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Chapter 12 of 38
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अतीत में दबे पाँव

Meghalaya Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for अतीत में दबे पाँव — Meghalaya Board Class 12 Hindi.

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सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा के भौगोलिक स्थानों को दर्शाने वाला एक मानचित्र, जिसमें वर्तमान पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांतों को उजागर किया गया है।
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8 Questions Solved · 1 Section

अभ्यास — अतीत में दबे पाँव

1सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था। कैसे?Show solution
दिया गया है: सिंधु-सभ्यता (मुअनजो-दड़ो) के पुरातात्विक अवशेषों का अध्ययन।

उत्तर:

सिंधु-सभ्यता निश्चित रूप से साधन-संपन्न थी, इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं —

1. नगर-नियोजन: मुअनजो-दड़ो में पक्की ईंटों से बने सुनियोजित मकान, चौड़ी सड़कें और गलियाँ मिली हैं जो उस समय की समृद्धि को दर्शाती हैं।
2. जल-प्रबंधन: विशाल स्नानागार (महाकुंड), कुएँ और बेजोड़ निकासी व्यवस्था उनकी तकनीकी दक्षता और संपन्नता का प्रमाण है।
3. व्यापार एवं शिल्प: उत्कृष्ट मृद्भांड, आभूषण, मुहरें और बाट-माप के पत्थर मिले हैं जो व्यापारिक समृद्धि को सिद्ध करते हैं।

भव्यता का आडंबर न होने के प्रमाण:

- मिस्र या मेसोपोटामिया की सभ्यताओं की तरह यहाँ कोई विशाल राजमहल, भव्य मंदिर या पिरामिड नहीं मिले।
- कोई भव्य राजकीय स्मारक नहीं है जो शासक की शक्ति का प्रदर्शन करे।
- यहाँ के भवन सामान्य नागरिकों की सुविधा के लिए बने थे, न कि किसी राजा या देवता की महिमा के लिए।
- सार्वजनिक स्नानागार और जल-निकासी व्यवस्था जन-सुविधा को प्राथमिकता देती है, न कि दिखावे को।

निष्कर्ष: इस प्रकार स्पष्ट है कि सिंधु-सभ्यता के लोग साधन-संपन्न होते हुए भी व्यावहारिक और सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। उनकी समृद्धि जन-कल्याण में व्यक्त होती थी, भव्य आडंबर में नहीं।
2'सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।' ऐसा क्यों कहा गया?Show solution
दिया गया है: सिंधु-सभ्यता के अवशेषों में सौंदर्य-बोध के प्रमाण।

उत्तर:

इस कथन के पीछे निम्नलिखित तर्क हैं —

राज-पोषित न होने का कारण:
- मुअनजो-दड़ो में कोई भव्य राजमहल नहीं मिला।
- कोई ऐसी इमारत नहीं मिली जो किसी राजा की शक्ति या वैभव का प्रतीक हो।
- यहाँ का सौंदर्य किसी राजाज्ञा से नहीं, बल्कि लोगों की अपनी रुचि से उत्पन्न हुआ।

धर्म-पोषित न होने का कारण:
- यहाँ कोई विशाल मंदिर या धार्मिक स्मारक नहीं मिला।
- मिस्र की सभ्यता में जहाँ कला धर्म और देवताओं की सेवा में थी, वहीं सिंधु-सभ्यता में ऐसा नहीं था।
- धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बनाई गई भव्य संरचनाओं का अभाव है।

समाज-पोषित होने के प्रमाण:
- यहाँ मिली मुहरों, मृद्भांडों, आभूषणों और मूर्तियों में सौंदर्य-बोध स्पष्ट दिखता है।
- नर्तकी की कांस्य-मूर्ति और पुजारी की मूर्ति सामाजिक जीवन को दर्शाती हैं।
- घरों की बनावट, कुएँ, स्नानागार — सब सामान्य नागरिकों की सुविधा और सुरुचि के लिए बने हैं।
- सौंदर्य यहाँ आम जनजीवन में रचा-बसा था।

निष्कर्ष: इसीलिए कहा गया कि सिंधु-सभ्यता का सौंदर्य-बोध समाज-पोषित था — यह सौंदर्य ऊपर से थोपा हुआ नहीं, बल्कि समाज के भीतर से स्वाभाविक रूप से उभरा था।
3पुरातत्व के किन चिह्नों के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि — 'सिंधु-सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी।'Show solution
दिया गया है: मुअनजो-दड़ो के पुरातात्विक अवशेष।

उत्तर:

निम्नलिखित पुरातात्विक चिह्नों के आधार पर यह कहा जा सकता है —

1. शस्त्रों का अभाव: मुअनजो-दड़ो की खुदाई में बड़े पैमाने पर युद्ध-शस्त्र नहीं मिले। इससे स्पष्ट है कि यहाँ सैन्य शक्ति से शासन नहीं होता था।

2. किले या सैनिक छावनी का अभाव: यहाँ कोई विशाल किला या सैनिक संरचना नहीं मिली जो बलपूर्वक शासन का संकेत दे।

3. सुनियोजित नगर-व्यवस्था: सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं, नालियाँ ढकी हुई हैं — यह सब बिना सामूहिक समझ और सहयोग के संभव नहीं था।

4. एक समान भवन-निर्माण: अमीर-गरीब के घरों में बहुत अधिक अंतर नहीं दिखता। यह सामाजिक समानता और आपसी समझ का प्रतीक है।

5. सार्वजनिक सुविधाएँ: महाकुंड (सार्वजनिक स्नानागार), अन्नागार और सभा-भवन जैसी संरचनाएँ सामूहिक निर्णय और अनुशासन को दर्शाती हैं।

6. बाट-माप की एकरूपता: पूरी सभ्यता में एक जैसे बाट और माप मिले हैं जो बिना सामूहिक सहमति के लागू नहीं हो सकते।

निष्कर्ष: इन सभी प्रमाणों से सिद्ध होता है कि सिंधु-सभ्यता में अनुशासन भय या बल से नहीं, बल्कि सामूहिक समझ, सहमति और सामाजिक चेतना से आता था।
4'यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब आप को कहीं नहीं ले जातीं; वे आकाश की तरफ़ अधूरी रह जाती हैं। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं, वहाँ से आप इतिहास को नहीं उस के पार झाँक रहे हैं।' इस कथन के पीछे लेखक का क्या आशय है?Show solution
दिया गया है: लेखक ओम थानवी का मुअनजो-दड़ो के खंडहरों के संदर्भ में यह कथन।

उत्तर:

इस कथन में लेखक ने अत्यंत काव्यात्मक और दार्शनिक भाव व्यक्त किया है। इसका आशय निम्नलिखित है —

शाब्दिक अर्थ:
मुअनजो-दड़ो के खंडहरों में कुछ सीढ़ियाँ मिली हैं जो किसी भवन के आँगन की थीं। ये सीढ़ियाँ अब टूटी-फूटी हैं और किसी मंजिल तक नहीं पहुँचातीं — बस अधूरी हैं, आकाश में खुलती हैं।

गहरा आशय:

1. इतिहास से परे जाना: लेखक कहना चाहता है कि ये खंडहर केवल इतिहास के दस्तावेज नहीं हैं। इन पर खड़े होकर मनुष्य इतिहास की सीमाओं को पार कर उस काल में पहुँच जाता है जब यह सभ्यता जीवंत थी।

2. कल्पना और अनुभव की शक्ति: अधूरी सीढ़ियाँ भले ही किसी छत तक न ले जाएँ, लेकिन वे मन को उस युग तक ले जाती हैं। यह अनुभव इतिहास पढ़ने से नहीं, बल्कि उस स्थान पर खड़े होकर महसूस करने से मिलता है।

3. 'दुनिया की छत' का प्रतीक: यह पाँच हजार साल पुरानी सभ्यता मानव-इतिहास की आधारशिला है। इस पर खड़े होकर व्यक्ति समय के उस शिखर पर होता है जहाँ से मानव-सभ्यता का विस्तार दिखता है।

4. अस्तित्व की गहराई: लेखक यह भी कहना चाहता है कि खंडहर भले ही अधूरे हों, लेकिन वे हमें उस जीवन की पूर्णता का अहसास कराते हैं जो कभी यहाँ था।

निष्कर्ष: लेखक का आशय है कि इतिहास केवल तथ्यों में नहीं, बल्कि अनुभव में जीवित होता है। इन खंडहरों पर खड़े होकर हम समय की सीमाओं को लाँघ कर उस सभ्यता की धड़कन को महसूस कर सकते हैं।
5टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों का भी दस्तावेज होते हैं — इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया है: मुअनजो-दड़ो के खंडहरों के संदर्भ में यह कथन।

उत्तर:

इस कथन में लेखक ने खंडहरों के दोहरे महत्त्व को रेखांकित किया है —

पहला पक्ष — सभ्यता और संस्कृति का इतिहास:
- खंडहर हमें बताते हैं कि उस काल में नगर-नियोजन कैसा था, भवन-निर्माण की तकनीक क्या थी।
- मुहरें, मृद्भांड, आभूषण आदि उस सभ्यता की कला, व्यापार और धर्म की जानकारी देते हैं।
- ये अवशेष इतिहासकारों को किसी सभ्यता के उत्थान और पतन की कहानी सुनाते हैं।

दूसरा पक्ष — धड़कती जिंदगियों के अनछुए समय:
- खंडहर केवल राजाओं, युद्धों या धर्म की कहानी नहीं कहते — वे आम इंसान के जीवन की भी गवाही देते हैं।
- एक टूटी सीढ़ी बताती है कि कोई उस पर चढ़ता-उतरता था।
- एक पुराना कुआँ बताता है कि कोई स्त्री वहाँ पानी भरने आती थी।
- बच्चों के खिलौने, आभूषण, रसोई के बर्तन — ये सब उन साधारण लोगों की जिंदगी के अनछुए पल हैं जिनका इतिहास में कोई नाम नहीं।
- ये 'अनछुए समय' वे क्षण हैं जो किसी ग्रंथ में दर्ज नहीं हुए, लेकिन खंडहरों में आज भी जीवित हैं।

उदाहरण: मुअनजो-दड़ो में मिली नर्तकी की मूर्ति केवल कला का नमूना नहीं, बल्कि उस समाज में नृत्य-कला के प्रति प्रेम और किसी जीवंत स्त्री के अस्तित्व का प्रमाण भी है।

निष्कर्ष: खंडहर इतिहास की पाठ्यपुस्तक से कहीं अधिक हैं — वे उन असंख्य जीवनों की साँसें हैं जो कभी इन गलियों में चलती थीं। इसीलिए लेखक कहता है कि ये 'धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों का दस्तावेज' हैं।
6इस पाठ में एक ऐसे स्थान का वर्णन है जिसे बहुत कम लोगों ने देखा होगा, परंतु इससे आपके मन में उस नगर की एक तसवीर बनती है। किसी ऐसे ऐतिहासिक स्थल, जिसको आपने नजदीक से देखा हो, का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।Show solution
निर्देश: यह प्रश्न छात्र के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। नीचे एक आदर्श उत्तर का नमूना दिया जा रहा है जिसे छात्र अपने अनुभव के अनुसार बदल सकते हैं।

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आगरा का लाल किला — एक यात्रा-वृत्तांत

स्थान का परिचय:
पिछले वर्ष मैंने आगरा के लाल किले को देखा। यमुना के किनारे खड़ा यह विशाल किला मुगल साम्राज्य की शक्ति और वैभव का जीवंत प्रमाण है।

पहली दृष्टि:
जब मैं किले के मुख्य द्वार — अमर सिंह दरवाजे — के सामने खड़ा हुआ, तो लाल बलुआ पत्थर की विशाल दीवारें देखकर मन में एक अजीब-सी सिहरन हुई। ऐसा लगा जैसे समय ठहर गया हो।

भीतर का दृश्य:
किले के भीतर दीवान-ए-आम में वह संगमरमर का सिंहासन देखा जहाँ कभी बादशाह बैठकर न्याय करते थे। दीवान-ए-खास की नक्काशी इतनी बारीक थी कि आँखें थक जाएँ पर मन न भरे। मुसम्मन बुर्ज — जहाँ से शाहजहाँ ने अपनी कैद में ताजमहल को निहारा था — के पास खड़े होकर मन भावुक हो उठा।

अनुभव:
टूटे-फूटे कुछ हिस्से, पुरानी दीवारें, संकरे रास्ते — सब मिलकर एक ऐसी कहानी कहते हैं जो किताबों में नहीं मिलती। उन पत्थरों को छूकर लगा जैसे इतिहास हाथ में आ गया हो।

निष्कर्ष:
लाल किला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि सदियों के सुख-दुख, शक्ति और पतन की जीवंत गाथा है। ऐसे स्थलों को देखकर ही इतिहास सच्चे अर्थों में समझ में आता है।
7नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ निकासी व्यवस्था को देखते हुए लेखक पाठकों से प्रश्न पूछता है कि क्या हम सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कह सकते हैं? आपका जवाब लेखक के पक्ष में है या विपक्ष में? तर्क दें।Show solution
दिया गया है: सिंधु घाटी सभ्यता में जल-संबंधी संरचनाओं का विवरण।

उत्तर: (लेखक के पक्ष में)

मेरा जवाब लेखक के पक्ष में है। सिंधु घाटी सभ्यता को 'जल-संस्कृति' कहना पूर्णतः उचित है। इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क हैं —

तर्क 1 — नदी के किनारे बसाव:
मुअनजो-दड़ो सिंधु नदी के किनारे बसा था। नदी न केवल जीवन-रेखा थी, बल्कि व्यापार और कृषि का आधार भी थी। जल के बिना इस नगर की कल्पना असंभव है।

तर्क 2 — महाकुंड (विशाल स्नानागार):
मुअनजो-दड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल एक विशाल स्नानागार है। इसकी लंबाई लगभग 11.88 मीटर, चौड़ाई 7.01 मीटर और गहराई 2.43 मीटर है। यह जल के प्रति उनकी विशेष आस्था और महत्त्व को दर्शाता है।

तर्क 3 — कुओं की बहुलता:
नगर में हर मुहल्ले में कुएँ मिले हैं। अनुमान है कि पूरे नगर में सैकड़ों कुएँ थे — यह जल-प्रबंधन की असाधारण व्यवस्था है।

तर्क 4 — बेजोड़ निकासी व्यवस्था:
घरों से गंदे पानी की निकासी के लिए ढकी हुई नालियाँ बनाई गई थीं जो मुख्य नालियों से जुड़ती थीं। यह स्वच्छ जल-प्रबंधन की अद्भुत समझ को दर्शाता है।

तर्क 5 — धार्मिक-सांस्कृतिक महत्त्व:
स्नानागार का उपयोग संभवतः धार्मिक शुद्धि के लिए भी होता था, जो जल को सांस्कृतिक जीवन का केंद्र बनाता है।

निष्कर्ष: जब किसी सभ्यता की नगर-योजना, धर्म, स्वास्थ्य और दैनिक जीवन — सब कुछ जल के इर्द-गिर्द केंद्रित हो, तो उसे 'जल-संस्कृति' कहना पूर्णतः तर्कसंगत है।
8सिंधु घाटी सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला है। सिर्फ़ अवशेषों के आधार पर ही धारणा बनाई है। इस लेख में मुअनजो-दड़ो के बारे में जो धारणा व्यक्त की गई है। क्या आपके मन में इससे कोई भिन्न धारणा या भाव भी पैदा होता है? इन संभावनाओं पर कक्षा में समूह-चर्चा करें।Show solution
निर्देश: यह प्रश्न मुक्त चिंतन और समूह-चर्चा पर आधारित है। नीचे कुछ संभावित धारणाएँ और भिन्न दृष्टिकोण दिए जा रहे हैं जिन पर कक्षा में चर्चा की जा सकती है।

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लेख में व्यक्त प्रमुख धारणाएँ:
- यह सभ्यता शांतिप्रिय और लोकतांत्रिक थी।
- यहाँ कोई केंद्रीय सत्ता या राजतंत्र नहीं था।
- यह जल-संस्कृति थी।
- यहाँ का सौंदर्य-बोध समाज-पोषित था।

भिन्न धारणाएँ जो मन में उठ सकती हैं:

1. क्या यह सच में शांतिप्रिय थी?
कुछ विद्वानों का मानना है कि मुअनजो-दड़ो के अंतिम काल में हिंसा के प्रमाण मिले हैं — कुछ कंकाल सड़कों पर पड़े मिले। क्या यह किसी आक्रमण का प्रमाण है? क्या यह सभ्यता युद्ध से नष्ट हुई?

2. क्या कोई केंद्रीय सत्ता थी?
पूरी सभ्यता में एक जैसी ईंटें, एक जैसे बाट-माप — यह बिना किसी केंद्रीय नियंत्रण के कैसे संभव था? शायद कोई शक्तिशाली प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसके प्रमाण अभी नहीं मिले।

3. लिपि का रहस्य:
सिंधु लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी। जब यह पढ़ी जाएगी, तो शायद हमारी सारी धारणाएँ बदल जाएँ। हो सकता है कि यह सभ्यता उतनी सरल न हो जितनी हम सोचते हैं।

4. पतन का कारण:
क्या यह सभ्यता बाढ़ से नष्ट हुई, या जलवायु परिवर्तन से, या किसी बाहरी आक्रमण से? हर संभावना एक अलग कहानी कहती है।

5. धर्म और विश्वास:
महाकुंड को धार्मिक स्नान के लिए माना जाता है, लेकिन क्या यह केवल स्वच्छता के लिए भी हो सकता है?

समूह-चर्चा के लिए सुझाव:
- कक्षा को छोटे-छोटे समूहों में बाँटें।
- प्रत्येक समूह एक धारणा पर चर्चा करे और अपने तर्क प्रस्तुत करे।
- अंत में सभी समूह अपने निष्कर्ष साझा करें।

निष्कर्ष: चूँकि सिंधु-सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं है, इसलिए इसके बारे में कोई भी धारणा अंतिम सत्य नहीं है। यही इस सभ्यता का सबसे बड़ा रहस्य और आकर्षण है। खुले मन से सोचना और प्रश्न पूछना ही इतिहास को समझने का सही तरीका है।

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Sources & Official References

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