्मान) गँवा दी।
शिल्प-सौंदर्य:
- 'लाज गँवाई' — व्यंजना शक्ति से युक्त; केवल सामाजिक लाज नहीं, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की हानि का बोध।
- करुण रस की प्रधानता; पाठक के हृदय को द्रवित करने में सक्षम।
- संबोधन शैली — आशा को सीधे संबोधित करना नाटकीयता उत्पन्न करता है।
- 'लौटा लो' में अनुनय-विनय का भाव; देवसेना की विवशता मार्मिक रूप से व्यक्त हुई है।
- छायावादी अभिव्यंजना-शैली का सुंदर उदाहरण।
5देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?Show solution
देवसेना जयशंकर प्रसाद के नाटक 'स्कंदगुप्त' की एक प्रमुख पात्र है। उसकी हार और निराशा के निम्नलिखित कारण हैं —
1. अपूर्ण प्रेम: देवसेना स्कंदगुप्त से एकनिष्ठ प्रेम करती थी, किंतु स्कंदगुप्त का ध्यान राष्ट्र-रक्षा और विजया की ओर था। उसका प्रेम कभी पूर्ण नहीं हो सका।
2. आशा का छलावा: उसने जीवन भर आशा के सहारे प्रतीक्षा की, किंतु वह आशा 'बावली' (व्यर्थ) सिद्ध हुई। आशा ने उसे वास्तविकता से दूर रखा।
3. जीवन-संचित सुख का व्यय: उसने जो थोड़ा-थोड़ा सुख और प्रेम जीवन में संचित किया था, वह सब प्रेम-धर्म के निर्वाह में लुटा दिया — बदले में कुछ न मिला।
4. दुर्बलता और असमान संघर्ष: उसने अपनी दुर्बलता के बावजूद नियति से होड़ लगाई, जो स्वाभाविक रूप से हारनी ही थी।
5. एकाकीपन: जीवन के अंत में वह पूर्णतः अकेली रह गई — न प्रेम मिला, न सम्मान, न सुख।
6. आत्मसम्मान की हानि: आशा के कारण उसने अपनी 'लाज' (आत्मसम्मान) भी गँवा दी।
निष्कर्ष: देवसेना की निराशा व्यक्तिगत प्रेम की विफलता के साथ-साथ उस नारी की पीड़ा का प्रतीक है जो समर्पण करती है, प्रतीक्षा करती है, किंतु नियति उसे निराश करती है।
कार्नेलिया का गीत — प्रश्न-अभ्यास
1कार्नेलिया का गीत कविता में प्रसाद ने भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?Show solution
जयशंकर प्रसाद ने इस गीत में भारत की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर संकेत किया है —
1. प्राकृतिक सौंदर्य: भारत की प्रकृति अत्यंत मनोहर है — अरुण (लालिमायुक्त) आकाश, हरी-भरी वनस्पति, मलय समीर (सुगंधित वायु), उषा की सुनहरी आभा — सब मिलकर इसे 'मधुमय' (मिठास से भरा) देश बनाते हैं।
2. आश्रय और सहारा देने की क्षमता: 'अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा' — भारत उन लोगों को भी आश्रय देता है जो अनजान हैं, भटके हुए हैं। यह भारत की उदारता और आतिथ्य-भावना का प्रतीक है।
3. जीवन-शक्ति और हरियाली: 'छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुम सारा' — भारत की धरती जीवनदायिनी है, यहाँ मंगल और शुभता का वास है।
4. स्वतंत्रता और स्वदेश-प्रेम: उड़ते पक्षी जिस दिशा में उड़ते हैं, उसे अपना घोंसला (नीड़) समझते हैं — यह भारत के प्रति स्वाभाविक आकर्षण और अपनेपन का भाव है।
5. करुणा और संवेदनशीलता: 'बरसाती आँखों के बादल बनते जहाँ भरे करुणा जल' — भारत करुणा और सहानुभूति का देश है।
6. उषा की दिव्यता: 'हेम कुंभ ले उषा सवेरे' — भारत की भोर सोने के घड़े जैसी आभायुक्त है, जो सुख और समृद्धि का प्रतीक है।
निष्कर्ष: प्रसाद ने भारत को एक ऐसे देश के रूप में चित्रित किया है जो प्राकृतिक सौंदर्य, करुणा, उदारता, जीवन-शक्ति और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है।
2'उड़ते खग' और 'बरसाती आँखों के बादल' में क्या विशेष अर्थ व्यंजित होता है?Show solution
'उड़ते खग' (उड़ते हुए पक्षी) का विशेष अर्थ यह है कि पक्षी जिस दिशा में भी उड़ते हैं, उस दिशा को अपना 'नीड़' (घोंसला/घर) समझते हैं। यहाँ 'उड़ते खग' उन लोगों के प्रतीक हैं जो भारत में आते हैं — चाहे वे किसी भी देश के हों। भारत की विशेषता यह है कि यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसे अपना घर समझने लगता है। यह भारत की आत्मीयता, उदारता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता का प्रतीक है।
इसके साथ ही 'उड़ते खग' स्वतंत्र आत्माओं के प्रतीक भी हैं जो भारत की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होती हैं।
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'बरसाती आँखों के बादल' में व्यंजित अर्थ:
'बरसाती आँखों के बादल' एक अत्यंत मार्मिक और व्यंजनापूर्ण प्रतीक है। इसका अर्थ है — वे लोग जिनकी आँखें करुणा और दुःख से भरी हैं, जो जीवन में पीड़ित और व्यथित हैं। जैसे बादल वर्षा करके धरती को तृप्त करते हैं, वैसे ही भारत उन दुःखी, पीड़ित और करुणा-भरे लोगों को सांत्वना और आश्रय देता है।
यह भारत की करुणामयी प्रकृति और उसकी मानवीय संवेदनशीलता का प्रतीक है — भारत वह स्थान है जहाँ दुःखी आत्माओं को किनारा मिलता है।
समग्र व्यंजना: दोनों प्रतीक मिलकर यह व्यंजित करते हैं कि भारत सभी के लिए — स्वतंत्र आत्माओं के लिए भी और पीड़ित हृदयों के लिए भी — एक आश्रय-स्थल है।
3काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए — हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती दुलकाती सुख मेरे / मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा।Show solution
भाव-सौंदर्य:
इन पंक्तियों में भारत की भोर (उषा) का अत्यंत मनोरम चित्रण है। कवि कहता है कि उषा सोने के घड़े (हेम कुंभ) में सुख भरकर लाती है और उसे दुलकाती (हिलाती-डुलाती, बिखेरती) है — अर्थात् प्रातःकाल की सुनहरी आभा सुख और समृद्धि का संदेश लेकर आती है। रात भर तारे जागते रहते हैं और मदिर (मस्ती भरी) नींद में ऊँघते रहते हैं — यह रात्रि और प्रभात के संधि-काल का सुंदर चित्र है।
शिल्प-सौंदर्य:
1. 'हेम कुंभ' — रूपक अलंकार; उषा की सुनहरी आभा को सोने के घड़े की उपमा दी गई है। अत्यंत सटीक और सुंदर बिम्ब।
2. 'उषा सवेरे भरती दुलकाती' — मानवीकरण अलंकार; उषा को एक माँ या सेविका के रूप में चित्रित किया गया है जो सुख का घड़ा भरकर लाती है।
3. 'मदिर ऊँघते रहते' — तारों का मानवीकरण; तारे मस्ती में ऊँघते हैं — यह अत्यंत कल्पनाशील और मनोरम चित्र है।
4. 'जगकर रजनी भर तारा' — विरोधाभास का आभास; रात भर जागना और साथ ही ऊँघना — यह रात्रि के अंतिम प्रहर की उनींदी अवस्था का सटीक चित्रण है।
5. ध्वनि-सौंदर्य: 'हेम कुंभ', 'दुलकाती', 'मदिर' जैसे शब्दों में संगीतात्मकता और लय है।
6. बिम्ब-विधान: स्वर्णिम उषा का दृश्य-बिम्ब अत्यंत जीवंत और चित्रात्मक है।
7. भाषा: तत्सम-प्रधान, परिष्कृत खड़ी बोली; छायावादी शैली की विशेषताएँ स्पष्ट हैं।
4'जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा' — पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।Show solution
इस पंक्ति में कवि जयशंकर प्रसाद ने भारत की उदारता, विशालता और आतिथ्य-भावना को व्यक्त किया है।
शाब्दिक अर्थ: 'क्षितिज' वह रेखा है जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं — यह एक अनंत, अनजान और अनिश्चित स्थान का प्रतीक है। 'अनजान क्षितिज' उन लोगों का प्रतीक है जो अपरिचित हैं, भटके हुए हैं, जिनका कोई ठिकाना नहीं।
व्यापक आशय:
1. भारत वह देश है जहाँ अनजान, भटके हुए और असहाय लोगों को भी सहारा मिलता है। यह भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना का प्रतीक है।
2. यह पंक्ति कार्नेलिया (एक विदेशी स्त्री) के मुख से कही गई है — वह स्वयं एक 'अनजान' है जिसे भारत ने सहारा दिया। अतः यह उसका व्यक्तिगत अनुभव भी है।
3. 'क्षितिज' की अनंतता भारत की विशालता और उसकी समावेशी संस्कृति का प्रतीक है — यहाँ सभी को स्थान मिलता है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति भारत को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करती है जो अपरिचितों को भी अपनाता है, भटके हुओं को राह दिखाता है और असहायों को आश्रय देता है — यही भारत की महानता है।
5कविता में व्यक्त प्रकृति-चित्रों को अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
जयशंकर प्रसाद ने इस गीत में भारत की प्रकृति के अनेक सुंदर चित्र अंकित किए हैं —
1. अरुण आकाश का चित्र:
प्रातःकाल का आकाश लालिमा (अरुण) से भरा हुआ है। यह मधुमय (मिठास से भरा) वातावरण भारत की भोर की विशेषता है।
2. तरु-शिखाओं का नृत्य:
तांबे जैसी लाल आभा (तामरस गर्भ विभा) पर वृक्षों की चोटियाँ (तरुशिखा) मनोहर ढंग से नाचती हुई प्रतीत होती हैं। यह प्रातःकालीन प्रकाश में वृक्षों के हिलने का जीवंत चित्र है।
3. हरियाली पर मंगल-कुंकुम:
हरी-भरी धरती पर जीवन बिखरा हुआ है — मानो हरियाली पर मंगल का कुंकुम छिड़का गया हो। यह भारत की उर्वर और जीवनदायिनी भूमि का चित्र है।
4. पक्षियों की उड़ान:
छोटे-छोटे इंद्रधनुष जैसे पंख फैलाए पक्षी मलय पर्वत की शीतल और सुगंधित वायु के सहारे उड़ रहे हैं। यह स्वतंत्रता और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत चित्र है।
5. करुणा-जल से भरे बादल:
बरसाती आँखों जैसे बादल करुणा के जल से भरे हुए हैं — यह वर्षा ऋतु के बादलों का मानवीकृत चित्र है।
6. लहरों का किनारे से मिलन:
अनंत (समुद्र) की लहरें किनारे से टकराती हैं — यह समुद्र-तट का गतिशील और भव्य चित्र है।
7. उषा का स्वर्णिम चित्र:
उषा सोने के घड़े (हेम कुंभ) में सुख भरकर लाती है और उसे बिखेरती है। रात भर तारे मस्ती में ऊँघते रहते हैं।
निष्कर्ष: इन सभी प्रकृति-चित्रों में प्रसाद ने भारत की प्रकृति को जीवंत, मनोरम और आत्मीय रूप में प्रस्तुत किया है।
योग्यता-विस्तार
1भोर के दृश्य को देखकर अपने अनुभव काव्यात्मक शैली में लिखिए।Show solution
यह एक रचनात्मक गतिविधि है। विद्यार्थी निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखकर काव्यात्मक शैली में लिख सकते हैं —
उदाहरण-स्वरूप काव्यांश:
धीरे-धीरे उठी उषा, लाली लेकर आई,
सोने-सी आभा बिखेर, नई सुबह मुस्काई।
चिड़ियों ने गाया गीत, पत्ते हिले मंद-मंद,
ओस की बूँदें चमकीं, जैसे मोती बेशुमार।
विद्यार्थियों के लिए सुझाव:
- प्रातःकाल के रंगों (लाल, सुनहरा, नीला) का वर्णन करें।
- पक्षियों के कलरव, ओस की बूँदों, फूलों के खिलने का चित्रण करें।
- प्रकृति का मानवीकरण करने का प्रयास करें।
- लय और तुक का ध्यान रखें।
2जयशंकर प्रसाद की काव्य रचना 'आँसू' पढ़िए।Show solution
यह एक स्वाध्याय-आधारित गतिविधि है। विद्यार्थियों को निर्देश दिया गया है कि वे जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध काव्य-रचना 'आँसू' पढ़ें।
'आँसू' के बारे में संक्षिप्त जानकारी:
- 'आँसू' जयशंकर प्रसाद की एक प्रमुख काव्य-रचना है जो वियोग-शृंगार पर आधारित है।
- इसमें प्रेम में विरह और पीड़ा की अभिव्यक्ति है।
- यह छायावादी काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- इसे पढ़कर विद्यार्थी प्रसाद की काव्य-शैली, भाव-सौंदर्य और भाषा-सौंदर्य को और गहराई से समझ सकते हैं।
3जयशंकर प्रसाद की कविता 'हमारा प्यारा भारतवर्ष' तथा रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'हिमालय के प्रति' का कक्षा में वाचन कीजिए।Show solution
यह एक सामूहिक कक्षा-गतिविधि है। विद्यार्थियों को निर्देश दिया गया है कि वे —
1. जयशंकर प्रसाद की 'हमारा प्यारा भारतवर्ष' — यह कविता भारत के प्रति प्रेम और गौरव की भावना से ओत-प्रोत है। 'कार्नेलिया के गीत' से इसकी तुलना करने पर भारत-प्रेम की भावना और गहरी समझ में आती है।
2. रामधारी सिंह दिनकर की 'हिमालय के प्रति' — यह कविता हिमालय को भारत की शक्ति, गौरव और अमरता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है।
वाचन के लाभ:
- उच्चारण और लय का अभ्यास होगा।
- राष्ट्र-प्रेम की भावना जागृत होगी।
- दो महान कवियों की शैलियों की तुलना करने का अवसर मिलेगा।
- काव्य-पाठ का आनंद प्राप्त होगा।
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