बनारस / दिशा (केदारनाथ सिंह) — NCERT Solutions
Meghalaya Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for बनारस / दिशा (केदारनाथ सिंह), Meghalaya Board Class 12 Hindi: 15 textbook questions solved step by step.
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प्रश्न-अभ्यास
1बनारस में वसंत का आगमन कैसे होता है और उसका क्या प्रभाव इस शहर पर पड़ता है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
बनारस में वसंत का आगमन अत्यंत धीमे और अनोखे ढंग से होता है। यहाँ वसंत किसी भव्य उत्सव की तरह नहीं, बल्कि चुपचाप, धीरे-धीरे उतरता है। वह पहले इस शहर की गलियों, घाटों और मंदिरों में प्रवेश करता है। भिखारियों के 'खाली कटोरों' में भी वसंत उतरता है, अर्थात् वसंत की बहार यहाँ के निर्धनतम जीवन को भी स्पर्श करती है।
इस शहर पर वसंत का प्रभाव यह होता है कि पूरा बनारस एक नई चेतना और स्फूर्ति से भर उठता है। पचखियाँ (अंकुरण) फूटने लगती हैं, जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। वसंत यहाँ के जड़-चेतन सभी को प्रभावित करता है — घाट, गलियाँ, मंदिर और यहाँ के निवासी सभी इस ऋतु की लय में बँध जाते हैं।
निष्कर्ष: बनारस में वसंत का आगमन इस शहर की अपनी विशिष्ट लय के अनुसार — धीरे-धीरे और गहराई से — होता है।
2'खाली कटोरों में वसंत का उतरना' से क्या आशय है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
'खाली कटोरों में वसंत का उतरना' एक अत्यंत सार्थक बिम्ब है। यहाँ 'खाली कटोरे' उन भिखारियों और निर्धन लोगों के प्रतीक हैं जो बनारस की गलियों और घाटों पर भीख माँगते हैं। उनके कटोरे रिक्त हैं — वे अभाव और दरिद्रता के प्रतीक हैं।
इस पंक्ति का आशय यह है कि वसंत की सुंदरता और उल्लास किसी भेदभाव के बिना सबके जीवन में उतरता है — चाहे वह धनी हो या निर्धन। वसंत की बहार उन खाली कटोरों में भी झाँकती है जो जीवन की रिक्तता के प्रतीक हैं। इसमें एक करुण व्यंग्य भी है — जहाँ एक ओर वसंत की सुंदरता है, वहीं दूसरी ओर मानव-जीवन की विपन्नता भी है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति बनारस की उस विशेषता को उजागर करती है जहाँ वैभव और दरिद्रता, पूर्णता और रिक्तता साथ-साथ विद्यमान हैं।
3बनारस की पूर्णता और रिक्तता को कवि ने किस प्रकार दिखाया है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
कवि केदारनाथ सिंह ने बनारस की पूर्णता और रिक्तता को एक साथ, विरोधाभासी बिम्बों के माध्यम से प्रस्तुत किया है:
पूर्णता के संदर्भ:
- बनारस एक ऐसा शहर है जो सदियों से जीवित है, जहाँ संस्कृति, धर्म, परंपरा और जीवन की पूर्णता है।
- यहाँ के घाट, मंदिर, गंगा — सब मिलकर एक परिपूर्ण सांस्कृतिक चित्र बनाते हैं।
- कवि कहता है — 'यह शहर इसी तरह खुलता है' — अर्थात् इसमें एक संपूर्णता है।
रिक्तता के संदर्भ:
- 'खाली कटोरे' निर्धनता और रिक्तता के प्रतीक हैं।
- 'अगर ध्यान से देखो तो यह शहर आधा है और आधा नहीं है' — यह पंक्ति बनारस की अधूरेपन और पूर्णता दोनों को एक साथ व्यक्त करती है।
निष्कर्ष: कवि ने बनारस को एक ऐसे शहर के रूप में चित्रित किया है जो एक साथ पूर्ण भी है और अपूर्ण भी — जहाँ जीवन और मृत्यु, वैभव और दरिद्रता, भरापन और खालीपन साथ-साथ चलते हैं।
4बनारस में धीरे-धीरे क्या-क्या होता है? 'धीरे-धीरे' से कवि इस शहर के बारे में क्या कहना चाहता है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
बनारस में धीरे-धीरे होने वाली क्रियाएँ:
- धीरे-धीरे वसंत का आना
- धीरे-धीरे सुबह का होना
- धीरे-धीरे घाटों पर जीवन का जागना
- धीरे-धीरे नावों का चलना
- धीरे-धीरे पूजा-अर्चना का होना
- धीरे-धीरे इस शहर का खुलना और बंद होना
'धीरे-धीरे' का अभिप्राय:
'धीरे-धीरे' शब्द के माध्यम से कवि बनारस की उस विशिष्ट लय और गति को व्यक्त करना चाहता है जो इसे अन्य शहरों से अलग बनाती है। बनारस आधुनिक भागदौड़ की दुनिया से परे अपनी एक शाश्वत, धीमी, लेकिन निरंतर चलने वाली लय में जीता है। यह धीमापन आलस्य नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक चेतना और सदियों पुरानी परंपरा का प्रतीक है।
निष्कर्ष: 'धीरे-धीरे' बनारस की आत्मा है — यह शहर समय की अपनी एक अलग धारा में बहता है जो न बहुत तेज़ है, न रुकती है।
5धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय में क्या-क्या बँधा है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय में बनारस का समूचा जीवन बँधा है। इस लय में निम्नलिखित तत्त्व सम्मिलित हैं:
- प्रकृति — वसंत का आना, सुबह का उगना, साँझ का ढलना।
- धार्मिक जीवन — घाटों पर पूजा-अर्चना, अर्घ्य देना, स्नान करना।
- सामाजिक जीवन — गलियों में चलना-फिरना, नावों का चलना।
- आर्थिक जीवन — भिखारियों के खाली कटोरे, दुकानों का खुलना-बंद होना।
- सांस्कृतिक जीवन — मंदिरों की घंटियाँ, शंख-ध्वनि, मंत्रोच्चार।
- समूचा शहर — कवि कहता है कि यह धीरे-धीरे होना 'समूचे शहर को' अपनी लय में बाँधे रखता है।
निष्कर्ष: बनारस की यह सामूहिक लय उसे एक जीवंत, शाश्वत और अनूठी सत्ता बनाती है जिसमें जड़-चेतन, मनुष्य-प्रकृति, धर्म-जीवन सब एक साथ बँधे हैं।
6'सई साँझ' में घुसने पर बनारस की किन-किन विशेषताओं का पता चलता है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
'सई साँझ' अर्थात् शाम की शुरुआत में बनारस में प्रवेश करने पर इस शहर की निम्नलिखित विशेषताओं का पता चलता है:
- आध्यात्मिक वातावरण: साँझ के समय घाटों पर दीप जलते हैं, आरती होती है, मंत्रोच्चार गूँजता है — यह बनारस की धार्मिक आत्मा को प्रकट करता है।
- जीवन और मृत्यु का सह-अस्तित्व: साँझ के समय एक ओर आरती की रोशनी है, दूसरी ओर मणिकर्णिका घाट पर चिताएँ जलती हैं — जीवन और मृत्यु यहाँ साथ-साथ चलते हैं।
- शहर की अपनी लय: साँझ होते ही बनारस अपनी विशेष लय में आ जाता है — घाट, गलियाँ, मंदिर सब एक विशेष रंग में रँग जाते हैं।
- अलक्षित (अज्ञात) सौंदर्य: साँझ के धुँधलके में बनारस का एक अनदेखा, रहस्यमय सौंदर्य उभरता है जो दिन के उजाले में नहीं दिखता।
- सामूहिक चेतना: साँझ के समय लोग घाटों पर एकत्र होते हैं — यह बनारस की सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।
निष्कर्ष: 'सई साँझ' में बनारस अपने सबसे प्रामाणिक और जीवंत रूप में दिखता है।
7बनारस शहर के लिए जो मानवीय क्रियाएँ इस कविता में आई हैं, उनका व्यंजनार्थ स्पष्ट कीजिए।Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
कवि ने बनारस शहर को एक जीवित मनुष्य की तरह चित्रित किया है और उसके लिए अनेक मानवीय क्रियाओं का प्रयोग किया है। यह मानवीकरण (Personification) का अलंकार है। इन क्रियाओं का व्यंजनार्थ इस प्रकार है:
| मानवीय क्रिया | व्यंजनार्थ |
|---|---|
| शहर का खुलना | बनारस का प्रतिदिन नई चेतना के साथ जागना, जीवन का नवीनीकरण |
| शहर का सुगबुगाना | बनारस की आंतरिक जीवन-शक्ति का जागरण, उसकी सजीवता |
| एक टाँग पर खड़े रहना | बनारस की अडिग, एकनिष्ठ और ध्यानमग्न स्थिति — जैसे कोई योगी एकाग्र हो |
| बेखबर रहना | बनारस का आधुनिक परिवर्तनों से निर्लिप्त रहना, अपनी परंपरा में मग्न रहना |
निष्कर्ष: इन मानवीय क्रियाओं के माध्यम से कवि यह व्यंजित करना चाहता है कि बनारस केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत, चेतन और व्यक्तित्वसंपन्न सत्ता है जो सदियों से अपनी लय में जी रही है।
8(क)शिल्प-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए — 'यह धीरे-धीरे होना ………… समूचे शहर को'Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
शिल्प-सौंदर्य:
- पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार: 'धीरे-धीरे' में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति से बनारस की मंथर, निरंतर और शाश्वत गति का बोध होता है।
- मानवीकरण (Personification): 'धीरे-धीरे होना' — शहर को एक जीवित प्राणी की तरह चित्रित किया गया है जो अपनी लय में चलता है।
- बिम्ब-योजना: 'समूचे शहर को' — यह बिम्ब बनारस की समग्रता और उसकी सामूहिक लय को एक चित्र में प्रस्तुत करता है।
- लय और प्रवाह: पंक्तियों में एक धीमी, संगीतात्मक लय है जो बनारस की गति के अनुरूप है।
- भाषा: सरल, सहज खड़ी बोली में गहरी बात कही गई है। शब्द-चयन अत्यंत सटीक है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति बनारस की उस विशिष्ट सामूहिक लय को व्यक्त करती है जिसमें पूरा शहर बँधा हुआ है।
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Frequently Asked Questions
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